मेरी छोटी बहन राधिका का स्वभाव शुरू से ही पानी की तरह निर्मल और पारदर्शी रहा है। छल-कपट, चालाकी या दुनियादारी की पेचीदगियां जैसे उसे कभी छू कर भी नहीं गुजरीं। घर में सब से छोटी होने के कारण वह सबकी लाडली तो थी, लेकिन उसमें नखरे या ज़िद नाम की कोई चीज़ नहीं थी। जब राधिका की शादी की बात चली, तो माँ ने अलीगढ़ के पास एक कस्बे के एक बड़े और पुराने परिवार को चुना। परिवार बड़ा था, पुश्तैनी कपड़े का व्यापार था। देखने में सब कुछ बहुत भरा-पूरा और संस्कारी लग रहा था। लेकिन राधिका जैसी गाय के समान सीधी लड़की जब उस घर में ब्याही गई, तो मेरे मन के किसी कोने में एक अज्ञात भय हमेशा मंडराता रहता था। उसकी सास, दोनों जेठानियां और तीन ननदें—सब की सब बातों में इतनी तेज और हावी होने वाली थीं कि मुझे अक्सर लगता कि मेरी भोली बहन उनके बीच कहीं घुट कर न रह जाए।
शादी के कुछ समय बाद, जब राधिका को पहली बार मायके लाने की रस्म का समय आया, तो हमने अपने छोटे भाई मयंक को उसे विदा कराने भेजा। हम सब घर में बड़ी बेसब्री से राधिका के आने का इंतज़ार कर रहे थे। हमने सोचा था कि वह आएगी तो अपने नए घर की, अपने पति विक्रम की और ससुराल के माहौल की ढेरों बातें बताएगी। लेकिन शाम को मयंक अकेला ही लौट आया। उसका चेहरा उतरा हुआ था और आँखों में एक अजीब सी उलझन और गुस्सा था।
“क्या हुआ मयंक? राधिका कहाँ है?” माँ ने घबराते हुए पूछा।
मयंक ने सोफे पर धम्म से बैठते हुए कहा, “दीदी को उसकी सास ने विदा ही नहीं किया। साफ कह दिया कि अभी घर में पूजा है, फिर किसी रिश्तेदार के बच्चे का मुंडन है। महीने भर बाद भेजेंगे।”
मुझे कुछ अजीब लगा। मैंने मयंक के पास बैठकर पूछा, “तू इतना परेशान क्यों लग रहा है? क्या बात हुई वहां?”
मयंक ने जो कुछ बताया, उसे सुनकर मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई। वह झुंझलाते हुए बोला, “दीदी, आपने राधिका दीदी को कैसे घर में ब्याह दिया? वह घर क्या उनके रहने लायक है? बाहर से बड़ा दिखने वाला वह पुश्तैनी मकान अंदर से कितना घुटन भरा और छोटा है, इसका आपको अंदाज़ा नहीं है। एक ही बड़े से आंगन के चारो तरफ छोटे-छोटे कमरे हैं और उसी में पंद्रह-बीस लोग ठुंसे हुए हैं। और तो और, आज के ज़माने में कौन बहुओं से इतना लंबा घूंघट करवाता है? राधिका दीदी जब मेरे सामने चाय लेकर आईं, तो उनका चेहरा तक मुझे नहीं दिखा। घूंघट उनके सीने तक खिंचा हुआ था।”
मयंक की बातें सुनकर मेरा दिल जोर से धड़कने लगा। मयंक आगे कहता जा रहा था, “ऊपर से उनकी सास और जेठानियां… बाप रे! इतनी तेज़ और रोबीली औरतें मैंने आज तक नहीं देखीं। मैं वहां बैठा था और राधिका दीदी की सास मुझे ही ताने मारने लगीं। कहने लगीं कि तुम्हारी माँ ने लड़की को कोई काम-काज तो सिखाया नहीं है, बस नाज़ुक सी गुड़िया बना कर भेज दिया है। इतने बड़े घर का काम इसके बस का नहीं है, चार लोगों की रोटी बेलने में इसके हाथ दुखने लगते हैं। अब हम ही इसे सुधारेंगे और घर के तौर-तरीके सिखाएंगे।”
