वक्त का पहिया – सीमा सिंघी

घड़ी का कांटा नौ पर पहुंच चुका था। रागिनी अपने काम जल्दी-जल्दी निपटाने में लगी हुई थी इसीलिए राज को और दोनों बच्चों को टिफिन देकर विदा किया और खुद भी नाश्ता लेकर बैठ गई और फिर नाश्ते के बर्तन सिंक में डाले और जल्दी-जल्दी हाथ चलाने लगी । रसोई का काम निपटाकर रागिनी ऑफिस के लिए निकल पड़ी ।

तब तक साढ़े नौ बज चुके थे। उफ्फ ये सुबह की भाग दौड़…. जितनी भी जल्दी हाथ चलाओ…घड़ी का काटा रुकने का नाम ही नहीं लेता। यह सब सोचते सोचते रागिनी अपनी गाड़ी में जा बैठी और ड्राइव करते हुए ऑफिस की ओर निकल पड़ी। भीड़ को देखकर वह सोचने लगी ।

उफ यह मुंबई की भीड़…. यहां घर से बाहर निकलना है तो भीड़ का रेला पार करके ही जाना होगा इसीलिए अगर हाथ में थोड़ा वक्त ना हो तो… इंसान कैसे अपनी सही जगह पर सही समय पर पहुंच पाए।

यह सब सोचते सोचते रागिनी अपनी गाड़ी चला रही थी अचानक उसकी नजर उस भीड़ के रेले में एक जाने पहचाने चेहरे पर पड़ी। उसकी गाड़ी की स्टेरिंग तुरंत रुक गई। मन पर जोर डालते हुए उसे तुरंत याद आ गया ।

 अरे यह तो सोनी है… कॉलेज के दिनों में तो बड़ी क्वीन हुआ करती थी मगर आज इस हालत में?? रागिनी से रहा नहीं गया उसने तुरंत सोनी को आवाज दी।

सोनी को भी वह आवाज बहुत जानी पहचानी लगी इसीलिए वह भी तुरंत उस आवाज को सुनकर देखने लगी और दो पल बाद ही दोनों ने एक दूसरे को पहचान लिया और फिर रागिनी ने अपनी गाड़ी एक किनारे लगाई और तुरंत सोनी के करीब पहुंच गई।

दोनों सहेलियां आज तकरीबन पंद्रह वर्ष बाद मिल रही थी।

रागिनी से अब ज्यादा रहा नहीं गया। वह तुरंत सोनी से पूछ बैठी। 

सोनी तुम यहां कब से हो। जहां तक मुझे पता है तुम पहले इंदौर थी तो अब यहां मुंबई कैसे ?? यह तो मैं तुम्हें देखते ही समझ चुकी हूं कि तुम बुरे हालातों से लड़ रही हो। मैं सब कुछ जानना चाहती हूं मगर अभी इस तरह नहीं। 

रुको जरा मैं ऑफिस में फोन कर देती हूं और हां आज मेरा ऑफिस जाना कैंसिल समझ और तू चल सीधे मेरे घर कहते हुए रागिनी ने अपने ऑफिस में फोन लगाया और फिर सोनी को तुरंत अपनी गाड़ी में बैठाकर अपने घर ले आई। 

आज इतने बरसों बाद दोनों सहेलियां एक दूसरे से गले मिली । रागिनी ने गरमा गरम दो कप चाय बनाई और मठरी डब्बे से निकाली और दोनों सहेलियां बैठ गई । चाय पीते पीते रागिनी बोल पड़ी। 

हां सोनी अब तू मुझे बेशक कह सकती है। तू अपने आप को अकेली बिल्कुल मत समझना । मैं भी तेरे साथ हूं कहते हुए उसने सोनी का हाथ अपने हाथों में ले लिया। 

सोनी के हाथों में जैसे ही रागिनी का हाथ आया। उसे बहुत तसल्ली महसूस हुई। उसे लगा आज उसका कोई अपना भी है वरना जिन हालातो से वो लड़ रही थी । उसमें तो वह बिल्कुल खुद को अकेली समझने लगी थी। 

वह कुछ पल शांत रहकर फिर रागिनी की ओर देख कर कहने लगी।

कॉलेज के दिनों में तो तू जानती ही है । पापा के यहां किसी बात 

की कोई कमी नहीं थी । घर गाड़ी बंगला सब था । शायद इसीलिए मैं तुम सबको बहुत छोटी नजरों से देखा करती थी क्योंकि मुझे यही लगता था कि घर गाड़ी बंगला जिस इंसान के पास ना हो। वह तो बेवजह ही अपना जीवन जी रहा है इसीलिए मैं तुम सबके साथ भी जब भी मिलती ज्यादा घुलती मिलती नहीं थी और तुम सबसे दूरी बनाए रहती थी । 

जबकि तुम सबके मन में ऐसी कोई भावना नहीं थी। कॉलेज खत्म होते ही पापा ने एक अपने जैसे ही स्टेटस वाले इंसान के साथ मेरी शादी कर दी। 

