ज़हर का प्याला

 “मैं बिल्कुल पूरे होश-ओ-हवास में हूँ अनिरुद्ध,” गरिमा ने बिना पलक झपकाए कहा। “तुमने अभी-अभी कहा ना कि यह तुम्हारी ज़िंदगी है, अपनी कमाई है और तनाव मिटाने के लिए पीते हो। तो सुनो, तनाव मुझे भी है। सुबह पाँच बजे उठने से लेकर रात के ग्यारह बजे तक, घर का हर कोना साफ करने, तुम्हारी दवाइयों का ध्यान रखने, आरव की पढ़ाई की चिंता करने, समाज के तानों को झेलने और तुम्हारी इस लत के कारण हर रात घुट-घुट कर मरने का तनाव मुझे भी है। अगर शराब ही तनाव मिटाने की सबसे बेहतरीन दवा है, तो यह दवा आज से मैं भी लूँगी।”

गरिमा रसोई की स्लैब पर हाथ टिकाए गैस पर चढ़ी चाय की केतली को एकटक देख रही थी, लेकिन उसका ध्यान चाय पर नहीं, बल्कि हॉल में बजती उस घड़ी की टिक-टिक पर था जो ठीक आठ बजा चुकी थी। आठ बजने का मतलब था—मुख्य दरवाज़े की कुंडी का खड़कना, भारी कदमों की गूँज और फिर घर की फिज़ा में शराब की बदबू का घुल जाना।

गरिमा और अनिरुद्ध के विवाह को चौदह वर्ष बीत चुके थे। बारह वर्ष का एक होनहार बेटा था—आरव। अनिरुद्ध एक जानी-मानी टेक्सटाइल फर्म में ऊँचे ओहदे पर तैनात था। बाहर की दुनिया उसे एक शालीन, बेहद समझदार और सफल इंसान के रूप में जानती थी, लेकिन उस चारदीवारी के भीतर वह उस शराब के आगे घुटने टेक चुका एक बेबस और जिद्दी गुलाम था। शुरुआत कभी-कभार दोस्तों के साथ पार्टी में ‘सोशल ड्रिंकिंग’ से हुई थी, मगर कब वह शाम के हर पहर की अनिवार्य लत बन गई, खुद अनिरुद्ध को भी खबर न लगी।

दरवाज़े की घंटी बजी। गरिमा ने एक गहरी सांस भरी, अपने बिखरे पल्लू को संभाला और दरवाज़ा खोला। सामने अनिरुद्ध खड़ा था। चेहरे पर थकान थी, आँखों में हल्की लाली, लेकिन चाल में वही जानी-पहचानी जल्दबाजी। उसने गरिमा की ओर बिना देखे ब्रीफकेस सोफे पर पटका और सीधे बालकनी से लगे छोटे से स्टडी रूम की ओर बढ़ गया, जिसे उसने अनौपचारिक रूप से अपना निजी ठिकाना बना रखा था।

गरिमा पानी का गिलास लेकर पीछे-पीछे गई। उसने देखा कि मेज पर कांच का चमचमाता गिलास और सुनहरी रंगत लिए व्हिस्की की बोतल पहले ही निकल चुकी थी। अनिरुद्ध ने आइस बकेट से बर्फ निकाली, गिलास में दो क्यूब्स डाले और बोतल उड़ेल दी। शराब की तीखी गंध हवा में तैरने लगी।

गरिमा ने थरथराते हाथों से पानी का गिलास मेज पर रखा और बहुत ही संयत स्वर में बोली, “अनिरुद्ध, क्या यह रोज़-रोज़ का तमाशा बंद नहीं हो सकता? क्या तुम्हें सच में नहीं दिखता कि यह जहर धीरे-धीरे तुम्हें, तुम्हारी सेहत को और इस पूरे घर को निगल रहा है?”

