समर की वह हंसी मेघना के कानों में पिघले हुए सीसे की तरह चुभ गई। वह उस इंसान को अवाक होकर देख रही थी जिसे उसने अब तक बहुत सुलझा हुआ, संवेदनशील और अपने प्यार में डूबा हुआ समझा था। समर जिस आसानी से अपनी ही पत्नी की आंखों में धूल झोंक रहा था, जिस चालाकी से उसने एक पवित्र रिश्ते का मुखौटा पहनकर झूठ बोला था, उसने मेघना के अंतर्मन को झकझोर कर रख दिया। उसे ऐसा लगा जैसे समर के चेहरे से शराफत का वह नकाब अचानक खिसक गया हो जिसे देखकर वह उस पर मोहित हुई थी।
शाम के धुंधलके में जब गाड़ियों की बत्तियां सड़कों पर सुनहरी लकीरें खींच रही थीं, तब मेघना एक बड़े से अपार्टमेंट की तीसरी मंजिल पर खड़ी थी। उसके हाथ में एक फाइल थी, जिसे उसने ऑफिस के काम का बहाना बनाकर थाम रखा था। दिल की धड़कनें तेज थीं, लेकिन चेहरे पर उसने एक बनावटी आत्मविश्वास ओढ़ रखा था। आज वह पहली बार समर के घर आई थी। वही समर, जिसके साथ पिछले छह महीनों से वह ऑफिस के बाद घंटों कॉफी शॉप में बैठती थी, जिसकी मीठी बातों ने मेघना को यह अहसास करा दिया था कि दुनिया में अगर कोई उसे सबसे ज्यादा समझता है, तो वह सिर्फ समर है। समर हमेशा अपनी शादीशुदा जिंदगी को नीरस और बोझिल बताता था। वह कहता था कि उसकी शादी केवल एक सामाजिक मजबूरी है, जिसमें कोई भावना, कोई आत्मीयता नहीं बची। मेघना उसकी बातों के जाल में इस कदर उलझती चली गई कि उसने यह सोचना ही छोड़ दिया कि समर पहले से किसी और का है।
दरवाजे की घंटी बजी तो समर ने ही दरवाजा खोला। सामने मेघना को देखकर उसके चेहरे पर एक पल के लिए घबराहट की हल्की सी लकीर उभरी, लेकिन अगले ही पल उसने खुद को संभाल लिया। समर के चेहरे पर एक चालाक मुस्कान तैर गई। उसने पीछे मुड़कर ड्राइंग रूम में खेलते हुए अपने छह साल के बेटे कबीर की तरफ देखा और ऊंची आवाज में कहा, अरे कबीर बेटा! देखो तुम्हारी मौसी आई हैं। आओ बेटा, मौसी के पैर छूकर नमस्ते करो।
छोटा कबीर अपनी गाड़ियों से खेल रहा था। पिता की आवाज सुनकर वह मासूमियत से दौड़ता हुआ आया। उसके चेहरे पर एक निश्छल, प्यारी सी चमक थी। उसने मेघना के घुटने छुए और हाथ जोड़कर बोला, नमस्ते मौसी जी!
मेघना सन्न रह गई। उसके पैर जैसे जमीन में जम गए हों। उसके गले से आवाज तक नहीं निकली। उसने बस कांपते हाथों से उस नन्हे बच्चे के सिर पर हाथ रख दिया। समर ने तुरंत भीतर की ओर मुखातिब होकर पुकारा, सुनती हो सौम्या! जरा बाहर तो आओ, देखो मेघना आई है। ऑफिस की एक जरूरी फाइल देने आई थी। जरा अच्छी सी अदरक वाली चाय और कुछ नाश्ता बना लाओ इसके लिए।
भीतर के कमरे से एक सौम्य, सादगी से भरी महिला निकली। उसने हल्के नीले रंग की सूती साड़ी पहन रखी थी, माथे पर लाल बिंदी और मांग में गहरा सिंदूर। चेहरे पर किसी भी प्रकार का कोई तनाव या बनावट नहीं थी, बल्कि एक ऐसी आत्मीय शांति थी जो केवल सच्चे और समर्पित मन में होती है। सौम्या ने मेघना को देखकर हाथ जोड़े और बड़ी गर्मजोशी से मुस्कुराई, अरे आइए, बैठिए प्लीज। समर अक्सर ऑफिस के प्रोजेक्ट्स की बात करते हैं, पर आप कभी घर नहीं आईं। मैं अभी आपके लिए बढ़िया चाय बनाकर लाती हूं। आप आराम से बैठिए।
सौम्या तुरंत रसोई की ओर मुड़ गई। मेघना का दिल तेजी से धड़क रहा था। जैसे ही सौम्या रसोई में गई, मेघना ने दबी आवाज में, गुस्से और बेचैनी के मिले-जुले भाव से समर की ओर देखा। उसकी आंखों में एक तीखा सवाल था। उसने फुसफुसाते हुए कहा, मौसी? तुमने अपने बेटे से मुझे मौसी कहने को क्यों कहा? तुम मुझे अपनी कलीग या दोस्त भी तो कह सकते थे! यह रिश्ते का ढोंग रचने की क्या जरूरत थी?
