जब घर फिर से मुस्कुरा उठा

 मानस ने उसके आँसू पोंछे और कहा, “तू नकारा नहीं है समर्थ। तू तो हम सबमें सबसे ज्यादा संवेदनशील है। ज़िंदगी में ठोकरें सबको लगती हैं। कल से हम दोनों मिलकर तेरे विषयों की पढ़ाई शुरू करेंगे। मैं देखता हूँ कि तू कैसे पास नहीं होता!” समर्थ के दिल से जैसे कई मन का बोझ उतर गया था। उसने उसी पल सिगरेट और गलत दोस्तों से दूर रहने का संकल्प लिया।

विमान जब दिल्ली की ज़मीन को छूकर रुका, तो मानस की छाती में एक अजीब सी सिहरन दौड़ गई थी। जर्मनी में एयरोस्पेस इंजीनियरिंग के लंबे, थकाऊ और अकेले छह साल बिताने के बाद अपनी मिट्टी की गंध को अपने फेफड़ों में भरना एक ऐसा अहसास था, जिसे शब्दों में नहीं बाँधा जा सकता। वहाँ कई बड़ी कंपनियों के लुभावने पैकेज सामने थे, आलीशान अपार्टमेंट और यूरोपीय सुख-सुविधाओं से भरी ज़िंदगी की गारंटी थी, लेकिन मानस ने पहले दिन ही तय कर लिया था कि जो ज्ञान उसने बाहर हासिल किया है, उसकी असली आहुति अपनी ही धरती पर लगेगी। वह अपने देश लौट आया था।

घर पहुँचकर माता-पिता के आलिंगन, दोस्तों के शोर-शराबे और माँ के हाथ के गरम पराठों के बीच कब तीन हफ्ते गुजर गए, पता ही नहीं चला। बेंगलुरु के एक प्रसिद्ध अनुसंधान संस्थान में नियुक्ति पत्र आने में अभी पंद्रह दिन का वक्त बाकी था। एक दोपहर, जब वह अपने कमरे में पुरानी डायरी पलट रहा था, उसकी नज़र ननिहाल की एक पुरानी तस्वीर पर पड़ी। तस्वीर में नानी के दोनों ओर वह और उसके दो ममेरे भाई, समर्थ और शौर्य खड़े थे, और पीछे मामा-मामी हँसते हुए खड़े थे। नानी अब इस दुनिया में नहीं थीं। दो साल पहले जब वे गुज़री थीं, तब वह बर्लिन में अपने शोध के अंतिम चरण में फँसा हुआ था और चाहकर भी अंतिम दर्शन के लिए नहीं आ सका था। उस समय दूर देश में अकेले बैठकर नानी के सुनाए लोकगीत, उनकी गोदी की महक और हाथ से खिलाए गए मखाने की खीर याद करके उसने कई रातें रोते हुए काटी थीं। मानस ने उसी पल बैग पैक किया और ननिहाल जाने वाली दोपहर की इंटरसिटी एक्सप्रेस में सवार हो गया।

राजपुर… एक ऐसा कस्बा जो अब कस्बा नहीं रहा था। सीमेंट-कंक्रीट की बहुमंजिला इमारतें, बड़े-बड़े चमकीले होर्डिंग्स और चौड़ी होती सड़कें बता रही थीं कि विकास की अंधी दौड़ ने यहाँ के पुराने दरख्तों और कच्ची पगडंडियों को लील लिया है। ट्रेन में बैठे-बैठे मानस के ज़हन में बचपन की यादें चलचित्र की तरह घूम रही थीं। समर्थ, जो अब बाइस साल का हो चुका था, बचपन में कितना बातूनी था; हर बात पर सवाल पूछना और मानस की पीठ पर चढ़कर पूरे आँगन में दौड़ना उसकी आदत थी। छोटा भाई शौर्य, जो अब सोलह वर्ष का था, हर वक्त अपने हाथ से कागज़ के हवाई जहाज बनाकर उड़ाया करता था। मामा जी की खिलखिलाती आवाज़ जो गली के मोड़ से ही सुनाई देने लगती थी, और मामी का वह ममतामयी रूप जो घर आए हर मेहमान के लिए थाली सजाने में कभी नहीं थकता था।

