पति-पत्नी के रिश्ते में काहे की हेकड़ी और कैसी अकड़ दीदी? झुकने से अगर अपना घर बचता है, तो झुक जाना कोई हार तो नहीं होती।”
तुलसी के इन सीधे, अनगढ़ और ठेठ शब्दों ने अवनि के कानों में पिघले हुए शीशे की तरह असर किया। अवनि अवाक रह गई। वह कुर्सी पर वापस बैठ गई। एक कम पढ़ी-लिखी, गरीब फूलवाली महिला उसके सामने खड़ी थी, जो मार खाने के बाद भी अपने पति की उस बुनियादी अच्छाई को नहीं भूली थी, जो इंसान के भीतर छुपी होती है।
तीस के दशक के उत्तरार्ध में कदम रख चुकी अवनि की पहचान एक बेहद सख्त, आत्मविश्वासी और आधुनिक विचारों वाली स्वतंत्र महिला की थी। उसका रहन-सहन, उसके फैसले और उसका व्यक्तित्व सब कुछ अनुशासन और स्वाभिमान की परिधि में बंधा हुआ था। मगर इस चकाचौंध के पीछे एक चुभता हुआ सन्नाटा भी था। करीब तीन साल पहले अवनि का अपने पति से तलाक हो चुका था। कारण कोई बहुत बड़ा अपराध नहीं था, बस दोनों के अहं का टकराव, एक-दूसरे के सामने न झुकने की जिद और छोटी-छोटी नोकझोंक को बर्दाश्त न कर पाने का फैसला था। अवनि मानती थी कि आत्मसम्मान से बढ़कर दुनिया में कोई रिश्ता नहीं हो सकता और अगर कोई साथी आपकी उम्मीदों पर खरा न उतरे, तो उसे अपनी ज़िंदगी से काटकर अलग कर देना ही सबसे बेहतर उपाय है।
तभी लोहे के भारी गेट के चरमराने की आवाज़ आई। हर सुबह ताजे फूलों की मालाएं और गुलदस्ते लेकर आने वाली तुलसी अंदर दाखिल हुई। तुलसी एक साधारण सी, कम पढ़ी-लिखी महिला थी, जो शहर की एक तंग बस्ती में रहती थी और सुबह-सुबह घरों में फूल पहुंचाकर तथा शाम को एक नर्सरी में पौधे तैयार करके अपना घर चलाती थी। उसका जीवन संघर्षों से भरा था, लेकिन उसके चेहरे पर हमेशा एक सहज, निश्चल मुस्कान रहती थी। आज तुलसी जब लॉन की सीढ़ियां चढ़ रही थी, तो उसकी चाल में वह सामान्य फुर्ती नहीं थी। वह थोड़ी थकी हुई और उदास लग रही थी।
“अवनि दीदी, आज गेंदे और चमेली के बहुत सुंदर फूल मिले हैं,” तुलसी ने टोकरी बरामदे के फर्श पर रखते हुए कहा।
अवनि ने जब अपना सिर उठाया, तो उसकी नज़र तुलसी की दाहिनी कलाई पर पड़ी। कलाई पर नीला निशान था और उसके चेहरे पर भी खिंचाव और पीड़ा के लक्षण साफ दिख रहे थे। अवनि ने अपनी कॉफी का मग टेबल पर रखा और फिक्रमंद लहजे में पूछा, “तुलसी, ये हाथ पर क्या हुआ है? चोट कैसे लगी?”
तुलसी ने झिझकते हुए अपनी साड़ी के पल्लू से कलाई को ढकने की कोशिश की, फिर एक गहरी सांस छोड़कर बोली, “क्या बताऊं दीदी… कल रात तो गज़ब ही हो गया। मेरे घरवाले, माधव ने फिर शराब पी ली थी। जब वह नशे में होता है, तो उसका दिमाग उसके वश में नहीं रहता। घर में आकर बहुत गाली-गलौज और चीख-पुकार करने लगा। मैंने उसे शांत कराने की कोशिश की, तो उसने मेरा हाथ मरोड़ दिया और धक्का देकर नीचे गिरा दिया। हमारे चिल्लाने की आवाज़ सुनकर पड़ोस के लोगों ने पुलिस को बुला लिया। पुलिस की गाड़ी आई और माधव को थाने ले गई। पूरी रात उसे हवालात में बंद रखा और सुना है कि पुलिस वालों ने उसे बहुत पीटा भी है। बेचारे के साथ कितना बुरा हुआ न दीदी?”
