उम्मीदों के नए रंग

सुबह की पहली किरण के साथ ही घर में बर्तनों की खटपट शुरू हो गई थी। चौंतीस वर्षीय सुमन अपनी दाईं ओर हल्का सा झुककर चलती हुई रसोई की तरफ बढ़ रही थी। बचपन में पोलियो का शिकार होने के कारण उसके पैर में जो लचक आ गई थी, वह उम्र के साथ और भी स्पष्ट हो गई थी। जैसे ही उसने रसोई की चौखट पर कदम रखा, तभी पीछे से उसकी बड़ी भाभी नीता की तीखी आवाज़ आई, “अरे, थोड़ा जल्दी-जल्दी हाथ-पैर चलाया करो सुमन! तुम्हारे इस लंगड़ा कर चलने के चक्कर में आज फिर नाश्ता लेट हो जाएगा। मेहमानों के सामने भी ऐसे ही कछुए की चाल चलोगी क्या?”

पीछे खड़ी छोटी भाभी सीमा ने भी अपनी हंसी दबाते हुए कहा, “जीजी, आप भी ना… अब जो बचपन से ही ऐसे चलती है, वो आज अचानक हिरनी की तरह थोड़ी दौड़ने लगेगी। वैसे भी, आज तो सजने-संवरने का दिन है!” दोनों भाभियों का समवेत ठहाका उस छोटे से घर के आंगन में गूंज उठा। सुमन ने एक गहरी सांस ली और बिना कुछ कहे गैस जलाकर चाय का पानी चढ़ा दिया।

सुमन की जिंदगी हमेशा से ऐसी नहीं थी। जब वह अठारह साल की थी, तब एक भयानक सड़क हादसे में उसने अपने माता-पिता दोनों को खो दिया था। उसके दो बड़े भाई थे—अविनाश और प्रकाश। माता-पिता के गुजरने के बाद दोनों भाइयों ने सुमन को बहुत लाड़-प्यार से रखा। उन्होंने कभी उसे यह महसूस नहीं होने दिया कि वह अनाथ है या उसके पैर में कोई कमी है। लेकिन जैसे ही भाइयों की शादियां हुईं और घर में नीता और सीमा का प्रवेश हुआ, सुमन की दुनिया पूरी तरह से बदल गई। भाइयों का प्यार अपनी-अपनी पत्नियों और उनके परिवारों तक सिमट कर रह गया। सुमन, जो कभी उस घर की लाडली हुआ करती थी, अब उसी घर में एक मुफ्त की नौकरानी बनकर रह गई थी।

सुमन रंग-रूप में साधारण थी और पैर की कमी के कारण उसके विवाह के लिए कभी कोई गंभीर प्रयास नहीं किया गया। एक-दो बार जब बात उठी भी, तो लड़के वालों ने उसकी चाल देखकर ही मना कर दिया। भाइयों ने भी यह सोचकर पल्ला झाड़ लिया कि अब इसकी शादी में भारी दहेज कौन देगा! घर की आर्थिक स्थिति भी ऐसी नहीं थी कि वे कोई बड़ा खर्च उठा सकें। हालांकि, सुमन ने हार नहीं मानी थी। वह अपने घर के पास ही एक सिलाई केंद्र चलाती थी। अपने हुनर से वह हर महीने इतने पैसे कमा लेती थी कि उसे अपने छोटे-मोटे खर्चों के लिए किसी के आगे हाथ न फैलाना पड़े। इसके बावजूद, घर के सारे काम, रसोई से लेकर कपड़े धोने तक, सुमन की ही जिम्मेदारी थे। भाभियों के लिए वह बस एक बोझ थी, जिस पर वे जब चाहें अपना गुस्सा और ताने निकाल सकती थीं।

लेकिन आज का दिन घर में कुछ अलग ही हलचल लेकर आया था। कुछ दिन पहले ही आलोक जी का रिश्ता सुमन के लिए आया था। बयालीस वर्षीय आलोक एक प्रतिष्ठित सरकारी स्कूल में प्रिंसिपल थे। उनकी पत्नी का चार साल पहले कैंसर से निधन हो गया था और उनकी एक आठ साल की बेटी थी—अदिति। आलोक जी अक्सर उस रास्ते से गुजरते थे जहां सुमन का सिलाई केंद्र था। उन्होंने कई बार सुमन को मोहल्ले के गरीब बच्चों को मुफ्त में सिलाई सिखाते और उन्हें प्यार से समझाते देखा था। सुमन की सादगी, उसकी शांत आँखों की गहराई और उसके होठों पर हमेशा तैरने वाली एक सौम्य मुस्कान ने आलोक का दिल जीत लिया था। उन्होंने अपने एक परिचित के माध्यम से सुमन के भाइयों तक यह प्रस्ताव पहुंचाया था। आलोक को एक ऐसी जीवनसंगिनी की तलाश थी जो न केवल उनके सूने घर को संवारे, बल्कि उनकी छोटी सी बेटी को एक माँ का निश्छल प्यार दे सके।

