कल्याणी जी के इन शब्दों ने नूपुर के भीतर की सारी ग्रंथियां खोल दीं। नूपुर को अपनी गलती का गहरा अहसास हुआ। उसे समझ आ गया कि जिस कड़वाहट का शिकार आज कल्याणी जी बनी थीं, उसकी शुरुआत जाने-अनजाने खुद उसी के हाथों हुई थी। कल्याणी जी ने न केवल अपने बेटे की मानसिक स्थिति को संभाला था, बल्कि नूपुर के आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाए बिना उसे उसकी भूल का आईना भी दिखा दिया था।
शाम की गुनगुनी धूप अब धीरे-धीरे छत के मुंडेर से फिसलकर आंगन में सिमटने लगी थी। छत पर लगी तुलसी की क्यारी से आती सौंधी खुशबू और रसोई से छनती इलायची व अदरक की महक पूरे वातावरण को एक अजीब सी ताजगी से भर रही थी। इस घर में शाम की चाय केवल एक आदत नहीं, बल्कि पूरे परिवार का एक अनमोल उत्सव हुआ करती थी। रसोई में कड़ाही में गर्मागर्म प्याज के पकौड़े उतारते हुए कल्याणी जी ने बड़े ही अपनेपन से अपनी बहू नूपुर को देखा। नूपुर चाय की प्यालियों को सलीके से ट्रे में सजा रही थी।
कल्याणी जी ने मुस्कराते हुए कहा, “नूपुर बहू, सच कहूं तो दिनभर की सारी थकान इस शाम की चाय की चुस्की के साथ ही मिट जाती है। जब तक आंगन के उस तख्त पर बैठकर हम सब दो घड़ी हंस-बोल न लें, तब तक तो ऐसा लगता है जैसे दिन पूरा ही नहीं हुआ।”
नूपुर ने भी चाय की छलनी रखते हुए बेहद आत्मीयता से सिर हिलाया और बोली, “बिल्कुल सही कह रही हैं माँ जी। मुझे भी पूरे दिन में इस वक्त का सबसे ज्यादा इंतजार रहता है। दिनभर हर कोई अपने-अपने कामों में उलझा रहता है, कम से कम इस बहाने हम सब एक साथ बैठते हैं, एक-दूसरे का हाल जानते हैं। सच में, परिवार के साथ बिताए ये चंद मिनट पूरे दिन की ऊर्जा लौटा देते हैं।”
दोनों सास-बहू हाथ में चाय और नाश्ते की ट्रे लेकर आंगन की ओर बढ़ीं। आंगन के बीचों-बीच लगे पुराने आम के पेड़ की छांव में एक बड़ा सा लकड़ी का तख्त बिछा हुआ था। वहां नूपुर के ससुर, यानी कल्याणी जी के पति, ओंकारेश्वर जी अपनी पुरानी आदत के मुताबिक चश्मा नाक पर टिकाए मोबाइल पर देश-दुनिया के समाचारों में पूरी तरह खोए हुए थे। हर शाम कल्याणी जी उन्हें टोकती थीं कि कम से कम इस वक्त मोबाइल को किनारे रख दिया कीजिए, पर ओंकारेश्वर जी हमेशा की तरह कंधे उचका कर हंस देते और कहते कि वह स्क्रीन देखते हुए भी सबकी बातें सुन रहे हैं।
कुछ ही देर में घर का बड़ा बेटा, देवांश, भी ऑफिस से लौटकर आंगन में आ पहुंचा। वह सीधे तख्त पर एक किनारे बैठ गया। उसके चेहरे पर सामान्य दिनों जैसी चमक नहीं थी, बल्कि एक अजीब सा भारीपन और बुझा-बुझा सा भाव था। टाई की ढीली गांठ और माथे पर खिंची त्योरियां बता रही थीं कि आज का दिन उसके लिए आसान नहीं रहा था। कल्याणी जी की पारखी नजरों ने बेटे के इस बदले हुए मिजाज को तुरंत भांप लिया। माँ का दिल था, उन्होंने मन ही मन सोचा कि शायद आज दफ्तर में काम का दबाव ज्यादा रहा होगा या फिर शहर के भारी ट्रैफिक ने उसे थका दिया होगा।
कल्याणी जी ने बेहद लाड़ से चाय की प्याली देवांश की तरफ बढ़ाई और ओंकारेश्वर जी की ओर देखते हुए मीठे उलाहने के अंदाज में कहा, “सुनिए जी, अब यह फोन बंद भी कर दीजिए। चाय ठंडी हो रही है। जब बच्चे पूरे दिन बाद घर लौटते हैं, तो कम से कम आधा घंटा तो उनके साथ खुलकर बात किया कीजिए। अगर आप ही इस तरह स्क्रीन में मुंह छुपाए रखेंगे, तो कल को बच्चे भी अपनी दुनिया में सिमट जाएंगे। याद रखिए, अगर औलाद हमें मान-सम्मान और समय देती है, तो हमें भी उनकी मौजूदगी और सम्मान का आदर करना चाहिए।”
