गले में शब्द जैसे अटक गए हों, सुधीर कुछ बोल ही नहीं पाया। माधवराव ने फल और मिठाइयों का थैला रोहन के हाथ में दिया। फिर वे सुधीर के बिल्कुल करीब गए, अपने दोनों हाथ जोड़े और भारी, भर्राई हुई आवाज में बोले, “सुधीर मेरे भाई… इतने सालों में मुझसे बहुत बड़ी भूल हुई है। मैंने मन ही मन तुझे बहुत कोसा है। मैं बड़ा होकर भी बड़प्पन नहीं दिखा पाया। हो सके तो अपने इस अभागे भाई को क्षमा कर दे मेरे लाल।”
‘क्षमा’ शब्द का माधवराव के मुख से निकलना था कि जैसे बारह सालों से जमी हुई बर्फ पिघल गई। सुधीर की आँखों से पश्चाताप के आँसुओं का बांध टूट पड़ा। वह धड़ाम से अपने बड़े भाई के पैरों पर गिर पड़ा और जोर-जोर से रोने लगा। “भैया! मुझे माफ कर दीजिए… मैं अंधा हो गया था पैसों के लालच में। मैंने आपके साथ बहुत बड़ा पाप किया है। आप देवता हैं भैया, और मैं एक नीच इंसान। मुझे क्षमा कर दीजिए भैया…” सुधीर फफक-फफक कर रो रहा था।
माधवराव एक अत्यंत सीधे, सरल और धार्मिक प्रवृत्ति के व्यक्ति थे। वे एक सरकारी स्कूल से हेडमास्टर के पद से सेवानिवृत्त हुए थे। जीवन भर उन्होंने ईमानदारी और उसूलों की रोटी खाई थी। उनका एक छोटा भाई था, सुधीर। माधवराव ने पिता की मृत्यु के बाद सुधीर को बिल्कुल अपने बेटे की तरह पाला था। सुधीर महत्वाकांक्षी था और अपना खुद का एक बड़ा व्यापार शुरू करना चाहता था। जब सुधीर ने अपने बड़े भाई के सामने व्यापार के लिए पैसों की कमी का रोना रोया, तो माधवराव ने बिना एक पल सोचे अपनी जीवन भर की गाढ़ी कमाई और रिटायरमेंट का सारा पैसा—करीब बीस लाख रुपये—सुधीर के हाथों में रख दिए। उन्होंने सोचा कि घर का पैसा है, छोटा भाई तरक्की करेगा तो पूरे परिवार का नाम रौशन होगा।
सुधीर की किस्मत ने उसका साथ दिया। उसका कपड़ों का व्यापार बहुत तेजी से चल पड़ा। कुछ ही सालों में उसने शहर के एक पॉश इलाके में अपना एक बड़ा सा बंगला बना लिया, महंगी गाड़ियाँ खरीद लीं और समाज के रसूखदार लोगों में उठने-बैठने लगा। लेकिन, जैसे-जैसे सुधीर के पास पैसा आता गया, उसके स्वभाव में अहंकार और बेरुखी भी बढ़ती गई। उसने कभी माधवराव को वो पैसे लौटाने का जिक्र तक नहीं किया। शुरुआत में माधवराव ने कुछ नहीं कहा, लेकिन जब माधवराव की बेटी की शादी तय हुई और उन्हें पैसों की सख्त जरूरत पड़ी, तो वे उम्मीद लेकर सुधीर के पास गए।
सुधीर ने पैसे लौटाने के बजाय माधवराव का घोर अपमान कर दिया। उसने कह दिया कि वो पैसे तो उसने व्यापार में डुबो दिए और अब उसके पास देने के लिए कुछ नहीं है, उल्टे उसने माधवराव को ताना मारा कि वे उसकी तरक्की से जलते हैं। बात इतनी बढ़ गई कि दोनों भाइयों के बीच भयंकर विवाद हो गया। सुधीर ने बड़े भाई को धक्के मारकर घर से निकाल दिया। उस दिन के बाद से दोनों परिवारों के बीच जैसे एक गहरी खाई खुद गई। उनका एक-दूसरे के घर आना-जाना पूरी तरह से बंद हो गया।
