एक भाई का निस्वार्थ प्रेम

उनकी कराहने की आवाज़ सुनकर बगल के कमरे से चंद्रकांत भैया उठकर आ गए। उन्होंने सूर्यकांत का तड़पता हुआ चेहरा देखा तो उनके चेहरे पर चिंता की लकीरें खिंच गईं। बिना एक शब्द कहे भैया सीधे रसोई में गए। उन्होंने सरसों के तेल में लहसुन डालकर उसे हल्का गर्म किया। फिर वो वापस आए, सूर्यकांत के बिस्तर पर बैठे और अपने छोटे भाई का सिर अपनी गोद में रख लिया। चंद्रकांत भैया अपने खुरदुरे लेकिन प्यार भरे हाथों से सूर्यकांत के सिर की मालिश करने लगे। उस गर्म तेल और भैया के हाथों के स्पर्श से ऐसा जादू हुआ कि थोड़ी ही देर में सूर्यकांत का दर्द छूमंतर हो गया और उन्हें एक गहरी, सुकून भरी नींद आ गई।

  पचपन साल के हो चुके सूर्यकांत अपने कमरे की खिड़की से बाहर देखते हुए चाय की चुस्कियां ले रहे थे। बाहर सड़क पर भागती-दौड़ती दुनिया थी, जहाँ हर इंसान अपनी किसी न किसी होड़ में लगा था। अखबार के पन्नों में रोज़ ऐसी खबरें छपती थीं कि फलां जगह संपत्ति के लिए एक भाई ने दूसरे भाई को मार दिया या अदालत के चक्कर काटते-काटते सगे भाइयों के रिश्ते दम तोड़ गए। लेकिन सूर्यकांत जब भी अपने घर के भीतर नज़र दौड़ाते, तो उन्हें लगता कि वो कलयुग के इस स्वार्थी दौर में नहीं, बल्कि किसी त्रेता युग के ‘राम राज्य’ में जी रहे हैं। उनकी आंखें अक्सर उन पलों को याद करके नम हो जाती थीं, जो उन्होंने अपने बड़े भाई चंद्रकांत और भाभी सुभद्रा के साए में गुज़ारे थे।

सूर्यकांत की उम्र आज पचपन साल हो गई है। आम तौर पर इस उम्र में इंसान अपने परिवार, बच्चों और खुद की बनाई दुनिया में मगन रहता है, लेकिन सूर्यकांत की दुनिया उनके भैया और भाभी के इर्द-गिर्द ही घूमती है। उम्र के इस पड़ाव पर भी अगर सूर्यकांत को ज़रा सी खांसी आ जाए या रात में हल्का सा भी बुखार महसूस हो, तो बड़े भैया और भाभी की नींद हराम हो जाती है। वे तब तक नहीं सोते जब तक कि सूर्यकांत का बुखार उतर न जाए। आज के ज़माने में जहाँ लोग अपने सगे माता-पिता की परवाह नहीं करते, वहाँ एक बड़े भाई का अपने पचपन साल के छोटे भाई के लिए ऐसा फिक्रमंद होना किसी चमत्कार से कम नहीं लगता।

यह अथाह प्रेम एक दिन में नहीं पनपा था। इसके पीछे बरसों का त्याग, तपस्या और निस्वार्थ सेवा थी। बात आज से करीब बीस साल पुरानी है। सूर्यकांत का जीवन बहुत खुशहाल चल रहा था। उनका एक छोटा सा परिवार था जिसमें उनकी पत्नी मीरा और उनका पाँच साल का बेटा रोहन था। लेकिन नियति को कुछ और ही मंज़ूर था। एक गंभीर बीमारी ने मीरा को सूर्यकांत और नन्हे रोहन से हमेशा के लिए छीन लिया। उस वक्त सूर्यकांत पूरी तरह से टूट चुके थे। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि वो अपना दुख कैसे संभालें और पाँच साल के उस मासूम बच्चे की परवरिश कैसे करें।

