मौन की देहरी पर बंधा विश्वास

अवनि के हलक से आवाज़ नहीं निकली। बस एक गहरी, भारी सिसकी फोन के उस पार पहुँची।

“अवनि, बोलो भी! तुम डरा रही हो मुझे। क्या बात है?” समर का स्वर अब बेचैनी से भर गया था।

“समर… बस एक आखिरी बार तुम्हारी आवाज़ सुननी थी। आज के बाद शायद कभी इस तरह तुम्हें फोन करने की हिम्मत न जुटा पाऊँ,” अवनि की आवाज़ काँप रही थी, मगर उसमें एक अजीब सा ठहराव था—वैसा ठहराव जो इंसान के भीतर तब आता है जब वह अपनी आखिरी बाज़ी हारने के कगार पर होता है।

घड़ी की सुइयाँ रात के ढाई बजा रही थीं। चंडीगढ़ की सर्द हवाएँ खिड़की के काँच से टकराकर एक अजीब सी सनसनाहट पैदा कर रही थीं। कमरे में मद्धम नीली नाइट-लाइट जल रही थी, जिसकी रोशनी में सात साल का आरव अपने तकिये को सीने से चिपकाए बेखबर सो रहा था। उसी बिस्तर के कोने में बैठी अवनि अपने काँपते हाथों में फोन थामे हुए थी। मोबाइल की स्क्रीन पर ‘समर’ नाम चमक रहा था और कान में लगातार बजती लंबी घंटी उसकी दिल की धड़कनों को कई गुना बढ़ा रही थी।

उंगलियों की पकड़ ठंडी पड़ चुकी थी। आँखों में आँसू थे, जो पलकों की कोर से फिसलकर गालों पर सूख चुके थे। अवनि को लगा कि समर अब फोन नहीं उठाएगा। वैसे भी इतनी रात गए किसी को जगाना शिष्टाचार के खिलाफ था, मगर आज शिष्टाचार और संकोच की दीवारें टूट चुकी थीं। कल सुबह सूरज निकलने के साथ ही उसके जीवन का फैसला होने वाला था। घर के बड़े-बुजुर्गों ने तय कर दिया था कि एक अकेली, परित्यक्त माँ के रूप में अब उसका सफर खत्म होना चाहिए। एक संपन्न व्यापारी से उसका रिश्ता तय किया जा रहा था, जो उसके बेटे को छत देने को तैयार था। सब खुश थे, सिवाय अवनि की उस आत्मा के, जो अंदर ही अंदर घुट रही थी।

जैसे ही उसने निराश होकर कॉल काटने के लिए स्क्रीन पर उंगली बढ़ाई, दूसरी तरफ से क्लिक की आवाज़ आई और कॉल रिसीव हो गई।

“अवनि? क्या हुआ? सब खैरियत तो है? इतनी रात को… तुम ठीक तो हो न? आरव की तबीयत तो ठीक है?” समर की आवाज़ में हड़बड़ाहट और गहरी चिंता साफ झलक रही थी। वह गहरी नींद से जागा था, मगर अवनि का नाम स्क्रीन पर देखते ही उसके सारे होश उड़ गए थे।

अवनि के हलक से आवाज़ नहीं निकली। बस एक गहरी, भारी सिसकी फोन के उस पार पहुँची।

“अवनि, बोलो भी! तुम डरा रही हो मुझे। क्या बात है?” समर का स्वर अब बेचैनी से भर गया था।

“समर… बस एक आखिरी बार तुम्हारी आवाज़ सुननी थी। आज के बाद शायद कभी इस तरह तुम्हें फोन करने की हिम्मत न जुटा पाऊँ,” अवनि की आवाज़ काँप रही थी, मगर उसमें एक अजीब सा ठहराव था—वैसा ठहराव जो इंसान के भीतर तब आता है जब वह अपनी आखिरी बाज़ी हारने के कगार पर होता है।

“आखिरी बार मतलब? क्या बकवास कर रही हो तुम? कहाँ हो तुम इस वक्त?”