समय बीतता गया। लगभग बारह साल गुजर गए। इस दौरान माधवराव जब भी अपने किसी रिश्तेदार या परिचित से मिलते, वे अनायास ही सुधीर के धोखे, उसके लालच और उसके बुरे बर्ताव की चर्चा करने लगते। उनके मन में सुधीर के प्रति एक गहरी कड़वाहट बैठ गई थी। वे सुधीर की निंदा करते और उसे कोसते रहते।
माधवराव बचपन से ही पूजा-पाठ और ध्यान में बहुत रुचि रखते थे। वे नियमित रूप से गीता का पाठ करते और घंटों ध्यान में बैठते। लेकिन पिछले कुछ सालों से उनकी साधना में एक अजीब सी बाधा आने लगी थी। जैसे ही वे आँखें बंद करके ईश्वर का ध्यान करने बैठते, सुधीर का अंहकारी चेहरा उनकी आँखों के सामने आ जाता। सुधीर द्वारा कहे गए कड़वे शब्द उनके कानों में गूंजने लगते। उनका मन अशांत हो जाता। इस मानसिक द्वंद्व और तनाव का असर उनके शरीर पर भी पड़ने लगा। उनका रक्तचाप हमेशा बढ़ा रहता और रातों की नींद उड़ गई। वे हर समय बेचैन रहने लगे। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि आखिर उनके भीतर की यह आग कैसे बुझेगी।
अपनी इस मानसिक पीड़ा का कोई समाधान न पाकर, माधवराव आखिरकार शहर के बाहर एक आश्रम में रहने वाले अपने आध्यात्मिक गुरु, स्वामी निगमानंद जी के पास पहुँचे। उन्होंने स्वामी जी के चरणों में सिर रख दिया और अपनी सारी व्यथा, सुधीर का धोखा, और अपने छिन चुके मानसिक सुख की पूरी कहानी कह सुनाई।
स्वामी निगमानंद जी ने माधवराव की पूरी बात बहुत ध्यान और शांति से सुनी। फिर वे मुस्कुराए और अत्यंत कोमल स्वर में बोले, “माधव! तुम व्यर्थ ही इतनी चिंता कर रहे हो। ईश्वर की कृपा से तुम्हारे हृदय की यह पीड़ा बहुत जल्द शांत हो जाएगी। तुम्हें बस एक छोटा सा काम करना है। कल कुछ ताजे फल और मिठाई लेना, और सीधे अपने छोटे भाई सुधीर के घर जाना। जब वह तुम्हारे सामने आए, तो उससे कोई पुरानी बात मत करना, कोई शिकायत मत करना। बस हाथ जोड़कर उससे इतना कहना कि ‘मेरे भाई, मुझसे बहुत बड़ी भूल हो गई है, मुझे क्षमा कर दो।'”
यह सुनकर माधवराव सन्न रह गए। उन्हें अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ। वे थोड़े उद्विग्न होकर बोले, “महाराज! आप यह क्या कह रहे हैं? मेरे साथ धोखा हुआ है। मेरी जीवन भर की कमाई उसने हड़प ली। उसने मेरा अपमान किया, मुझे धक्के मारकर निकाला। मैंने तो हमेशा उसकी मदद की है! और आप कह रहे हैं कि मैं जाकर उससे क्षमा माँगू? भूल मेरी नहीं, उसकी है!”
स्वामी जी ने शांत भाव से उत्तर दिया, “माधव, इस संसार में कोई भी ऐसा विवाद या संघर्ष नहीं है, जिसमें पूरी तरह से केवल एक ही पक्ष दोषी हो। यह हो सकता है कि उसकी गलती निन्यानवे प्रतिशत हो और तुम्हारी केवल एक प्रतिशत, लेकिन ताली कभी एक हाथ से नहीं बजती। भूल दोनों तरफ से होती है।”
माधवराव अब भी उलझन में थे। उन्होंने पूछा, “स्वामी जी, मैं सच में नहीं समझ पा रहा हूँ। आप ही बताइए कि मेरी क्या भूल है?”