समर ने बेफिक्री से सोफे पर बैठते हुए एक हल्की सी हंसी बिखेरी। उसकी उस हंसी में एक अजीब सा छिछोरापन और धूर्तता थी। उसने बहुत सहज लहजे में कहा, अरे यार मेघना, तुम भी न बात का बतंगड़ बना देती हो। औरतें बहुत शक्की मिजाज की होती हैं। अगर मैं कहता कि तुम सिर्फ मेरी कलीग हो, तो सौम्या के मन में हजार सवाल उठते कि शाम को घर क्यों आई। अब जब मैंने तुम्हें रिश्ते की मर्यादा का नाम दे दिया, तो वह बेफिक्र होकर खातिरदारी करेगी और कभी कोई शक भी नहीं करेगी। समझदारी इसी में है कि पानी भी पी लिया जाए और लहरें भी न उठें।
समर की वह हंसी मेघना के कानों में पिघले हुए सीसे की तरह चुभ गई। वह उस इंसान को अवाक होकर देख रही थी जिसे उसने अब तक बहुत सुलझा हुआ, संवेदनशील और अपने प्यार में डूबा हुआ समझा था। समर जिस आसानी से अपनी ही पत्नी की आंखों में धूल झोंक रहा था, जिस चालाकी से उसने एक पवित्र रिश्ते का मुखौटा पहनकर झूठ बोला था, उसने मेघना के अंतर्मन को झकझोर कर रख दिया। उसे ऐसा लगा जैसे समर के चेहरे से शराफत का वह नकाब अचानक खिसक गया हो जिसे देखकर वह उस पर मोहित हुई थी।
तभी सौम्या रसोई से बाहर आई। उसके हाथ में एक सुंदर ट्रे थी जिसमें भाप उड़ाती चाय के दो कप और प्लेट में घर के बने नमकीन व बिस्कुट सजे थे। सौम्या के चेहरे पर एक पराई औरत के लिए भी वही सम्मान और अपनापन था जो किसी सगी बहन के लिए हो सकता है। उसने बड़े आदर से कप मेघना की ओर बढ़ाते हुए कहा, लीजिए दीदी, चाय पीजिए। बाहर बारिश जैसा मौसम हो रहा है, चाय पीकर आपको बहुत ताजगी महसूस होगी। और हां, अगर आप रात का खाना हमारे साथ खा सकें तो मुझे बहुत खुशी होगी।
सौम्या का वह ‘दीदी’ कहना मेघना के सीने में खंजर की तरह लगा। उसने कांपते हाथों से चाय का कप थामा। चाय का हर एक घूंट मेघना के गले में कांटे की तरह अटक रहा था। उसने देखा कि सौम्या किस तरह घर के हर कोने को संजोए हुए थी। दीवार पर लगी शादी की बड़ी तस्वीर में दोनों हंस रहे थे, और आज वही सौम्या उस इंसान के झूठ से पूरी तरह अनजान होकर उसी के लिए दिन-रात एक कर रही थी। सौम्या की आंखों में एक ऐसा भोलापन और निष्कलंक विश्वास था, जिसे देखकर किसी भी संवेदनशील इंसान की रूह कांप जाए।
मेघना को अचानक अपना अस्तित्व बहुत छोटा, बहुत घिनौना लगने लगा। उसने खुद से पूछा, मैं यहाँ क्या कर रही हूँ? मैं किस रास्ते पर चल पड़ी थी? क्या मैं इस निश्छल स्त्री के घर की खुशियों को दीमक की तरह चाटने आई थी?
