छवि जैसे ही स्कूल के लिए निकलने लगी, उसकी माँ ने उसे रोकते हुए कहा, “छवि टिफिन तो लेकर जा। इतनी बड़ी हो गई लेकिन ध्यान ही नहीं रहता।”
ये सुनकर छवि हँसते हुए उनके गले में झूल गई, “मम्मा, ध्यान मुझे नहीं बल्कि आपको नहीं रहता।”
“क्या मतलब?”
“मतलब ये भाग्यवान कि तुम भूल गई आज हमारी छवि बिटिया का रिजल्ट है और हर बार की तरह आज भी ये टॉप करेगी और अपनी फ्रेंड्स को ट्रीट देगी।” छवि के पापा ने छवि के हाथ में रुपये थमाते हुए हँसते हुए कहा।
“हे भगवान! इतना बड़ा दिन मैं कैसे भूल गई। जा बेटी, आज तेरे टॉप करने की खुशी में मैं तेरा फेवरेट मूँग दाल हलवा बनाऊँगी।” ये सुनते ही छवि उछलते-कूदते स्कूल की ओर निकल गई।
ये है छवि रस्तोगी, रस्तोगी परिवार की इकलौती बिटिया। विद्या निकेतन स्कूल की क्लास 8 की टॉपर। पढ़ने में बहुत ही तेज़ है। क्लास 1 से लेकर क्लास 8 तक इसने हर एग्जाम में टॉप किया है। टॉप आना सिर्फ उसकी आदत नहीं, बल्कि उसकी पहचान बन चुकी थी।
आज उसका क्लास नाइन का पहले टर्म का रिजल्ट आने वाला था। छवि के साथ-साथ उसके माता-पिता, उसकी फ्रेंड्स, उसके टीचर्स, सबको पूरा विश्वास था कि पिछले आठ सालों की तरह इस बार भी छवि ही टॉप करेगी।
जैसे ही छवि क्लास में पहुँची, उसकी फ्रेंड्स उसे घेरकर “ट्रीट-ट्रीट” चिल्लाने लगीं।
“हाँ-हाँ दूँगी, बिल्कुल दूँगी। इतने सालों में कभी मना किया है?”
तभी क्लास टीचर रिजल्ट लेकर आ गईं। पहली बेंच पर बैठी छवि मंद-मंद मुस्कुरा रही थी।
जैसे ही टीचर ने कहा, “इस बार क्लास 9 के फर्स्ट टर्म में टॉप किया है…”
पूरी क्लास “छवि… छवि…” चिल्लाने लगी और छवि अपनी जगह से उठकर टीचर के पास जाने लगी।
लेकिन तभी टीचर ने सबको शांत रहने का इशारा करते हुए अपनी बात कम्प्लीट की, “…टॉप किया है – मेधा मित्तल ने।”
ये सुनते ही छवि के बढ़ते पाँव वहीं के वहीं जम गए और पूरी क्लास की नज़रें लास्ट बेंच पर, बैठी न्यू ऐडमिशन मेधा मित्तल पर टिक गईं जो अपने पापा के ट्रांसफर के कारण पिछले महीने ही क्लास में आई थी। मेधा इतनी शांत और साधारण थी कि किसी को भी यकीन ही नहीं हो रहा था कि उसमें टॉप किया है।
टीचर ने उसे आवाज़ देकर आगे बुलाया,
“मेधा, आगे आओ।”
ये सुनते ही मेधा धीरे-धीरे आगे आई और छवि से आगे बढ़कर टीचर के पास जा खड़ी हुई।
“बच्चों, इस बार मेधा मित्तल ने 98% मार्क्स लाकर क्लास में टॉप किया है और पिछली साल की टॉपर छवि रस्तोगी को 97% मार्क्स के साथ सेकेंड पोजीशन हासिल हुई है।”
ये सुनते ही छवि की आँखों में आँसू आ गए। वह आश्चर्य और गुस्से से मेधा को देख रही थी। उसे ये विश्वास ही नहीं हो रहा था कि उसने टॉप नहीं किया है। वह वहीं बुत बनी खड़ी होकर एकटक मेधा की ओर देखी जा रही थी, जो अब क्लास के बाकी स्टूडेंट्स से घिरी खड़ी थी।
तभी उसकी बेस्ट फ्रेंड ने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, “छवि, कब तक यहाँ ऐसे खड़ी रहोगी? चलो। मत ध्यान दो, ऐसे ही तुक्का लग गया होगा।”
“हाँ, सही कह रही हो। तुक्का लग गया होगा। नई आई है तो ज़्यादा ही रट लिया होगा। अगली बार देखना।” उसने मेधा की ओर देखते हुए कहा, जो मुस्कुराते हुए सबसे बात कर रही थी।
वो गुस्से में क्लास से निकलकर घर पहुँच गई।
“अरे बेटी, इतनी जल्दी घर आ गई! फ्रेंड्स को पार्टी नहीं दी अपने टॉप करने की?”
इस पर उसने धीरे से ‘ना’ में सिर हिला दिया।
“लेकिन क्यों?”