अनिरुद्ध ने गिलास से पहला घूँट भरा, चेहरे पर एक तृप्ति का भाव आया और उसने हल्की मुस्कान के साथ गरिमा को देखा। “गरिमा, प्लीज़! आज ऑफिस में ऑडिट था, मेरा दिमाग फटा जा रहा है। दिनभर गधों की तरह मेहनत करता हूँ। इस कंपनी को खड़ा करने में मेरा खून-पसीना लगा है। दिनभर के भारी तनाव के बाद अगर मैं खुद को रिलैक्स करने के लिए दो पैग ले लेता हूँ, तो इसमें तुम्हारा क्या बिगड़ता है? मैं अपने खून-पसीने की कमाई पीता हूँ, किसी से उधार मांगकर नहीं लाता।”

“कमाई तुम्हारी होगी अनिरुद्ध, पर यह शरीर केवल तुम्हारा नहीं है। यह परिवार तुम्हारा है, तुम्हारा एक बेटा है जो बड़ा हो रहा है। क्या पैसों से सेहत और सम्मान खरीदा जा सकता है?” गरिमा की आवाज़ में वर्षों का दबा हुआ दर्द छलक पड़ा। “क्या तुमने कभी सोचा है कि जब तुम इस नशे में धुत होते हो, तो उस बच्चे की नज़रों में तुम्हारा क्या अक्स बनता है? क्या यह आदत बुरी नहीं है?”

अनिरुद्ध के माथे पर त्यौरियां चढ़ गईं। उसने झुंझलाते हुए गिलास मेज पर पटका, जिससे कुछ बूँदें छलक गईं। “बुरी आदत? कौन तय करता है क्या अच्छा है और क्या बुरा? मैं किसी का बुरा नहीं कर रहा, किसी के साथ बदतमीज़ी नहीं कर रहा, घर में बैठकर शांति से पी रहा हूँ। यह मेरी निजी ज़िंदगी है गरिमा! मुझे हक है कि मैं अपनी ज़िंदगी अपनी शर्तों पर जिऊँ। तुम हर शाम मेरा मूड खराब करने के लिए अदालत लगाकर मत बैठा करो।”

गरिमा ने हिम्मत नहीं हारी। उसने आगे बढ़कर अनिरुद्ध की आँखों में आँखें डालकर पूछा, “अगर यह कोई बुरी बात नहीं है, अगर यह सिर्फ एक निर्दोष शौक है और खुद को रिलैक्स करने का जरिया है, तो सच बताओ—क्या तुम आरव को बड़े होकर शराब पीने की सलाह दोगे? क्या तुम कल अपने हाथ से उसके गिलास में शराब उड़ेल सकोगे? क्या कहोगे उससे कि बेटा, तनाव मिटाने के लिए यह सबसे अच्छी दवा है?”

इस सवाल ने अनिरुद्ध के अहंकार पर सीधा प्रहार किया। उसका चेहरा गुस्से से तमतमा उठा। वह सोफे से उछलकर खड़ा हो गया और चीख पड़ा, “दिमाग खराब हो गया है तुम्हारा? आरव मेरा बेटा है! मैं उसे क्यों पीने की सलाह दूँगा? खबरदार जो उसका नाम इस सब में घसीटा! मैं बाप हूँ उसका, जानता हूँ उसके लिए क्या सही है और क्या गलत। मैं किसी को पीने की राय नहीं देता और न ही दूंगा! लेकिन मैं खुद पीना नहीं छोड़ूँगा, समझीं तुम? यह मेरी चॉइस है, मेरी लाइफ है!”

“अगर यह इतनी ही सही चॉइस है, तो अपने बेटे के लिए गलत क्यों?” गरिमा का यह सवाल हवा में तैरता रह गया।

अनिरुद्ध ने चिढ़कर अपना मुंह फेर लिया और दोबारा सोफे पर धंस गया। उसने बोतल उठाई और अपने खाली हो रहे गिलास को फिर से भर लिया। उसे लगा कि रोज़ की तरह गरिमा अब रोते हुए कमरे से बाहर चली जाएगी, दरवाजा पटक देगी और सुबह तक उससे बात नहीं करेगी। पिछले कई सालों से यही तो होता आया था। गरिमा लड़ती थी, समझाती थी, मंदिरों में मन्नतें मांगती थी, डॉक्टरों के पर्चे लाती थी, रोती थी और अंत में हार मानकर चुप हो जाती थी। अनिरुद्ध को इस चुप्पी की आदत हो चुकी थी। उसे लगने लगा था कि उसकी इस लत के आगे गरिमा की हर दलील हमेशा बौनी साबित होगी।

