जब वंदना अपनी ससुराल के आंगन में खड़ी होकर अपने ससुर और जेठ के सामने जोर-जोर से बोल रही थी, तब किसी ने नहीं सोचा था कि रिश्तों की कड़वाहट इतनी दूर तक जाएगी। वंदना की शादी को सात साल हो चुके थे। पति नितेश एक निजी बैंक में कार्यरत थे और सीधे-सादे स्वभाव के इंसान थे। ससुर विश्वंभर जी ने जिंदगी भर की कमाई से शहर के बाहरी इलाके में एक तीन मंजिला मकान बनाया था। पिछले कुछ महीनों से वंदना की केवल एक ही रट थी—घर का बँटवारा होना चाहिए और नितेश के हिस्से की रजिस्ट्री तुरंत उनके नाम की जाए।
विश्वंभर जी जब भी समझाने की कोशिश करते कि बेटा अभी सब साथ हैं, जरूरत पड़ने पर सब तुम्हारा ही है, तो वंदना तपाक से जवाब देती, “कानूनन हमारा जो हक बनता है, वह हमें मिलना ही चाहिए। कल को कोई अनहोनी हो जाए तो हम सड़क पर आ जाएंगे क्या? ससुराल में बहू का कोई वजूद तभी होता है जब उसके हाथ में संपत्ति का पक्का कागज हो।”
घर में रोज-रोज के क्लेश और तानों से तंग आकर आखिरकार विश्वंभर जी ने अपने बड़े बेटे और नितेश के बीच घर के दो हिस्से कर दिए। नीचे का पूरा हिस्सा, दुकान समेत, नितेश और वंदना के नाम लिख दिया गया। जिस दिन रजिस्ट्री के कागजात हाथ में आए, वंदना की खुशी का ठिकाना नहीं था। उसने अपनी सहेलियों और पड़ोसियों को बुलाकर दावत दी और गर्व से कहा कि अपने हक के लिए लड़ना कोई बुरी बात नहीं है।
शांति कुछ महीनों तक ही टिक सकी। वंदना के मन में अब एक नई महत्वाकांक्षा ने जन्म ले लिया था। नितेश का मन अपना खुद का एक स्वतंत्र व्यवसाय शुरू करने का था, जिसके लिए कम से कम पच्चीस लाख रुपयों की सख्त जरूरत थी। बैंक से लोन लेने पर भारी ब्याज देना पड़ता। एक शाम चाय पीते हुए वंदना ने नितेश से कहा, “तुम बैंक के चक्कर क्यों काट रहे हो? मेरठ में मेरे पापा के पास हाईवे पर तीन बीघा पुश्तैनी जमीन है और शहर के बीचों-बीच चार दुकानों वाला एक बड़ा मकान भी है। मेरे भाई सौरभ की अकेले की तो वह सारी जायदाद नहीं है। कानून तो बेटियों को भी बराबर का हक देता है। मैं अपने मायके जाऊँगी और पापा से कहूँगी कि मेरा जो हिस्सा बनता है, वह मुझे बेचकर कैश दे दें।”
नितेश ने झिझकते हुए मना किया, “वंदना, ससुराल में बात अलग थी, वहाँ बँटवारे की बात घर के भीतर हुई। मायके में जाकर जमीन का हिस्सा मांगना सही नहीं होगा। तुम्हारे बाबूजी बुजुर्ग हैं और सौरभ भाई अभी अपनी गृहस्थी संभाल ही रहे हैं।”
मगर वंदना अपने अहंकार और आत्मविश्वास में चूर थी। उसने तंज कसते हुए कहा, “ससुराल वालों से तो मैंने लड़कर सब ले लिया, मायके वाले तो अपने खून हैं। पापा मुझसे इतना प्यार करते हैं, वो भला अपनी लाडली बेटी को मना करेंगे? मैं कोई भीख थोड़ी मांग रही हूँ, अपना कानूनी अधिकार ही तो मांगूँगी।”
अगले ही दिन वंदना बिना किसी पूर्व सूचना के अपनी माँ और पिता के घर मेरठ पहुँच गई। घर में सब उसे अचानक देखकर हैरान रह गए। बाबूजी हरिशंकर जी और माँ सावित्री ने बेटी का बड़े लाड़-प्यार से स्वागत किया। भाभी नीलम तुरंत रसोई में जाकर उसके पसंदीदा पकवान बनाने लगी। भाई सौरभ बाजार से मिठाइयां ले आया। दो दिनों तक वंदना का खूब आदर-सत्कार हुआ। मायके के इस लाड़-प्यार ने वंदना के हौसले को और बढ़ा दिया। उसे लगा कि यहाँ तो सब कुछ बेहद आसान है।
तीसरे दिन दोपहर के भोजन के बाद जब हरिशंकर जी बैठक में अखबार पढ़ रहे थे और सौरभ भी वहीं बैठा था, तब वंदना ने बात छेड़ी। उसने इधर-उधर की बातें करने के बाद सीधे मुद्दे पर आते हुए कहा, “बाबूजी, मुझे आपसे एक जरूरी बात करनी है। नितेश को अपना कारोबार शुरू करना है और हमें पच्चीस लाख रुपयों की जरूरत है। मुझे पता चला है कि हाईवे वाली जमीन का भाव आजकल बहुत अच्छा मिल रहा है। कानून भी कहता है कि पिता की संपत्ति में बेटी का बराबर का हिस्सा होता है। आप उस जमीन में से मेरा हिस्सा बेचकर मुझे मेरे रुपये दे दीजिए।”
कमरे में सन्नाटा छा गया। हरिशंकर जी के हाथ से अखबार धीरे-धीरे नीचे गिर गया। सौरभ का चेहरा एकदम फक पड़ गया। रसोई से बाहर आती माँ के कदम वहीं चौखट पर ठिठक गए।
काफी देर की खामोशी के बाद हरिशंकर जी ने चश्मा उतारा और भारी आवाज में बोले, “वंदना, यह तू क्या कह रही है? वह जमीन हमारी पुश्तैनी है। उसी के सहारे सौरभ अपने बच्चों की पढ़ाई और भविष्य की योजना बना रहा है। तेरी शादी में हमने अपनी हैसियत से बढ़कर खर्च किया, गहने दिए, गाड़ियां दीं ताकि तू खुश रहे। आज तू अपने ही भाई के सामने अपनी जमीन का बँटवारा मांगने आ गई?”
