सुहासिनी ने संयम से मयंक का हाथ अपने हाथों में थामते हुए कहा, “मयंक, आप दोनों भाइयों का झगड़ा व्यापार की नीतियों को लेकर है, दिलों को लेकर नहीं। व्यापार में नफे-नुकसान के गणित में आप दोनों एक-दूसरे पर चिल्लाए, कागज़ात अलग कर लिए, लेकिन इसका खामियाजा हम दोनों औरतें क्यों भुगतें? मालिनी भाभी ने तो कभी मुझे देवरानी नहीं, अपनी छोटी बहन माना है। उन्होंने हर सुख-दुख में मेरी उंगली थामी है। अगर भैया के गुस्से के कारण वो संकोच में नहीं आ पा रही हैं, तो क्या हुआ? मैं खुद कल सुबह उनके घर जाऊंगी, उनके पैर छूकर उनका आशीर्वाद और अपनी सरगी दोनों लेकर आऊंगी। आखिर वो मुझसे बड़ी हैं, घर की लक्ष्मी हैं। अगर आपको मेरे साथ चलना हो तो चलिएगा, वरना मैं अकेले चली जाऊंगी।”
कार्तिक महीने की हल्की गुलाबी ठंड ने शहर की हवाओं में अपनी मौजूदगी दर्ज करानी शुरू कर दी थी। बाज़ारों में सुहागनों की भीड़, खनकती कांच की चूड़ियाँ, रंग-बिरंगी साड़ियों की दुकानें और मेंहदी की भीनी-भीनी खुशबू करवाचौथ के त्योहार का स्वागत कर रही थी। हर साल इस मौसम की आहट होते ही सुहासिनी का मन मयूर की तरह नाच उठता था, लेकिन इस बार उसके मन पर एक अजीब सी उदासी का साया था। घर के लिविंग रूम में जलती पीली रोशनी के नीचे सोफे पर बैठे उसके पति मयंक अपनी लैपटॉप स्क्रीन पर आंखें गड़ाए हुए थे। उनके चेहरे की रेखाओं पर तनाव और खिंचाव साफ देखा जा सकता था।
सुहासिनी ने रसोई से इलायची वाली चाय के दो कप उठाए और धीरे कदमों से आकर मयंक के करीब बैठ गई। उसने चाय की प्याली सेंटर टेबल पर रखी और बहुत लाड़ से मयंक के कंधे पर अपना सिर टिका दिया। मयंक ने एक गहरी सांस ली लेकिन स्क्रीन से नज़रें नहीं हटाईं।
“सुनिए ना…” सुहासिनी ने मयंक के हाथ पर अपनी उंगलियां फेरते हुए बेहद कोमल आवाज़ में कहा, “करवाचौथ में बस दो ही दिन बचे हैं। बाज़ार में कितनी रौनक है, आपको इस बार मेरे लिए क्या उपहार लाना है?”
मयंक ने तुरंत अपनी उंगलियां कीबोर्ड से हटाईं और अपना कंधा हल्का सा झटका, मानो वह सुहासिनी के इस लाड़ के पीछे छिपी असली बात को पहले से भांप चुके हों। उनके चेहरे पर तल्खी तैर गई और आवाज़ में रूखापन भर आया, “सुहासिनी, पहेलियां मत बुझाओ। मुझे अच्छी तरह पता है कि तुम्हारा इरादा किसी तोहफे की बात करने का नहीं है। सीधे-सीधे कहो कि तुम्हारे दिमाग में क्या चल रहा है।”
सुहासिनी मयंक के इस बदले हुए स्वभाव से वाकिफ थी। पिछले तीन महीनों से इस घर में तनाव की एक अनदेखी दीवार खड़ी थी। उसने मयंक के रूखेपन को नज़रअंदाज़ किया, अपने चेहरे पर एक शांत मुस्कान बनाए रखी और बात आगे बढ़ाई, “मैं सच कह रही हूँ, मुझे किसी महंगे गहने या साड़ी की चाहत नहीं है। मेरी चिंता का सबब कुछ और है। हर साल व्रत से हफ्ता भर पहले ही दीदी मेरे लिए सरगी का सामान भिजवा देती थीं या खुद लेकर आ जाती थीं। काजू की बर्फी, मट्ठियां, सुहाग का जोड़ा, बिछिया और उनका दुलार… आज व्रत में सिर्फ अड़तालीस घंटे बाकी हैं, और बड़ी दीदी की तरफ से कोई खबर नहीं आई।”