लेकिन उस रात कुछ अलग होने वाला था।

गरिमा वहाँ से भागी नहीं। उसकी आँखों के आँसू अचानक सूख चुके थे। उसने कमरे का दरवाज़ा धीरे से बंद किया ताकि बाहर सो रहे आरव की नींद में खलल न पड़े। फिर वह बहुत शांत, नपे-तुले कदमों से आगे बढ़ी। उसके चेहरे पर गुस्से का कोई नामोनिशान नहीं था; वहाँ केवल एक भयावह, शांत और दृढ़ संकल्प झलक रहा था।

वह मेज के करीब आई। अनिरुद्ध उसे अचरज से देख रहा था। मेज के कोने पर एक खाली शीशे का टंबलर रखा था। गरिमा ने बिना कुछ बोले उस खाली गिलास को उठाया और सीधे अनिरुद्ध के सामने रख दिया।

अनिरुद्ध भौंचक्का रह गया। “यह क्या कर रही हो?”

गरिमा ने स्थिर नज़रों से अनिरुद्ध को देखा और सपाट आवाज़ में कहा, “ज़रा मेरे गिलास में भी डालना।”

कमरे में सन्नाटा ऐसा छा गया मानो किसी ने सारी हवा ही खींच ली हो। अनिरुद्ध की उंगलियाँ हाथ में पकड़ी बोतल पर जम सी गईं। वह अपनी आँखों पर विश्वास नहीं कर पा रहा था। जिस गरिमा ने कभी चाय में तेज अदरक तक पसंद नहीं की थी, जो पूजा-पाठ और संस्कारों की मूरत थी, वह उसके सामने शराब का गिलास आगे किए खड़ी थी।

“पागल हो गई हो क्या? होश में तो हो?” अनिरुद्ध की आवाज़ में घबराहट साफ झलक रही थी।

“मैं बिल्कुल पूरे होश-ओ-हवास में हूँ अनिरुद्ध,” गरिमा ने बिना पलक झपकाए कहा। “तुमने अभी-अभी कहा ना कि यह तुम्हारी ज़िंदगी है, अपनी कमाई है और तनाव मिटाने के लिए पीते हो। तो सुनो, तनाव मुझे भी है। सुबह पाँच बजे उठने से लेकर रात के ग्यारह बजे तक, घर का हर कोना साफ करने, तुम्हारी दवाइयों का ध्यान रखने, आरव की पढ़ाई की चिंता करने, समाज के तानों को झेलने और तुम्हारी इस लत के कारण हर रात घुट-घुट कर मरने का तनाव मुझे भी है। अगर शराब ही तनाव मिटाने की सबसे बेहतरीन दवा है, तो यह दवा आज से मैं भी लूँगी।”

अनिरुद्ध का गला सूखने लगा। उसने बोतल मेज पर रख दी। “गरिमा, बकवास बंद करो। यह औरतों के पीने की चीज़ नहीं है। तुम एक माँ हो, एक पत्नी हो।”

“और तुम? तुम एक पिता नहीं हो? तुम एक पति नहीं हो?” गरिमा की आवाज़ अब थोड़ी ऊँची हुई, लेकिन उसमें गज़ब का नियंत्रण था। “अगर एक पिता होकर तुम हर रात नशे में चूर हो सकते हो, तो एक माँ होकर मैं क्यों नहीं? किसने कहा कि यह बुरी चीज़ है? अभी दो मिनट पहले तो तुम कह रहे थे कि इसमें कुछ भी बुरा नहीं है! जब तुम्हारे लिए यह बुरा नहीं है, तो मेरे लिए जहर कैसे हो गई? डालो शराब! आज से हम दोनों रोज़ शाम को बैठकर पिएंगे। आरव भी बड़ा हो रहा है, वो भी देखेगा कि उसके मम्मी-पापा कितने ‘रिलैक्स’ रहते हैं। जब पूरा घर ही इस नशे की भट्टी में झुलस रहा है, तो मैं अकेली इस घर को बचाने का ठेका लेकर क्यों जलूँ?”