कल्याणी जी की यह बात किसी को चुभने के लिए नहीं थी, यह तो बस एक आम पारिवारिक बातचीत का हिस्सा थी। मगर न जाने क्यों, उस शाम देवांश के अंदर कोई अनजाना तूफान चल रहा था। कल्याणी जी के मुंह से ‘सम्मान’ शब्द निकलते ही देवांश ने हाथ में पकड़ा चाय का कप तख्त पर जोर से पटका। चाय की कुछ बूंदें तख्त पर छलक गईं।
देवांश ने अपनी आँखें तरेरते हुए बेहद तीखे और कड़वे लहजे में कहा, “माँ, क्या आपको जरा भी समझ है कि आप क्या बोल रही हैं? जब देखो तब आपकी ये नसीहतें और प्रवचन शुरू हो जाते हैं! आपको क्या लगता है कि बाहर की दुनिया में क्या चल रहा है? किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता कि कौन किसका कितना सम्मान कर रहा है। दिनभर बस आपका यही रोना रहता है कि कोई बैठता नहीं, कोई बात नहीं करता! कभी इंसान की मानसिक हालत भी समझ लिया करो, बस हर वक्त खुद को सही साबित करने में लगी रहती हो!”
देवांश के बोल इतने रूखे और अप्रत्याशित थे कि पूरे आंगन में अचानक सन्नाटा छा गया। ओंकारेश्वर जी के हाथ से मोबाइल छूटते-छूटते बचा। नूपुर, जो अभी नमकीन की प्लेट रख रही थी, देवांश का यह आक्रामक रूप देखकर सन्न रह गई। उसने देवांश को कभी अपनी माँ से इस बदतमीजी से बात करते नहीं देखा था।
नूपुर को अपनी सास के आत्मसम्मान को ठेस पहुंचते देख बेहद बुरा लगा। उसने तुरंत देवांश के पास जाकर उसका कंधा हल्के से दबाया और आँखों ही आँखों में उसे चुप रहने और माँ से इस तरह बात न करने का सख्त इशारा किया। नूपुर चाह रही थी कि वह देवांश को वहीं रोक दे ताकि बात और न बिगड़े।
कल्याणी जी ने अपनी बहू की यह बेचैनी और देवांश को रोकने की कोशिश साफ देख ली। कल्याणी जी के चेहरे पर एक पल के लिए दुख की एक महीन लकीर उभरी, पर अगले ही पल उन्होंने खुद को संभाल लिया। उन्होंने अपनी नजरों से नूपुर को देखा और बेहद शांत भाव से ना में सिर हिलाते हुए बहू को इशारा किया कि वह देवांश को न रोके, उसे जो बोलना है बोलने दे।
कल्याणी जी ने एक गहरी सांस ली, अपने होठों पर एक फीकी सी मुस्कान लाईं और बेहद धीमे स्वर में बोलीं, “माफ करना बेटा, अगर मेरी किसी बात से तेरा दिल दुखा हो। मुझे नहीं पता था कि तू इतना परेशान है।” इतना कहकर कल्याणी जी चुपचाप उठीं और रसोई की तरफ बढ़ गईं।
देवांश भी झटके से उठा और अपने कमरे की तरफ चला गया।
आंगन में छाई उदासी नूपुर से बर्दाश्त नहीं हो रही थी। वह तेजी से कदमों से रसोई में पहुंची, जहां कल्याणी जी खामोशी से खाली बर्तनों को समेट रही थीं। नूपुर की आँखों में आंसू थे। उसने कल्याणी जी के पास जाकर भरे हुए गले से कहा, “माँ जी, देवांश ने आज जो कुछ भी कहा, उसके लिए मैं आपसे हाथ जोड़कर माफी मांगती हूँ। मुझे समझ नहीं आ रहा कि आज उन्हें क्या हो गया था। लेकिन माँ जी, आपने मुझे उन्हें रोकने से मना क्यों किया? वो आपके साथ इतनी बेरुखी से पेश आ रहे थे, सरेआम आपका अपमान कर रहे थे और आप चुपचाप सहती रहीं? आपको मुझे उन्हें टोकने देना चाहिए था!”
