शालिनी का मन आज सुबह से ही एक अजीब सी बेचैनी और उदासी के भंवर में गोते खा रहा था। घर का हर कोना उसे काटने को दौड़ रहा था। आज उसकी इकलौती बेटी काव्या की शादी को ठीक एक महीना पूरा हो गया था। यह एक महीना शालिनी के लिए किसी युग के बीतने जैसा था।
घर में वैसे तो सब कुछ पहले जैसा ही था, पति सतीश अपने ऑफिस के कामों में व्यस्त रहते थे, नौकरानी अपने समय पर आकर सफाई कर जाती थी, लेकिन इस घर की जो असली रौनक थी, जो चहचहाहट थी, वह अब एक महीने से गायब थी। काव्या की विदाई के बाद से इस घर की दीवारें जैसे खामोश हो गई थीं।
सुबह उठते ही शालिनी की नज़र सबसे पहले काव्या के कमरे की तरफ गई। कमरे का दरवाज़ा आधा खुला था। बिस्तर बिल्कुल करीने से लगा हुआ था, जो काव्या के रहते कभी नहीं होता था। शालिनी के कदम अपने आप उस कमरे की तरफ बढ़ गए। ड्रेसिंग टेबल पर अभी भी काव्या की कुछ पुरानी चूड़ियां और एक खाली परफ्यूम की बोतल रखी थी।
शालिनी ने कांपते हाथों से उस बोतल को छुआ और उसकी आँखों से आंसुओं की दो बूंदें छलक कर टेबल पर गिर पड़ीं। काव्या की कितनी याद आ रही थी उसे। जब भी घर में काव्या की पसंद की कोई सब्ज़ी बनती, या टीवी पर उसका कोई पसंदीदा गाना आता, शालिनी का दिल भर आता।
पच्चीस सालों तक शालिनी की पूरी दुनिया काव्या के ही इर्द-गिर्द घूमती रही थी। काव्या के बचपन की छोटी-छोटी बीमारियों में रात-रात भर जागना, उसके स्कूल के प्रोजेक्ट्स में उसकी मदद करना, उसकी पसंद के कपड़े ढूँढने के लिए पूरे बाज़ार की खाक छानना,
और फिर जब वह कॉलेज जाने लगी तो उसके एक फोन कॉल के इंतज़ार में दरवाज़े पर नज़रें गड़ाए रखना। शालिनी ने अपनी खुद की कोई ज़िंदगी ही नहीं रखी थी। उसकी हर ख़ुशी, हर गम काव्या से ही जुड़ा था। और फिर एक दिन, अचानक से वह बड़ी हो गई और उसे एक पराए घर सौंपना पड़ा।
शालिनी जानती थी कि यही दुनिया का दस्तूर है। बेटियां तो पराया धन होती हैं। लेकिन दिल को यह बात कौन समझाए? शादी के बाद से ही शालिनी के मन में हज़ारों तरह के डर बैठे हुए थे।
काव्या बहुत चुलबुली और आज़ाद ख्यालों वाली लड़की थी। शालिनी को हमेशा यही चिंता सताती रहती थी कि क्या काव्या अपनी ससुराल के नियम-कायदों में ढल पाएगी? क्या उसकी सास, निर्मला जी, जो देखने में बहुत सख्त मिज़ाज की लगती थीं, काव्या की छोटी-मोटी गलतियों को माफ़ कर पाएंगी? क्या रोहन, उसका पति, उसके नखरे उठा पाएगा जैसे सतीश और शालिनी उठाते थे?