मयंक का चेहरा गुस्से से तमतमा उठा। उन्होंने लैपटॉप को एक झटके से बंद किया और सुहासिनी की तरफ घूमते हुए तीखे स्वर में कहा, “तुम्हारी याददाश्त इतनी कमज़ोर कब से हो गई सुहासिनी? क्या तुम भूल गईं कि उस दिन ऑफिस में राघव भैया ने सबके सामने मेरा कितना अपमान किया था? उन्होंने मुझे उस नई टेक्सटाइल यूनिट के विस्तार से यह कहकर अलग कर दिया कि मेरे फैसले कंपनी के लिए नुकसानदेह हैं। उन्होंने साफ शब्दों में कह दिया था कि अगर मुझे अपनी शर्तों पर काम करना है तो मैं अपनी राह अलग चुन लूँ। जब मेरे सगे बड़े भाई ने मुझसे खून का रिश्ता तक तोड़ने की बात कह दी, तो तुम्हें अभी भी लगता है कि मालिनी भाभी तुम्हारे लिए सरगी लेकर इस चौखट पर पैर रखेंगी? भूल जाओ ये सब।”
सुहासिनी ने मयंक की आंखों में झांका, जहां गुस्सा तो था लेकिन उस गुस्से के पीछे अपने बड़े भाई से मिले दर्द की एक गहरी लकीर भी थी। मयंक और राघव केवल भाई नहीं थे, पिता के गुजर जाने के बाद राघव ने मयंक को बेटे की तरह पाला था। दोनों भाइयों ने मिलकर अपने पुश्तैनी कपड़े के कारोबार को आसमान की बुलंदियों तक पहुँचाया था। लेकिन नए प्रोजेक्ट में विदेशी साझेदारों को शामिल करने की बात पर दोनों के बीच ऐसा टकराव हुआ कि बात बंटवारे और अलगाव तक पहुँच गई।
सुहासिनी ने संयम से मयंक का हाथ अपने हाथों में थामते हुए कहा, “मयंक, आप दोनों भाइयों का झगड़ा व्यापार की नीतियों को लेकर है, दिलों को लेकर नहीं। व्यापार में नफे-नुकसान के गणित में आप दोनों एक-दूसरे पर चिल्लाए, कागज़ात अलग कर लिए, लेकिन इसका खामियाजा हम दोनों औरतें क्यों भुगतें? मालिनी भाभी ने तो कभी मुझे देवरानी नहीं, अपनी छोटी बहन माना है। उन्होंने हर सुख-दुख में मेरी उंगली थामी है। अगर भैया के गुस्से के कारण वो संकोच में नहीं आ पा रही हैं, तो क्या हुआ? मैं खुद कल सुबह उनके घर जाऊंगी, उनके पैर छूकर उनका आशीर्वाद और अपनी सरगी दोनों लेकर आऊंगी। आखिर वो मुझसे बड़ी हैं, घर की लक्ष्मी हैं। अगर आपको मेरे साथ चलना हो तो चलिएगा, वरना मैं अकेले चली जाऊंगी।”
मयंक का पारा सातवें आसमान पर पहुँच गया। उन्होंने अपना हाथ झटके से छुड़ाया और खड़े हो गए। “अगर तुम वहां गईं, तो समझ लेना कि तुमने मेरी आत्मसम्मान की बलि चढ़ा दी। उस घर से अब हमारा कोई नाता नहीं है!” इतना कहकर मयंक भारी कदमों से बेडरूम की तरफ बढ़ गए और दरवाज़ा जोर से बंद कर लिया।
