बस बहुत हो गया – सीमा सिंघी

सुबह के दस बज चुके थे राजी के कॉलेज का वक्त हो चला था मगर फिर भी राजी घर पर ही थी। उसे कॉलेज नहीं जाते देखकर रोहिणी जी पूछ बैठी । अरे राजी बिटिया….  आज कॉलेज नहीं जाना?? क्या कोई छुट्टी है?? 

राजी अपनी मां की बात सुनकर अनमने मन से बोल बैठी।

मम्मी कोई छुट्टी नहीं है मगर मेरा मन कुछ ठीक है इसीलिए आज घर पर ही रुक रही हूं कहकर राजी वहां से जाने को हुई मगर मां तो मां होती है। रोहिणी जी ने राजी के कुछ नहीं कहने पर भी उसके चेहरे के पीछे छुपी गहराई को पढ़ लिया  इसीलिए तुरंत बोल बैठी। 

 राजी रुक जरा …आ बैठ मेरे पास कहते हुए राजी का हाथ थामकर वहीं पास रखी सोफा पर बैठा लिया और फिर बड़े प्यार से बोल उठी। देख राजी मैं तेरी मां हूं अगर तू कुछ नहीं भी कहेगी तो भी मैं तेरे चेहरे को पढ़ लूंगी और तेरे मन में चल रहे तूफान को भी महसूस कर लूंगी इसीलिए अब ज्यादा मत सोच और जो तेरे दिल और दिमाग में चल रहा है वो कह डाल कहकर रोहिणी जी अपनी बेटी राजी के चेहरे की ओर देखने लगी।

अपनी मम्मी की बातें सुनकर राजी को थोड़ी तसल्ली मिली मगर फिर दो पल बाद ही वो आश्चर्यचकित होकर पूछ बैठी।मम्मी मैंने तो आपसे कुछ भी नहीं कहा फिर आपने मेरे मन की बात कैसे जान ली??

राजी की बात सुनकर रोहिणी जी मुस्कुराकर कहने लगी। वही तो मैं कह रही हूं की कोई भी मां का अपने बच्चों से खून का होता है इसीलिए अगर किसी मां के बच्चे को कोई तकलीफ हो  तो उसकी मां को तुरंत पता चल जाता है समझी। चल अब जल्दी से बता…तुझे क्या तकलीफ है ?? तुझे कॉलेज क्यों नहीं जाना ??

अपनी मां की प्यार भरी बातें सुनकर राजी कहने लगी। मम्मी मैं जब भी कॉलेज जाती हूं तो आए दिन अपनी गली के नुक्कड़ पर कुछ अनजाने लड़के मुझे परेशान करने लगते हैं और मैं आसपास के लोग क्या सोचेंगे.. यह सोचकर..मैं उन्हें कुछ कह नहीं पाती हूं मगर.. सच कहूं तो मैं अब बहुत परेशान हो चुकी हूं क्योंकि उनकी उदंडता दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है इसीलिए आजकल मेरा कॉलेज जाने का मन भी नहीं करता है। 

रोहिणी जी अपनी बेटी राजी की यह बात सुनकर सब समझ गई और तुरंत राजी को समझाते हुए कहने लगी। देख बिटिया तुझे पहले दिन ही उन्हें रोक देना था । लोग क्या सोचेंगे…लोग क्या कहेंगे… यह सोचकर.. तो तू कभी भी अपनी जिंदगी नहीं जी सकती मेरी लाडो।

तुमने अब तक उन्हें रोका नहीं इसीलिए उनकी उद्दंडता बढ़ती चली गई और देख राजी यही हम इंसानों की जिंदगी में भी होता है। हम किसी भी मंजिल को पाने के लिए जब रास्ते पर निकलते हैं तो रास्ते में बहुत से रुकावट वाले पत्थर यानी की राह के रोड़े हमें रोकना चाहते हैं मगर उन पत्थरों को.. उन राह के रोड़ों को देखकर डर से रुकना नहीं बल्कि उनका सामना करना  ही सही होता है। जिंदगी हमें पल पल यही तो सिखाती है। जितना सहोगी लोग और ज्यादा सहने को मजबूर करेंगे खैर..अब समझ गई ना.. मेरी बात।

राजी अपनी मां की सीख को सुनकर खुश हो गई तुरन्त जोश में आकर कहने लगी।

मम्मी आपने तो मेरी आंखें खोल दी । मुझे आपसे पहले ही कह देना था । मैं तो नाहक ही परेशान होती रही। आज मैं इतना जरूर जान गई हूं । स्कूल कॉलेज की सहेलियों के संग संग मम्मी भी एकदम प्योर वाली सहेली होती है । जो हर सुख दुख में अपनी बेटी के साथ खड़ी होती है। “बस बहुत हो गया” लोगों की सोच कर खुद के दिल को चोट पहुंचाना। अब आज के बाद आपकी यह बेटी राजी.. और नहीं सहेगी और हां मां मैं कॉलेज जा रही हूं कहकर राजी कमरे की ओर तैयार होने जाने लगी। रोहिणी जी राजी की बात सुनकर खुशी से बोल उठी। शाबाश मेरी गुड़िया यह हुई ना बात…. और सुन गली के नुक्कड़ से कुछ दूर पर मैं भी खड़ी रहूंगी और तुम उन्हें अपने तरीके से जवाब देना बाकी.. कदम कदम पर तेरा साथ देने को मैं तो हूं ही…

ठीक है आप कुछ दूर पर खड़ी रहना मगर… मुझे लगता है आपको आने की जरूरत नहीं पड़ेगी क्योंकि आज आपकी बेटी ये जान गई है  कि किसी भी गलत बात को सहना सामने वाले को बढ़ावा देना होता है । बस अब बहुत हो गया मम्मी… अब आगे और नहीं होगा कहकर राजी एक अलग अंदाज में घर से निकल पड़ी।

 रोहिणी जी ने गौर किया कुछ देर पहले जो उनकी बेटी के चेहरे पर डर था। वह अब कहीं नहीं था बल्कि उसकी जगह उसके चेहरे पर गहरा आत्मविश्वास झलक रहा था । जिसे देख रोहिणी जी का मन खुश हो उठा। वो भी अपनी बेटी राजी से कुछ कदम दूर चलते चलते सोचने लगी। 

अब समय बहुत बदल गया है। वे जिस तरह कॉलेज के दिनों में  लोक लाज से डरी डरी सी रहती थी, हर गलत बातों को भी सह जाती थी । वो खुद अपनी बेटी को अब गलत बातों पर चुप रहना नहीं बल्कि बस अब बहुत हो गया कहना सिखाएगी।

स्वरचित 

सीमा सिंघी 

गोलाघाट असम

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