यही सब सोचते-सोचते दोपहर के बारह बज गए। शालिनी ने रसोई में जाकर गैस पर चाय का पानी चढ़ाया। तभी उसका ध्यान घड़ी पर गया। उसने सोचा, इस वक़्त तो रोहन ऑफिस चला गया होगा। निर्मला जी भी दोपहर के समय अपने कमरे में आराम करती हैं। काव्या इस समय बिल्कुल फ्री होगी। क्यों न उसे एक फोन कर लूँ? एक महीने से उससे तसल्ली से बात भी नहीं हो पाई है। कभी ससुराल में कोई मेहमान आ जाता, तो कभी वह किसी रस्म में व्यस्त रहती। आज फुर्सत का समय है, उसकी आवाज़ सुन लूंगी तो दिल को थोड़ा चैन आ जाएगा।
शालिनी ने चाय का कप मेज़ पर रखा और अपने फोन से काव्या का नंबर मिलाया। दो-तीन घंटी बजने के बाद ही उधर से एक बहुत ही चहकती हुई आवाज़ आई।
“हैलो मम्मा! कैसी हैं आप?” काव्या की आवाज़ में एक अजीब सी खनक और ख़ुशी थी, जिसे सुनकर शालिनी के चेहरे पर भी एक हल्की सी मुस्कान तैर गई।
“मैं बिल्कुल ठीक हूँ मेरी बच्ची। तू बता, तू कैसी है? आज बहुत दिनों बाद तुझे फुर्सत मिली है शायद, आवाज़ से तो बहुत खुश लग रही है।” शालिनी ने अपने सीने में उठ रहे प्यार के सैलाब को काबू में करते हुए कहा।
“हाँ मम्मा, आज रोहन जल्दी ऑफिस चले गए और मैंने भी सारा काम खत्म कर लिया है। आप बताइए, पापा कैसे हैं? आपकी घुटनों के दर्द की दवाई खत्म तो नहीं हो गई?” काव्या ने अपनी माँ की फिक्र करते हुए पूछा।
“हम सब ठीक हैं बेटा। सतीश जी भी ऑफिस गए हैं। बस तेरी बहुत याद आ रही थी। आज सुबह मैंने राजमा बनाए थे, तुझे बहुत पसंद हैं न। जब खाने बैठी तो निवाला गले से नीचे ही नहीं उतर रहा था। ऐसा लग रहा था जैसे अभी तू पीछे से आकर मेरे गले में बाहें डाल देगी और कहेगी कि मम्मा मुझे भी खाना दो।” शालिनी का गला भर आया था।
उधर से काव्या कुछ पल के लिए शांत रही, शायद वह भी भावुक हो गई थी। फिर उसने खुद को संभालते हुए कहा, “ओह मम्मा, आप भी न… मुझे भी आपकी बहुत याद आती है। लेकिन आप प्लीज़ मेरे लिए ऐसे परेशान मत हुआ कीजिए।”
शालिनी से अब रहा नहीं गया। उसने अपने दिल में दबे उन तमाम सवालों को काव्या के सामने रख दिया जो पिछले एक महीने से उसे अंदर ही अंदर खा रहे थे। “बेटा, तेरा वहाँ दिल तो लग गया है न? सब ठीक तो है न? रोहन तेरा ख्याल तो रखता है न? और… और तेरी सासू माँ… निर्मला जी, वो कैसी हैं तेरे साथ? ज़्यादा काम तो नहीं करवातीं? तुझे सुबह जल्दी उठने की आदत नहीं है, वो कुछ कहती तो नहीं हैं? मुझे तो बस दिन-रात तेरी ही फिक्र लगी रहती है। तूने कभी कोई काम किया नहीं यहाँ, मुझे डर लगता है कि कहीं तुझसे कोई गलती न हो जाए और वो तुझे डांट दें।”
शालिनी एक ही सांस में अपनी सारी चिंताएं अपनी बेटी के सामने उंडेल चुकी थी। उसे उम्मीद थी कि काव्या शायद कहेगी कि हाँ मम्मा, मुझे यहाँ एडजस्ट करने में थोड़ी दिक्कत हो रही है, या मुझे आपकी बहुत ज़रूरत महसूस होती है।