स्टेशन से उतरकर मानस ने कोई ऑटो नहीं लिया। सांझ का धुंधलका उतर रहा था, पश्चिम का आकाश नारंगी और सिंदूरी रंगों से रंगा था। ठंडी भीनी बयार चल रही थी। मानस अपने कंधे पर बैग लटकाए पैदल ही उस दोमंजिला पुश्तैनी मकान की ओर चल पड़ा। लेकिन जैसे-जैसे वह घर के नज़दीक पहुँच रहा था, उसे एक अजीब सी चुप्पी महसूस हुई। वह आँगन, जहाँ कभी शाम को बच्चों की कबड्डी या छुपम-छुपाई का शोर गूँजता था, एकदम वीरान पड़ा था। मुख्य द्वार खुला था, लेकिन भीतर से किसी के बोलने की आहट नहीं थी।

मानस ने दरवाज़े की घंटी बजाई। कुछ देर बाद मामी ने दरवाज़ा खोला। उनके चेहरे पर वही पुरानी रेखाएँ थीं, लेकिन आँखों के नीचे गहरे काले घेरे थे। मानस को देखकर उनके चेहरे पर एक क्षण के लिए चौंकने का भाव आया, फिर एक औपचारिक मुस्कान उभरी, “अरे मानस! तुम? बिना बताए? कब आए भारत से?”

“बस मामी, आप सबको सरप्राइज देना चाहता था। कैसी हैं आप?” मानस ने झुककर उनके पैर छुए।

मामी ने उसके सिर पर हाथ रखा, पर उस स्पर्श में वह पुरानी गर्माहट कहीं खोई हुई थी जो कभी दिल को छू जाती थी। वे उसे सीधे लिविंग रूम में ले आईं। टीवी पर बहुत तेज़ आवाज़ में एक धारावाहिक चल रहा था, जिसमें सास-बहू के षड्यंत्र, संपत्ति को हड़पने की साजिशें और चीखते-चिल्लाते संवाद कमरे की हवा को भारी बना रहे थे। मामी ने मानस को सोफे पर बिठाया और खुद वापस टीवी स्क्रीन की तरफ मुँह करके बैठ गईं, जैसे कोई बहुत जरूरी रहस्य छूटने वाला हो।

मानस को वह माहौल बेहद घुटन भरा लगा। उसने अपना बैग किनारे रखा और कमरे के चारों ओर नज़र दौड़ाई। नानी की जो बड़ी सी तस्वीर दीवार पर लगी थी, उस पर फूलों का सूखा हार लटका था और शीशे पर गर्द जमी थी। घर वही था, दीवारें वही थीं, लेकिन उस आशियाने की रूह जैसे कहीं खो चुकी थी।

“मामी, शौर्य कहाँ है? दिखाई नहीं दे रहा,” मानस ने टीवी की कर्कश आवाज़ के बीच थोड़ा ऊँचा बोलते हुए पूछा।

मामी ने बिना स्क्रीन से नज़रें हटाए रिमोट से आवाज़ थोड़ी कम की और बेपरवाही से कहा, “कहाँ होगा? अपने कमरे का दरवाज़ा बंद करके बैठा होगा। जब से ऑनलाइन क्लासेस के लिए नया फोन दिलवाया है, तब से न दिन का होश है न रात का। खाना भी कमरे में ही मँगवाता है। आँखें फोड़ रहा होगा किसी गेम में या वीडियो देखने में। आवाज़ दो तो चिढ़ जाता है।”

“और समर्थ भैया? कॉलेज से नहीं लौटे?” मानस ने उम्मीद से पूछा।

मामी के चेहरे पर एक गहरी शिकन उभरी, “उसका कुछ न पूछो बेटा। कॉलेज तो बस नाम का जाता है। शहर के कुछ आवारा लड़कों के साथ दिन भर कैफे और हुक्का बार के चक्कर काटता रहता है। बी.कॉम के दो पेपर पहले ही बैक लगे हैं, पर कोई परवाह नहीं। रात को ग्यारह बजे से पहले घर नहीं लौटता।”

“और मामा जी?”