तुलसी की बात सुनकर अवनि के तन-बदन में आग लग गई। उसके भीतर का आधुनिक, स्वाभिमानी दृष्टिकोण एकदम से भड़क उठा। वह अपनी कुर्सी से उठ खड़ी हुई और कठोर स्वर में बोली, “बुरा हुआ? तुम्हारा दिमाग तो ठीक है, तुलसी? जो आदमी शराब पीकर घर में तांडव मचाता है, अपनी ही पत्नी पर हाथ उठाता है, उसके साथ अगर पुलिस ने दो डंडे बजा दिए तो इसमें बुरा क्या हुआ? यह तो बहुत अच्छा हुआ! ऐसे वहशी आदमियों के साथ यही होना चाहिए। अब उसे समझ आएगी कि कानून क्या होता है। मैं तो कहती हूं कि तुम्हें खुद जाकर उसके खिलाफ घरेलू हिंसा की सख्त धाराएं लगवानी चाहिए ताकि वह कम से कम छह महीने जेल में सड़े और कभी दोबारा तुम पर हाथ उठाने की हिम्मत न करे!”
तुलसी ने अवनि की तरफ ऐसे देखा मानो अवनि ने कोई बहुत बड़ा पाप कह दिया हो। तुलसी ने दोनों हाथ जोड़ते हुए कहा, “अरे नहीं-नहीं दीदी! भगवान के लिए ऐसा मत कहिए। अगर उसने नशे में बहककर मुझ पर हाथ उठा भी दिया, तो क्या हुआ? जब वह होश में होता है, तो मेरा कितना ख्याल रखता है! दिनभर कड़ी धूप में रिक्शा चलाता है और शाम को घर लौटते वक्त मेरी पसंद की मीठी जलेबी लाना कभी नहीं भूलता। पिछले महीने जब मुझे तेज़ बुखार था, तो पूरी-पूरी रात उसने मेरे सिर पर गीली पट्टियां रखी थीं। उसने एक गलती की, वह भी शराब की लत की वजह से, तो क्या मैं उसके साथ अपने सात फेरों के बंधन को भूल जाऊं? मेरी ज़िंदगी की डोर उसी के साथ तो बंधी है। जब सुख में उसके साथ रही, तो उसके इस बुरे वक्त में उसका साथ कैसे छोड़ दूं? और पति-पत्नी के रिश्ते में काहे की हेकड़ी और कैसी अकड़ दीदी? झुकने से अगर अपना घर बचता है, तो झुक जाना कोई हार तो नहीं होती।”
तुलसी के इन सीधे, अनगढ़ और ठेठ शब्दों ने अवनि के कानों में पिघले हुए शीशे की तरह असर किया। अवनि अवाक रह गई। वह कुर्सी पर वापस बैठ गई। एक कम पढ़ी-लिखी, गरीब फूलवाली महिला उसके सामने खड़ी थी, जो मार खाने के बाद भी अपने पति की उस बुनियादी अच्छाई को नहीं भूली थी, जो इंसान के भीतर छुपी होती है।
अवनि के भीतर विचारों का एक बवंडर उठ खड़ा हुआ। उसने अपनी ज़िंदगी के पन्नों को पलटना शुरू किया। उसका पति, समर… क्या वह सच में इतना बुरा था कि उससे नाता तोड़ लिया जाए? समर ने तो कभी उस पर हाथ भी नहीं उठाया था, कभी कोई नशा नहीं किया था। बस बात इतनी सी थी कि दोनों के करियर बहुत व्यस्त थे। एक दिन किसी पारिवारिक कार्यक्रम में जाने को लेकर दोनों में कहासुनी हो गई थी। समर ने कुछ कड़वे शब्द कह दिए थे, और अवनि ने अपनी प्रतिष्ठा और स्वाभिमान का मुद्दा बनाकर बात को इतना बढ़ा दिया कि मामला अदालत तक पहुंच गया। न समर झुका, न अवनि ने पहल की। दोनों की अपनी-अपनी ‘अकड़’ थी, अपना-अपना ‘अहं’ था। आज तुलसी की बात सुनकर अवनि को महसूस हुआ कि जिस बात को वह अपना ‘आत्मसम्मान’ समझकर सीने से लगाए बैठी थी, वह दरअसल खोखला ‘अहंकार’ था।