लेकिन फोन के दूसरी तरफ से काव्या की एक बहुत ही खिलखिलाती हुई हंसी गूंजी।
“अरे मम्मा! आप भी किन ख्यालों में खोई रहती हैं। आप मेरी बिल्कुल भी फिक्र मत किया कीजिए। मैं यहाँ बहुत, बहुत खुश हूँ।” काव्या की आवाज़ में जो उत्साह था, वह किसी भी तरह का दिखावा नहीं था, वह बिल्कुल असली था।
“और आप सासू माँ की बात कर रही हैं न?” काव्या ने आगे बोलना शुरू किया, “मम्मा, आपको पता है, वो मुझे सुबह उठने ही नहीं देतीं। कहती हैं कि अभी तो तुम्हारी नई-नई शादी हुई है, आराम से सोकर उठो। कल रात मुझे हल्का सा सिरदर्द हो रहा था, तो उन्होंने मुझे रसोई में घुसने तक नहीं दिया। खुद अपने हाथों से मुझे हल्दी वाला दूध बनाकर पिलाया और मेरे सिर की मालिश भी की। आप यकीन नहीं करेंगी मम्मा, वो मुझे आपसे भी ज़्यादा प्यार करती हैं! यहाँ सब मुझे इतना लाड करते हैं कि मुझे लगता ही नहीं कि मैं किसी दूसरे घर में आ गई हूँ। ऐसा लगता है जैसे मुझे एक और माँ मिल गई है।”
काव्या अपनी ख़ुशी में मगन होकर अपनी सासू माँ की तारीफों के पुल बांध रही थी। लेकिन इधर शालिनी के हाथ में पकड़ा हुआ फोन जैसे सुन्न पड़ गया। काव्या के वो आख़िरी शब्द – “वो मुझे आपसे भी ज़्यादा प्यार करती हैं” – शालिनी के कानों में किसी गूंज की तरह टकरा रहे थे।
शालिनी के होंठ कांपने लगे। वह आगे कुछ बोल ही नहीं पाई। काव्या फोन पर अभी भी कुछ कह रही थी, रोहन के बारे में, किसी नई साड़ी के बारे में, लेकिन शालिनी को अब कुछ सुनाई नहीं दे रहा था। उसकी आँखों से आंसुओं की एक मोटी धार फूट पड़ी थी।
“मम्मा? मम्मा आप सुन रही हैं न?” काव्या ने उधर से पूछा।
शालिनी ने अपने आंसू पोंछते हुए अपने गले की रुंधन को किसी तरह छुपाया और बस इतना ही कह पाई, “हाँ बेटा… मैं सुन रही हूँ। बहुत अच्छी बात है… मैं अभी रखती हूँ बेटा, गैस पर दूध चढ़ा है, फिर बात करूंगी।”
बिना काव्या का जवाब सुने शालिनी ने फोन काट दिया। फोन को मेज़ पर रखकर वह वहीं कुर्सी पर धम्म से बैठ गई। अब उसकी आँखों से आंसुओं की जैसे गंगा-यमुना बह निकली थी। वह दोनों हाथों से अपना चेहरा छुपाकर रोने लगी।
कमरे में चारों तरफ एक खामोशी थी, और उस खामोशी में शालिनी के मन में विचारों का एक भयंकर तूफ़ान चल रहा था। उसे खुद समझ नहीं आ रहा था कि उसकी इस रुलाई का असली कारण क्या है।
क्या ये ख़ुशी के आंसू थे? हाँ, एक माँ होने के नाते उसे दुनिया की सबसे बड़ी ख़ुशी मिलनी चाहिए थी। जिस बात से वह पिछले एक महीने से डर रही थी, वो डर पूरी तरह से झूठा साबित हुआ था। उसकी बेटी अपनी ससुराल में रानी की तरह रह रही थी। उसकी सासू माँ उसे एक सगी बेटी से भी बढ़कर प्यार दे रही थी। हर माँ यही तो चाहती है! शालिनी ने भी तो भगवान के सामने दिन-रात हाथ जोड़कर यही मन्नतें मांगी थीं कि उसकी काव्या को ससुराल में कभी कोई तकलीफ न हो। फिर जब उसकी सारी दुआएं कबूल हो गई थीं, तो वह रो क्यों रही थी?
