रमा के सामने वाले फ्लैट में सुबह से हलचल मची हुई थी। वह फ्लैट काफी समय से खाली पड़ा था। इस फ्लोर पर सिर्फ दो ही फ्लैट थे, इसलिए रमा बहुत खुश थी कि चलो, पड़ोसी आ जाने से उसका अकेलापन कुछ कम होगा। वह उत्सुक थी कि आखिर उसके नए पड़ोसी कौन हैं।
उसने आई-होल से देखा—एक लंबे-चौड़े, बड़ी-बड़ी मूँछों वाला व्यक्ति मजदूरों से सामान रखवा रहा था। उससे रहा नहीं गया। उसने दरवाजा खोला और बाहर आकर पूछा, “भाई साहब, आप ही यहाँ रहने आ रहे हैं?”
“जी बहन जी, हम ही आ रहे हैं। मैं दरोगा हूँ। अभी-अभी इस शहर में मेरा ट्रांसफर हुआ है।”
रमा के चेहरे पर खुशी आ गई। वह बोली, “किसी भी चीज की जरूरत हो तो जरूर बताइएगा। हम आपके होने वाले पड़ोसी हैं।”
“जरूर बहन जी, कोई आवश्यकता होगी तो आपको जरूर बताऊँगा।”
रमा अपना पड़ोसी धर्म निभाकर घर आ गई।
शाम को पति के घर लौटने पर उसने नए पड़ोसी के बारे में बताया।पति ने समझाते हुए कहा, “देखो रमा, आज तो तुमने उनसे बोल दिया, वह ठीक है। हमारा फर्ज बनता है पड़ोसी की मदद करना, लेकिन इन पुलिस वालों से दूर रहना ही ठीक है।इनसे न ज्यादा दोस्ती भली, न ज्यादा दुश्मनी।”
रमा ने ज्यादा ध्यान नहीं दिया।
दरोगा जी की पत्नी का स्वभाव भी बहुत अच्छा था। वह अक्सर रमा के पास आ जाती। उनके बच्चे नहीं थे, इसलिए वह रमा के बच्चों को बहुत प्यार करती थी। दरोगा जी भी आते-जाते बच्चों को देखकर खुश होते और उनसे बातें करते। धीरे-धीरे दोनों परिवारों में अपनापन बढ़ने लगा, लेकिन रमा के पति को यह मेल-जोल अब भी पसंद नहीं था।
एक दिन रमा का बेटा तो स्कूल से आ गया, लेकिन बेटी अभी तक नहीं आई थी।वो दूसरे स्कूल में पढ़ती थी।शाम के छह बजने को थे…रमा की चिंता बढ़ने लगी। उसने स्कूल में फोन किया, लेकिन किसी ने फोन नहीं उठाया। शायद स्कूल बंद हो चुका था।
उसने पति को फोन कर बताया। वे बोले, “तुम चिंता मत करो। मैं अभी ऑफिस से निकलता हूँ और स्कूल जाकर पता करता हूँ।”
रमा ने बेटी की सहेलियों को भी फोन किया। सबने यही बताया कि आंटी, वह हमारे साथ ही स्कूल से निकली थी, उसके बाद हमें नहीं पता।
रमा के मन में तरह-तरह के बुरे ख्याल आने लगे। वह रोने लगी। उसे रोता देखकर बेटा भी रोने लगा।
तभी डोरबेल बजी।
रमा तेजी से दरवाजे की ओर भागी। दरवाजा खोला तो सामने दरोगा जी उसकी बेटी का हाथ थामे खड़े थे। इससे पहले कि वह कुछ पूछती, बेटी उससे लिपटकर जोर-जोर से रोने लगी-
“मम्मी! अगर आज अंकल नहीं होते तो पता नहीं मेरा क्या होता!”