कल्याणी जी ने नूपुर के सिर पर अपना ममतामयी हाथ रखा। उनकी आँखों में किसी प्रकार का क्रोध नहीं था, बल्कि एक अथाह ठहराव था। उन्होंने नूपुर को पास बिठाते हुए कहा, “बहू, मैं उसकी माँ हूँ। एक माँ सिर्फ अपने बच्चे के शब्द नहीं सुनती, उसके पीछे छुपे दर्द और घबराहट को भी महसूस करती है। देवांश कोई बदतमीज लड़का नहीं है, उसने आज तक कभी ऊंची आवाज में मुझसे बात नहीं की। अगर आज वह इस तरह फट पड़ा है, तो इसका मतलब साफ है कि उसके अंदर कोई बहुत बड़ा बोझ था, जिसे वह संभाल नहीं पा रहा था। ऑफिस की कोई परेशानी, किसी बात का भारी तनाव या मन का कोई ऐसा द्वंद्व जो उसे अंदर ही अंदर घोंट रहा था।”
कल्याणी जी ने आगे समझाया, “नूपुर, जब इंसान के अंदर का गुबार हद से ज्यादा बढ़ जाता है, तो वह बाहर निकलने का रास्ता खोजता है। अगर यह घुटन बाहर न निकले, तो इंसान डिप्रेशन और अवसाद की खाई में गिर जाता है। मैंने उसे बोलने दिया ताकि उसके दिल की भड़ास निकल जाए और उसका मन हल्का हो जाए। अगर मैं भी उस पर चिल्ला पड़ती या तू उसे दबा देती, तो वह बात उसके सीने में पत्थर बनकर जम जाती।”
नूपुर ने कल्याणी जी की बात ध्यान से सुनी, पर उसके मन का आधुनिक संशय शांत नहीं हुआ। उसने थोड़ा ठहरकर, सीधे कल्याणी जी की आँखों में देखते हुए एक बेहद साहसिक सवाल पूछा, “माँ जी, आपकी यह ममता सच में बहुत बड़ी है। लेकिन मुझे एक बात बताइए… अगर आज देवांश की जगह मैं होती? अगर मैंने किसी बात की झुंझलाहट में, ऑफिस या मायके के तनाव में आकर आपके साथ ऐसी बेरुखी की होती, तो क्या आप मुझे भी इसी तरह अपनी भड़ास निकालने देतीं? क्या आप मुझे भी डिप्रेशन से बचाने के लिए अपमान का यह घूंट पी लेतीं, या फिर बात बहू के संस्कारों पर आ जाती?”
नूपुर के इस सीधे और तीखे सवाल से रसोई का माहौल एक बार फिर गंभीर हो गया। नूपुर के मन में यह जानने की गहरी उत्सुकता थी कि क्या एक सास का यह विशाल हृदय सिर्फ अपने बेटे के लिए ही धड़कता है या बहू के लिए भी वही पैमाना है?
कल्याणी जी एक पल के लिए रुकीं, फिर उन्होंने नूपुर के दोनों हाथ अपने हाथों में ले लिए। उन्होंने बहुत ही अपनत्व से कहा, “नूपुर, सच कहूं तो इसका जवाब बहुत सरल है, बस नजरिए का फर्क है। देख बेटा, इंसान अपना गुस्सा, अपनी झुंझलाहट और अपने मन की कड़वाहट हमेशा उसी के सामने निकालता है, जिसके बारे में उसे पूरा यकीन होता है कि यह इंसान मुझे कभी छोड़कर नहीं जाएगा। जहाँ उसे खोने का डर नहीं होता, वहीं वह अपनी कमजोरियां और अपने विकार खुलकर बिखेरता है।”
कल्याणी जी ने मुस्कुराते हुए आगे कहा, “अब तू ही सोच, देवांश ने जिस लहजे में मुझसे बात की, क्या वह अपने पापा से ऐसी बात कर सकता था? कभी नहीं, क्योंकि वह जानता है कि पिता के सामने एक मर्यादा की दीवार है। क्या वह तेरे सामने ऑफिस के किसी क्लाइंट या बॉस के सामने ऐसा बोल सकता था? बिल्कुल नहीं। उसने मेरे सामने यह सब इसलिए उगला क्योंकि वह जानता है कि माँ का दिल एक ऐसा समंदर है जो उसके सारे जहर को पी जाएगा और बदले में उसे कभी ठुकराएगी नहीं।”
