शिखा की आँखों के सामने का वो सुनहरा सपना, जो उसने पिछले कई महीनों से बुना था, एक पल में कांच की तरह टूट कर बिखर गया। जिन रिश्तेदारों ने कहा था कि भाभी माँ बनकर आएगी, उनके सारे वादे और सारी बातें उस ठंडी सुबह के कोहरे में कहीं गायब हो गई थीं।
उसे समझ आ गया था कि ‘भाभी’ उसके लिए कोई जादू की छड़ी नहीं, बल्कि एक और ज़िम्मेदारी बनकर आई है। पहले उसे दो लोगों का काम करना पड़ता था, अब तीन का करना होगा। उसकी वो सुबह की नींद, वो शाम का खेल, वो स्कूल का ड्रामा क्लब… सब कुछ उस रसोई के काले धुएं में उड़ गया था।
शिखा ने ज़मीन पर गिरी अपनी टाई उठाई। उसकी आँखों में आंसू भर आए थे, लेकिन उसने उन्हें बहने नहीं दिया। उसने अपने आंसू पोंछे, स्कूल यूनिफॉर्म को वापस बिस्तर पर रखा और भारी कदमों से रसोई की तरफ चल दी। उसने माचिस उठाई और गैस जलाई।
सर्दियों की वो ठिठुरती हुई सुबह थी। ग्यारह साल की छोटी सी शिखा के अलार्म की घंटी बजी तो उसने अपनी रजाई को और कसकर पकड़ लिया। बाहर अभी भी अँधेरा था और कोहरे की सफेद चादर ने पूरे मोहल्ले को ढक रखा था। उसकी उम्र की बाकी बच्चियां इस समय अपनी माँ की गोद में दुबक कर मीठे सपने देख रही होंगी, लेकिन शिखा के भाग्य में ये सुख नहीं था। तीन साल पहले एक भयानक बीमारी ने उसकी माँ को उससे हमेशा के लिए छीन लिया था। माँ के जाने के बाद घर का पूरा नक्शा ही बदल गया।
पिताजी एक मिल में काम करते थे और उनका बड़ा भाई विकास, जो चौबीस साल का था, शहर की एक प्राइवेट कंपनी में सेल्समैन की नौकरी करता था। घर में कोई और औरत न होने के कारण, सारी जिम्मेदारी धीरे-धीरे शिखा के उन नन्हे और नाज़ुक कंधों पर आ गई, जो अभी खुद ठीक से मजबूत भी नहीं हुए थे।
शिखा ने एक गहरी सांस ली और रजाई से बाहर निकल आई। फर्श बर्फ की तरह ठंडा था। उसने जल्दी से अपने बाल बांधे और रसोई की तरफ चल दी। रसोई में जाते ही उसने सबसे पहले गैस जलाई और चाय का पानी रखा। उसे अपने लिए, पिताजी के लिए और भैया के लिए नाश्ता बनाना था, साथ ही तीनों के टिफिन भी पैक करने थे। कई बार रोटियां बेलते हुए उसके हाथ जल जाते थे, कई बार सब्जी में नमक ज्यादा हो जाता था, लेकिन वो बिना किसी शिकायत के सब कुछ सह लेती थी।
वो एक बच्ची ही तो थी, जिसका मन खेलने को करता था। जब वो स्कूल के लिए निकलती, तो मोहल्ले के बाकी बच्चों को क्रिकेट या लुका-छिपी खेलते देख उसके कदम रुक जाया करते थे। उसका भी मन करता था कि वो अपना भारी बस्ता एक तरफ फेंके और उनके साथ दौड़ने लगे। लेकिन फिर उसे याद आता कि अगर वो खेलने गई, तो शाम का खाना कौन बनाएगा? पिताजी और भैया थके-हारे लौटेंगे तो उन्हें कौन पानी पूछेगा?