सुहासिनी वहीं सोफे पर अकेली बैठी रह गई। उसकी आंखों से दो बूंद आंसू छलक कर गालों पर ढुलक गए। उसने दीवार पर टंगे उस पुराने पारिवारिक फ्रेम को देखा, जिसमें चारों लोग एक साथ खड़े हंस रहे थे। क्या चंद रुपयों और व्यावसायिक मतभेदों की कीमत इतने सालों के प्यार से ज्यादा हो सकती है? उसने मन ही मन भगवान से प्रार्थना की कि काश यह त्योहार उनके परिवार के अंधेरे को दूर कर दे।
अभी दस ही मिनट बीते थे कि घर की मुख्य डोरबेल की मीठी आवाज़ गूंजी।
सुहासिनी ने चौंककर घड़ी देखी। रात के साढ़े आठ बज रहे थे। उसने पल्लू से अपनी आंखें पोंछीं और दरवाज़े की तरफ कदम बढ़ाए। उसे लगा शायद नीचे का चौकीदार कोई पार्सल देने आया होगा। लेकिन जैसे ही उसने कुंडी खोली और दरवाज़ा पीछे किया, उसके कदम वहीं जम गए।
सामने चौखट पर गहरे लाल रंग की बनारसी साड़ी पहने, मांग में सिंदूर भरे और हाथों में चांदी की खूबसूरत नक्काशीदार थाल लिए मालिनी भाभी खड़ी थीं। थाल के ऊपर गोटेदार लाल चुनरी ढकी हुई थी, जिसके किनारों से मेवे, नारियल और सुहाग की चूड़ियों की चमक छनकर बाहर आ रही थी। उनके चेहरे पर वही पुरानी, चिर-परिचित ममतामयी मुस्कान थी।
सुहासिनी के मुंह से एक शब्द भी नहीं निकला। खुशी, विस्मय और भावुकता का ऐसा सैलाब उमड़ा कि वह तुरंत झुककर मालिनी के पैरों में गिर पड़ी। मालिनी ने तुरंत थाल को एक हाथ से संभाला और दूसरे हाथ से सुहासिनी को उठाकर अपने सीने से भींच लिया। दोनों की आंखों से आंसुओं की अविरल धारा बह निकली।
सुहासिनी ने सिसकते हुए, रुंधे गले से कहा, “दीदी… मुझे लगा… मुझे लगा कि इस बार आप मुझसे रूठ गईं। मुझे लगा कि उस तकरार के बाद शायद आप कभी नहीं आएंगी…”
मालिनी ने अपने पल्लू से सुहासिनी के आंसू पोंछे और उसके गाल को प्यार से थपथपाते हुए बीच में ही टोक दिया, “पागल लड़की! तूने सोच भी कैसे लिया कि तेरी यह जेठानी अपना धर्म और फर्ज भूल जाएगी? आदमियों का क्या है, वो तो बाहर की दुनिया की धूल और हिसाब-किताब को घर के आंगन में ले आते हैं। व्यापार में अगर उनकी सोच नहीं मिली, तो क्या हमारे सालों पुराने प्यार की डोर इतनी कच्ची थी कि तिनके की तरह टूट जाती? रिश्ते तोड़ना तो बहुत आसान होता है छोटी, दुनिया का सबसे आसान काम है किसी को छोड़ देना। असली हुनर और बड़प्पन तो टूटे हुए धागों को प्यार से दोबारा गांठ बांधकर निभाने में है।”
मालिनी के इन शब्दों ने घर के सन्नाटे में जैसे अमृत घोल दिया। उन्होंने घर के अंदर कदम रखा, थाल को सेंटर टेबल पर आदर से रखा और फिर चारों तरफ नज़र घुमाते हुए बहुत अपनेपन से आवाज़ लगाई, “कहाँ छिपे बैठे हैं हमारे लक्ष्मण जैसे देवर जी? ज़रा बाहर तो आएं, आज मैं खुद उनके कान खींचकर बताऊंगी कि बड़ों से आंखें फेरने की सज़ा क्या होती है!”