“मेरी बात सुन लो समर, बस आज सुन लो। अगर आज नहीं कहा, तो यह घूंट जिंदगी भर मेरे सीने में ज़हर बनकर सुलगता रहेगा। मेरी ज़िंदगी का सबसे कठिन दौर मैंने बिल्कुल अकेले काटा है। जब आरव सिर्फ दो साल का था और उसके पिता हमें दर-दर भटकने के लिए छोड़कर चले गए थे… उस वक्त मुझे जिस सहारे की सबसे ज्यादा जरूरत थी, वह मुझे नहीं मिला। वह सारा वक्त मैंने सिर्फ रोते हुए, अंधेरों में घुटते हुए काट दिया। उस दौर ने मेरे भीतर की तमाम ख्वाहिशों को मार दिया। मैं जिंदा रही, पर सिर्फ एक माँ बनकर, एक बेजान जिस्म बनकर। मुझे किसी से कोई शिकायत नहीं रही।”

समर ने कुछ कहना चाहा, “अवनि, मेरी बात—”

“नहीं समर, प्लीज, मुझे रोक मत। आज नहीं,” अवनि ने एक गहरी सांस ली, उसकी आँखें फिर छलक पड़ीं। “मुझे दुनिया से बहुत कुछ नहीं चाहिए था। कोई बहुत बड़ा महल या धन-दौलत की हसरत कभी नहीं रही। बस कोई ऐसा मिल जाए जो मुझे अपने दिल में थोड़ी सी सच्ची जगह दे दे। एक दोस्त जैसा ध्यान रख ले। मुझे किसी से पत्नी जैसा ओहदा या हक नहीं चाहिए। न मुझे किसी का अधिकार चाहिए, न उसका बिस्तर। बस एक पवित्र साथ चाहिए जहाँ छल न हो, सिर्फ वफादारी हो। कोई यह पूछ ले कि आज तुमने खाना खाया या नहीं? कोई रोने पर अपना कंधा दे दे और बिना किसी शर्त के कह सके कि डरो मत, मैं हूँ। पत्नियों के कोई सुख नहीं चाहिए समर, बस रूह का एक सुरक्षित कोना चाहिए।”

फोन के उस पार समर पूरी तरह खामोश था। सिर्फ उसकी भारी होती सांसों की आवाज़ सुनाई दे रही थी।

अवनि की रुलाई फूट पड़ी, “समर, तीन साल पहले जब ऑफिस के प्रोजेक्ट के सिलसिले में तुमसे पहली मुलाकात हुई थी, तब से आज तक तुमने बिना किसी स्वार्थ के हमेशा मेरा और आरव का ख्याल रखा। तुमने एक बार बहुत सहजता से मुझसे पूछा था कि क्या मैं कभी दोबारा प्यार कर पाऊँगी? मैंने हँसकर बात टाल दी थी। पर सच यह है समर… कि मैं तुमसे बहुत पहले से प्यार करती हूँ। जब से टूटने के बाद तुमसे मिली, तब से मेरा मन सिर्फ तुम्हारे नाम से धड़कता है। पर मैं कभी बोल न पाई। एक परित्यक्त औरत, एक बच्चे की माँ… भला तुमसे यह कैसे कहती? तुम्हें पाना मेरे लिए एक ऐसा ख्वाब था जो कभी पूरा नहीं हो सकता था। मैंने अपनी इस भावना को हमेशा खुद से भी छुपाया, क्योंकि मुझे लगा कि तुम्हें अपने दिल में रखकर अगर मैं किसी और की हो गई, तो यह तुम्हारे साथ भी धोखा होगा और उस इंसान के साथ भी।”

कमरे में सन्नाटा इतना गहरा था कि अवनि को अपनी ही धड़कनें सुनाई दे रही थीं। उसने अपने आँसू पोछे और बात जारी रखी।

