स्मिता ने अपना रेशमी पल्लू सँभालते हुए कहा। “ये जो लड़का है ना सूरज, इसका बाप एक नंबर का जुआरी और शराबी था। सिर पर लाखों का कर्ज़ा छोड़कर लिवर खराब होने से मर गया। इसकी माँ, कमला, मेरे पैरों में गिरकर रोने लगी। मेरे पति राकेश जी का दिल बहुत बड़ा है।
उन्होंने कमला को हमारे फार्महाउस की सफाई पर रख लिया और इस लड़के को यहाँ घर के छोटे-मोटे कामों के लिए। हम इन्हें रहने को छत देते हैं, अपना बचा हुआ खाना देते हैं और हमारे पुराने कपड़े भी इन्हें ही जाते हैं। हमारी इसी मेहरबानी की वजह से आज ये लोग कम से कम भूखे तो नहीं मर रहे। लेकिन ये लोग कभी एहसान नहीं मानते।”
शाम के सात बज रहे थे और स्मिता के आलीशान बंगले की चमक-दमक देखते ही बनती थी। आज स्मिता और राकेश की शादी की पंद्रहवीं सालगिरह थी। लॉन को विदेशी फूलों और झिलमिलाती रोशनियों से सजाया गया था। शहर के तमाम रसूखदार लोग इस जश्न का हिस्सा थे।
मैं, काव्या, अपनी मध्यमवर्गीय पृष्ठभूमि और कुछ हद तक अलग विचारों के बावजूद, स्मिता की पुरानी सहेली होने के नाते इस महफ़िल में मौजूद थी। ऊंचे घरानों की पार्टियों में अक्सर एक अजीब सी घुटन होती है, जहाँ हर कोई अपने कपड़ों, गहनों और विदेश यात्राओं का बखान करने में व्यस्त रहता है। मैं भी एक कोने में खड़ी इस बनावटी दुनिया को देख रही थी कि तभी मेरी नज़र उस पर पड़ी।
ग्यारह या बारह साल का एक दुबला-पतला सा लड़का, जिसका नाम मैंने बाद में सूरज सुना। उसके शरीर पर एक सफेद शर्ट थी जो उसके नाप से काफी बड़ी थी, शायद किसी और की उतरी हुई। वह एक भारी ट्रे में कोल्ड ड्रिंक्स और स्नैक्स लिए मेहमानों के बीच ऐसे भाग रहा था जैसे कोई मशीन हो। उसकी आँखों में नींद और थकान साफ़ तैर रही थी।
स्मिता के घर का यह नियम था कि जब भी कोई पार्टी हो, घर के नौकरों के साथ-साथ उनके बच्चों को भी काम पर लगा दिया जाता था। सुबह से लेकर आधी रात तक, बिना रुके, बिना थके। सूरज की मासूमियत और उसके कंधों पर लदा यह बोझ मुझे अंदर तक कचोट रहा था।
पार्टी शबाब पर थी। सभी मेहमान तरह-तरह के व्यंजनों का स्वाद ले रहे थे। मैं पानी पीने के बहाने किचन की तरफ गई। वहां मैंने देखा कि सूरज एक कोने में खड़ा होकर जूठे बर्तनों के ढेर के पास रखे एक प्लेट को हसरत भरी नज़रों से देख रहा था, जिसमें कुछ बचे हुए कबाब रखे थे।
उसकी उंगलियां कांप रही थीं और चेहरा पीला पड़ चुका था। मुझसे रहा नहीं गया। मैंने एक साफ प्लेट ली, उसमें कुछ ताज़े स्नैक्स और एक मिठाई रखी और धीरे से सूरज की तरफ बढ़ा दी। “ये लो बेटा, थोड़ा खा लो, सुबह से दौड़ रहे हो,” मैंने बड़ी नरमी से कहा।
सूरज ने सहमी हुई नज़रों से मेरी तरफ देखा। उसके हाथ प्लेट की तरफ बढ़े ही थे कि तभी पीछे से स्मिता की कर्कश आवाज़ गूंजी, “काव्या! ये क्या कर रही हो तुम?”