“क्योंकि मैंने टॉप नहीं किया। मैं सेकेंड आई हूँ,” उसने धीरे से कहा।
“क्या!” माँ धम्म से वहीं बैठ गईं।
दोपहर में जब पापा घर आए, तो ये सुनते ही वे छवि पर बरस पड़े, “एक नई आई लड़की ने तुम्हें पीछे छोड़कर टॉप कैसे कर लिया! आजकल तुम्हारा पढ़ाई में बिल्कुल मन नहीं लगता। तुम्हारा बाहर जाना बंद।”
“पापा, प्लीज गुस्सा मत कीजिए। अगली बार मैं पक्का टॉप करूँगी।”
मगर अगली बार भी कुछ नहीं बदला। टेस्ट हो या प्रोजेक्ट वर्क, मेधा हर बार छवि से एक कदम आगे निकलती। उसके जवाब, उसकी हैंडराइटिंग, उसके कॉन्सेप्ट इतने सटीक होते कि टीचर्स उसकी तारीफ करते नहीं थकते थे। जो टीचर पहले छवि-छवि करते रहते थे, वो अब हर बात में मेधा का उदाहरण देने लगे थे। छवि क्लास में खुद को काफी अलग-थलग महसूस करने लगी थी।
घर का माहौल भी बदल चुका था। वो घर जो कभी उसके माता-पिता के प्यार-दुलार और छवि की हँसी से गुलज़ार रहता था, वहाँ अब बस मायूसी, गुस्सा और डाँट-फटकार ही पसरा रहता।
“क्या बात है छवि? आजकल तुम्हारा मन पढ़ाई में नहीं लग रहा।” हाफ इयरली का रिजल्ट देखते ही उसके पापा ने गुस्से से कहा।
“पापा, सिर्फ दो नंबर का फर्क था…” छवि ने धीरे से कहा।
“फर्क दो नंबर का हो या बीस का, 2nd पोजीशन सेकेंड ही होती है। छवि, तुमने हमें बहुत निराश किया है।”
अपने पापा की ये बात छवि के सीने में तीर की तरह चुभ गई। नंबरों की इस अंधी दौड़ ने छवि को एक अंधेरे कुएँ में धकेल दिया। किताबों में अब उसे क्वेश्चंस नहीं, मेधा का मुस्कुराता चेहरा दिखता। वह रात-रात भर जागती, मगर पढ़ाई की जगह उसके ज़ेहन में मेधा के प्रति जलन और नफ़रत तैरती रहती।
उसे लगने लगा था कि मेधा ने सिर्फ उसकी टॉप पोजीशन ही नहीं, उसकी पहचान, उसकी फ्रेंड्स, यहाँ तक कि उसके माता-पिता का प्यार भी छीन लिया है।
वह दिन-प्रतिदिन घुटती जा रही थी। लेकिन उसकी घुटन को, उसके मनोभावों को कोई नहीं समझ रहा था, यहाँ तक कि उसके माता-पिता भी नहीं। मेधा के प्रति उसकी जलन बढ़ती ही जा रही थी।
ऐसे ही दिन बीतते रहे और फाइनल एग्जाम आ गए। आज फाइनल एग्जाम का लास्ट पेपर था, मैथ्स का। छवि स्कूल के लिए रेडी हो रही थी। इस बार उसने बहुत मेहनत की थी। उसके पेपर्स भी अच्छे जा रहे थे।
तभी उसके पापा वहाँ आए, “इस बार पेपर अच्छे से देना। कहीं इस बार भी ऐसा ना हो कि वह मेधा टॉप कर जाए और तुम सेकेंड आकर फिर से हमारी नाक कटा दो।”
ये सुनकर उसने अपना सिर झुका लिया।
तभी उसके दिमाग में ख्याल आया—अगर किसी तरह मेधा आज का पेपर नहीं दे, तो वो फेल हो जाएगी और मैं वापस टॉप कर जाऊँगी। फिर मम्मी-पापा, टीचर्स, फ्रेंड्स सभी मुझे फिर से प्यार करने लगेंगे। लेकिन मैं आखिर ऐसा क्या करूँ कि मेधा आज का पेपर न दे पाए?
