सुनिए जी दीपक को जरा फोन करिए बात करने का मन कर रहा है, किया था फोन अरविंद जी ने कहा ,पत्नी सुनीता से । तो क्या हुआ नहीं उठाया फोन कभी उठाता है वह मेरा । और ना कभी अपने आप फोन करता है । अरे नहीं उठाता भाग्यवान मैं कितनी बार तुमसे बता चुका हूं। अच्छा एक बार उससे मिल आए बहुत मन में बुरे बुरे ख्याल आ रहे हैं। और उसको देखने का अब मन कर रहा है ।
अब भूल भी जाओ बेटे को, कैसे भूल जाऊं मां हूं उसको नौ महीने कोख मे रखा है । एक बार मिले उसे अपनी आंखों से देख लीजिए हाल-चाल मिल जाए तो तसल्ली हो जाएगी। नहीं मैं नहीं जाऊंगा तुम्हारे कहने पर मैं एक बार पहले भी गया था तो उसे दरवाजे से लौटा दिया था। नहीं मैं नहीं जाऊंगा प्लीज मेरी खातिर चले जाइए एक बार सुनीता अरविंद जी से विनती करने लगी।
दीपक अरविंद और सुनीता जी का एकलौता बेटा था।इंजीनियरिंग की पढ़ाई की थी उसने। पढ़ाई के बाद नौकरी करने लगा था। नौकरी की तरफ दौरान ही वह संपदा को पसंद करने लगा था। दीपक ने जब घर में अपनी मम्मी पापा को बताया तो वो थोड़े नाराज हुए,
और जब यह पता चला कि वह अपने धर्म से अलग है तो बहुत ज्यादा नाराज हो गए। संपदा क्रिश्चियन थी । और दीपक की मम्मी पापा ये स्वीकार करने को ही तैयार नहीं थे कि दीपक एक दूसरे धर्म में शादी करें। लेकिन दीपक मानने को तैयार नहीं था इन सब बातों को नहीं मानता था।
क्या होता है जात पात कुछ नहीं होता। मम्मी पापा को मानने को दीपक साल भर बीत गए लेकिन अरविंद जी और सुनीता जी मानने को तैयार नहीं हुए।फिर एक दिन दीपक संपदा से शादी करके उसे घर ले आया। सुनीता जी ने दरवाजा खोला सामने दुल्हन की जोड़े में संपदा को दीपक के साथ देखा। तो भौचक्की रह गई सुनीता।
तभी सपंदा ने झुककर सुनीता के पांव छुए। सुनीता ये स्वीकार ही नहीं कर पा रही थी दीपक अपने बिना मां-बाप की मर्ज़ी के शादी कर ली।।तभी अरविंद जी ने पीछे से आवाज दी कौन है सुनीता दीपक है ,अच्छा तो दरवाजे पर क्यों खडी हो अंदर बुलाओ ना। सुनीता दरवाजे के सामने से हट गई और दीपक और सपंदा अंदर आ गए ।
संपदा ने अरविंद जी के पांव छुए। यह क्या दीपक तूने बिना हम लोगों के मर्जी से शादी कर ली ,हां पापा अब ये आपकी बहू है। आप लोग मान ही नहीं रहे थे तो मजबूरन यह कदम उठाना पड़ा। निकल जाओ इस घर से मैं इसे अपनी बहू कभी स्वीकार नहीं कर सकता। पापा सुनिए तो संपदा बहुत अच्छी लड़की है, पापा आप लोगों को शिकायत का मौका नहीं देगी।
तभी संपदा बीच में बोल पडी पापा जी मम्मी जी हम लोग आप लोगों को मर्जी के खिलाफ जाने को मजबूर हो गए थे। आप मान नहीं रहे थे।चुप रहो तुम मैं अपनी बेटे से बात कर रहा हूं। निकल जाओ तुम यहां से पर पापा पापा पापा पापा कुछ नहीं निकल जाओ।
और दीपक और संपद दोनों बाहर निकल आए घर से। और सोचने लगे कहां जाए। एक होटल के रूम में शरण ली।दो दिन बाद एक किराए का फ्लैट किया और वहां सेट हो गया। अरविंद जी और सुनीता के मन में और दीपक और सपंदा के मन में भी एक दूसरे के प्रति नफरत के बीज पड़ गया था। दीपक घर से अलग रहने लगा ।
तो दीपक ने और अरविंद जी ने कभी दूसरे का हाल-चाल जानने की कोशिश नहीं करी । ना कभी दीपक में फोन कियान कभी अरविंद जी ने। समय बिता गया और मन में बसी कडवाहट अब धीरे-धीरे थोड़ी कम होने लगी थी। ऐसे ही एक दिन अरविंद जी और सुनीता जी आपस में कहने लगे आज दीपक की बहुत याद आ रही है ,हां मुझे भी।
अरविंद जी बोले दीपक ने तो ऐसे मुंह मोड़ लिया फिर से कभी पलट कर ही नहीं देखा। माना की उस समय नाराज था लेकिन नाराजगी धीरे-धीरे खत्म भी तो हो जाती है।
दीपक ने तो फिर से कभी हाल ही न पूछा।क्या करूं फोन लगाऊं क्या, आज मेरा मन बहुत कर रहा है दीपक से बात करने का । एक बार फोन लगाइए ना क्या करूं फोन लगाकर, अरे लगाओ तो बच्चे भले ही हम लोगों को भूल जाए लेकिन हम लोग कैसे अपने बच्चों को भूल सकते हैं मैं मां हूं उसकी।