मुझे अपने कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था। राधिका, जिसने हमारे घर में कभी किसी काम के लिए ना नहीं कहा, उसे वे लोग कामचोर साबित कर रहे थे। मुझे तुरंत अंदेशा हो गया कि इतने सीधे-सादे ढंग से हमने जो शादी की है, कहीं ये लोग दहेज़ के लालची तो नहीं? कहीं वे मेरी मासूम बहन को कम दहेज़ या किसी और बहाने से प्रताड़ित तो नहीं कर रहे? वैसे भी अख़बारों और टीवी में बहुओं को प्रताड़ित करने के इतने किस्से रोज़ ही सुनने को मिलते हैं। मेरा मन एक अजीब सी बेचैनी से भर गया।
राधिका से बात करने की बहुत कोशिश की, लेकिन ससुराल में होने की वजह से वह कभी खुलकर बात ही नहीं कर पाती थी। फोन हमेशा ड्राइंग रूम में रखा रहता था और आस-पास कोई न कोई जरूर मौजूद होता था। जब भी मैं पूछती, “तू ठीक तो है ना राधिका?” वह बस एक दबी हुई सी आवाज़ में “हाँ दीदी, सब ठीक है” कहकर बात टाल देती थी।
माँ से इस विषय पर ज्यादा चर्चा करना भी संभव नहीं था। माँ को दिल की बीमारी थी और डॉक्टर ने उन्हें किसी भी तरह का तनाव लेने से सख्त मना किया था। वैसे भी माँ पुराने ख्यालों की महिला थीं, जिनका मानना था कि बेटी को ससुराल में हर हाल में समझौता करना ही पड़ता है।
कुछ महीने ऐसे ही बीत गए। दीवाली का त्योहार आने वाला था। मुझे लगा कि शायद इस बार राधिका मायके आएगी। मैं भी त्योहार पर माँ के पास गई हुई थी। घर पहुँचकर जब मैंने राधिका के बारे में पूछा, तो माँ ने बहुत ही सहज भाव से कहा, “अरे, उसकी सास की तबीयत बहुत खराब है। राधिका ने फोन किया था कि वह इस बार नहीं आ पाएगी।”
मुझसे रहा नहीं गया। मैं थोड़ी झल्लाहट के साथ बोल पड़ी, “माँ, उस घर में इतनी सारी औरतें हैं, दो-दो जेठानियां हैं, ननदें हैं। फिर राधिका तो नई-नवेली बहू है। क्या उस बड़े से घर में अब सास की सेवा के लिए बस वही एक बची है, जो त्योहार पर चार दिन के लिए भी अपने मायके नहीं आ सकती?”
मुझे पूरा यकीन था कि यह उस तेजतर्रार सास और चालबाज़ जेठानियों की कोई चाल है। उन्होंने जानबूझकर सारा बोझ राधिका पर डाल दिया होगा ताकि वह मायके न जा सके।
उधर माँ बहुत ही गर्व से मुस्कुराते हुए कह रही थीं, “तू तो हमेशा उल्टा ही सोचती है। तुझे पता है, समधन जी का इलाज बड़े अस्पताल में होना था। पैसों की थोड़ी कमी पड़ रही थी तो हमारी राधिका ने अपने हाथ के दोनों भारी सोने के कंगन उतार कर अपनी सास के हाथों में रख दिए। उसकी सास तो इतनी खुश थी, फोन पर मेरी बेटी की बहुत तारीफ कर रही थी।”
माँ की बात सुनकर मैंने अपना माथा पीट लिया। बेवकूफी की भी कोई हद होती है! एक पुश्तैनी व्यापार वाले इतने बड़े परिवार में, जहाँ इतने सारे लोग कमाने वाले हैं, वहां एक छोटी-मोटी बीमारी के इलाज के लिए नई बहू के गहनों की जरूरत कैसे पड़ गई? यह सास की बहुत बड़ी चतुराई और साजिश थी। जो थोड़े-बहुत जेवर हम लोगों ने राधिका को शादी में दिए थे, उन पर भी इस लालची परिवार की नज़रें गड़ गई थीं। उन्होंने बातों के जाल में फंसाकर और अपनी झूठी बीमारी का नाटक रचकर राधिका से उसके कंगन भी ठग लिए थे।