रमा ने अचरज से दरोगा जी की ओर देखा।
“बहन जी, अंदर चलिए। मैं आपको सब बताता हूँ।”
उन्होंने पानी पिया और फिर बोले, “आज किस्मत से मेरी ड्यूटी आपकी बेटी के स्कूल के पास ही थी। कुछ दिनों से उस इलाके में ऐसे गिरोह के सक्रिय होने की खबरें थीं, जो लड़कियों को अगवा कर गलत धंधे में धकेल देते थे।ड्यूटी के दौरान मुझे एक सफेद गाड़ी दिखाई दी। उसमें से किसी लड़की के चीखने की आवाज आ रही थी। मुझे शक हुआ तो मैंने गाड़ी का पीछा किया।पास पहुँचने पर देखा,कि दो बदमाश एक लड़की को जबरदस्ती पकड़े हुए थे और वो चिल्ला रही थी मुझे छोड़ दो..मुझे छोड़ दो…!! मुझे शक्ल कुछ जानी पहचानी सी लगी,फिर याद आया ये तो आपकी बेटी है।मैंने तुरंत कार्रवाई की। मेरे साथ मौजूद पुलिसकर्मियों ने दोनों बदमाशों को पकड़ लिया। उन्हें थाने भिजवाने से पहले मैंने सोचा कि बिटिया को सुरक्षित घर पहुँचा दूँ।आप लोग परेशान हो रहे होंगे।”
सारी बात सुनकर रमा की आँखें भर आईं।
“भाई साहब, मैं आपका कैसे शुक्रिया करूँ? आज आपने हम पर जो उपकार किया है, उसका ऋण हम जिंदगी भर नहीं चुका सकते।”
दरोगा जी मुस्कुराए, “बहन जी, इसमें शुक्रिया कैसा? लोगों की रक्षा करना हमारा फर्ज है। फिर यह तो हमारी अपनी बच्ची है।”
इतना कहकर वे चले गए।
कुछ देर बाद रमा के पति का फोन आया-“बेटी नहीं मिली। मैं पुलिस में रिपोर्ट करने जा रहा हूँ।”
रमा ने राहत भरी आवाज में कहा, “रिपोर्ट करने की जरूरत नहीं है। बेटी सुरक्षित घर आ गई है। आप भी जल्दी घर आ जाइए।”
घर पहुँचकर जब रमा के पति ने पूरी बात सुनी तो वे कुछ देर तक खामोश रहे। उनके मन में आत्मग्लानि थी। जिस पुलिस वाले से उन्होंने पत्नी को दूर रहने की हिदायत दी थी, उसी ने आज उनकी बेटी को एक बड़ी मुसीबत से बचा लिया था।रात को वो रमा को लेकर दरोगा जी के घर गए और उनके सामने हाथ जोड़ दिए।
“मुझे माफ कर दीजिए भाई साहब। मैं आपको सिर्फ आपकी वर्दी और पेशे से पहचानता रहा, लेकिन आज समझ आया कि रिश्ते खून से ही नहीं, इंसानियत से भी बनते हैं।”
दरोगा जी ने मुस्कुराकर उनका हाथ थाम लिया।
“अरे भाई साहब, इसमें माफी कैसी? पड़ोसी हैं हम… और पड़ोसी का सुख-दुख तो अपना ही होता है।”
रमा की आँखें नम हो उठीं। कुछ दिन पहले तक जो रिश्ता महज दो आमने-सामने के फ्लैटों के बीच था,आज वह विश्वास,अपनापन और इंसानियत के बंधन में बदल चुका था।
रमा के पति ने दरोगा जी की ओर देखा और मन ही मन सोचा—आखिर ये कैसा बंधन है, जो न खून का है, न किसी स्वार्थ का, फिर भी अपनों से बढ़कर है?
सच दोस्तों किसी व्यक्ति को उसके पेशे या बाहरी पहचान से नहीं, बल्कि उसके व्यवहार और इंसानियत से परखना चाहिए। सच्चे रिश्ते खून के नहीं, विश्वास,अपनत्व और जरूरत के समय साथ खड़े होने से बनते हैं। पड़ोसी केवल पास रहने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि सुख-दुख में काम आने वाला अपना भी हो सकता है।
कमलेश आहूजा