“तुम्हारे मामा के तो क्या कहने! जब से नगर निगम के चुनावों की सुगबुगाहट शुरू हुई है, वे किसी स्थानीय नेता की गाड़ी में झंडा थामे घूमते रहते हैं। सुबह निकलते हैं, रात को किसी ढाबे पर कार्यकर्ताओं के साथ शराब और कबाब उड़ाकर लौटते हैं। इस घर में कोई किसी से बात नहीं करता मानस। सब अपने-अपने नशे में मस्त हैं।” मामी ने एक ठंडी आह भरी और उठकर रसोई की तरफ चली गईं। कुछ देर बाद वे एक ट्रे में ठंडी हो चुकी चाय और एक प्लेट में बाजारू नमकीन लेकर आईं।

मानस ने चाय का घूँट भरा, तो उसका गला कड़वा हो गया। यह वह घर नहीं था जहाँ नानी की धूप-दीप की सुगंध फैलती थी, जहाँ दाल के तड़के की महक से भूख जाग उठती थी, और जहाँ रात को एक थाली में सब मिलकर हँसते-हँसते खाना खाते थे। यहाँ तो हर इंसान अपने ही बनाए एक अदृश्य पिंजरे में कैद था। चार कमरों के इस मकान में चार अलग-अलग दुनियाएँ बस रही थीं, जो एक ही छत के नीचे रहकर भी एक-दूसरे से मीलों दूर थीं। एक अजीब सा अनदेखा मौन हर कोने में पसरा हुआ था।

मानस का मन भीतर तक बुझ गया। उसने सोचा था कि वह यहाँ चार-पाँच दिन रहकर अपनी पुरानी यादों को ताज़ा करेगा, लेकिन इस सन्नाटे ने उसका दम घोंट दिया। उसने मन ही मन तय कर लिया कि वह सुबह की पहली गाड़ी से वापस अपने घर लौट जाएगा।

रात के लगभग नौ बजे समर्थ घर लौटा। उसके कपड़ों से सिगरेट की तेज़ बदबू आ रही थी और आँखें चढ़ी हुई थीं। मानस को सामने देखकर वह एक पल के लिए झेंपा, फिर एक बनावटी गर्मजोशी दिखाते हुए बोला, “अरे भाई मानस! तू कब आया? जर्मनी से कब लौटा?”

मानस ने उसे गले लगाया, लेकिन समर्थ की धड़कनों में उसे वह भाई नहीं मिला जिसके साथ उसने कभी पतंगें उड़ाई थीं। थोड़ी देर की औपचारिक बातचीत के बाद समर्थ ने अपना मोबाइल निकाला, किसी से चैट करने लगा और फिर मुँह फेरकर सोफे पर ही पसर गया। कुछ देर बाद मामा जी आए; उनके कुर्ते पर शिकन थी, चेहरे पर शराब का नशा और जुबान पर सिर्फ आगामी रैलियों की डींगें थीं। उन्होंने मानस की पीठ थपथपाई, पर उनकी बातों में अपने भांजे के लिए कोई सच्चा अपनापन नहीं था। रात का खाना सबने अलग-अलग खाया—शौर्य ने अपने कमरे में, मामा जी ने टीवी के सामने, समर्थ ने बाहर ही खा लिया था, और मामी ने रसोई में खड़े-खड़े बची हुई सूखी रोटी निगल ली।

रात को जब मानस नानी के पुराने कमरे में सोने गया, तो उसे नींद नहीं आई। पंखे की घड़घड़ाहट में उसे नानी की वह मीठी डाँट सुनाई दे रही थी—”मानस, समर्थ! जब तक सब एक साथ ज़मीन पर दरी बिछाकर नहीं बैठोगे, अन्नपूर्णा मैया नाराज़ हो जाएँगी।”

उसने उठकर खिड़की खोली। बाहर सन्नाटा था। उसने सोचा, ‘क्या मैं सचमुच सुबह भाग जाऊँ? एक कायर की तरह मुँह मोड़ लूँ? अगर नानी ज़िंदा होतीं, तो क्या वे इस घर को इस तरह बिखरने देतीं? इस परिवार ने मुझे बचपन में बेपनाह प्यार दिया है। आज जब यह घर तकनीक, नशे और संवेदनहीनता के दलदल में धँस रहा है, तो क्या एक पढ़ा-लिखा इंसान होने के नाते मेरी कोई ज़िम्मेदारी नहीं बनती? पलायन करना तो सबसे आसान है, पर असली चुनौती तो उस बिखराव को समेटने में है।’ मानस की आँखों में एक नई चमक आ गई। उसने सुबह जाने का विचार त्याग दिया। उसने तय किया कि वह इस घर में नानी का वह खोया हुआ प्यार और संवाद वापस लाकर रहेगा।

