झूले को देखते ही कौशल्या का दिल मचल उठा। उनके भीतर छिपी वह दस साल की नटखट बच्ची अचानक जाग उठी। बचपन में सावन के झूले, जब वह सखियों के साथ आसमान छूने की होड़ लगाती थीं। उन्होंने इधर-उधर देखा। कोई उनकी तरफ ध्यान नहीं दे रहा था। उनके होठों पर एक शरारती मुस्कान बिखर गई।
वह धीरे-धीरे झूले की तरफ बढ़ीं और गुनगुनाने लगीं,
“सावन का महीना, पवन करे सोर… जियरा रे झूमे ऐसे, जैसे बनमा नाचे मोर…”
अलसुबह की पहली किरण जब कमरे की खिड़की से छनकर फर्श पर गिरी, तो कौशल्या देवी की आँखें बरसों के तय ढर्रे पर अपने-आप खुल गईं। हाथ अनजाने ही तकिए के नीचे घड़ी टटोलने लगे। फिर अचानक उनका हाथ वहीं थम गया। एक मीठी, सुकून भरी मुस्कान उनके चेहरे पर तैर गई। आज घड़ी का अलार्म बजाने की कोई जल्दी नहीं थी। न चाय की पतीली चढ़ाने की हड़बड़ाहट थी, न किसी की दवाइयों की पुड़िया तैयार करने की फिक्र। पचास साल के लंबे गृहस्थ जीवन में आज का सवेरा सचमुच निराला था।
कौशल्या जब अठारह बरस की होकर इस चौखट के भीतर आई थीं, तब से लेकर आज तक का सफर किसी तूफानी नदी को पार करने जैसा रहा। ससुराल में कदम रखते ही संयुक्त परिवार का विशाल ढांचा उनके कंधों पर आ टिका था। सांस लेने की भी फुर्सत नहीं मिलती थी। सुबह चार बजे उठकर चूल्हा सुलगाना, पूरे परिवार के लिए नाश्ता-खाना तैयार करना, और रात को जब सब सो जाएं तब चुपचाप अपनी थकी हुई देह को बिस्तर पर गिरा देना—यही उनकी दिनचर्या थी।
वक्त ने कभी उन्हें संभलने की मोहलत नहीं दी। पहले वृद्ध सास-ससुर की लंबी बीमारियां, अस्पतालों के चक्कर, सेवा-सुश्रूषा और परहेज के खाने। कौशल्या ने कभी माथे पर शिकन नहीं आने दी। सास-ससुर की सेवा में उन्होंने अपने सारे शौक, अपनी सारी इच्छाएं एक पुराने संदूक में बंद करके रख दी थीं। अभी वह जिम्मेदारी पूरी भी नहीं हुई थी कि पति सोमनाथ जी पक्षाघात के शिकार हो गए। बिस्तर पर पड़े पति की सेवा, घर का बजट संभालना और साथ ही साथ दो छोटे बेटों और एक बेटी की पढ़ाई-लिखाई।
कई बार रात के सन्नाटे में कौशल्या का दम घुटता था। कभी-कभी उनका मन करता कि सब कुछ छोड़कर कहीं दूर निकल जाएं, जहाँ सिर्फ खुला आसमान हो, ताजी हवा हो और कोई उनसे यह न पूछे कि ‘दाल में नमक कम क्यों है?’ या ‘मेरी कमीज कहाँ प्रेस होकर रखी है?’ लेकिन भारतीय नारी की ममता और कर्तव्यबोध के धागों ने उनके पांवों में ऐसी बेड़ियां डाल रखी थीं, जिन्हें काटना उनके बस में नहीं था। उन्होंने अपनी जवानी को चूल्हे की आग और आंसुओं के बीच तपाकर राख कर दिया। कब उनके काले, घने बाल चांदी की तरह सफेद हो गए, कब चेहरे की चमक बारीक झुर्रियों में बदल गई और कब कमर झुक गई, उन्हें इसका भान ही नहीं हुआ।
जिंदगी के इस लंबे इम्तिहान में आखिरकार सब कुछ अपनी मंजिल पर पहुंच गया। बड़े बेटे आलोक की शादी होकर वह अपनी गृहस्थी में रम गया। छोटा बेटा रोहन विदेश में सेटल हो गया और बेटी वर्तिका अपने भरे-पूरे परिवार में खुश थी। पति सोमनाथ जी भी दो बरस पहले शांत भाव से विदा ले चुके थे। अब उस बड़े से पुश्तैनी मकान में कौशल्या देवी थीं और उनकी अपनी तन्हाई।