तभी उनके बड़े भाई चंद्रकांत और भाभी सुभद्रा ढाल बनकर उनके सामने खड़े हो गए। सुभद्रा भाभी ने रोहन का हाथ पकड़ा और उसे अपने सीने से लगा लिया। उन्होंने सूर्यकांत से कहा, “आज से यह मेरा बेटा है। तू इसकी कोई फिक्र मत कर।” और सच में, भाभी ने अपनी बात पत्थर की लकीर की तरह निभाई। रोहन पाँच साल की उम्र से लेकर अपनी ज़िंदगी में सफल होने तक अपने ताऊ और ताई जी के पास ही रहा। सुभद्रा भाभी ने उसे इतना प्यार दिया कि रोहन कभी अपनी सगी माँ की कमी महसूस ही नहीं कर पाया। आज रोहन एक बहुत बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी में सॉफ्टवेयर इंजीनियर है, लेकिन आज भी वो अपनी हर कामयाबी का श्रेय अपनी ताई जी को ही देता है।

समय का पहिया आगे बढ़ा। रोहन अपनी ज़िंदगी में सेटल हो गया और सूर्यकांत ने भी अपनी बिखरी हुई ज़िंदगी को समेटना शुरू कर दिया था। लेकिन किस्मत को शायद सूर्यकांत का एक और इम्तिहान लेना था। आज से ठीक पाँच साल पहले, जब सूर्यकांत पचास साल के थे, उन पर दुखों का एक और भयानक पहाड़ टूट पड़ा। उनका एक बहुत बड़ा एक्सीडेंट हो गया था और उसी दौरान उनके व्यापार में ऐसा घाटा लगा कि वो पूरी तरह से दिवालिया हो गए। शरीर और मन, दोनों से टूट चुके सूर्यकांत ने तो जैसे जीने की उम्मीद ही छोड़ दी थी। अस्पताल के बिस्तर पर पड़े हुए वो यही सोचते थे कि अब उनकी ज़िंदगी का सफर यहीं खत्म हो जाना चाहिए।

लेकिन इन दोनों यानी बड़े भैया और भाभी ने उन्हें कैसे उस मौत के मुंह से बाहर निकाला, यह सिर्फ सूर्यकांत का दिल जानता है। चंद्रकांत भैया ने अपने छोटे भाई के इलाज के लिए अपनी बरसों की जमा-पूंजी पानी की तरह बहा दी। दिन-रात अस्पताल में उसके पास बैठे रहते। जब सूर्यकांत घर आए, तो सुभद्रा भाभी ने एक छोटे बच्चे की तरह उनकी देखभाल की। उनके खाने-पीने से लेकर उनकी दवाइयों का समय, सब कुछ भाभी की उंगलियों पर रहता था। भैया-भाभी ने उन्हें शारीरिक और मानसिक, दोनों ही तरह से इतना संबल दिया कि सूर्यकांत फिर से अपने पैरों पर खड़े हो गए। उन दिनों को याद करके सूर्यकांत आज भी सिहर जाते हैं। अगर उस वक्त बड़े भाई का हाथ उनके सिर पर न होता, तो शायद आज वो ज़िंदा ही नहीं होते।

इन यादों के बीच सूर्यकांत को पिछले साल की सर्दियों की वो रात याद आ गई, जिसने उनके दिल में बड़े भाई के लिए सम्मान को पूजा के दर्जे तक पहुँचा दिया। उस रात जयपुर में कड़ाके की ठंड पड़ रही थी। आधी रात के करीब सूर्यकांत के सिर में बहुत तेज़ दर्द उठा। यह दर्द इतना भयंकर था कि उनसे सहा नहीं जा रहा था। वो दर्द से कराह रहे थे। उन्होंने उठकर दवा ढूंढने की कोशिश की, लेकिन घर में उस वक्त सिरदर्द की कोई भी दवा नहीं थी। रात के दो बज रहे थे और बाहर जाकर दवा लाना मुमकिन नहीं था।

