ममता की विरासत

मयंक बिना कुछ कहे चाची के पैरों में गिर पड़ा और उनके घुटनों पर सिर रखकर बच्चों की तरह सुबकने लगा। “मुझे माफ कर दीजिए चाची… मुझे माफ कर दीजिए। मैं भटक गया था। आपके बिना हमारा घर श्मशान जैसा है, कोई शांति नहीं है वहां। आपको कहीं नहीं जाना है। आपका घर वही है जहां आपका मयंक है।”

रश्मि ने आगे बढ़कर चाची के दोनों हाथ थाम लिए और आंसुओं के बीच बोली, “मां जी, बहू से गलती हो गई। हमें अपनी सेवा का मौका दीजिए। आपके बिना हमारा परिवार अधूरा है।”

ड्राइंग रूम में पसरा सन्नाटा किसी भारी पत्थर की तरह महसूस हो रहा था। सोफे पर पसरते हुए मयंक ने एक गहरी सांस छोड़ी, चेहरे पर थकान और एक अजीब सी बेफिक्री का भाव तैर गया। उसने मेज पर रखी चाय की प्याली उठाई, जो अब ठंडी हो चुकी थी, और सामने बैठी अपनी पत्नी रश्मि की ओर देखकर बोला, “चलो, अब जाकर चैन मिला। बड़ी चाची जी चली गईं… घर में अचानक कितनी शांति हो गई है। सच कहूं तो पिछले पंद्रह दिनों से हर बात पर टोका-टोकी से दम घुटने लगा था। अच्छा आरव बेटा, जरा मेहमान वाले कमरे में जाकर देख आओ, कहीं दादी का कोई सामान तो नहीं छूट गया?”

सात साल का आरव अपने खिलौने छोड़कर चुपचाप कमरे की तरफ बढ़ गया। रश्मि ने भी एक हल्की मुस्कान के साथ राहत की सांस भरी और आलमारी के पर्दे ठीक करने लगी। रविवार की सुबह थी, बाहर तेज धूप खिली थी और शहर की चहल-पहल अपनी रफ्तार पकड़ चुकी थी।

मयंक पटना के एक प्रतिष्ठित सरकारी संस्थान में क्लास वन अफसर था। उसका परिवार कभी बहुत साधारण था। पिता त्रिलोकीनाथ जी एक इंटर कॉलेज में शिक्षक थे और मां गिरिजा देवी घर-गृहस्थी संभालने में माहिर थीं। परिवार में त्रिलोकीनाथ जी के बड़े भाई उमाकांत जी और उनकी पत्नी जानकी चाची भी थे। दोनों भाइयों का प्रेम ऐसा था कि पूरे इलाके में मिसाल दी जाती थी। उमाकांत जी गांव में रहकर अपनी पुश्तैनी जमीन, आम के बगीचे और खेती-किसानी संभालते थे, जबकि त्रिलोकीनाथ जी शहर में बच्चों की पढ़ाई के लिए बस गए थे।

विवाह के बारह साल बीत जाने के बाद भी जब जानकी चाची की गोद सूनी रही, तो समाज के लोगों ने ताने देने में कोई कसर नहीं छोड़ी। कुटुंब के बुजुर्गों ने उमाकांत जी पर दबाव बनाया कि वे वंश चलाने के लिए दूसरा विवाह कर लें। उस दिन उमाकांत जी ने सबके सामने अपनी पत्नी के कांपते हाथों को थामा और मुस्कुराते हुए कहा था, “भगवान ने हमारी झोली में भले सीधे औलाद न डाली हो, लेकिन मेरे छोटे भाई के बच्चे क्या मेरे अपने नहीं हैं? मयंक, पल्लवी और शांतनु जब गांव की पगडंडियों पर दौड़ते हुए ‘बड़े पापा-बड़ी चाची’ कहकर लिपटते हैं, तो मेरा संसार भर जाता है। मुझे कोई दूसरा विवाह नहीं करना।” उस दिन के बाद से जानकी चाची ने भी अपने सारे अधूरे अरमान और बांझपन का दर्द समेटकर उन तीनों बच्चों की झोली में उड़ेल दिया था।