मैं झेंप गई। स्मिता ने झपट्टा मारकर वो प्लेट मेरे हाथ से छीन ली और सूरज पर चिल्लाने लगी, “कामचोर कहीं का! यहाँ खाने के लिए खड़ा है? जा बाहर, मेहमानों के गिलास खाली हो गए हैं। तुम्हारी नीयत कभी नहीं भरेगी, चाहे जितना खिला लो।” सूरज डर के मारे कांपता हुआ तुरंत वहां से भाग गया। मुझे बहुत तेज़ गुस्सा आया, लेकिन मैं किसी के घर में तमाशा नहीं करना चाहती थी।
स्मिता मुझे पकड़कर वापस मुख्य हॉल में ले आई और अपने कुछ खास दोस्तों के बीच बैठ गई। फिर उसने सूरज की कहानी को एक महान गाथा की तरह सुनाना शुरू किया। “तुम लोग नहीं जानतीं काव्या, इन गरीबों का कोई ईमान नहीं होता,” स्मिता ने अपना रेशमी पल्लू सँभालते हुए कहा। “ये जो लड़का है ना सूरज, इसका बाप एक नंबर का जुआरी और शराबी था। सिर पर लाखों का कर्ज़ा छोड़कर लिवर खराब होने से मर गया। इसकी माँ, कमला, मेरे पैरों में गिरकर रोने लगी। मेरे पति राकेश जी का दिल बहुत बड़ा है। उन्होंने कमला को हमारे फार्महाउस की सफाई पर रख लिया और इस लड़के को यहाँ घर के छोटे-मोटे कामों के लिए। हम इन्हें रहने को छत देते हैं, अपना बचा हुआ खाना देते हैं और हमारे पुराने कपड़े भी इन्हें ही जाते हैं। हमारी इसी मेहरबानी की वजह से आज ये लोग कम से कम भूखे तो नहीं मर रहे। लेकिन ये लोग कभी एहसान नहीं मानते।”
वहां बैठी हर महिला स्मिता की ‘दरियादिली’ और ‘महानता’ की कसमें खाने लगी। “अरे स्मिता, तुम तो साक्षात अन्नपूर्णा हो इनके लिए,” एक महिला ने कहा। दूसरी ने सहमति जताते हुए कहा, “बिल्कुल सही कहा, ये गरीब लोग बहुत चालाक होते हैं, बस रोना रोकर हम जैसे शरीफ लोगों को बेवकूफ बनाते हैं।”
मेरा मन वितृष्णा से भर गया। एक ग्यारह साल के बच्चे से चौदह घंटे काम करवाना, उसकी भूख को अनदेखा करना और फिर इसे समाज सेवा का नाम देना? ये कैसा न्याय था? मेरा मन किया कि मैं वहीं खड़ी होकर बाल श्रम कानून की धज्जियां उड़ाने के लिए स्मिता को खरी-खोटी सुनाऊं। मेरे आदर्शवादी मन ने मुझे उकसाया कि पुलिस या किसी एनजीओ को फोन कर दूं।
लेकिन फिर एक भयानक सच ने मेरे कदमों को जकड़ लिया। अगर मैंने आज आवाज़ उठाई, तो शायद स्मिता अपनी झूठी शान में इस परिवार को तुरंत नौकरी से निकाल देगी। कमला और उसके तीन और छोटे बच्चे सड़क पर आ जाएंगे। क्या पुलिस उन्हें दो वक्त की रोटी दे पाएगी? क्या कोई एनजीओ उस बड़े कर्ज़ को चुकाएगा जो सूरज के पिता ने लिया था? नया काम खोजना सूरज और उसकी माँ के लिए नामुमकिन होगा, और शायद वो इससे भी किसी बदतर दलदल में फंस जाएं।
मेरी सारी पढ़ाई, मेरा सारा आदर्शवाद उस वक़्त एक गरीब की मजबूरी के आगे घुटने टेक चुका था। मैं चाह कर भी उस शराबी बाप, इस क्रूर समाज और स्मिता जैसी खोखली महिलाओं की मानसिकता से अकेले नहीं लड़ सकती थी।
पार्टी खत्म होने के बाद जब मैं लौट रही थी, तो मैंने देखा सूरज गेट के पास खड़ा मेहमानों को विदा कर रहा था। मैंने चुपके से अपनी गाड़ी की डिग्गी खोली, उसमें रखा एक बिस्कुट का बड़ा पैकेट और कुछ पैसे निकाले और स्मिता की नज़र बचाकर सूरज के हाथों में थमा दिए। उसकी उदास आँखों में एक पल के लिए चमक आ गई। उसने मुस्कुराकर मुझे देखा, और वो मुस्कान मेरे सीने में एक मीठे दर्द की तरह उतर गई।
आज भी जब मैं स्मिता के घर जाती हूँ, तो अपने बैग में कुछ पुरानी किताबें, कपड़े या खाने का सामान छिपाकर ले जाती हूँ। सूरज को चुपके से वो सामान दे देती हूँ। बदले में वो मासूम बच्चा मेरी कार का शीशा ज्यादा चमका कर साफ कर देता है या मेरे लिए सबसे पहले पानी ले आता है। एक मूक सा रिश्ता बन गया है हम दोनों के बीच। मैं जानती हूँ कि मेरी इस छोटी सी मदद से उसका भविष्य नहीं बदल जाएगा, ना ही उसकी तकदीर में लिखी ये गुलामी खत्म होगी। लेकिन शायद, उस एक पल के लिए उसका पेट भर जाता है और मेरा अपराधबोध थोड़ा कम हो जाता है। ज़िंदगी का ये कैसा क्रूर खेल है, जहाँ कुछ लोग मखमली पर्दों के पीछे अपनी क्रूरता छिपाते हैं, और कुछ लोग बस खामोश रहकर अपनी नियति सहने को मजबूर होते हैं।
आप इस स्थिति में होते तो क्या करते? क्या काव्या का चुप रहना और केवल थोड़ी सी मदद करना सही था या उसे आवाज़ उठानी चाहिए थी? अपने विचार कमेंट में ज़रूर बताएं।
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लेखिका : सरोजनी शुक्ला