आज आसमान में काले बादल घिरे हुए थे और हल्की-हल्की बारिश हो रही थी। जब भी मौसम ऐसा होता है, काव्या के मन के किसी गहरे कोने में दबी हुई यादें ताज़ा हो जाती हैं। खिड़की के पास खड़ी काव्या के हाथ में एक पुरानी तस्वीर थी—उसके बाबूजी की। पच्चीस साल बीत गए थे बाबूजी को इस दुनिया से गए हुए, लेकिन काव्या के लिए ऐसा लगता था जैसे कल की ही बात हो। आज उसकी आँखों में फिर वही नमी थी, जो हर उस दिन होती है जब उसे अपने मायके और अपने पिता की याद सताती है। कमरे में पसरे सन्नाटे के बीच काव्या तस्वीर से बातें करने लगी, ठीक वैसे ही जैसे वो अपने मन के भीतर पिछले कई सालों से कर रही थी।
“बाबूजी, आपको शायद अंदाज़ा भी नहीं होगा कि इन पच्चीस सालों में एक भी दिन, एक भी पल ऐसा नहीं गुज़रा जब मैंने आपको याद न किया हो। घर में कोई भी उत्सव हो, कोई खुशी का मौका हो, या फिर मेरे जीवन की कोई गहरी तकलीफ—हर बार मेरी आँखें आपको ही ढूंढती हैं। मेरी हर मुस्कुराहट के पीछे और मेरे हर आंसू की बूंद में सिर्फ और सिर्फ आपकी याद छुपी होती है। लोग कहते हैं कि समय के साथ घाव भर जाते हैं, लेकिन बाबूजी, पिता के जाने का घाव समय के साथ और गहरा होता जाता है।”
काव्या की आवाज़ में एक अजीब सी कसक थी। उसने तस्वीर को अपने सीने से लगा लिया और अपनी पुरानी यादों के भंवर में गोते लगाने लगी।
“मुझे आज भी याद है वो दिन जब आप हमें छोड़कर गए थे। उस वक्त मैं पूरी तरह टूट चुकी थी। मेरे ससुर जी ने तब मेरे सिर पर हाथ रखा था, मेरे आंसू पोंछे थे और बड़े ही स्नेह से कहा था, ‘रो मत बेटी, मैं हूँ ना। आज से मैं ही तेरा पिता हूँ।’ उनकी बातें उस वक्त बहुत ढांढस बंधाती थीं। लेकिन बाबूजी, सच तो यही है ना कि ससुर, ससुर ही होता है, वो कभी पिता की जगह नहीं ले सकता। पिता का घर वो होता है जहाँ बेटी बेझिझक अपने मन की बात कह सके, जहाँ उसे अपने आंसुओं का कारण न बताना पड़े। अगर ससुर सच में पिता बन जाता, तो शायद ही दुनिया की किसी भी लड़की को ससुराल के बंद कमरों में छुपकर अपने मायके की याद में रोना पड़ता। ससुराल की दहलीज पार करते ही लड़की से उम्मीद की जाती है कि वो हर रिश्ते को परफेक्शन के साथ निभाए, लेकिन मायके में एक पिता अपनी बेटी की हर गलती को नज़रअंदाज़ कर देता है। ये फर्क मैंने इन पच्चीस सालों में हर रोज़ महसूस किया है।”
खिड़की से आती सर्द हवा ने काव्या को सिहरा दिया, लेकिन उसके अंदर चल रहा जज़्बातों का तूफान रुकने का नाम नहीं ले रहा था।
“आज मैं आपसे कुछ ऐसा कहना चाहती हूँ, बाबूजी, जो शायद मैं जीते जी आपसे कभी नहीं कह पाई। आपने मेरे लिए जो फैसला किया था, मेरे लिए जो जीवनसाथी चुना था, मैंने आपके उस फैसले को भगवान का आदेश मानकर स्वीकार कर लिया। विकास के रूप में आपने जो इंसान मेरे जीवन में भेजा, मैंने उसकी हर अच्छाई और हर बुराई के साथ उसे अपना लिया। इस परिवार ने मुझ पर जो भी बंदिशें लगाईं, जो भी ज्यादतियां कीं, मैंने बिना एक शब्द कहे, बिना कोई शिकायत किए सब कुछ चुपचाप बर्दाश्त किया। कभी भी पलटकर जवाब नहीं दिया, कभी भी अपने हक के लिए आवाज़ नहीं उठाई।”
काव्या की आँखों से आंसुओं की एक और धार बह निकली।