स्कूल में भी शिखा की परेशानियां कम नहीं थीं। सुबह घर के इतने सारे काम निबटाने के चक्कर में वो अक्सर स्कूल पहुँचने में लेट हो जाती थी। उसकी क्लास टीचर, जो उसकी पारिवारिक स्थिति से अनजान थीं, उसे रोज क्लास के बाहर खड़ा कर देती थीं। “तुम कभी समय पर नहीं आ सकती शिखा! हमेशा तुम्हारे बाल बिखरे होते हैं और होमवर्क भी अधूरा होता है,” टीचर की ये डांट सुनकर शिखा बस अपनी आँखें नीची कर लेती थी। वो कैसे बताती कि उसका होमवर्क इसलिए अधूरा है क्योंकि रात को बर्तन धोते-धोते उसे नींद आ गई थी।
इस उदास और बोझिल जीवन में अचानक एक दिन खुशी की लहर दौड़ गई। शिखा के बड़े भाई विकास की शादी तय हो गई थी। घर में मेहमानों का आना-जाना शुरू हो गया। मोहल्ले की औरतें और रिश्तेदार जब भी घर आते, तो शिखा को काम करते देख अक्सर कहते, “बस बेटा, कुछ दिन की और मेहनत है। फिर तो तेरी भाभी आ जाएगी। वो बिल्कुल तेरी माँ की तरह तुझे प्यार करेगी। फिर तुझे ये चूल्हा-चौका नहीं करना पड़ेगा। तू आराम से खेलना और अपनी पढ़ाई पर ध्यान देना।”
ये बातें शिखा के मासूम मन में एक बहुत गहरी और मीठी उम्मीद जगा देती थीं। ‘भाभी’ शब्द उसके लिए किसी जादू की छड़ी जैसा हो गया था, जो उसके जीवन के सारे दुख और सारी मेहनत को एक पल में गायब कर देने वाली थी। उसने मन ही मन ढेरों योजनाएं बना ली थीं। उसने सोचा था कि भाभी के आने के बाद वो शाम को अपनी सहेली रिया के घर जाकर कैरम खेला करेगी। वो स्कूल के ड्रामा क्लब में हिस्सा लेगी, क्योंकि तब उसे घर भागने की जल्दी नहीं होगी। वो सुबह आराम से सात बजे तक सोएगी और जब उठेगी तो उसे नाश्ता तैयार मिलेगा, बिल्कुल वैसे ही जैसे माँ के समय में मिलता था।
शादी की तैयारियों में शिखा ने अपनी जी-जान लगा दी। घर की पुताई से लेकर मेहमानों के स्वागत तक, वो एक पल के लिए भी नहीं बैठी। शादी वाले दिन भी वो सबसे ज्यादा खुश थी। उसने एक लाल रंग का लहंगा पहना था। जब नई दुल्हन, नेहा, घर में आई, तो शिखा ने उसकी आरती उतारी। नेहा बहुत सुंदर थी। उसके हाथों में लाल चूड़ा था और चेहरे पर एक अलग ही चमक थी। शिखा ने जब अपनी नई भाभी के पैर छुए, तो उसने मन ही मन कहा, ‘माँ, देखो मेरे लिए एक और माँ आ गई।’
शादी के बाद के रस्मो-रिवाज़ कुछ दिनों तक चलते रहे। रिश्तेदार घर में भरे हुए थे, इसलिए शिखा को अभी भी काम करना पड़ रहा था। लेकिन वो थक नहीं रही थी, क्योंकि उसके होंठों पर एक मुस्कान थी कि बस, मेहमानों के जाते ही उसकी आज़ादी के दिन शुरू हो जाएंगे।
आखिरकार वो दिन आ ही गया। सारे मेहमान अपने-अपने घर लौट चुके थे। रात को सब जल्दी सो गए थे क्योंकि पिछले कई दिनों से कोई ठीक से सोया नहीं था।
अगली सुबह, सर्दियों की धूप हल्की-हल्की आंगन में आ चुकी थी। शिखा की नींद खुली तो उसने सामने दीवार पर टंगी घड़ी देखी। सुबह के साढ़े सात बज रहे थे। एक पल के लिए वो घबराई, क्योंकि इतने बजे तक तो उसका आधा काम खत्म हो जाता था। लेकिन अगले ही पल उसे याद आया कि अब घर में भाभी आ चुकी हैं। उसने चैन की सांस ली और मुस्कुराते हुए बिस्तर पर ही लेटी रही। उसने सोचा कि भाभी ने अब तक पिताजी का टिफिन बना दिया होगा और भैया की चाय भी दे दी होगी। आज वो आराम से नहाएगी, तैयार होगी और बिना भागे, सुकून से स्कूल जाएगी।