मैं भी ऐसे घर घराने को पाकर बहुत खुश थी क्योंकि साहिल के पास वह सब कुछ था। जिसे मैं अपना सर्वस्व मानती थी मगर कुछ दिन बाद ही मेरी यह खुशी गम में बदल गई । जब मुझे पता चला यह सारा दिखावा घर गाड़ी बंगला सब गिरवी रखा हुआ था। 

उन्होंने पापा की संपत्ति देखकर ही मुझसे विवाह किया था ना की मुझे देखकर और फिर वही हुआ धीरे-धीरे करके घर गाड़ी बंगले सब नीलाम होते गए और हम सड़कों पर आ गए। 

इसीलिए हमने फिर इंदौर छोड़ दिया और मुंबई आकर बस गए और एक छोटे से किराए के मकान में रहने लगे । 

हमने सोचा इतने बड़े शहर में हमें कौन पहचानेगा और हमारी जिंदगी निकल जाएगी मगर रागिनी जब मुसीबत आती है तो एक नहीं चारों तरफ से आती है।

  साहिल को भी पहले से ही नशे की आदत थी । जिसकी वजह से वह भी अब  कई बीमारियों से जूझ रहा है। मुझे तो सामने देख ही रही हो और फिर हम दोनों की जिंदगी में कोई तीसरा आया भी नहीं यानी की कोई संतान भी नहीं हुई। सास ससुर भी एक एक्सीडेंट में खत्म हो गए तो रह गए सिर्फ अब हम दोनों कहते हुए सोनी रोने लगी ।

सोनी की इतनी दुख भरी बातें सुनकर रागिनी का दिल भर आया। वह तुरंत सोनी को गले लगाते हुए बोल बैठी। जो दिन बीत गए । उसे भूल जा…. मैं हूं ना तेरी सहेली… अब हम मिलकर  तेरी जिंदगी से दुख को विदा करेंगे। देख सोनी… हम इंसानों के जीवन में यह वक्त का पहिया ऐसे ही घूमता रहता है

कभी धीमे तो कभी बहुत तेज कदमों से तो उस वक्त हमें भी बहुत धैर्य और समझदारी के साथ  उसके साथ चलकर उसका सामना करना होता है

ना कि घबराकर उस से दूर भागना….तभी हम इंसान जिंदगी जी पाते हैं । समय के साथ-साथ यह वक्त का पहिया हमें बहुत अच्छे बुरे अनुभव कराते रहता है। जिससे हमें जिंदगी में बहुत सीख मिलती है। रागिनी यही नहीं रुकी वह फिर बोल पड़ी । 

अच्छा छोड़ ये सब बातें…..सबसे पहले तुझे उस किराए के घर को छोड़कर हमारे घर के ऊपर एक हमारा ही अपना घर है । जिसे हमने किराए पर दे रखा था। जो फिलहाल अभी खाली है। उसमें तु साहिल जी के साथ शिफ्ट हो जा बाकी शाम तक जब राज आ जाएंगे तो उनसे बात कर के साहिल जी का इलाज भी करवाएंगे। 

जिससे तू देखना कुछ ही दिनों में साहिल जी बिल्कुल तंदुरुस्त हो जाएंगे और तू तो वैसे भी बहुत पढ़ी लिखी है तो मैं जहां जॉब करती हूं । वहीं पर अपनी ऑफिस में मैं तेरे लिए भी बात कर लूंगी। ठीक है ना…

अपनी सहेली रागिनी की बात सुनकर सोनी अवाक होकर धीरे से बोल उठी। रागिनी तूने तो मेरी जिंदगी की हर उलझन को दो पल में सुलझा दिया और मुझे जीने की नई राह भी दिखा दी। तूने अभी वक्त के पहिए वाली बात कही जो बिल्कुल सही कही क्योंकि… जिंदगी में वक्त का पहिया तो हमेशा चलते ही रहता है बस जरूरत है

तो इसके साथ हमें चलते रहने की मगर उसके लिए तुम जैसी एक मार्गदर्शक.. एक हमदर्द… एक सच्ची सहेली की भी जरूरत होती है। तभी तो हम उस वक्त के पहिए के साथ लड़खड़ाए हुए कदमों से भी जोश के साथ दोबारा चल पड़ेंगे कहते हुए सोनी प्यार भरी नजरों से रागिनी को देखने लगी।

यह हुई ना बात….अब चल मुस्कुरा दे… रात गई बात गई कहकर रागिनी भी मुस्कुराने लगी और सोचने लगी । चलो अच्छा है आज मैं अपनी सहेली की जिंदगी में चल रहे वक्त के पहिए जो कुछ वर्षों के लिए रुक गए थे। आज उसे दोबारा चलाने में वह हिस्सेदार बन पाई क्योंकि… जमीन जायदाद के तो सभी हिस्सेदार बन जाते हैं…सच्चा इंसान तो वही है । जो किसी के दुख दर्द का हिस्सेदार बने।

#वक्त का पहिया 

स्वरचित 

सीमा सिंघी 

गोलाघाट असम

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