“जानते हैं क्यों बाबूजी? क्योंकि ये रिश्ता आपने मेरे लिए चुना था। आपका मान, आपकी इज़्ज़त मेरे लिए मेरी अपनी खुशियों से कहीं ज़्यादा बढ़कर थी। मेरी चुप्पी का कारण मेरी कमज़ोरी नहीं, बल्कि आपके द्वारा दी गई वो शिक्षा थी जिसमें कहा गया था कि ‘बेटी, ससुराल ही अब तुम्हारा असली घर है।’ लेकिन आज, इतने सालों बाद, मैं आपके सामने अपनी उस सच्चाई को स्वीकार करना चाहती हूँ जिसे मैंने अपने दिल की सबसे गहरी खाई में दफना दिया था। सच तो ये था बाबूजी, कि मैं अपने मन के मंदिर में किसी और को बसा चुकी थी। मेरे कॉलेज के दिनों का वो मासूम सा प्यार, जिसके साथ मैंने एक खूबसूरत भविष्य के सपने बुने थे। लेकिन जिस दिन आपने विकास का रिश्ता तय किया और कहा कि ‘यह लड़का मेरे परिवार की प्रतिष्ठा के लिए बिल्कुल सही है’, उस दिन मेरे होंठ सिल गए थे। आपके उस फैसले के आगे मैं एक शब्द भी नहीं बोल पाई।”
तस्वीर पर गिरे आंसुओं को पोंछते हुए काव्या के चेहरे पर एक दर्द भरी मुस्कान आ गई।
“मैंने अपने प्यार, अपनी इच्छाओं की बलि सिर्फ इसलिए चढ़ा दी ताकि आपका सिर समाज में कभी नीचे न झुके। मैंने आज तक इस राज़ को किसी के सामने उजागर नहीं किया। विकास ने भी कभी मेरे भीतर की उस खामोशी को पढ़ने की कोशिश नहीं की। उसके लिए मैं सिर्फ एक अच्छी पत्नी, एक अच्छी बहू बनकर रह गई। एक ऐसी मशीन, जिसका काम सिर्फ परिवार की ज़रूरतें पूरी करना था। भावनाओं का जैसे हमारे रिश्ते में कोई मोल ही नहीं था। कई बार विकास का रूखापन, सास के ताने और इस घर की दमघोंटू परंपराएं मुझे अंदर से चीर देती थीं। मुझे हमेशा से लगता था कि आपने मेरे लिए सही फैसला नहीं लिया। आपने सिर्फ परिवार, रुतबा और समाज देखा, लेकिन ये नहीं देखा कि उस घर में आपकी बेटी को प्यार और सम्मान मिलेगा या नहीं।”
बाहर बारिश अब तेज़ हो चुकी थी। काव्या की आवाज़ भी अब आंसुओं के पार एक अजीब सी मज़बूती ले रही थी।
“फिर भी बाबूजी, मैंने आपके हर फैसले के आगे नतमस्तक होकर हर रिश्ते को पूरी मर्यादा और ईमानदारी से निभाया। मैंने अपने बच्चों को अच्छे संस्कार दिए, इस घर को अपना माना और कभी किसी को शिकायत का मौका नहीं दिया। आपके जाने के बाद तो वैसे भी मेरे पास शिकायत करने के लिए कोई बचा ही नहीं था। किससे कहती मैं अपने मन की बात? कौन सुनता मेरी खामोश चीखें? लेकिन आज, जब ज़िंदगी के इस पड़ाव पर खड़ी हूँ, जहाँ मेरे बाल सफेद हो रहे हैं और चेहरे पर झुर्रियां दस्तक दे रही हैं, तो मुझे एहसास होता है कि सहते-सहते मुझमें एक अजीब सी हिम्मत आ गई है। दुःख और तकलीफों ने मुझे अंदर से लोहे जैसा मज़बूत बना दिया है।”
काव्या ने एक गहरी सांस ली और आसमान की तरफ देखा, जैसे वो सीधे अपने पिता की आँखों में देख रही हो।
“अगर आज आप यहाँ होते, बाबूजी, तो शायद मैं वो कमज़ोर और डरी हुई काव्या नहीं होती। आज मुझमें इतनी हिम्मत और जज़्बा आ गया है कि मैं आपकी आँखों में आँखें डालकर अपनी तकलीफ और अपनी परेशानी खुलकर कह पाती। मैं आपसे कह पाती कि ‘बाबूजी, आपका फैसला गलत था। बेटियां सिर्फ सम्मान और संस्कार की मूरत नहीं होतीं, उनके अंदर भी एक धड़कता हुआ दिल होता है।’ मैं आपसे ये नहीं कहती कि मैं आपसे नफरत करती हूँ, क्योंकि मैं आज भी आपसे उतना ही प्यार करती हूँ। लेकिन मैं आपको ये ज़रूर बताती कि आपके एक फैसले ने मेरी पूरी ज़िंदगी को एक खामोश समझौते में बदल दिया।”
काव्या ने वो तस्वीर वापस टेबल पर रख दी। अब उसके मन में कोई बोझ नहीं था। पच्चीस सालों का वो गुबार जो आंसुओं और शब्दों के रूप में आज बाहर निकल आया था, उसने उसे एक अजीब सी शांति दी थी। वो जानती थी कि बीता हुआ कल वापस नहीं आ सकता, लेकिन अपने अतीत को स्वीकार कर लेने से भविष्य का रास्ता थोड़ा आसान ज़रूर हो जाता है।
क्या आपको भी लगता है कि माता-पिता को अपने बच्चों के जीवनसाथी का चुनाव करते समय सिर्फ समाज और रुतबे की जगह उनकी भावनाओं और पसंद को भी अहमियत देनी चाहिए? अपने विचार हमें ज़रूर बताएं।
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मूल लेखिका : रीता मक्कड़