गरिमा ने खुद आगे बढ़कर बोतल उठाई और तेजी से अपने गिलास में शराब उड़ेलने लगी। शराब के छलकने की आवाज़ अनिरुद्ध के कानों में किसी हथौड़े की तरह पड़ रही थी। गरिमा ने गिलास हाथ में उठाया और उसे अपने होठों के करीब ले आई।

अनिरुद्ध के अंदर कुछ बुरी तरह चरमरा कर टूट गया। एक पल के भीतर उसके दिमाग में एक खौफनाक मंज़र कौंध गया—गरिमा नशे में लड़खड़ा रही है, उसका घर बिखर चुका है, आरव कोने में खड़ा रो रहा है और उसका पूरा अस्तित्व गर्त में समा चुका है। उस भयानक कल्पना ने उसके नशे को एक ही सेकंड में काफूर कर दिया। वह सोफे से झपटा और उसने झटके से गरिमा के हाथ से वह गिलास छीन लिया।

गिलास छीनते ही अनिरुद्ध का हाथ कांप गया और शीशा फर्श पर गिरकर चकनाचूर हो गया। शराब की तीखी गंध पूरे कमरे के फर्श पर फैल गई।

“क्या तमाशा है यह!” अनिरुद्ध हांफते हुए चिल्लाया। उसकी पेशानी पर पसीने की बूँदें चमक रही थीं।

गरिमा ने फर्श पर बिखरे टुकड़ों को देखा और फिर अनिरुद्ध की कांपती आँखों में झांका। उसने बहुत धीमी, दर्दभरी मगर बेधड़क आवाज़ में कहा, “तमाशा तो तुम चौदह साल से कर रहे हो अनिरुद्ध। आज जब यह गिलास मेरे हाथ में दिखा, तो तुम्हारी रूह कांप गई? तुम्हें घिन आ गई? तुम्हें डर लग गया कि तुम्हारा घर बर्बाद हो जाएगा? तो फिर यह सोचो कि जब मैं हर शाम तुम्हें इसी हालत में देखती हूँ, तो मेरे सीने पर क्या बीतती होगी? मैं जिस इंसान को अपना सब कुछ मानकर इस घर में आई थी, उसे हर रोज़ थोड़ा-थोड़ा मरते देखकर मेरे दिल पर क्या गुजरती होगी?”

गरिमा की आँखों से अब आँसू बह निकले, पर उसकी आवाज़ में एक अटल सच्चाई थी, “अनिरुद्ध, तुम कहते हो कि तुम खुद के पैसे की पीते हो। गलत कहते हो तुम! तुम अपने पैसे की नहीं, तुम अपने बेटे के भविष्य की, मेरी खुशियों की, हमारी पारिवारिक शांति की और इस घर की बरकत की कीमत पर पीते हो। जिस दिन तुम इस लत में डूबकर इस दुनिया से चले जाओगे या किसी गंभीर बीमारी से बिस्तर पकड़ लोगे, उस दिन तुम्हारा यह पैसा हमें वह सुकून लौटा पाएगा जो तुम हर रोज़ हमसे छीन रहे हो?”

अनिरुद्ध निरुत्तर था। उसके पास गरिमा के किसी भी शब्द की कोई काट नहीं थी। उसके तर्क, उसका अहंकार, उसकी तथाकथित ‘निजी ज़िंदगी’ का खोखला दर्शन—सब कुछ उस टूटे हुए गिलास की तरह बिखर चुका था। उसने पहली बार उस दर्पण में अपना असली चेहरा देखा था जिसे गरिमा ने आज उसके सामने ला खड़ा किया था। वह समझ गया कि वह तनाव से नहीं लड़ रहा था, बल्कि अपनी कायरता को इस बोतल के पीछे छिपा रहा था। वह अपने ही परिवार के लिए एक ऐसा ज़हर बन चुका था जिसे उसकी पत्नी आज पीने को तैयार हो गई थी ताकि उसकी आँखें खुल सकें।

अनिरुद्ध के कदम डगमगाए और वह वहीं सोफे के किनारे फर्श पर बैठ गया। उसके दोनों हाथ उसके सिर पर थे। उसके कंधे धीरे-धीरे हिलने लगे। एक कठोर, हठी और नशे का आदी पुरुष उस रात एक समर्पित और मजबूत पत्नी के आत्मबलिदान के आगे फूट-फूट कर रो पड़ा।

“मुझे माफ कर दो गरिमा… मुझे माफ कर दो,” अनिरुद्ध की भर्राई आवाज़ में गहरा पछतावा था। “मैंने कभी इस तरह नहीं सोचा था। मैं कितना अंधा, कितना स्वार्थी हो गया था। मैं अपने ही हाथों से अपने सबसे प्यारे लोगों को मार रहा था।”