बेडरूम का दरवाज़ा पहले से ही थोड़ा सा खुला हुआ था। मयंक अंदर खड़े होकर अपनी भाभी की हर एक बात सुन रहे थे। भाभी की वह ममतामयी आवाज़, वह डांट जिसमें सिर्फ और सिर्फ निस्वार्थ स्नेह भरा था, मयंक के अंदर के सारे अहंकार और गुस्से को बर्फ की तरह पिघला चुकी थी।
मयंक बहुत धीमी गति से, नज़रें झुकाए, भीगी पलकों के साथ कमरे से बाहर निकले। वे एक शब्द भी नहीं बोल पा रहे थे। जैसे ही वे मालिनी के सामने पहुंचे, उनके घुटने मुड़ गए और वे बिना कुछ सोचे-समझे सीधे अपनी भाभी के पैरों में गिर पड़े।
“भाभी… मुझे माफ कर दीजिए,” मयंक का गला पूरी तरह भर आया था, उनकी आवाज़ कांप रही थी, “मैंने गुस्से में बहुत गलत सोच लिया था। मैंने भैया के साथ-साथ आपके मातृत्व का भी अनादर किया। मैं शर्मिंदा हूँ भाभी…”
मालिनी की आंखों से भी ममता के आंसू टपक पड़े। उन्होंने झुककर मयंक के दोनों कंधे पकड़े और उन्हें उठाकर अपने गले से लगा लिया। उन्होंने मयंक के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “पगले, कभी मां भी अपने बच्चों से नाराज़ होकर बैठी रहती है क्या? भाइयों में मतभेद हो सकते हैं, मनभेद नहीं होना चाहिए। तू जितना राघव का छोटा भाई है, उतना ही मेरा पहला बच्चा भी है।”
मालिनी ने अपनी साड़ी के पल्लू से अपनी भीगी आंखें और मयंक के आंसू पोंछे। फिर अचानक उनके चेहरे पर एक नटखट मुस्कान तैर गई। उन्होंने मयंक के कंधे पर हलकी सी चपत लगाते हुए कहा, “अच्छा अब ये रोना-धोना बंद करो और जरा बाहर बालकनी से नीचे झांककर देखो। तुम्हारे वो बड़े भैया, तुम्हारे ‘रामजी’, बाहर गाड़ी की ड्राइविंग सीट पर मुंह फुलाए, हाथ बांधे बैठे हैं। कह रहे थे कि जब तक मयंक खुद आकर मेरा हाथ पकड़कर अंदर नहीं ले जाएगा, मैं ऊपर नहीं चढ़ूंगा। अब जाओ और बिजली की तेज़ी से अपने भैया को मनाकर अंदर लाओ!”
यह सुनते ही मयंक के चेहरे पर एक साथ हैरानी और असीम आनंद की चमक दौड़ गई। वे बिना एक पल गंवाए, नंगे पैर ही मेन गेट की तरफ दौड़े। लिफ्ट का इंतज़ार किए बिना सीढ़ियों से नीचे उतर गए।
इधर लिविंग रूम में सुहासिनी और मालिनी ने एक-दूसरे को देखा और दोनों के होठों से खिलखिलाती हुई हंसी छूट पड़ी। पूरे घर में उस हंसी की गूंज फैल गई, जिसने पिछले कई हफ्तों की उदासी, घुटन और कड़वाहट को एक झटके में धो डाला था।
चंद ही मिनटों में मयंक अपने बड़े भाई राघव का हाथ दोनों हाथों से थामे, उन्हें लगभग खींचते हुए घर के अंदर लेकर आए। राघव के चेहरे पर एक गंभीर बड़प्पन था, लेकिन मयंक को देखते ही उनकी आंखें भी नम थीं। जैसे ही राघव ने चौखट लांघी, मयंक ने उनके गले लगकर कहा, “भैया, कंपनी रहे या जाए, मैं आपके बिना अधूरा हूँ।” राघव ने मयंक की पीठ थपथपाते हुए कसकर गले लगा लिया और बोले, “गलती मेरी भी थी छोटे, बड़प्पन सिर्फ उम्र में नहीं, सुनने में भी होना चाहिए था।”
उस रात शांति कुंज के उस छोटे से घर में केवल सरगी का त्योहार नहीं मना, बल्कि प्रेम, क्षमा और संस्कारों की ऐसी ज्योत जली जिससे करवाचौथ का पर्व समय से पहले ही दिवाली के महापर्व में तब्दील हो गया। सुहासिनी ने जब मालिनी के हाथों से सरगी का थाल स्वीकार किया, तो उसे महसूस हुआ कि संसार का सबसे बड़ा उपहार सोने-चांदी के आभूषण नहीं, बल्कि एक सूत्र में बंधा हुआ खुशहाल परिवार है।
परिवारों में अक्सर व्यापारिक या वैचारिक मतभेद दीवारों की तरह खड़े हो जाते हैं, लेकिन अगर घर की महिलाएं समझदारी और प्रेम का दिया जलाए रखें, तो बड़ी से बड़ी गलतफहमियां भी मिट जाती हैं। क्या आपको लगता है कि रिश्तों में अपनी ईगो को किनारे रखकर झुक जाना कमजोरी नहीं बल्कि सबसे बड़ा बड़प्पन है? यदि आपके परिवार में कभी ऐसा मनमुटाव हो, तो क्या आप भी मालिनी भाभी की तरह पहला कदम उठाने की हिम्मत दिखाएंगे? अपने विचार और अनुभव नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।
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