गर्मियों की छुट्टियों में जब तीनों बच्चे गांव जाते, तो जानकी चाची दिन-रात उनके मनपसंद पकवान बनाने में जुटी रहतीं। मिट्टी के चूल्हे पर बनी गुड़ की खीर, हाथ से कूटे गए आम के अचार और शुद्ध घी की सुगंध से पूरा आंगन महक उठता। बच्चे भी अपनी सगी मां से ज्यादा बड़ी चाची के पल्लू से चिपके रहते।

समय बीतता गया। मयंक ने इंजीनियरिंग पूरी करके नौकरी हासिल कर ली थी। शांतनु चार्टर्ड अकाउंटेंसी के फाइनल की तैयारी में जुटा था और सबसे छोटी बहन पल्लवी मेडिकल के तीसरे वर्ष में थी। मां गिरिजा देवी अक्सर कहा करती थीं, “बस शांतनु की नौकरी पक्की हो जाए और पल्लवी की पढ़ाई पूरी हो जाए, तो एक साथ घर में बहू का स्वागत करूंगी और बेटी को विदा करूंगी।”

मगर होनी को कुछ और ही मंजूर था। एक शाम छत पर सुखाए गए पापड़ समेटते वक्त अचानक तेज बारिश आ गई। सीढ़ियों से जल्दी-जल्दी उतरते हुए गिरिजा देवी का पैर फिसल गया और वे सीधे नीचे पत्थरों पर आ गिरीं। सिर पर गहरी चोट लगी और अस्पताल पहुंचने से पहले ही उनकी सांसों की डोर टूट गई। हंसता-खेलता परिवार एक झटके में बिखर गया।

मां के जाने के बाद घर में कोहराम मच गया। रोते-बिलखते मयंक, शांतनु और पल्लवी को तब जानकी चाची ने ही अपनी छाती से चिपटाया था। उन्होंने गांव की गृहस्थी की चिंता छोड़कर शहर का रुख किया। आंसुओं को पीकर उन्होंने चूल्हा संभाला, शांतनु की पढ़ाई के समय रात-रात भर जागकर चाय बनाई और पल्लवी के बालों में तेल लगाकर उसे मां की कमी महसूस नहीं होने दी।

मयंक का विवाह रश्मि से बड़ी धूमधाम से कराया गया। जानकी चाची ने अपनी शादी के पुश्तैनी सोने के कंगन उतारकर बहू की कलाइयों में पहना दिए थे। इसके बाद पल्लवी का ब्याह एक अच्छे डॉक्टर परिवार में हुआ और शांतनु को बेंगलुरु की एक मल्टीनेशनल कंपनी में बड़ा पद मिल गया। जब जिम्मेदारियों का बोझ कुछ हल्का हुआ, तो उमाकांत जी की तबीयत अचानक बिगड़ने लगी। चाची को वापस गांव लौटना पड़ा।

कुछ वर्षों बाद त्रिलोकीनाथ जी का देहांत हो गया। इस सदमे से उमाकांत जी भी ज्यादा दिन उबर नहीं पाए और साल भर के भीतर वे भी संसार छोड़ गए। अब गांव की विशाल हवेली में जानकी चाची बिल्कुल अकेली रह गई थीं। मयंक ने उस वक्त औपचारिकता निभाते हुए चाची से शहर चलने को कहा था, लेकिन चाची ने यह कहकर मना कर दिया कि उनके पति की यादें इसी मिट्टी में रची-बसी हैं।

हाल ही में जानकी चाची की आंखों का मोतियाबिंद का ऑपरेशन होना था। शांतनु विदेश के दौरे पर था, इसलिए मयंक उन्हें पंद्रह दिनों के लिए पटना ले आया था। ऑपरेशन तो सफल रहा, लेकिन इन पंद्रह दिनों में घर का माहौल बदल गया था। चाची की पुरानी आदतें—सुबह चार बजे उठकर भजन गाना, हर कमरे की बत्ती बुझाने को कहना, आरव को सादा खाना खाने की नसीहत देना और रश्मि को रसोई में बार-बार सलाह देना—मयंक और रश्मि को अखरने लगी थीं। उन्हें लगने लगा था कि उनके आधुनिक और व्यवस्थित जीवन में कोई अनावश्यक दखल दे रहा है।