फिर कल्याणी जी ने नूपुर की आँखों में सीधे देखते हुए एक ऐसा सच उजागर किया जिसने नूपुर के पैरों तले जमीन खिसका दी। कल्याणी जी ने धीमे स्वर में कहा, “और रही बात तेरी, तो नूपुर, तू भूल रही है कि तू भी तो यही करती है। जब तू किसी बात से परेशान होती है, तो तू अपने मन की सारी भड़ास, सारी शिकायतें किसके सामने निकालती है? देवांश के सामने ना? कल रात जब तू अपने कमरे में इस घर के तौर-तरीकों और मेरी छोटी-मोटी रोक-टोक को लेकर देवांश पर बरस रही थी, तब देवांश खामोशी से सुन रहा था ना? तूने अपने मन का सारा तनाव उस पर उड़ेल दिया था।”
नूपुर का चेहरा शर्म से लाल हो गया। कल रात कमरे में उसने देवांश से बहुत नाराजगी जताई थी और घर की कई बातों को लेकर उसे खूब खरी-खोटी सुनाई थी। उसे बिल्कुल अंदाजा नहीं था कि कल्याणी जी ने वह सब सुन लिया था या समझ लिया था।
कल्याणी जी ने नूपुर का हाथ सहलाते हुए बड़े ही कोमल स्वर में कहा, “बेटा, जब तू देवांश पर गुस्सा निकालती है, तो देवांश वह गुस्सा तुझ पर नहीं उतार पाता क्योंकि वह तुझसे प्यार करता है और तेरा सम्मान करता है। ऑफिस का तनाव और रात को घर में मिले ताने… यह सब उसके सीने में बारूद की तरह जमा हो रहा था। आज शाम जब मैंने जरा सी बात कही, तो वह बारूद मेरे सामने फट पड़ा। देवांश के इस बेरुखे व्यवहार की जड़ में केवल ऑफिस नहीं था, कहीं न कहीं हमारी और तुम्हारी बातें भी थीं।”
कल्याणी जी ने नूपुर के माथे पर हाथ फेरते हुए कहा, “अगर कल को तू भी मेरे सामने इस तरह रो पड़े या चिल्ला पड़े, तो मैं तुझे भी अपनी बच्ची समझकर सीने से लगा लूंगी, क्योंकि जिस दिन बहू अपनी सास के सामने बिना डरे अपना दर्द और गुस्सा बयां करने लगे, समझो उस दिन सास सच में माँ बन गई।”
कल्याणी जी के इन शब्दों ने नूपुर के भीतर की सारी ग्रंथियां खोल दीं। नूपुर को अपनी गलती का गहरा अहसास हुआ। उसे समझ आ गया कि जिस कड़वाहट का शिकार आज कल्याणी जी बनी थीं, उसकी शुरुआत जाने-अनजाने खुद उसी के हाथों हुई थी। कल्याणी जी ने न केवल अपने बेटे की मानसिक स्थिति को संभाला था, बल्कि नूपुर के आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाए बिना उसे उसकी भूल का आईना भी दिखा दिया था।
नूपुर की आँखों से पश्चाताप के आंसू छलक पड़े। उसने कल्याणी जी के गले लगकर सिसकते हुए कहा, “मुझे माफ कर दीजिए माँ जी। मैंने आपको समझने में कितनी बड़ी भूल कर दी थी। आप सिर्फ एक ममतामयी माँ ही नहीं, इस पूरे घर की सबसे मजबूत ढाल हैं। आज आपने मुझे सिखा दिया कि रिश्तों को संभालने के लिए सिर्फ अधिकार नहीं, बल्कि एक विशाल और क्षमाशील दिल की जरूरत होती है।”
उसी समय कमरे के दरवाजे की ओट में खड़ा देवांश भी यह सब सुन रहा था। उसका सिर शर्म से झुक गया था। वह चुपचाप रसोई में आया और अपनी माँ के चरणों में बैठ गया। उसकी आँखों में पश्चाताप के आंसू थे। कल्याणी जी ने दोनों बच्चों को अपने आंचल में समेट लिया। शाम की वह कड़वाहट अब एक नए, गहरे और अटूट विश्वास की मिठास में बदल चुकी थी। उस घर में अब सिर्फ चाय की खुशबू नहीं, बल्कि एक-दूसरे के प्रति सच्ची समझ और सम्मान की महक भी घुल चुकी थी।
इस कहानी में माँ के जिस धैर्य और समझदारी को दिखाया गया है, क्या आज के दौर में हम सब अपने परिवारों में ऐसा दृष्टिकोण रख पाते हैं? क्या आपको लगता है कि रिश्तों में अपनी भड़ास निकालने की छूट केवल अपनों को ही मिलती है? अपने विचार नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।
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मूल लेखिका : संध्या त्रिपाठी