“कल सुबह मेरे रिश्तेदार शिमला से आ रहे हैं। एक बड़े कारोबारी से मेरी शादी की बात पक्की करने। वह आदमी अच्छा है, समाज में रुतबा है, आरव को अपना नाम भी दे देगा। पर मेरी आत्मा वहीं रुक गई है समर। मैं उसके साथ रहकर कभी उसे प्यार नहीं कर पाऊँगी। मेरे ज़हन में, मेरी हर सांस में सिर्फ तुम रहोगे। पर अगर तुम नहीं… तो मुझे उस समझौते की आग में कूदना ही होगा। क्योंकि अब अकेले नहीं जिया जाता। इस समाज की गंदी नज़रों से अपने बच्चे को बचाते-बचाते मैं थक चुकी हूँ। किसी का सहारा बहुत जरूरी हो गया है। इसलिए यह अंतिम संवाद सिर्फ तुमसे कर रही हूँ… क्या तुम मुझे और मेरे बच्चे को अपनाओगे?”

अवनि ने कांपती आवाज़ में आगे कहा, “कोई जबरदस्ती नहीं है समर। कोई अहसान नहीं। मैं तुमसे सिर्फ तुम्हारा साथ माँग रही हूँ। तुम्हारे दो मीठे बोल… बस हक से इतना पूछ लेना कि तू कैसी है? ठीक तो है न? मैं शाम को तुम्हारे लौटने का इंतजार करूँगी, तुम्हारे बिना निवाला नहीं तोडूंगी। जब दिल भारी होगा तो तुम्हारे सीने से लगकर रो लूँगी। बस तुम्हारी बनाई छाया में मुझे और मेरे मासूम बच्चे को थोड़ी सी पनाह दे दो। क्या तुम हमें अपना सकते हो?”

सवाल पूछकर अवनि की सांसें थम गईं।

फोन पर एक अनंत, चीरती हुई खामोशी पसर गई। सेकेंड्स सदियों जैसे लगने लगे। अवनि का दिल डूबने लगा। उसे लगा कि उसने बहुत बड़ी गलती कर दी। समर शायद इस अप्रत्याशित प्रस्ताव से स्तब्ध रह गया था या शायद वह इस बोझ को उठाने से कतरा रहा था।

“समर?” अवनि ने रुंधे गले से पुकारा। कोई जवाब नहीं आया। फिर अचानक कॉल कटने की ‘बीप’ सुनाई दी।

अवनि का हाथ ढीला पड़ गया। फोन बिस्तर पर गिर गया। उसने दोनों हाथों से अपना चेहरा ढक लिया और फूट-फूट कर रो पड़ी। उसे अपनी बेबसी पर, अपनी किस्मत पर और सबसे ज्यादा अपनी इस गुस्ताखी पर घिन आने लगी। उसने सोचा कि उसने समर जैसा सच्चा दोस्त भी हमेशा के लिए खो दिया। अब उसके सामने उस समझौते की शादी के सिवा कोई रास्ता नहीं बचा था। वह रात भर बिस्तर पर पड़ी सिसकती रही, अपनी किस्मत को कोसती रही।

सुबह के लगभग साढ़े पाँच बज रहे थे। धुंधलका अभी छँटा नहीं था। बाहर हल्की ओस गिर रही थी। अवनि ने जैसे-तैसे उठकर अपना चेहरा धोया और रसोई में आरव के लिए दूध गर्म करने लगी। तभी मुख्य दरवाज़े की घंटी बजी।

अवनि चौंक गई। इतनी सुबह कौन हो सकता है? क्या माँ-बाबूजी गाँव से इतनी जल्दी आ गए?