आज सुबह ही मयंक ने गांव जाने वाली पैसेंजर ट्रेन में चाची को बैठाया था और साथ में गांव के एक परिचित को टिकट देकर भेजा था। स्टेशन से लौटकर उसने यही सोचा था कि चलो, अब जाकर शांति मिलेगी।

तभी मेहमान वाले कमरे से आरव दौड़ता हुआ आया। उसके नन्हे हाथों में मखमली कपड़े का एक पुराना डिब्बा और एक मुड़ा-तुड़ा कागज का लिफाफा था।

“पापा! देखिए, दादी की तकिए के नीचे यह डिब्बा और चिट्ठी छूट गई है,” आरव ने सांस फूलते हुए कहा।

मयंक ने अनिच्छा से वह डिब्बा लिया। डिब्बे का ढक्कन खोलते ही उसकी आंखें फटी रह गईं। अंदर एक सोने की भारी चेन और एक बैंक की पासबुक रखी थी। पासबुक पर मयंक के बेटे आरव का नाम दर्ज था और उसमें पंद्रह लाख रुपये की फिक्स्ड डिपॉजिट की रसीद नत्थी थी।

मयंक के हाथ कांपने लगे। उसने थरथराते हाथों से उस लिफाफे को खोला। उसमें चाची की कांपती लिखावट में एक पत्र था:

“प्रिय मयंक बेटा,

सदा खुश रहो और तुम्हारा परिवार फले-फूले। मैं जानती हूं कि मेरे बुढ़ापे की आदतों, मेरी खांसी और पुरानी बातों से तुम दोनों को परेशानी होती थी। जब उम्र ढलती है, तो इंसान खुद नहीं जानता कि वह कब दूसरों के लिए बोझ बन जाता है। कल रात जब तुम रश्मि से कह रहे थे कि ‘चाची के जाने के बाद घर में सुकून लौटेगा’, तो मेरी नींद खुल गई थी। मुझे बुरा नहीं लगा बेटा, क्योंकि दुनिया का यही दस्तूर है।

तुम्हारे बड़े पापा और मैंने अपनी सारी जिंदगी तुम तीनों बच्चों के नाम कर दी थी। भगवान ने हमें अपनी संतान नहीं दी, पर तुम लोगों ने कभी उस कमी का अहसास नहीं होने दिया। गांव की जमीन का जो हिस्सा तुम्हारे बड़े पापा के नाम था, उसे बेचकर मुझे जो पैसे मिले थे, वह सब मैंने आरव के भविष्य के लिए जमा कर दिए हैं। यह सोने की चेन तुम्हारी मां गिरिजा की थी, जो उसने अपनी मौत से ठीक पहले मुझे दी थी और कहा था कि जब मयंक का बेटा बड़ा हो, तो उसे पहना देना। मैं तो बस अपनी अमानत लौटाने आई थी।

मुझे गांव जाने में कोई दुख नहीं है। वहां तुम्हारे बड़े पापा की यादें हैं, पेड़-पौधे हैं, वही मेरा सहारा हैं। तुम लोग कभी परेशान मत होना। अगर कभी मेरी याद आए, तो आरव को गले लगा लेना, मुझे लगेगा कि मेरा बेटा मेरे पास है।

तुम्हारी—बड़ी चाची”

पत्र के शब्द मयंक की आंखों के सामने धुंधले होने लगे। उसकी आंखों से आंसुओं की धार बह निकली। पास खड़ी रश्मि ने जब वह पत्र पढ़ा, तो उसका सिर भी शर्म और ग्लानि से झुक गया।

मयंक को अचानक बीता हुआ कल याद आ गया—जब मां की चिता ठंडी भी नहीं हुई थी और यही चाची अपनी सूनी मांग और सफेद साड़ी के बावजूद उन तीनों भाई-बहनों को अपनी आंचल की छांव में समेटे खड़ी थीं। उन्होंने अपनी पूरी जवानी, अपनी खुशियां, अपनी भूख-प्यास सब कुछ उन पर न्योछावर कर दिया था। और बदले में मयंक ने उन्हें क्या दिया? पंद्रह दिनों की मेहमाननवाजी का ताना और उनके जाने पर ‘राहत’ की सांस!