अगली सुबह सूरज की पहली किरण के साथ ही मानस उठ गया। उसने देखा कि घर में सब सो रहे हैं। वह सीधे रसोई में गया। उसने चाय के बर्तन धोए, अदरक और इलायची कूटकर ताज़ी चाय का पानी चढ़ाया। इसके बाद उसने पूरे घर का झाड़ू उठाया और दीवानखाने की धूल साफ की। नानी की तस्वीर पर जमी धूल को उसने एक साफ कपड़े से बड़े आदर के साथ पोंछा, ताजे गेंदे के फूल जो वह सुबह के बाज़ार से दौड़कर ले आया था, तस्वीर पर चढ़ाए और नानी के प्रिय चंदन की अगरबत्ती जला दी।

कुछ ही देर में पूरे घर में इलायची वाली चाय और चंदन की सौंधी सुगंध तैरने लगी।

सबसे पहले मामी हड़बड़ाकर उठीं। उन्होंने जब रसोई में मानस को चाय छानते और गुनगुनाते देखा, तो वे अवाक रह गईं, “अरे मानस बेटा! यह तुम क्या कर रहे हो? मुझे जगा दिया होता!”

मानस ने हँसते हुए एक गरम कप उनके हाथों में थमाया और कहा, “मामी, कभी-कभी घर के बच्चों को भी बड़ों की सेवा का मौका मिलना चाहिए। चलिए, आज की चाय बालकनी में बैठकर पीते हैं।”

मामी ने बरसों बाद चाय की चुस्की के साथ ताज़ी सुबह की हवा को महसूस किया। उनके चेहरे का तनाव धीरे-धीरे पिघलने लगा।

इसके बाद मानस सीधे छोटे भाई शौर्य के कमरे में गया। शौर्य तकिए के नीचे फोन दबाए सो रहा था। मानस ने खिड़की के भारी पर्दे हटा दिए। सुनहरी धूप कमरे में बिखर गई। उसने शौर्य को झकझोर कर उठाया, “उठो मेरे छोटे पायलट! बहुत सो लिए।”

शौर्य चिढ़कर उठा, “भैया, सोने दो ना, रात को देर से सोया था।”

मानस ने उसका फोन उठाकर चुपचाप अपनी जेब में रख लिया। शौर्य चिल्लाने लगा, लेकिन मानस ने मुस्कुराते हुए अपने बैग से एक बेहद आधुनिक ‘एयरोमॉडलिंग किट’ निकाली, जो वह जर्मनी से लाया था। “अगर यह फोन हाथ में रखोगे, तो सिर्फ दूसरों के बनाए गेम खेलते रहोगे। लेकिन अगर मेरे साथ छत पर चलोगे, तो आज हम सचमुच का उड़ने वाला रिमोट-ग्लाइडर अपने हाथों से डिज़ाइन करेंगे। बताओ, क्या करना है?”

शौर्य की आँखें खिल उठीं। बचपन का वह कागज़ के विमान उड़ाने वाला शौक अचानक फिर से जाग उठा। वह एक झटके में बिस्तर से कूद पड़ा और दोनों भाई छत की ओर दौड़ पड़े। अगले दो घंटे तक छत पर हँसी, तालियों और ग्लाइडर के उड़ने की गूँज सुनाई देती रही। शौर्य भूल ही गया कि उसका मोबाइल कहाँ है।

दोपहर में जब समर्थ सोकर उठा और अपने सिर दर्द को थामे बैठा, तो मानस उसके पास गया। उसने समर्थ को कोई भाषण नहीं दिया, न ही उसकी आदतों पर कोई ताना मारा। उसने बस उसका कंधा थपका और कहा, “समर्थ भाई, शहर में तुम्हारी बाइक से एक चक्कर लगाना है। मुझे कुछ पुरानी किताबें ढूँढनी हैं। चलोगे?”

बाइक की सवारी के दौरान मानस ने समर्थ से बहुत सहजता से बात की। उसने अपनी जर्मनी की उन रातों की कहानियाँ सुनाईं जब वह अकेलेपन और असफलता के डर से रोया करता था। उसने बताया कि कैसे उसने खुद को सँभाला। उसने समर्थ की आँखों में झाँककर पूछा, “समर्थ, तू अंदर से बहुत उदास है ना भाई? क्या बात है जो तुझे इस तरह खुद को मिटाने पर मजबूर कर रही है?”

