अस्तित्व की धूप

छत पर पहुँचते ही शालिनी ने मीरा का हाथ पकड़ लिया और एक गहरी साँस लेते हुए बोली, “मीरा, मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि तू साबित क्या करना चाहती है? कल ही तो वकीलों से बात हुई थी। तूने खुद कहा था कि अब तू विकास के साथ एक पल भी नहीं रहना चाहती। वो आदमी जिसने तुझे कदम-कदम पर धोखा दिया, जिसने तुझे इस घर में एक इंसान नहीं बल्कि एक निर्जीव वस्तु समझ कर रखा… आज तू उसी के लिए निर्जला व्रत रख कर बैठी है? सोलह श्रृंगार करके उसकी लंबी उम्र की दुआ माँगने जा रही है?”

आंगन में गेंदे के फूलों और चंदन की महक फैली हुई थी। करवाचौथ का दिन था, और पूरे घर में औरतों की चहल-पहल से एक अलग ही रौनक छाई हुई थी। लाल, हरी और पीली साड़ियों में सजी-धजी औरतें लोकगीत गा रही थीं। इन्हीं सबके बीच मीरा भी बैठी थी। उसने गहरे हरे रंग की बनारसी साड़ी पहनी थी, माथे पर लाल बिंदी और हाथों में ताज़ी रची हुई मेहंदी उसके रूप को और भी निखार रही थी। लेकिन अगर कोई उसकी आँखों में गहराई से झांकता, तो उसे उस उत्सव की खुशी के बजाय एक अजीब सा ठहराव नजर आता। एक ऐसा सन्नाटा, जो तूफ़ान के गुज़र जाने के बाद पीछे रह जाता है।

थोड़ी दूर पर खड़ा उसका पति, विकास, अपने दोस्तों के साथ हँसी-मज़ाक कर रहा था। बीच-बीच में वह तिरछी नज़रों से मीरा को देख लेता और उसके होंठों पर एक विजयी मुस्कान तैर जाती। उसे लग रहा था कि उसकी हर गलती, हर फरेब को मीरा ने हमेशा की तरह इस बार भी माफ़ कर दिया है। आखिर सात साल से यही तो होता आ रहा था। वह दर्द देता था, और मीरा इस उम्मीद में उसे सह लेती थी कि शायद एक दिन वह सुधर जाएगा।

लेकिन विकास को यह नहीं पता था कि इस बार मीरा ने जो मेहंदी अपने हाथों में रचाई है, उसमें उसका नाम कहीं नहीं है। मेहंदी वाली ने जब पूछा था कि ‘दीदी, जीजाजी का नाम कहाँ लिखूँ?’ तो मीरा ने बहुत ही शांत स्वर में कहा था, ‘मेरा ही नाम लिख दो, मीरा। दोनों हाथों में।’

शाम ढलने लगी थी। पूजा की तैयारियाँ ज़ोरों पर थीं। तभी मीरा की बड़ी बहन, शालिनी, जो इस पूरे आयोजन में मीरा के साथ-साथ परछाई की तरह खड़ी थी, उसे भीड़ से अलग कर छत पर ले गई। शालिनी के चेहरे पर एक उलझन थी, एक ऐसा सवाल था जो सुबह से उसे परेशान कर रहा था।

छत पर पहुँचते ही शालिनी ने मीरा का हाथ पकड़ लिया और एक गहरी साँस लेते हुए बोली, “मीरा, मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि तू साबित क्या करना चाहती है? कल ही तो वकीलों से बात हुई थी। तूने खुद कहा था कि अब तू विकास के साथ एक पल भी नहीं रहना चाहती। वो आदमी जिसने तुझे कदम-कदम पर धोखा दिया, जिसने तुझे इस घर में एक इंसान नहीं बल्कि एक निर्जीव वस्तु समझ कर रखा… आज तू उसी के लिए निर्जला व्रत रख कर बैठी है? सोलह श्रृंगार करके उसकी लंबी उम्र की दुआ माँगने जा रही है?”

मीरा ने धीरे से अपना हाथ शालिनी की पकड़ से छुड़ाया। वह छत की मुंडेर के पास गई और ढलते हुए सूरज को देखने लगी। आसमान में सिंदूरी रंग फैल रहा था, ठीक वैसा ही रंग जैसा उसकी मांग में आज सजा था।

“दीदी, आप भी वही सोच रही हैं जो नीचे खड़े विकास और बाकी सब सोच रहे हैं,” मीरा की आवाज़ में न कोई दुख था, न कोई शिकायत, बल्कि एक ऐसी दृढ़ता थी जो शालिनी ने पहले कभी नहीं देखी थी।

“तो फिर सच क्या है, मीरा? विकास ने तुम्हारे साथ जो किया, क्या तुम उसे भूल गई हो?” शालिनी की आवाज़ में अब थोड़ी झुंझलाहट थी। “जब तुम्हें पता चला कि वो तुम्हें धोखा दे रहा है, जब तुमने उसकी सारी चैट्स और वो होटल के बिल्स देखे थे, तब भी उसने अपनी गलती नहीं मानी थी। उलटा तुम्हें ही मानसिक रूप से बीमार और शक करने वाली औरत साबित कर दिया था। उस आदमी के लिए यह व्रत, यह पूजा… क्या यह तुम्हारे आत्मसम्मान के खिलाफ नहीं है?”