शालिनी अपने दिल की गहराइयों में झांकने की कोशिश कर रही थी। वहाँ एक अजीब सी टीस उठ रही थी। एक ऐसी टीस जिसे वह किसी को बता नहीं सकती थी, सतीश को भी नहीं। यह टीस थी उस अधिकार के छिन जाने की, जो कल तक सिर्फ और सिर्फ उसका था।
काव्या ने कहा था, “वो मुझे आपसे भी ज़्यादा प्यार करती हैं।”
ये चंद शब्द शालिनी के पच्चीस साल के मातृत्व को जैसे चुनौती दे गए थे। शालिनी ने अपनी पूरी जवानी, अपने सारे शौक, अपनी सारी इच्छाएं काव्या की एक मुस्कान पर कुर्बान कर दिए थे। काव्या के लिए शालिनी ने जो रातों की नींदें हराम की थीं, जो तपस्या की थी, वह कोई और कैसे कर सकता है? शालिनी को लग रहा था जैसे उसकी पच्चीस साल की पूंजी, उसकी पच्चीस साल की परवरिश, निर्मला जी के एक महीने के दुलार के आगे छोटी पड़ गई थी। हार गई थी।
क्या सच में एक महीने का प्यार पच्चीस साल के प्यार पर भारी पड़ सकता है? क्या एक नई माँ, जन्म देने वाली माँ से बड़ी हो सकती है?
शालिनी मन ही मन खुद से सवाल कर रही थी। एक तरफ उसे अपनी बेटी की ख़ुशी देखकर परम संतोष हो रहा था, और दूसरी तरफ एक अनजानी सी जलन, एक असुरक्षा की भावना उसे घेर रही थी। उसे लग रहा था जैसे काव्या ने उसे भुला दिया है, जैसे अब काव्या को अपनी माँ की ज़रूरत नहीं रही। जब बचपन में काव्या को चोट लगती थी तो वह सबसे पहले ‘मम्मा’ कहकर शालिनी से लिपट जाती थी। आज जब उसे सिरदर्द हुआ, तो शालिनी की जगह निर्मला जी ने ले ली थी।
धीरे-धीरे, शालिनी ने एक लंबी सांस ली और अपनी आँखें पोंछी। उसने खुद को समझाया कि यह प्रकृति का नियम है। एक पेड़ से टूटकर जब कोई बीज दूसरी ज़मीन पर गिरता है, तो उसे उस नई मिट्टी में अपनी जड़ें फैलानी ही पड़ती हैं। काव्या अगर निर्मला जी को अपनी माँ का दर्ज़ा दे रही है, तो इसमें काव्या की कोई गलती नहीं है। बल्कि यह तो शालिनी के ही दिए हुए संस्कार हैं कि उसकी बेटी ने अपने नए घर को, अपने नए रिश्तों को इतनी सहजता से अपना लिया है।
निर्मला जी ने जो प्यार काव्या को दिया है, वह शालिनी के प्यार को मिटा नहीं सकता, बल्कि वह काव्या की ज़िंदगी को और ज़्यादा खूबसूरत बना रहा है। शालिनी का प्यार नीव की उन ईंटों की तरह है जिस पर काव्या का पूरा जीवन खड़ा है, जबकि निर्मला जी का प्यार उस घर की छत की तरह है जो अब उसे नया आसरा दे रहा है। दोनों की अपनी-अपनी अहमियत है।
शालिनी के होंठों पर अब आंसुओं के बीच एक सच्ची मुस्कान थी। वह समझ गई थी कि माँ का प्यार कभी किसी से हारता नहीं है, और न ही कोई दूसरा प्यार उसे रिप्लेस कर सकता है। काव्या का वो मासूम वाक्य शालिनी के लिए कोई हार नहीं, बल्कि शालिनी की जीत का सबसे बड़ा प्रमाण था। उसकी बेटी सुरक्षित हाथों में थी।
शालिनी उठी, उसने काव्या के कमरे का दरवाज़ा बंद किया, और एक गहरे सुकून के साथ अपने घर के कामों में लग गई। आज उसे महसूस हो रहा था कि उसकी ज़िम्मेदारी अब पूरी तरह से खत्म हो गई है और अब उसे भी अपने लिए, अपने पति के लिए एक नई ज़िंदगी की शुरुआत करनी चाहिए।
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