एक भाई का ऐसा निश्छल, बिना किसी शर्त का प्यार पाकर समर्थ का बाँध टूट गया। एक चाय की टपरी के किनारे खड़े होकर बाइस साल का वह नौजवान मानस के कंधे पर सिर रखकर फफक-फफक कर रो पड़ा। उसने बताया कि कैसे कॉलेज में फेल होने के बाद घर में सबने उसे नकारा समझ लिया था, कैसे कोई उसकी बात नहीं सुनता था, और इसी अवसाद से बचने के लिए उसने गलत संगति और नशे का सहारा ले लिया था।

मानस ने उसके आँसू पोंछे और कहा, “तू नकारा नहीं है समर्थ। तू तो हम सबमें सबसे ज्यादा संवेदनशील है। ज़िंदगी में ठोकरें सबको लगती हैं। कल से हम दोनों मिलकर तेरे विषयों की पढ़ाई शुरू करेंगे। मैं देखता हूँ कि तू कैसे पास नहीं होता!” समर्थ के दिल से जैसे कई मन का बोझ उतर गया था। उसने उसी पल सिगरेट और गलत दोस्तों से दूर रहने का संकल्प लिया।

शाम को जब मामा जी घर लौटे, तो घर का नज़ारा बदला हुआ था। टीवी बंद था। दीवानखाने के फर्श पर एक बड़ी सी दरी बिछी हुई थी। बीच में नानी की तस्वीर के सामने घी का दीपक जल रहा था। रसोई से गरमा-गरम पूरियों और कद्दू की खट्टी-मीठी सब्ज़ी की खुशबू आ रही थी, जो कभी नानी के हाथ की पहचान हुआ करती थी। मामी, शौर्य और समर्थ तीनों मिलकर रसोई में मदद कर रहे थे और उनकी खिलखिलाहट बाहर तक आ रही थी।

मामा जी चौखट पर ही ठिठक गए। उनके हाथ से पार्टी का झंडा छूट गया।

मानस बाहर आया और उसने मामा जी का हाथ पकड़कर भीतर खींच लिया, “आइए मामा जी! आज कोई मीटिंग नहीं होगी। आज छह साल बाद पूरा परिवार एक साथ ज़मीन पर बैठकर खाना खाएगा।”

मामा जी ने जब अपने बच्चों के चेहरे पर वह खोई हुई चमक और पत्नी की आँखों में बरसों बाद संतोष देखा, तो उनका नशा एक पल में हिरन हो गया। उनकी आँखें डबडबा आईं। वे चुपचाप जाकर दरी पर बैठ गए।

उस रात जब सबने एक साथ बैठकर भोजन किया, तो किसी के हाथ में मोबाइल नहीं था, कमरे में कोई कर्कश टीवी नहीं चल रहा था। वहाँ सिर्फ पुरानी यादें थीं, नानी के किस्से थे, ठहाके थे और अपनों का स्पर्श था। मामा जी ने हाथ जोड़कर कहा, “मानस बेटा, तूने आज हमारी आँखें खोल दीं। हम सब एक ही छत के नीचे रहते हुए भी एक-दूसरे से कितने दूर हो गए थे। हम तो भूल ही गए थे कि परिवार क्या होता है।”

मानस ने मुस्कुराते हुए सबका हाथ थामा और कहा, “मामा जी, मशीनें और दुनिया की दौड़ हमें सिर्फ भागना सिखाती हैं, लेकिन परिवार हमें जीना सिखाता है। अगर हम रोज़ आधा घंटा भी बिना किसी स्क्रीन के एक-दूसरे के साथ बैठें, तो दुनिया की कोई भी दूरी हमारे घरों में खामोशी की दीवार नहीं खड़ी कर सकती।”

अगले दिन जब मानस स्टेशन की ओर बढ़ा, तो उसके पीछे सिर्फ मामी का औपचारिक हाथ नहीं था; पूरा परिवार हँसते हुए उसे छोड़ने आया था। समर्थ की आँखों में नए भविष्य का संकल्प था, शौर्य के हाथ में अपने बनाए ग्लाइडर का मॉडल था, और मामा-मामी के चेहरे पर एक भरे-पूरे परिवार का गर्व था। वह अनदेखा मौन अब हमेशा के लिए टूट चुका था, और उस घर की देहरी पर एक नया, खुशनुमा सवेरा मुस्कुरा रहा था।

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