अरविंद जी ने कई बार फोन लगाया लेकिन दीपक का फोन नहीं उठाता। । सुनीता कहने लगी मेरा दिल बहुत घबरा रहा है कोई बात तो नहीं हो गई दीपक के साथ फोन नहीं उठा रहा है। सुनिए जी आप एक बार उसके घर चले जाइए। कैसे चला जाऊंगा पता है क्या कहां रहता है। यह तो बात है अरे सुनो दीपक का एक दोस्त था नमन,
वो यही पास में ही रहता है जरा उससे उसका पता पूछो । अच्छा देखता हूं आज इतने बरसों बाद अरविंद जी के दिल में दीपक से मिलने की हूक उठ रही थी । अरविंद जी निकल पड़े नमन के घर को वहां से पता लग गया घर आकर बताया सुनीता को तो, सुनीता ने जोर देने लगी कि दीपक के वहां चले जाओ।
दूसरे दिन अरविंद जी निकल पड़े दीपक के घर को ,,डोर बिल बजाई दरवाजा खुला से संपदा निकाल कर आई दरवाजा खुला तो सामने अरविंद जी को खड़े पाया। संपदा बिना संबोधन की बोली आप, आप क्यों आऐ है यहाँ। वह बेटा दीपक से मिलना है, लेकिन वह नहीं है मिलना नहीं चाहते आपसे, लेकिन मुझे तो मिलना है ,और वह अंदर जाने लगे।
इतने मे दीपक बोला कौन है संपदा देखा तो सामने पापा खड़े हैं । पापा आप क्यों आए हैं, तुझसे मिलना था बेटा मां तुम्हारी याद में तड़प रही है एक बार उससे मिल ले।लेकिन आप लोगों ने तो हम दोनों को घर से निकाल दिया था ना अब क्यों लेने आए हैं। घर से निकाला था जिंदगी से थोड़ी निकाल दिया था ।
नहीं पापा अब मैं आप लोगों से कोई रिश्ता नहीं रखना चाहता। बेटा तू औलाद है मेरी,मै फोन करता हूं तो फोन भी नहीं उठाता। पापा आप जाइए यहां से मुझे किसी से नहीं मिलना । बूढ़े मां-बाप को इतनी तकलीफ न दे।मैंने कह दिया न कि मै आप लोगों से मिलना नहीं चाहता।और जोर से दरवाजा अरविंद जी के मुंह पर बंद कर दिया । अरविंद जी अपना सा मुंह लेकर वापस घर आ गए।
घर आते सुनीता में प्रश्नों की झड़ी लगा दी अरविंद जी से ।क्या हुआ कैसा है दीपक सब ठीक तो है ना कब आएगा ,मुझसे मिलने। चुप हो जा सुनीता तुम्हारा बेटा तुम्हारा नहीं रहा वह और अब और किसी का हो गया है। अब भूल जाओ उसे ,अब वह नहीं आएगा । फिर वह उनके साथ जो भी व्यवहार दीपक को संपदा में किया था सब अरविंद जी ने बता दिया।
दूसरे से सुनीता अरविंद जी से बोली आप मुझे ले चले उसके पास । मेरी इतनी बेइज्जती हो गई अभी तुम्हें अपनी बेइज्जती करनी बाकी है क्या कोई जरूरत नहीं है जाने की। एक बार तो ले चलिए सुनीता बार-बार जीद पर करने लगी अरविंद जी ले गए सुनीता को।
डोर बेल बजाई फिर दरवाजा खुला और दीपक और संपदा आए। । अरविंद जी को देखकर दीपक फिर बोला आप फिर आ गए पापा। आपको तो घर से निकाल चुके थे ना । हां घर से निकला था जिंदगी से नहीं निकला था, बगल में खड़ी सुनीता बोल पड़ी ,,वक्त से डरो बेटा जब वक्त का पहिया घूमता है न तो कुछ भी सही नहीं रहता।
हम बूढ़े मां-बाप को जैसे तुम अपनी सूरत दिखाने को तरसा रहे हो ना, कहीं ऐसा तुम्हारे सामने ना आ जाए। हम मां-बाप हैं मैंने तुझे पैदा किया है आत्मा का कलपती है मेरी देखने को तुझे ,आंखें तरसती है । लेकिन तू तो बड़ा पत्थर दिल हो गया रे इतने सालों से कभी खबर ही ना ली मां-बाप जिंदा है कि मर गए। हम लोग मिलने आए हैं तो ऐसा व्यवहार कर रहा है।
ठीक है जा रहे हैं हम लोग अब कभी तेरी शक्ल नहीं देखेंगे,, हम भी जी लेंगे एक दूसरे का मुंह देखकर, एक दूसरे का दुख बांट कर, एक दूसरे को तसल्ली देकर। जा तू खुश रहा बेटा माँ हूँ तो बददुआ तो तुझे नहीं दे सकती जा रहे हैं। हमने लेकिन वक्त से डरना जरूर इतना कहकर अरविंद जी अस्मिता जी घर आ गए।
आज अरविंद जी ने अपने फोन से दीपक का फोन डिलीट नंबर डिलीट कर दिया ।। और सुनीता का हाथ अपने हाथ में लेकर बोले अब हम दोनों एक दूसरे का सहारा है। हां आप ठीक कह रहे हैं मुझे माफ कर देना आपको मैं जबर्दस्ती दीपक के यहां भेजा। नहीं ठीक ही तो है हो रहा है बेटे की सच्चाई तो सामने आ गई ।
अब कोई उम्मीद तो नहीं रहेगी। बस अब तो एक दूसरे के जिंदा रहेंगे हां जी सही कह रहे हैं आप। वक्त सबक सिखाएगा बस अब कोई आस मन मे नही रखना। बस ऐसे ही जिंदगी जी लेगें। हाँ आप ठीक कह रहे है।
मंजू ओमर
झांसी उत्तर प्रदेश
14 सितम्बर