“मैं कितना बड़ा पापी हूं रश्मि…” मयंक फफक कर रो पड़ा। “जिस औरत ने हमारी उंगली पकड़कर हमें इंसान बनाया, आज जब उन्हें हमारी जरूरत थी, तो मैंने उन्हें बेगाना कर दिया!”

रश्मि की आंखों में भी पश्चाताप के आंसू थे। उसने मयंक का हाथ पकड़ा और भरभराए गले से कहा, “मयंक, गाड़ी अभी स्टेशन से छूटी नहीं होगी… पैसेंजर ट्रेन अक्सर लेट होती है। चलिए, हम अभी चलते हैं!”

मयंक ने एक पल भी नहीं गंवाया। उसने अपनी कार की चाबी उठाई, आरव को गोद में लिया और रश्मि के साथ तेजी से बाहर निकल पड़ा। रास्ते भर मयंक ईश्वर से केवल यही प्रार्थना कर रहा था कि ट्रेन न छूटी हो।

स्टेशन पर पहुंचकर मयंक पागलों की तरह प्लेटफॉर्म नंबर तीन की ओर दौड़ा। ट्रेन बस सीटी बजाकर सरकने ही वाली थी। खिड़की के पास बैठी जानकी चाची अपनी धुंधली आंखों से स्टेशन की भीड़ को एकटक देख रही थीं, उनके चेहरे पर वही शांत और ममतामयी भाव था।

“चाची जी!” मयंक की चीख ट्रेन के शोर में गूंज उठी।

उसने लपक कर डिब्बे का दरवाजा पकड़ा और अंदर दाखिल हो गया। जानकी चाची चौंक गईं, “अरे मयंक बेटा! तुम यहां? क्या हुआ? आरव ठीक है न?”

मयंक बिना कुछ कहे चाची के पैरों में गिर पड़ा और उनके घुटनों पर सिर रखकर बच्चों की तरह सुबकने लगा। “मुझे माफ कर दीजिए चाची… मुझे माफ कर दीजिए। मैं भटक गया था। आपके बिना हमारा घर श्मशान जैसा है, कोई शांति नहीं है वहां। आपको कहीं नहीं जाना है। आपका घर वही है जहां आपका मयंक है।”

रश्मि ने आगे बढ़कर चाची के दोनों हाथ थाम लिए और आंसुओं के बीच बोली, “मां जी, बहू से गलती हो गई। हमें अपनी सेवा का मौका दीजिए। आपके बिना हमारा परिवार अधूरा है।”

जानकी चाची की सूखी आंखों में ममता का सैलाब उमड़ पड़ा। उन्होंने कांपते हाथों से मयंक और रश्मि के सिर पर हाथ फेरा और उन्हें उठाकर अपने सीने से लगा लिया। ट्रेन धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी, लेकिन मयंक ने चाची का छोटा सा संदूक उठाया और उन्हें सम्मानपूर्वक नीचे उतार लिया।

शाम ढलते-ढलते जब वे सब वापस घर लौटे, तो घर का कोना-कोना सचमुच खिल उठा था। आरव अपनी दादी की गोद में बैठकर कहानियां सुन रहा था और रसोई से चाय की भीनी खुशबू आ रही थी। मयंक ने खिड़की से बाहर देखते हुए महसूस किया कि असली सुकून अपनों को दूर भेजने में नहीं, बल्कि उनके त्याग का मान रखकर उन्हें सीने से लगाने में है।

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माता-पिता और बुजुर्गों का त्याग अनमोल होता है। अक्सर हम अपनी व्यस्त और आधुनिक जीवनशैली में उनकी भावनाओं और पुराने संस्कारों को बोझ समझने की भूल कर बैठते हैं। क्या बुजुर्गों का टोकना सचमुच दखलंदाजी है या वह उनका असीम प्यार है? आपकी इस बारे में क्या राय है, हमें अपनी टिप्पणी के माध्यम से जरूर बताएं।

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मूल लेखिका : विभा गुप्ता

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