गरिमा आगे बढ़ी। उसने कोई ताना नहीं मारा, कोई उपहास नहीं किया। वह अनिरुद्ध के पास बैठ गई और धीरे से उसके कांपते कंधों पर हाथ रख दिया। “अनिरुद्ध, गलती को मान लेना ही उसे सुधारने की पहली सीढ़ी है। मैं तुमसे नफरत नहीं करती, मैं उस ज़हर से नफरत करती हूँ जो मुझसे मेरा पति और मेरे बेटे से उसका पिता छीन रहा है।”

अनिरुद्ध ने ऊपर देखा। उसकी आँखों में पश्चाताप के साथ-साथ एक नई चमक थी। वह उठा, उसने मेज पर रखी उस आधी भरी शराब की बोतल को उठाया, बालकनी के सिंक की ओर गया और बिना एक पल गंवाए पूरी बोतल नाली में उड़ेल दी। शराब की एक-एक बूँद नाली में समा गई, और उसी के साथ अनिरुद्ध के भीतर का वह वर्षों पुराना अहंकार भी बह गया।

उसने मुड़कर गरिमा के दोनों हाथ थाम लिए। “गरिमा, मैं जानता हूँ कि यह लत इतनी आसानी से मेरा पीछा नहीं छोड़ेगी। मेरे शरीर को, मेरी नसों को इसकी आदत पड़ चुकी है। लेकिन मैं तुमसे वादा करता हूँ—आज से, इसी पल से मैं इसे दोबारा हाथ नहीं लगाऊँगा। अगर मुझे डॉक्टर के पास जाना पड़े, रिहैब जाना पड़े या किसी भी तरह की तकलीफ़ से गुज़रना पड़े, मैं सब सहूँगा। पर मैं अपने परिवार को फिर कभी इस आग में नहीं झोंकूँगा।”

गरिमा ने नम आँखों से सिर हिलाया। उसे पता था कि रास्ता कठिन होगा, लत से जंग लड़ना कोई एक दिन का काम नहीं था, लेकिन उसे यह भी विश्वास था कि जब एक इंसान के भीतर से छोड़ने की सच्ची इच्छाशक्ति जाग जाए, तो कोई भी नशा उसे दोबारा झुका नहीं सकता।

अगले कुछ महीने वाकई एक कठिन अग्निपरीक्षा जैसे थे। अनिरुद्ध को विदड्रॉल के लक्षण झेलने पड़े, बेचैनी हुई, अनिद्रा ने घेरा। लेकिन इस बार गरिमा उसके साथ दीवार बनकर खड़ी थी। उसने अनिरुद्ध को योग, ध्यान और एक स्वस्थ जीवनशैली की ओर मोड़ा। शाम के उस खाली पहर को, जब बोतल अनिरुद्ध को अपनी ओर खींचती थी, दोनों ने आरव के साथ पार्क में टहलने, बैडमिंटन खेलने और लंबी बातें करने में बिताना शुरू किया।

लगभग एक साल बाद, उसी घर की बालकनी में एक शाम फिर चाय की चुस्कियाँ ली जा रही थीं। हवा में ताजे मोगरे के फूलों की खुशबू थी। आरव अपने स्कूल के किस्से सुनाकर ठहाके लगा रहा था और अनिरुद्ध स्वस्थ, ऊर्जावान और खिले हुए चेहरे के साथ गरिमा की ओर देखकर मुस्कुरा रहा था। उस मुस्कान में एक नया जीवन था, एक ऐसा जीवन जो ज़हर के घूँट से नहीं, बल्कि रिश्तों के अमृत से सिंचित था।

शराब या किसी भी प्रकार का नशा केवल एक व्यक्ति के शरीर को ही नष्ट नहीं करता, बल्कि वह पूरे परिवार की आत्मा को लहूलुहान कर देता है। कई बार सीधे-सीधे समझाने से बात नहीं बनती, लेकिन जब कोई अपने स्वाभिमान और त्याग से सच्चाई का कठोर आईना सामने रख देता है, तो पत्थर दिल भी पिघल जाते हैं। क्या आपको लगता है कि गरिमा का यह अप्रत्याशित कदम अनिरुद्ध की आँखें खोलने के लिए सही था? आपकी नज़र में एक परिवार को नशे के दलदल से बाहर निकालने का सबसे प्रभावी तरीका क्या हो सकता है? अपनी अनमोल राय नीचे कमेंट बॉक्स में लिखकर जरूर बताएं।

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 मूल लेखिका : डॉ. बीना राघव

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