उसने किसी तरह आधा कप चाय खत्म की और फाइल मेज पर रख दी। उसने उठते हुए रुंधे गले से कहा, सौम्या जी, चाय बहुत अच्छी थी, लेकिन मुझे अभी निकलना होगा। घर पर मां मेरा इंतजार कर रही होंगी। फिर कभी आऊंगी।
समर ने उसे रुकने का इशारा किया, लेकिन मेघना ने उसकी ओर देखा तक नहीं। वह तेज कदमों से सीढ़ियां उतरती हुई नीचे आ गई। बाहर ठंडी हवा चल रही थी और हल्की बूंदाबांदी शुरू हो चुकी थी। मेघना सड़क पर बिना छाते के चलने लगी। बारिश की बूंदें उसके चेहरे पर गिर रही थीं, लेकिन उसकी आंखों से बहते आंसू उन बूंदों से कहीं ज्यादा गर्म थे।
रास्ते भर मेघना के दिमाग में एक तूफान चल रहा था। समर का वह वाक्य उसके कानों में गूंज रहा था—’औरतें बहुत शक्की होती हैं… समझदारी इसी में है कि शक न हो।’ मेघना ने सोचा कि जो पुरुष अपनी उस पत्नी का सगा नहीं हो सका जिसने उसके लिए अपना पूरा जीवन, अपना घर-बार सौंप दिया, जो औरत उसके बच्चे को संभाल रही है और उसके नाम का सिंदूर लगाए बैठी है, वह पुरुष भला उसका क्या सगा होगा? आज वह अपनी पत्नी को धोखा दे रहा है, कल वह मेघना को भी इसी तरह किसी तीसरे के सामने झुठला देगा।
मेघना ने समाज के इस कड़वे सच को बहुत गहराई से महसूस किया। पुरुष अक्सर अपने मन के भटकाव को सही ठहराने के लिए घर में कमियां निकालते हैं और बाहर सहानुभूति बटोरते हैं। वे बहती गंगा में हाथ धोना चाहते हैं, बिना किसी जिम्मेदारी के हर सुख भोगना चाहते हैं। लेकिन अंत में नुकसान किसका होता है? उस मासूम पत्नी का, जो घर की चारदीवारी में विश्वास की लौ जलाए बैठी है, और उस दूसरी औरत का, जिसे समाज केवल ‘घर तोड़ने वाली’ का नाम देकर किनारे कर देता है।
घर पहुंचकर मेघना ने अपने कमरे का दरवाजा बंद कर लिया। उसने ड्रेसिंग टेबल के सामने खड़े होकर आईने में खुद को देखा। आईने में उसे एक ऐसी लड़की नजर आई जो एक बहुत बड़े दलदल में गिरने से बाल-बाल बची थी। उसने अपने दिल पर हाथ रखा। उसकी अंतरात्मा चीख-चीख कर कह रही थी कि किसी के आंसुओं पर अपने सपनों का महल नहीं बनाया जा सकता। किसी मासूम की जिंदगी को वीरान करके पाई गई मोहब्बत कभी सुकून नहीं दे सकती।
उसने अपना फोन निकाला। स्क्रीन पर समर के कई मैसेज चमक रहे थे—’तुम अचानक क्यों चली गईं?’, ‘क्या हुआ मेघना?’, ‘कल लंच पर मिलते हैं।’
मेघना की उंगलियां एक पल के लिए भी नहीं हिचकिचाईं। उसने समर का नंबर हमेशा के लिए ब्लॉक कर दिया। इसके बाद उसने कंपनी के पोर्टल पर जाकर दूसरे शहर की ब्रांच में अपने ट्रांसफर के लिए आवेदन पत्र भर दिया। वह उस माहौल से, उस झूठे साये से हमेशा के लिए दूर चले जाना चाहती थी।
मेघना ने खिड़की खोली और बालकनी में आकर खड़ी हो गई। आसमान में काले बादलों के बीच से अब धुला-धुला सा चांद नजर आ रहा था। ठंडी हवा ने उसके चेहरे को छुआ, तो उसे लगा जैसे उसकी आत्मा पर लगा सारा मैल धुल गया हो। आज उसने किसी का घर उजड़ने से बचा लिया था। उसने एक अनजान, सीधी-सादी औरत के सुहाग की हिफाजत की थी, और सबसे बढ़कर, उसने अपनी खुद की गरिमा और आत्मसम्मान की रक्षा की थी।
उसे अहसास हुआ कि एक आत्मनिर्भर, समझदार और स्वाभिमानी स्त्री का असली गहना उसका चरित्र और उसकी नैतिकता है। किसी शादीशुदा मर्द की जिंदगी में एक गुप्त परछाई बनकर जीने से हजार गुना बेहतर है कि वह अपने दम पर अपना भविष्य संवारे। उसका अपना एक स्वतंत्र वजूद होगा, उसका अपना एक जीवनसाथी होगा जो उसे समाज के सामने गर्व से अपनाएगा, न कि किसी झूठ का मुखौटा पहनाकर दुनिया से छिपाएगा।
उस रात मेघना बहुत दिनों बाद चैन की नींद सोई। उसके मन पर कोई बोझ नहीं था, कोई ग्लानि नहीं थी। उसने उस कांटे को अपनी जिंदगी से निकाल फेंका था जो आगे चलकर नासूर बन सकता था। एक सही फैसले ने उसे न केवल एक बड़े पाप से बचा लिया था, बल्कि उसकी आने वाली पूरी जिंदगी को एक नई, उज्ज्वल और सकारात्मक दिशा दे दी थी।
जब इंसान वासना, भटकाव और स्वार्थ से ऊपर उठकर अपनी अंतरात्मा की आवाज सुनता है, तभी वह सच्चे अर्थों में इंसान कहलाता है। किसी के विश्वास की हत्या करके हासिल की गई खुशी कभी स्थायी नहीं हो सकती। जीवन में कभी-कभी एक सही मोड़ पर रुक जाना, भटकते हुए मीलों आगे चले जाने से कहीं बेहतर होता है। मेघना का यह कदम हर उस इंसान के लिए एक सीख है जो क्षणिक आकर्षण में पड़कर किसी का हंसता-खेलता संसार उजाड़ने की कगार पर पहुंच जाता है।
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