स्वामी जी ने माधवराव की आँखों में देखते हुए कहा, “माधव, ध्यान से सुनो। जब तुमने मन ही मन अपने छोटे भाई को बुरा और कपटी मान लिया—तो यह तुम्हारी पहली भूल थी। जब तुमने समाज और रिश्तेदारों के सामने उसकी निंदा की, उसकी आलोचना की और उसे नीचा दिखाया—तो यह तुम्हारी दूसरी भूल थी। जब तुमने क्रोध और नफरत भरी नजरों से उसके दोषों को देखा—तो यह तुम्हारी तीसरी भूल थी। जब तुमने अपने कानों से दूसरों के द्वारा की जा रही उसकी बुराई को रस लेकर सुना—तो यह तुम्हारी चौथी भूल थी। और आज भी, तुम्हारे इस निर्मल हृदय में अपने ही खून, अपने छोटे भाई के प्रति जो क्रोध, द्वेष और घृणा की आग जल रही है—यह तुम्हारी पांचवीं और सबसे बड़ी भूल है।”
स्वामी जी थोड़ा रुके और फिर बोले, “माधव, तुम्हारी इन्हीं भूलों ने तुम्हारे भीतर एक नकारात्मक ऊर्जा को जन्म दिया है। तुमने अपने विचारों से अपने भाई को जो सूक्ष्म दुःख पहुँचाया है, वही दुःख आज कई गुना बढ़कर तुम्हारी अशांति और बीमारियों के रूप में तुम्हारे पास लौट आया है। यदि तुम सच में शांति चाहते हो, अपनी साधना को सिद्ध करना चाहते हो, तो जाओ और अपनी इन भूलों के लिए उससे क्षमा माँग लो। क्षमा माँगना कायरता नहीं, बल्कि संसार की सबसे बड़ी आध्यात्मिक साधना है। अहंकार को तोड़ना ही असली भक्ति है। यदि तुम यह नहीं करोगे, तो तुम न तो कभी शांति से जी पाओगे और न ही शांति से मर पाओगे।”
स्वामी जी के इन वचनों ने माधवराव के मन पर पड़े अज्ञान और अंहकार के जालों को एक झटके में साफ कर दिया। उनकी आँखों से पर्दा हट गया। उन्हें अपनी गलतियों का स्पष्ट आभास होने लगा। उन्होंने साष्टांग दंडवत कर स्वामी जी को प्रणाम किया और भारी लेकिन शांत मन से आश्रम से विदा ली।
अगले दिन रविवार था। माधवराव ने बाजार से सुधीर के बच्चों के लिए कपड़े, कुछ ताजे फल और सुधीर की मनपसंद मिठाइयाँ खरीदीं। भारी कदमों से वे उसी बंगले की ओर चल पड़े जहाँ से उन्हें सालों पहले बेइज्जत करके निकाला गया था। उन्होंने दरवाजे की घंटी बजाई।
कुछ देर बाद दरवाजा खुला। सामने सुधीर का जवान हो चुका बेटा, रोहन खड़ा था। उसने माधवराव को कभी इतने करीब से नहीं देखा था, लेकिन पुरानी तस्वीरों में पहचाना था। ताऊ जी को दरवाजे पर देखकर वह खुशी और आश्चर्य से उछल पड़ा और भीतर की ओर मुड़कर जोर से चिल्लाया, “पापा! मम्मी! जल्दी बाहर आइए… देखिए कौन आया है! बड़े ताऊ जी आए हैं!”