मीरा मुस्कुराई। यह मुस्कान किसी मज़बूर औरत की नहीं थी। “दीदी, विकास ने सिर्फ एक बार धोखा नहीं दिया। उसने मेरे विश्वास की हर ईंट को अपने पैरों तले रौंदा है। सात साल तक मैंने अपने वजूद को मिटाकर सिर्फ उसके घर, उसके परिवार और उसकी झूठी इज़्ज़त को अपना माना। लेकिन बदले में मुझे क्या मिला? रोज़ का मानसिक उत्पीड़न और यह अहसास कि मेरी अपनी कोई कीमत नहीं है।”

मीरा ने अपनी लाल चूड़ियों को सहलाते हुए आगे कहा, “जब मुझे उसके और उसकी उस सो कॉल्ड ‘दोस्त’ के बारे में पूरी सच्चाई पता चली थी, तब मैं टूट गई थी। मैं रोई, गिड़गिड़ाई, मैंने उससे पूछा कि मुझमें क्या कमी रह गई थी। और जानते हैं उसने क्या कहा? उसने कहा कि मैं उसकी हैसियत के बराबर नहीं हूँ। उसने मेरे प्यार को मेरी कमज़ोरी समझ लिया था।”

“तो फिर आज यह सब क्यों, मीरा? क्यों भूखी-प्यासी हो सुबह से?” शालिनी का सवाल अब भी वहीं था।

मीरा ने आसमान में उभरते हुए चाँद के धुंधले अक्स को देखा। “मैंने यह व्रत विकास के लिए नहीं रखा है, दीदी।”

“क्या मतलब?” शालिनी हैरान थी।

“जब एक औरत शादी करके आती है, तो उसे सिखाया जाता है कि उसका पति ही उसका परमेश्वर है। वह व्रत रखती है तो पति की उम्र के लिए, श्रृंगार करती है तो पति की खुशी के लिए। लेकिन मैंने आज जो यह श्रृंगार किया है, यह मैंने खुद के लिए किया है। आज मैंने जो व्रत रखा है, वह विकास की लंबी उम्र के लिए नहीं, बल्कि अपने अंदर की उस औरत की लंबी उम्र के लिए रखा है जिसने बरसों तक घुट-घुट कर जीने के बाद आख़िरकार अपने हक के लिए आवाज़ उठाने की हिम्मत जुटाई है।”

मीरा की आँखों में एक अजीब सी चमक थी। वह आगे बोली, “आज मैं इस व्रत के ज़रिए अपने अतीत को विदा कर रही हूँ। मैंने संकल्प लिया है कि अब मेरी ज़िंदगी का कोई भी फैसला किसी और की मोहताज नहीं होगा। मैं भूखी इसलिए हूँ ताकि मुझे याद रहे कि आत्मसम्मान की भूख दुनिया के हर रिश्ते से बड़ी होती है। मैंने आज अपने भीतर की उस मीरा की पूजा की है जो अब किसी के पैरों की धूल नहीं, बल्कि अपने आसमान की खुद मालिक है। कल सुबह जब यह व्रत खुलेगा, तो मैं विकास का घर हमेशा के लिए छोड़ दूँगी। यह व्रत मेरी नई आज़ादी, मेरी नई भोर का संकल्प है, दीदी।”

शालिनी स्तब्ध रह गई। वह मीरा को एकटक देखती रह गई। कल तक जो मीरा बात-बात पर रोती थी, आज वह इतनी मज़बूत कैसे हो गई? शालिनी की आँखों में आँसू आ गए, लेकिन ये आँसू दुख के नहीं, बल्कि गर्व के थे। उसने आगे बढ़कर मीरा को गले लगा लिया।

“मुझे तुम पर गर्व है, मीरा। बहुत गर्व है,” शालिनी ने रूंधे गले से कहा।

नीचे आँगन में पूजा की घंटियाँ बजने लगी थीं। विकास आवाज़ लगा रहा था, “अरे मीरा, चाँद निकल आया है। आओ जल्दी, पूजा का मुहूर्त निकल रहा है!”

मीरा ने शालिनी की तरफ देखा और एक शांत मुस्कान के साथ बोली, “चलिए दीदी, चाँद को अर्घ्य दे आऊँ। अपने नए जीवन की शुरुआत का यह पहला अर्घ्य मुझे खुद को देना है।”

छत के एक कोने से चाँद पूरी चमक के साथ निकल आया था। मीरा ने पूजा की थाली उठाई। छलनी से चाँद को देखा, लेकिन उसके बाद उसने छलनी से विकास को देखने से मना कर दिया। विकास हैरान खड़ा था। परिवार के लोग कानाफूसी करने लगे। पर मीरा को अब किसी की परवाह नहीं थी। उसने जल का लोटा उठाया, आँखें बंद कीं और अपने भीतर की उस अजेय शक्ति को नमन करते हुए जल अर्पित कर दिया, जो अब किसी भी पिंजरे को तोड़ने के लिए तैयार थी।

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