और इधर मेरी भोली माँ अपनी ही धुन में मगन थीं, “कितना अच्छा है ना, मेरी बेटी उस घर में पूरी तरह से रच-बस गई है। घर वालों के काम आ रही है।”
मुझे समझ नहीं आ रहा था कि माँ किस काल्पनिक दुनिया में जी रही हैं। उन्हें यह क्यों नहीं दिखाई दे रहा था कि राधिका के पास उन थोड़े से गहनों के अलावा और था ही क्या? वह उसकी सुरक्षा के लिए थे। मेरा तो त्योहार से पूरी तरह से मन उचट गया। मैं वहां से वापस अपने घर लौट आई, लेकिन मेरा मूड कई दिनों तक उखड़ा-उखड़ा रहा।
मैंने अपने पति, समीर से जब यह सब बताया, तो उनका भी वही रटा-रटाया और व्यावहारिक सा जवाब था, “तुम ख्वामख्वाह परेशान हो रही हो। सबकी अपनी-अपनी किस्मत है। अब राधिका के भाग्य में अलीगढ़ का वो घर और वे लोग ही लिखे थे, तो तुम क्या कर सकती हो? और तुम अपनी माँ से भी क्या उम्मीद करती हो? उन्होंने अपनी हैसियत के हिसाब से बेटी ब्याह दी, अपना फर्ज़ पूरा कर दिया। अब बार-बार उनके घर के मामलों में दखल देना ठीक नहीं है।”
समीर की बातें अपनी जगह तार्किक हो सकती थीं, लेकिन एक बड़ी बहन होने के नाते मेरा दिल गवाही नहीं दे रहा था। मुझे पता था कि राधिका अंदर ही अंदर घुट रही है।
और मेरी वह आशंका सच साबित हुई। कल ही रात को मयंक का घबराया हुआ फोन आया। राधिका बहुत गंभीर रूप से बीमार थी। पता चला कि उसके पेट में भयंकर दर्द उठा था और डॉक्टर ने बताया है कि पित्त की थैली में बहुत बड़ी पथरी है, जिसका तुरंत ऑपरेशन करना पड़ेगा। इसके अलावा उसे खून की भी भारी कमी थी और कमज़ोरी की वजह से हालत बिगड़ रही थी। उसे तुरंत आगरा के एक बड़े अस्पताल में भर्ती कराया गया था।
जब मयंक ने मुझे यह बताया, तो मेरे रोंगटे खड़े हो गए। जिस लड़की ने कभी एक वक़्त का खाना नहीं छोड़ा था, उसकी यह हालत कैसे हो गई? साफ जाहिर था कि उस घर में राधिका को न तो ठीक से खाने-पीने को दिया जा रहा था और न ही उसे आराम मिलता था। सास और जेठानियों ने उसे घर की मुफ्त की नौकरानी समझ लिया था। मेरी फूल जैसी बहन आज अस्पताल के बिस्तर पर पड़ी थी और मुझे यह भी नहीं पता था कि मैं उसे किस हाल में देखूँगी। मैंने जल्दी-जल्दी अपना सामान पैक किया और आगरा के लिए निकल पड़ी। रास्ते भर मेरी आँखों से आंसू बहते रहे। मैं बस भगवान से यही प्रार्थना कर रही थी कि मेरी बहन ठीक हो जाए, और मैंने ठान लिया था कि इस बार मैं राधिका को उस नर्क में वापस नहीं जाने दूंगी।
यह कहानी सिर्फ राधिका की नहीं है, बल्कि समाज के उस दोहरे मापदंड की है जहाँ बहुओं को बेटी कहने का दिखावा तो किया जाता है, लेकिन असल में उन्हें केवल एक मशीन और मायके से धन लाने का जरिया ही समझा जाता है।
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