रोहन की आवाज सुनकर सुधीर और उसकी पत्नी बदहवास से बाहर भागे। उन्हें लगा शायद वे कोई सपना देख रहे हैं। बारह साल बाद, जिस बड़े भाई का उन्होंने इतना अपमान किया था, वह आज उनके दरवाजे पर खड़ा था। सुधीर भीतर ही भीतर किसी अनिष्ट की आशंका से कांपने लगा, लेकिन जब उसने माधवराव के चेहरे की ओर देखा, तो वहाँ कोई क्रोध या शिकायत नहीं थी, बल्कि एक असीम शांति और वात्सल्य था।
गले में शब्द जैसे अटक गए हों, सुधीर कुछ बोल ही नहीं पाया। माधवराव ने फल और मिठाइयों का थैला रोहन के हाथ में दिया। फिर वे सुधीर के बिल्कुल करीब गए, अपने दोनों हाथ जोड़े और भारी, भर्राई हुई आवाज में बोले, “सुधीर मेरे भाई… इतने सालों में मुझसे बहुत बड़ी भूल हुई है। मैंने मन ही मन तुझे बहुत कोसा है। मैं बड़ा होकर भी बड़प्पन नहीं दिखा पाया। हो सके तो अपने इस अभागे भाई को क्षमा कर दे मेरे लाल।”
‘क्षमा’ शब्द का माधवराव के मुख से निकलना था कि जैसे बारह सालों से जमी हुई बर्फ पिघल गई। सुधीर की आँखों से पश्चाताप के आँसुओं का बांध टूट पड़ा। वह धड़ाम से अपने बड़े भाई के पैरों पर गिर पड़ा और जोर-जोर से रोने लगा। “भैया! मुझे माफ कर दीजिए… मैं अंधा हो गया था पैसों के लालच में। मैंने आपके साथ बहुत बड़ा पाप किया है। आप देवता हैं भैया, और मैं एक नीच इंसान। मुझे क्षमा कर दीजिए भैया…” सुधीर फफक-फफक कर रो रहा था।
माधवराव ने झुककर सुधीर को उठाया और अपने सीने से लगा लिया। माधवराव के वात्सल्य के आँसू सुधीर के कंधों को भिगो रहे थे, और सुधीर के पश्चाताप के आँसू माधवराव के सीने को। घर के बाकी सदस्य भी इस अद्भुत और पवित्र मिलन को देखकर रो रहे थे। इतने सालों का क्रोध, द्वेष, नफरत और अहंकार सब कुछ उन आँसुओं की धारा में बहकर साफ हो गया था।
सुधीर दौड़कर अंदर गया और अपनी तिजोरी से एक बैग में बीस लाख रुपये और ब्याज की रकम भरकर ले आया। उसने वह बैग माधवराव के चरणों में रख दिया।
माधवराव ने बहुत प्यार से सुधीर के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “पगले! मैं आज यहाँ इन कागज़ के टुकड़ों को लेने नहीं आया हूँ। मैं तो अपने मन का मैल धोने, अपनी टूटती हुई साधना को बचाने और अपने खोए हुए भाई को वापस पाने आया हूँ। आज मेरा आना सफल हो गया। मेरे मन की सारी जलन, सारी पीड़ा शांत हो गई। मुझे वो आनंद मिल रहा है जो मुझे सालों के ध्यान में भी नहीं मिला।”
सुधीर ने दोनों हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाते हुए कहा, “नहीं भैया, जब तक आप यह पैसा वापस नहीं लेंगे, मेरे सीने की आग नहीं बुझेगी। मेरे पापों का प्रायश्चित नहीं होगा। कृपया इन्हें स्वीकार कर लीजिए।”
सुधीर के बहुत आग्रह करने पर, माधवराव ने वह पैसे ले लिए। लेकिन उन्होंने उस पैसे को अपने साथ घर ले जाने के बजाय, उसी समय अपनी भतीजी (सुधीर की बेटी) के नाम पर फिक्स डिपॉजिट करवा दिया, यह कहकर कि यह उसके बड़े ताऊ की तरफ से उसकी शादी का शगुन है।
उस दिन जब माधवराव अपने घर लौटे, तो उनके कदम बहुत हल्के थे। ऐसा लग रहा था मानो उनके सिर से कोई बहुत बड़ा पहाड़ उतर गया हो। क्षमा माँगने और क्षमा कर देने के इस छोटे से कृत्य ने उनके भीतर के सारे रोग, तनाव और निराशा को जड़ से मिटा दिया था। उनकी साधना एक बार फिर से सजीव हो उठी थी, क्योंकि अब उनके हृदय में किसी के लिए कोई कड़वाहट नहीं, केवल प्रेम और करुणा थी।
सच ही कहा गया है, झुकता वही है जिसमें जान होती है, अकड़ना तो मुर्दों की पहचान होती है। क्षमा माँगने से कोई छोटा नहीं होता, बल्कि उसका कद ईश्वर के और भी करीब हो जाता है।
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