आज रविवार था। बाहर गुनगुनी, सुनहरी धूप खिली हुई थी। हवा में हल्की सी ठंडक और फूलों की महक थी। बालकनी में खड़े होकर कौशल्या ने अंगड़ाई ली। मन के किसी कोने से एक दबी हुई, पुरानी आवाज आई, “कौशल्या! आज का दिन सिर्फ तेरा है। आज कोई मजबूरी नहीं, कोई बंदिश नहीं।”
बरसों से उन्होंने दूसरों की खुशियों में अपनी खुशी ढूंढी थी, आज वह खुद के लिए जीना चाहती थीं। उन्हें याद आया कि बचपन में उन्हें साइकिल चलाना और खुले मैदानों में दौड़ना कितना पसंद था। वह अपने गांव के बगीचे में घंटों पेड़ों की छांव में बैठकर अपनी सहेलियों के साथ कसीदाकारी करती थीं और गीत गाती थीं।
उन्होंने अलमारी खोली और अपनी सबसे पसंदीदा, गहरे नीले रंग की सूती साड़ी निकाली—वही साड़ी जो उन्होंने बरसों पहले अपनी पहली बचत से खरीदी थी, लेकिन जिसे पहनने का कभी ‘सही मौका’ नहीं मिला था। उन्होंने करीने से साड़ी पहनी, माथे पर लाल बिंदी सजाई और आईने में देखा। आईने में दिख रही बूढ़ी औरत की आंखों में आज एक चमक थी, जो शायद तीस साल पहले खो गई थी।
चप्पल पहनकर वह घर से बाहर निकलीं। कॉलोनी की सड़क पर कदम रखते ही ऐसा लगा जैसे पिंजरे का दरवाजा खुला हो और परिंदा खुले आसमान को देख रहा हो। चलते-चलते वह पास ही बने नगर निगम के बड़े पार्क में पहुंच गईं। इस पार्क के सामने से वह जाने कितनी बार गुजरी थीं, कभी सब्जी का थैला लिए तो कभी दवाइयों का पर्चा हाथ में दबाए, लेकिन कभी अंदर बैठकर धूप सेंकने की फुर्सत नहीं मिली थी।
पार्क में गुलमोहर और अमलतास के पेड़ खिले हुए थे। हरी घास पर ओस की बूंदें चमक रही थीं। छोटे बच्चे गेंद के पीछे भाग रहे थे, कुछ नौजवान दौड़ लगा रहे थे और कुछ हमउम्र बुजुर्ग बेंचों पर बैठकर दुनिया भर की राजनीति पर चर्चा कर रहे थे।
कौशल्या धीरे-धीरे टहलते हुए पार्क के उस कोने में पहुंचीं, जहाँ बच्चों के लिए झूले लगे हुए थे। लोहे के दो खंभों पर रस्सियों से बंधा एक बड़ा सा लकड़ी का तख्ते वाला झूला खाली पड़ा था। हवा के झोंकों से वह झूला धीरे-धीरे हिल रहा था।
झूले को देखते ही कौशल्या का दिल मचल उठा। उनके भीतर छिपी वह दस साल की नटखट बच्ची अचानक जाग उठी। बचपन में सावन के झूले, जब वह सखियों के साथ आसमान छूने की होड़ लगाती थीं। उन्होंने इधर-उधर देखा। कोई उनकी तरफ ध्यान नहीं दे रहा था। उनके होठों पर एक शरारती मुस्कान बिखर गई।
वह धीरे-धीरे झूले की तरफ बढ़ीं और गुनगुनाने लगीं,
“सावन का महीना, पवन करे सोर… जियरा रे झूमे ऐसे, जैसे बनमा नाचे मोर…”
जैसे ही उन्होंने झूले के तख्ते पर बैठने के लिए हाथ रखा, उनकी नजर उस पर गई। लकड़ी का वह तख्ता बीच से बुरी तरह चटका हुआ था। धूप और बारिश की मार झेलते-झेलते उसकी लकड़ी सड़ चुकी थी और उसमें गहरी दरारें पड़ गई थीं। वह वजन संभालने लायक नहीं था।
तभी पास ही बेंच पर बैठे एक बुजुर्ग, जो शायद देर से उन्हें देख रहे थे, हंसते हुए बोले, “अरे अम्मा जी! क्या कर रही हैं? यह झूला टूट चुका है, बैठेंगी तो गिर पड़ेंगी। अब हम लोगों की उम्र इन झूलों पर बैठने की नहीं रही। ये शौक, ये उमंगें तो जवानी के साथ ही लद जाती हैं। अब तो बस हरि भजन करिए और चुपचाप वक्त कटने का इंतजार कीजिए। हमारे मजे के दिन तो कब के बीत गए।”