उनकी कराहने की आवाज़ सुनकर बगल के कमरे से चंद्रकांत भैया उठकर आ गए। उन्होंने सूर्यकांत का तड़पता हुआ चेहरा देखा तो उनके चेहरे पर चिंता की लकीरें खिंच गईं। बिना एक शब्द कहे भैया सीधे रसोई में गए। उन्होंने सरसों के तेल में लहसुन डालकर उसे हल्का गर्म किया। फिर वो वापस आए, सूर्यकांत के बिस्तर पर बैठे और अपने छोटे भाई का सिर अपनी गोद में रख लिया। चंद्रकांत भैया अपने खुरदुरे लेकिन प्यार भरे हाथों से सूर्यकांत के सिर की मालिश करने लगे। उस गर्म तेल और भैया के हाथों के स्पर्श से ऐसा जादू हुआ कि थोड़ी ही देर में सूर्यकांत का दर्द छूमंतर हो गया और उन्हें एक गहरी, सुकून भरी नींद आ गई।

अगली सुबह जब सूर्यकांत की आंख खुली, तो उन्हें एहसास हुआ कि पचपन साल की उम्र में भी वो अपने बड़े भाई की गोद में सिर रखकर सोए थे। यह सोचकर ही उनका रोम-रोम कृतज्ञता से भर गया। ज़रा सोचिए, अगर पचपन-साठ वर्ष की उम्र में भी आपके परिवार में एक भाई दूसरे भाई के साथ ऐसा निस्वार्थ प्रेम कर रहा है, तो समझें कि आप राम राज्य में जी रहे हैं। यह कोई कहानी नहीं है, यह एक जीती जागती हकीकत है जो यह साबित करती है कि अगर इंसान चाहे, तो अपने घर को ही स्वर्ग बना सकता है।

यही कारण है कि सूर्यकांत आज भी रोज़ रात को सोने से पहले अपने बड़े भाई के पैर दबाते हैं। चंद्रकांत भैया अक्सर उन्हें मना करते हैं, कहते हैं, “तू भी अब बूढ़ा हो गया है, क्यों मेरे पैर दबाकर खुद को थकाता है?” लेकिन सूर्यकांत के लिए यह कोई काम नहीं, बल्कि अपनी श्रद्धा व्यक्त करने का एक तरीका है। वो अपने भाई के पैर दबाते हुए महसूस करते हैं कि दुनिया की सारी तीर्थ यात्राओं का पुण्य उन्हें इसी घर में मिल रहा है।

आज के समाज में जहाँ भाई-भाई एक दूसरे की शक्ल देखना पसंद नहीं करते, छोटी-छोटी बातों पर, पुश्तैनी ज़मीन के एक छोटे से हिस्से के लिए एक-दूसरे के खून के प्यासे हो जाते हैं, वहीं यह परिवार हम सबके लिए एक बहुत बड़ा उदाहरण है। लोग यह भूल जाते हैं कि पैसा, ज़मीन और जायदाद यहीं इस दुनिया में धरे रह जाएंगे। जब हम मुसीबत में होते हैं, तब न तो बैंक का बैलेंस काम आता है और न ही वकीलों की फौज। उस वक्त खून का रिश्ता और परिवार का प्यार ही ढाल बनकर खड़ा होता है।

सूर्यकांत अक्सर अपने दोस्तों और रिश्तेदारों से यही बात कहते हैं, “अरे यार! प्रेम से रहो। भाई के साथ भाई बनकर रहो। ज़िंदगी बहुत छोटी है और इसे अगर प्यार से जिओगे तो यह बड़ी आसान हो जाएगी। अहंकार और स्वार्थ को छोड़कर एक बार अपने परिवार को गले लगा कर तो देखो, तुम्हें दुनिया की कोई भी परेशानी बड़ी नहीं लगेगी।”

सच ही तो है, प्यार में जो ताकत है, वो किसी और चीज़ में नहीं। जो घर प्यार और आपसी समझ से चलते हैं, वहाँ भगवान खुद वास करते हैं।

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