उसने भारी कदमों से जाकर दरवाज़ा खोला। जैसे ही दरवाज़ा खुला, उसके कदम वहीं जम गए। सामने समर खड़ा था। उसके बाल बिखरे हुए थे, आँखों में रतजगे की लाली थी, और जैकेट पर हल्की ओस की बूँदें चमक रही थीं। वह हाँफ रहा था, जैसे सीढ़ियाँ भागकर चढ़ा हो।

“समर… तुम?” अवनि की आवाज़ गले में ही अटक गई।

समर ने एक शब्द भी नहीं कहा। उसने आगे बढ़कर अवनि की कलाई पकड़ी और उसे खींचकर सीधे अपने सीने से लगा लिया। वह आलिंगन इतना दृढ़, इतना सुरक्षित और इतना सच्चा था कि अवनि के भीतर का सारा दर्द, सारे बरसों का संकोच एक पल में पिघल गया। समर ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए उसे अपने भीतर समेट लिया।

“पागल हो तुम अवनि?” समर की आवाज़ भर्राई हुई थी। “तुमने यह कैसे सोच लिया कि मैं फोन पर तुम्हारे इस सबसे पवित्र अहसास का जवाब सिर्फ चंद शब्दों में दे देता? क्या मेरा प्यार इतना सस्ता था कि मैं ‘हाँ’ कहकर वापस सो जाता? तुमने कॉल काटी नहीं थी, मैंने काटी थी… क्योंकि मुझे तुम्हारे पास पहुँचना था। मुझे तुम्हें बताना था कि जिस दिन तुमने पहली बार आरव को अपनी गोद में लेकर उस बेरहम दुनिया का सामना किया था, उसी दिन से मेरी आत्मा तुम्हारी हो चुकी थी।”

अवनि समर के सीने में अपना चेहरा छुपाए बच्चों की तरह रोने लगी।

समर ने उसे खुद से थोड़ा अलग किया, उसके आंसुओं को अपने अँगूठे से पोंछा और उसकी आँखों में देखते हुए बोला, “तुमने कहा कि तुम्हें पत्नी का हक नहीं चाहिए? तुम्हें बिस्तर का सुख नहीं चाहिए? तुम्हें सिर्फ पनाह चाहिए? अवनि, तुम इतनी कमज़ोर कब से हो गईं? मैं तुम्हें कोई आधी-अधूरी जिंदगी नहीं देने आया हूँ। मैं तुम्हें अपनी अर्धांगिनी बनाने आया हूँ। पूरे हक, पूरे मान और पूरे सम्मान के साथ। और आरव… आरव पर तुम्हारा जितना हक है, आज से उतना ही मेरा भी है। वह सिर्फ तुम्हारा बेटा नहीं, हमारा बेटा है।”

तभी बेडरूम का दरवाज़ा खुला और आरव आँखें मलता हुआ बाहर आया। “समर अंकल?” उसने मासूमियत से पुकारा।

समर मुस्कुराया, उसने नीचे झुककर आरव को अपनी गोद में उठा लिया और उसके माथे को चूमा। “अब अंकल नहीं चैंपियन, अब से तुम मुझे पापा कहोगे।”

आरव ने खिलखिलाकर समर के गले में अपनी नन्हीं बाँहें डाल दीं। अवनि के कानों में वह हँसी किसी मंदिर की घंटी की तरह गूँज उठी। बरसों से जो घर एक वीराने की तरह था, आज वहाँ एक संपूर्ण परिवार की नींव पड़ चुकी थी। समर ने मुड़कर अवनि का हाथ अपने हाथ में लिया और कहा, “चलो, अब अपने घरवालों को फोन लगाओ और कह दो कि तुम्हें किसी समझौते की जरूरत नहीं है। तुम्हारा जीवनसाथी तुम्हें और तुम्हारे बेटे को अपने घर ले जाने के लिए तुम्हारे दरवाज़े पर खड़ा है।”

अवनि ने खिड़की से बाहर देखा। सूरज की पहली सुनहरी किरण कोहरे को चीरती हुई कमरे के भीतर उतर आई थी। उसकी ज़िंदगी की सबसे लंबी, अंधेरी रात खत्म हो चुकी थी और स्वाभिमान, प्रेम और विश्वास की एक नई सुबह की शुरुआत हो चुकी थी।

यदि आप समर की जगह होते, तो क्या समाज की परवाह किए बिना किसी अकेली माँ और उसके बच्चे को पूरे सम्मान के साथ अपनाते? अपनी राय नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।

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मूल लेखिका : दीपा साहू “प्रकृति”

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