तभी उसकी नज़र दीवार पर लगे ऑल-आउट के रिफिल पर पड़ी। उसे देखते ही उसके मन में खौफ़नाक आइडिया आया।
एक पल के लिए उसके हाथ काँपे, दिल की धड़कनें बेकाबू हुईं, पर अगले ही पल खोई हुई फर्स्ट रैंक और माता- पिता की फटकार का डर उस पर हावी हो गया। उसने चुपचाप उस रिफिल का ढक्कन खोलकर उसमें से आधा लिक्विड अपनी स्कूल की पानी की बोतल में मिला लिया। और फिर उस बोतल को अपने स्कूल बैग में रखकर स्कूल की ओर चल दी।
जलन, असुरक्षा, प्रतिस्पर्धा की अंधी दौड़ ने उस चौदह साल की बच्ची के सोचने-समझने की शक्ति को पूरी तरह शून्य कर दिया था।
वह तेज़ी से स्कूल पहुँची। वहाँ पहुँचकर वह मेधा को खोजने लगी, जो सबसे अलग एक कोने में खड़ी मैथ्स के फ़ॉर्मूले रिवाइज़ कर रही थी।
उसे देखकर छवि ने अपनी तेज़ चलती साँसों को संभाला और मेधा के पास जाकर मुस्कुरा कर बोली, “मेधा, कितना रटोगी यार… इतनी गर्मी में दिमाग खराब हो जाएगा।”
“बस ये लास्ट चैप्टर देख रही थी,” मेधा ने अपने माथे पर आई पसीने की बूँदें पोंछते हुए कहा।
“लो, मेरी बोतल में ठंडा पानी है, दो घूँट पी लो, फ्रेश फील करोगी।”
ये सुनते ही मेधा ने तुरंत छवि के हाथ से बोतल लेकर दो-तीन घूँट गटक लिए।
पानी पीते ही कड़वा, जलता हुआ स्वाद उसके गले में फैल गया और केमिकल की तीखी बदबू से उसका जी मिचलाने लगा।
“छवि… ये… ये क्या है पानी में?” मेधा खांसते हुए बोली। उसकी आवाज़ लड़खड़ाने लगी।
छवि का चेहरा सफेद पड़ गया। उसने झपट्टा मारकर बोतल मेधा के हाथ से छीनी और वहां से भाग गई।
अगले पाँच मिनट के भीतर ही स्कूल में चीख-पुकार मच गई। मेधा ज़मीन पर गिरकर पेट पकड़कर तड़पने लगी थी। उसे सांस लेने में तकलीफ हो रही थी, लगातार उल्टियां होने लगीं और मुंह से झाग जैसा निकलने लगा। मेधा को गंभीर हालत में तुरंत ज़िला अस्पताल ले जाया गया।
अस्पताल में डॉक्टरों ने जब उसका पेट वॉश किया, तो ये साफ हो गया कि यह फूड पॉइजनिंग नहीं, बल्कि कोई ज़हरीला रसायन है। डॉक्टरों ने तुरंत पुलिस को इन्फॉर्म कर दिया।
पुलिस की तहकीकात में क्लास की दो लड़कियों ने बताया कि पेपर से ठीक पहले छवि ने मेधा को अपनी बोतल से पानी पिलाया था। जब छवि के स्कूल बैग की तलाशी ली गई, तो उसकी पानी की बोतल से वही तीखी बदबू आ रही थी।
जब महिला पुलिसकर्मी ने सख्ती से पूछा, तो छवि की बची-खुची हिम्मत ढह गई। वह घुटनों के बल बैठकर बुरी तरह रोने लगी।
“मैंने ऑल-आउट मिलाया था…”
छवि की सिसकियों ने कमरे में मौजूद हर शख्स को हिला दिया। “वो हमेशा मुझसे आगे निकल जाती थी। घर पर मम्मी-पापा रोज़ डांटते थे। मुझे लगा अगर वो आज का पेपर नहीं दे पाएगी, तो मैं फिर से पहले नंबर पर आ जाऊंगी… मुझे सिर्फ पहला रैंक लाना था… लेकिन मुझे नहीं मालूम था कि उसकी तबीयत इतनी खराब हो जाएगी।”
यह सुनते ही कमरे में खड़े छवि के माता- पिता के पैर वहीं ज़मीन में धंस गए।
जिस टॉप पोजीशन के लिए उन्होंने बेटी पर इतना दबाव बनाया था, उसी ने उनकी फूल जैसी बच्ची को मुजरिम बना दिया था। छवि को तुरंत स्कूल से निष्कासित कर बाल सुधार गृह भेज दिया गया।
वहीं दूसरी ओर हॉस्पिटल के आईसीयू में पूरे सात दिन तक ज़िंदगी और मौत के बीच झूलने के बाद मेधा की साँसें तो बच गईं, लेकिन उसकी आँखों की वह बेफ़िक्र मासूमियत हमेशा के लिए उसी वेंटिलेटर पर छूट गई। वह ज़िंदा होकर भी उस खौफ़ से बाहर नहीं निकल पा रही थी जो उस एक घूँट पानी ने उसे दिया था।
एक जलन और प्रतिस्पर्धा की अंधी दौड़ ने दो बच्चों की जिंदगी को अंधकारमय कर दिया। एक बच्ची जिंदगी और मौत के बीच में झूल गई तो दूसरी अव्वल आने के खौफ़नाक दबाव में अनजाने ही अपराध के उस दलदल में उतर गई जहाँ सिर्फ़ जुर्म की कालिख और पछतावा था।
दोस्तों, आपको क्या लगता है बच्चों पर नंबरों का इतना दबाव बनाना उचित है? क्या उन्हें नंबरों की इस अंधी दौड़ में इस हद तक शामिल करना सही है? अपनी राय अवश्य बताएं।
धन्यवाद
साप्ताहिक विषय प्रतियोगिता-#जलन
शीर्षक- फर्स्ट रैंक
लेखिका- श्वेता अग्रवाल। धनबाद, झारखंड