लेकिन कहानी का दूसरा पहलू भी अवनि के सामने स्पष्ट था। अवनि ने खुद को संभाला। उसे लगा कि तुलसी की निष्ठा और प्रेम बहुत गहरा है, मगर हिंसा को चुपचाप सहना भी किसी रिश्ते का सही समाधान नहीं हो सकता। प्यार में समर्पण होना चाहिए, मगर आत्मसमर्पण या खुद को मिटा देना नहीं। अगर माधव को केवल प्यार और माफी मिलती रही, तो वह शराब और हिंसा को अपनी आदत बना लेगा। रिश्तों को बचाने के लिए करुणा की ज़रूरत होती है, लेकिन उसे सुधारने के लिए दृढ़ता और सही मार्गदर्शन की भी आवश्यकता होती है।
अवनि ने तुलसी का हाथ अपने हाथ में लिया। उसकी आवाज़ में अब गुस्सा नहीं, बल्कि एक बड़ी बहन जैसी ममता और गंभीरता थी। “तुलसी, तुम्हारी बातें सुनकर मैं सचमुच हैरान हूँ। तुम्हारे दिल में अपने पति के लिए जो प्यार और निभाने का जज़्बा है, वह बहुत दुर्लभ है। आज के ज़माने में लोग छोटी-छोटी बातों पर रिश्ते तोड़ देते हैं, जबकि तुम इतने बड़े दर्द के बाद भी उसे अपना मान रही हो। तुम्हारी इस भावना की मैं दिल से इज़्ज़त करती हूँ। लेकिन तुलसी, एक बात मेरी भी सुनो।”
तुलसी ने सवालिया नज़रों से अवनि को देखा।
अवनि ने आगे कहा, “रिश्ते को निभाना और एक-दूसरे के लिए झुकना बहुत अच्छी बात है, लेकिन किसी की बुराई को सहते रहना उस बुराई को बढ़ावा देना होता है। तुम माधव से प्यार करती हो, यह सच है। वह भी होश में तुमसे प्यार करता है, यह भी सच है। लेकिन जब वह शराब पीता है, तो वह तुम्हारा पति नहीं, एक बीमार इंसान बन जाता है जो तुम्हें शारीरिक नुकसान पहुंचाता है। अगर आज तुमने इस मारपीट को ‘प्यार’ का हिस्सा मानकर पूरी तरह नज़रअंदाज़ कर दिया, तो कल यह नशा और यह गुस्सा और बढ़ सकता है। क्या तुम चाहती हो कि तुम्हारे प्यार का अंत किसी बहुत बड़े हादसे में हो?”
तुलसी की आँखों में चिंता की परछाई तैर गई। “नहीं दीदी… मैं तो बस यही चाहती हूँ कि वह शराब छोड़ दे और हमारा घर पहले जैसा हंसता-खेलता हो जाए। पर मैं क्या करूँ? जब भी समझाने जाती हूँ, वह चिढ़ जाता है।”
अवनि के चेहरे पर एक सुलझा हुआ संकल्प उभरा। “तुलसी, रिश्ते को तोड़ना नहीं है, रिश्ते को बचाना है। लेकिन बचाने का तरीका सिर्फ मार खाकर चुप बैठना नहीं है। आज जब वह थाने से छूटेगा, तो वह अंदर से डरा हुआ और शर्मिंदा होगा। यही सही वक्त है जब तुम्हें उसके साथ खड़े भी रहना है और उसे सही रास्ते पर भी लाना है। मैं तुम्हारे साथ थाने चलती हूँ। हम उसकी ज़मानत करवाएंगे, लेकिन एक शर्त पर।”
“कैसी शर्त दीदी?” तुलसी ने उत्सुकता से पूछा।
“शर्त यह कि वह शहर के नशामुक्ति केंद्र में भर्ती होकर अपनी इस लत का इलाज करवाएगा। हम उसे यह अहसास कराएंगे कि तुम उससे बेइंतहा प्यार करती हो, इसीलिए उसे जेल से छुड़ाने आई हो, लेकिन तुम उसकी शराब और हिंसा को कभी स्वीकार नहीं करोगी क्योंकि तुम अपने रिश्ते को बचाना चाहती हो। प्यार का मतलब सिर्फ सहना नहीं होता तुलसी, प्यार का मतलब भटकते हुए साथी को सही राह दिखाना भी होता है।”
अवनि की यह बात तुलसी के दिल में उतर गई। उसे समझ आ गया कि त्याग और कायरता में फर्क होता है। अवनि ने अपनी गाड़ी निकाली और तुलसी को साथ लेकर स्थानीय पुलिस स्टेशन पहुंची।
थाने में माधव हवालात की सलाखों के पीछे सिर झुकाए बैठा था। उसके कपड़े मैले थे, रात भर की मार और पछतावे ने उसके चेहरे का रंग उड़ा दिया था। जब उसने तुलसी को वहां देखा, तो उसकी आँखों से आंसुओं की धार बह निकली। उसे लगा था कि कल रात के उसके बर्ताव के बाद तुलसी कभी उसका मुंह नहीं देखेगी।