यही सब सोचते हुए वो रजाई से निकली। उसने अपना स्कूल का यूनिफॉर्म निकाला और आंगन की तरफ गई। बाहर हल्की धूप में पिताजी अख़बार पढ़ रहे थे। उसने रसोई की तरफ झांका, लेकिन वहां कोई नहीं था। गैस का चूल्हा एकदम साफ और ठंडा पड़ा था।
शिखा कुछ समझ नहीं पाई। तभी सीढ़ियों से उतरते हुए उसके भैया, विकास की आवाज़ आई। वो तौलिया लपेटे हुए बाथरूम की तरफ जा रहा था। विकास ने शिखा को आंगन में खड़े देखा तो उसकी भौंहें तन गईं।
“शिखा! तू अभी तक स्कूल के लिए तैयार नहीं हुई? और ये रसोई में अँधेरा क्यों है? चाय कहाँ है मेरी?” विकास ने कड़क आवाज़ में पूछा।
शिखा की आँखें चौड़ी हो गईं। उसने धीरे से कहा, “भैया… वो… भाभी कहाँ हैं? मुझे लगा कि आज से…”
विकास ने उसे बीच में ही टोकते हुए कहा, “तेरी भाभी अभी सो रही है। शादी की थकान से उसके सिर में दर्द है और वैसे भी उसके मायके में उसे बिना बेड-टी के उठने की आदत नहीं है। वो उठकर काम थोड़ी करेगी अभी। तू जा जल्दी से चाय बना।”
शिखा वहीं जड़ हो गई। उसके हाथ से स्कूल की टाई छूटकर ज़मीन पर गिर गई।
विकास ने उसकी तरफ ध्यान दिए बिना आगे कहा, “सुन, अब से चाय दो नहीं, तीन कप बनाया कर। तेरी भाभी को सुबह अदरक वाली चाय लगती है बिस्तर पर। और हाँ, आज नाश्ते में मेरे और उसके लिए पोहा बना देना, और जल्दी कर, मुझे ऑफिस के लिए लेट हो रहा है।” विकास ये कहकर बाथरूम में घुस गया।
शिखा की आँखों के सामने का वो सुनहरा सपना, जो उसने पिछले कई महीनों से बुना था, एक पल में कांच की तरह टूट कर बिखर गया। जिन रिश्तेदारों ने कहा था कि भाभी माँ बनकर आएगी, उनके सारे वादे और सारी बातें उस ठंडी सुबह के कोहरे में कहीं गायब हो गई थीं।
उसे समझ आ गया था कि ‘भाभी’ उसके लिए कोई जादू की छड़ी नहीं, बल्कि एक और ज़िम्मेदारी बनकर आई है। पहले उसे दो लोगों का काम करना पड़ता था, अब तीन का करना होगा। उसकी वो सुबह की नींद, वो शाम का खेल, वो स्कूल का ड्रामा क्लब… सब कुछ उस रसोई के काले धुएं में उड़ गया था।
शिखा ने ज़मीन पर गिरी अपनी टाई उठाई। उसकी आँखों में आंसू भर आए थे, लेकिन उसने उन्हें बहने नहीं दिया। उसने अपने आंसू पोंछे, स्कूल यूनिफॉर्म को वापस बिस्तर पर रखा और भारी कदमों से रसोई की तरफ चल दी। उसने माचिस उठाई और गैस जलाई। चाय के पानी में जब वो अदरक कूट कर डाल रही थी, तो ओखली की हर चोट के साथ उसके बचपन का कोई न कोई हिस्सा टूट रहा था। वो चाय उबल रही थी, और उसके साथ ही शिखा की वो आखिरी उम्मीद भी हमेशा के लिए भाप बनकर उड़ गई।
आज उसे स्कूल जाने में फिर से देर होने वाली थी, और आज उसे टीचर की डांट का भी कोई बुरा नहीं लगने वाला था, क्योंकि असली सज़ा तो उसे उसके अपने घर ने दे दी थी।
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