उन सज्जन की बात और उस टूटे हुए झूले की बेबसी ने एक पल के लिए कौशल्या के मन में चुभन पैदा की। ऐसा लगा जैसे समाज फिर से उन पर एक सीमा रेखा खींच रहा हो—‘तुम बूढ़ी हो, तुम लाचार हो, तुम्हारे उड़ने के दिन बीत चुके हैं।’
कौशल्या ने उस टूटे हुए झूले को छुआ। उसकी दरारों को महसूस किया। फिर उन्होंने सिर उठाकर विशाल, नीले आसमान को देखा, जहाँ पंछियों का एक झुंड बिना किसी सहारे के अपनी ही धुन में परवाज भर रहा था।
कौशल्या के चेहरे पर उदासी की जगह एक गहरा, गरिमामय आत्मविश्वास छा गया। वह उन बुजुर्ग की तरफ मुड़ीं और अत्यंत सौम्यता से मुस्कुराते हुए बोलीं, “भाई साहब, झूला लकड़ी का हो तो टूट सकता है, लेकिन अगर हौसला सलामत हो तो मन कभी बूढ़ा नहीं होता। किसने कहा कि मजे करने की कोई उम्र तय होती है? शरीर थका है, मेरी रूह नहीं।”
वह मुड़ीं और झूले के पास से हटकर पार्क के खुले, पक्के रास्ते पर आ गईं। उन्होंने अपनी साड़ी का पल्लू कमर में खोंसा, दोनों बाहें फैलाईं और ताजी ठंडी हवा को अपने सीने में भर लिया।
उनकी जुबान पर फिर वही गीत आ गया, लेकिन इस बार आवाज में कोई हिचक नहीं थी, बल्कि एक नया संकल्प था:
“पंछी बनूँ उड़ती फिरूँ मस्त गगन में… आज मैं आज़ाद हूँ दुनिया के चमन में…”
पार्क में टहल रहे कई लोगों ने मुड़कर देखा। कोई मुस्कुराया, तो कोई हैरान रह गया। लेकिन कौशल्या को अब किसी के अनुमोदन की जरूरत नहीं थी। वह पार्क के बीचों-बीच तेज कदमों से चलने लगीं, मानो वह जमीन पर नहीं, बादलों पर चल रही हों।
पार्क से लौटते हुए कौशल्या सीधे बाजार गईं। उन्होंने न तो कोई दवा खरीदी, न ही कोई घरेलू सामान। वह रंगों की एक दुकान में घुसीं। उन्होंने कैनवास, ढेर सारे रंग और कुछ अच्छे ब्रश खरीदे। बचपन में उन्हें चित्रकारी का बेहद शौक था, जो जिम्मेदारियों के बोझ तले कहीं दफन हो गया था।
घर आकर उन्होंने अपने कमरे के सबसे उजाले वाले कोने में कैनवास सजाया। रंगों की महक ने उनके भीतर एक नई ऊर्जा भर दी। उन्होंने ब्रश उठाया और नीले, पीले, सुनहरे रंगों से कैनवास पर एक खुले आकाश और उसमें उड़ते हुए उन्मुक्त परिंदों की तस्वीर उकेरना शुरू कर दिया।
उस दिन कौशल्या देवी को समझ आया कि जिंदगी का असली आनंद जिम्मेदारियों के खत्म होने में नहीं, बल्कि खुद को पहचानने में है। जब तक सांसें हैं, तब तक हर दिन एक नई शुरुआत है। समाज चाहे जो कहे, खुद के लिए जीने की कोई अंतिम तारीख नहीं होती। उन्होंने तय कर लिया था कि अब से हर सुबह उनकी अपनी होगी, हर पल उनका अपना होगा। टूटे हुए झूले भले ही जमीन पर रह जाएं, लेकिन उनका मन अब उस अनंत आकाश का परिंदा बन चुका था, जिसे उड़ने के लिए किसी लकड़ी के तख्ते की दरकार नहीं थी।
अक्सर हम उम्र और जिम्मेदारियों के नाम पर अपने सपनों का गला घोंट देते हैं। क्या आपको भी लगता है कि जिंदगी के एक पड़ाव के बाद हमें समाज की परवाह किए बिना अपनी बची हुई जिंदगी अपने तरीके से जीने का हक है? आपकी इस बारे में क्या राय है, हमें नीचे लिखकर जरूर बताएं।
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