अवनि ने पुलिस अधिकारियों से बात की, कानूनी औपचारिकताएं पूरी कीं और अपनी पहचान व गारंटी पर माधव को रिहा करवाया। जब माधव बाहर आया, तो वह तुलसी के पैरों में गिर पड़ा। “तुलसी, मुझे माफ कर दे! मैं राक्षस बन गया था। मैंने तुझ पर हाथ उठाया, जिसने मेरे लिए अपनी पूरी ज़िंदगी लगा दी। मुझे बहुत शर्म आ रही है।”
तुलसी ने उसे उठाया, उसकी आँखों में आंसू थे लेकिन इस बार उसके चेहरे पर एक दृढ़ता थी। तुलसी ने भरे गले से कहा, “माधव, मैंने तुम्हें माफ किया क्योंकि मैं तुम्हारे बिना जीने की कल्पना भी नहीं कर सकती। लेकिन अगर तुम सच में मुझसे प्यार करते हो, तो तुम्हें इस ज़हर (शराब) को छोड़ना होगा। दीदी ने कहा है कि तुम्हें इलाज के लिए चलना होगा। अगर तुम तैयार हो, तभी हम घर चलेंगे।”
माधव ने हाथ जोड़कर अवनि और तुलसी दोनों की तरफ देखा और रोते हुए कहा, “मैं कसम खाता हूँ, मैं आज ही नशामुक्ति केंद्र जाऊंगा। मैं उस ज़हर को हाथ भी नहीं लगाऊंगा जिसने मुझसे मेरी इंसानियत छीन ली थी।”
अवनि ने दोनों को अपनी गाड़ी में बैठाया और शहर के एक अच्छे नशामुक्ति व परामर्श केंद्र में माधव का दाखिला करवाया। वहां के डॉक्टरों ने आश्वासन दिया कि उचित काउंसलिंग और दवाओं से माधव कुछ ही हफ्तों में पूरी तरह सामान्य हो जाएगा।
उस शाम जब अवनि वापस अपने घर लौटी, तो उसका मन एक अजीब से हल्केपन और सुकून से भरा हुआ था। आज उसने केवल तुलसी और माधव का घर टूटने से नहीं बचाया था, बल्कि उसके अपने भीतर जमी बर्फ भी पिघल चुकी थी।
अवनि ने अपने हाथ में फोन उठाया। उसकी उंगलियां एक ऐसे नंबर पर जाकर रुकीं, जिसे उसने पिछले तीन सालों से डायल नहीं किया था—समर का नंबर। अवनि की आँखों से एक बूंद आंसू गिरकर फोन की स्क्रीन पर फैला। उसने अपने अहं को एक तरफ रख दिया। उसने महसूस किया कि रिश्ते मुकदमों और दलीलों से नहीं, बल्कि क्षमा, समझदारी और संवाद से चलते हैं।
अवनि ने नंबर मिलाया। तीन घंटी बजने के बाद दूसरी तरफ से समर की जानी-पहचानी, हैरान आवाज़ आई, “हेलो… अवनि?”
अवनि ने एक गहरी सांस ली और चेहरे पर एक नई सुबह की मुस्कान लाते हुए कहा, “हेलो समर… कैसी हो? अगर तुम्हारे पास वक्त हो, तो क्या हम आज शाम एक कप चाय साथ पी सकते हैं? मुझे तुमसे बहुत सारी बातें करनी हैं… बिना किसी शिकायत के।”
दूसरी तरफ कुछ पलों का सन्नाटा रहा, और फिर समर की नम आवाज़ सुनाई दी, “हाँ अवनि, ज़रूर… मैं इसी दिन का इंतज़ार कर रहा था।”
सूरज ढल रहा था, लेकिन अवनि के जीवन में प्रेम, समझ और आत्मसम्मान के संतुलन की एक नई और सुनहरी भोर हो चुकी थी।
इस कहानी में जहाँ एक अनपढ़ स्त्री ने रिश्ते को निभाने का महत्व समझाया, वहीं एक पढ़ी-लिखी महिला ने उस रिश्ते को गरिमा के साथ संवारने की राह दिखाई। आपके अनुसार, क्या किसी रिश्ते को बचाने के लिए गलतियों को सुधारने का मौका देना और आपसी अहंकार को त्यागना ही सच्चा प्यार है? अपने अनमोल विचार नीचे कमेंट बॉक्स में लिखकर जरूर बताएं।
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मूल लेखक : -प्रो.शरद नारायण खरे