वंदना के तेवर बदल गए। उसने कड़े स्वर में कहा, “बाबूजी, शादी में जो दिया वो आपका फर्ज था। आज जमाना बदल चुका है। जब मैंने अपनी ससुराल में लड़कर अपने हिस्से का मकान अपने नाम करवा लिया, तो मैं अपने मायके का हिस्सा क्यों छोड़ूँ? नियम तो सबके लिए एक जैसा होता है ना?”
तभी तक चुप खड़ा भाई सौरभ बोल पड़ा, “दीदी, जब आप हर त्योहार पर आती थीं, तो हम पलकें बिछाकर आपका स्वागत करते थे। हमें लगता था कि बहन आई है, घर की रौनक आई है। लेकिन आज समझ आया कि आप बहन बनकर नहीं, एक हिस्सेदार बनकर आई हैं। अगर आपको सिर्फ कानूनी अधिकार ही दिखाई देता है, तो उस दिन का हिसाब कौन करेगा जब बाबूजी बीमार थे और मैंने रात-दिन अस्पताल में एक कर दिया था? उन जिम्मेदारियों का बँटवारा आप कब करेंगी?”
माँ सावित्री की आँखों से आँसू छलक पड़े। उन्होंने कहा, “बेटी, मायका मान-सम्मान और स्नेह की छाँव होता है, व्यापार की दुकान नहीं। ससुराल में तूने अपने ससुर के बुढ़ापे का ख्याल किए बिना छत के टुकड़े कर दिए और अब यहाँ आकर तू हमारे कलेजे के टुकड़े करने चली है? अगर तुझे सिर्फ संपत्ति चाहिए, तो ले ले, लेकिन याद रखना, जिस दिन तू इस घर से अपना हिस्सा लेकर जाएगी, उस दिन इस चौखट से तेरा रिश्ता हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा। फिर कभी किसी तीज-त्योहार पर यह मत सोचना कि कोई भाई तुझे लेने आएगा।”
माँ और भाई की बातें सुनकर वंदना का दिल दहल उठा। उसने जिस मायके को अपना सबसे मजबूत सहारा समझा था, जहाँ वह हमेशा गर्व से सिर उठाकर चलती थी, वहाँ संपत्ति की एक मांग ने उसे पराया बना दिया था। उसे अपनी सास और ससुर के वे उदास चेहरे याद आ गए, जब उसने ससुराल में जमीन-जायदाद के लिए झगड़ा किया था। तब उसे लगता था कि ससुराल वाले जालिम हैं जो उसका हक दबाना चाहते हैं, लेकिन आज जब वही मांग उसने अपने सगे माँ-बाप के सामने रखी, तो उसे समझ आया कि दर्द दोनों तरफ एक जैसा ही होता है।
अधिकार की भाषा जब भी रिश्तों के बीच आती है, तो प्यार और आत्मीयता की मौत हो जाती है। वंदना को अपनी गलती का गहरा अहसास हुआ। उसे समझ आया कि उसने ससुराल में भी एक परिवार को तोड़ा था और आज वह अपने जन्म देने वाले परिवार को भी तोड़ने की कगार पर ले आई थी।
वंदना घुटनों के बल बैठ गई और हरिशंकर जी के पैरों को पकड़कर रो पड़ी। “मुझे माफ कर दीजिए बाबूजी। लालच और अहंकार ने मेरी आँखें बंद कर दी थीं। मुझे कोई जमीन नहीं चाहिए, कोई पैसा नहीं चाहिए। मैं आपका प्यार और इस चौखट का मान कभी नहीं खोना चाहती।”
हरिशंकर जी ने बेटी के सिर पर हाथ रखा और उसे उठाकर गले से लगा लिया। सौरभ ने आगे बढ़कर अपनी बहन के आँसू पोंछे और कहा, “दीदी, कारोबार के लिए पैसों की जरूरत है तो हम सब मिलकर कोई दूसरा रास्ता निकालेंगे, अपनी क्षमता अनुसार मदद करेंगे, लेकिन जमीन बेचने या बँटवारे की बात कभी मत करना।”
वंदना जब कानपुर लौटी, तो वह एक बदली हुई इंसान थी। घर पहुँचते ही उसने सबसे पहले अपने ससुर विश्वंभर जी के चरण छुए और उनसे अपने पुराने दुर्व्यवहार के लिए क्षमा मांगी। उसने बँटवारे के कागजात फाड़कर ससुर के हाथों में सौंप दिए और पूरे परिवार को फिर से एक धागे में पिरोने का संकल्प लिया। उसने जान लिया था कि कागजों पर लिखे अधिकार मकान दिला सकते हैं, लेकिन सच्चा घर केवल त्याग, समझदारी और आपसी प्रेम से ही बनता है।
क्या आपको भी लगता है कि जब बेटियां ससुराल में पूरे हक की लड़ाई लड़ती हैं, तो मायके की संपत्ति के मामले में समाज और परिवारों का नजरिया पूरी तरह बदल जाता है? क्या संपत्ति से ज्यादा रिश्तों की मर्यादा अनमोल है? अपनी राय कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।
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