सुमन जानती थी कि आलोक जैसे प्रतिष्ठित व्यक्ति ने अगर उसे चुना है, तो इसके पीछे उनका अकेलापन और उनकी बेटी के लिए एक माँ की जरूरत है। उसे यह भी पता था कि शायद यह रिश्ता भी एक समझौता ही है, लेकिन कम से कम इस समझौते में उसे सम्मान मिलने की एक उम्मीद तो थी।

शाम के चार बज चुके थे। बैठक में आलोक जी अपने कुछ रिश्तेदारों के साथ आ चुके थे। सुमन ने एक साधारण सी सूती साड़ी पहनी थी। उसने अपने बालों को सलीके से बांधा हुआ था और चेहरे पर कोई बनावटी श्रृंगार नहीं था।

“सुमन… अरे चाय लाओ जल्दी! मेहमान कबसे बैठे हैं,” सीमा भाभी की तेज आवाज़ ने सुमन को ख्यालों से बाहर निकाला। सुमन ने ट्रे उठाई और धीरे-धीरे लचकती चाल से बैठक की ओर बढ़ी। उसके हाथ हल्के से कांप रहे थे। जैसे ही वह बैठक में पहुंची, सभी की निगाहें उस पर टिक गईं।

सुमन ने चाय की ट्रे मेज पर रखी। तभी नीता भाभी, जो वहां बैठी अपना प्रभाव जमाने की कोशिश कर रही थीं, व्यंग्यात्मक लहजे में बोलीं, “संभाल कर सुमन! कहीं तुम्हारे पैर के चक्कर में मेहमानों पर चाय न गिर जाए। बेचारी को बचपन से ही दिक्कत है, हम तो घर के काम भी इससे नहीं करवाते, लेकिन क्या करें, इसे खुद ही चैन नहीं मिलता।”

यह सुनकर सुमन का सिर शर्म और अपमान से झुक गया। वह चुपचाप वहां से लौटने लगी, तभी एक भारी लेकिन बेहद शांत और गरिमामयी आवाज़ गूंजी, “सुमन जी, आप वहां क्यों खड़ी हैं? कृपया यहां बैठिए।”

सुमन ने नजरें उठाईं तो देखा कि सामने सोफे पर बैठे आलोक जी उसे एक कुर्सी की ओर इशारा कर रहे थे। सुमन हिचकिचाई, लेकिन आलोक जी की आँखों में एक ऐसा सम्मान था जिसे वह टाल नहीं सकी। वह धीरे से कुर्सी पर बैठ गई।

तभी कमरे में आठ साल की अदिति दौड़ती हुई आई और उसने आलोक जी का हाथ पकड़ लिया, “पापा, मुझे प्यास लगी है।”

नीता भाभी तुरंत बनावटी प्यार दिखाते हुए बोलीं, “अरे बेटा, आओ मैं तुम्हें पानी देती हूँ। तुम्हारी होने वाली माँ को तो चलने-फिरने में ही इतनी तकलीफ होती है, वो तुम्हारा क्या ध्यान रखेगी!”

कमरे में अचानक एक असहज सन्नाटा छा गया। सुमन ने अपनी आँखें बंद कर लीं, जैसे वह इन तीखे शब्दों के वार को सहने की कोशिश कर रही हो।

लेकिन तभी आलोक जी ने बहुत ही शांति से, बिना अपना आपा खोए, नीता की ओर देखते हुए कहा, “भाभी जी, अगर इंसान के पैर लड़खड़ाते हैं तो वह छड़ी के सहारे चल सकता है, लेकिन अगर इंसान की सोच लड़खड़ा जाए, तो उसका कोई इलाज नहीं होता। मैंने सुमन जी को इसलिए नहीं चुना कि मुझे घर में कोई काम करने वाली मशीन चाहिए। मेरे पास नौकर-चाकर हैं। मैंने इन्हें इसलिए चुना है क्योंकि मैंने देखा है कि कैसे ये बिना किसी लालच के गरीब बच्चों को हुनर सिखाती हैं। मुझे अपनी बेटी के लिए एक ऐसी माँ चाहिए जिसका दिल खूबसूरत हो, और सुमन जी का दिल बहुत खूबसूरत है।”

आलोक जी के इन शब्दों ने जैसे पूरे कमरे की हवा ही बदल दी। नीता और सीमा के चेहरे फक पड़ गए। भाइयों के सिर भी शर्म से झुक गए।

आलोक जी ने सुमन की ओर देखते हुए बहुत ही कोमल स्वर में कहा, “सुमन जी, अगर आपको यह रिश्ता मंजूर है, तो मैं इसी महीने के अंत में आपसे विवाह करना चाहूंगा। और हाँ, शादी के बाद आपको रसोई में या किसी भी काम में इस तरह खुद को खपाने की जरूरत नहीं होगी। आप अपना सिलाई केंद्र बड़े स्तर पर चलाएंगी, यह मेरा आपसे वादा है।”

सुमन ने अपनी डबडबाई आँखों से आलोक जी को देखा। आज तक उसने सिर्फ अपने हिस्से के अपमान और उपहास को ही सच माना था, लेकिन आज एक अनजान व्यक्ति ने उसे उसकी असली कीमत का अहसास कराया था। उसके लड़खड़ाते कदमों को आज एक ऐसा मजबूत और सच्चा जीवनसाथी मिल गया था, जिसके साथ वह पूरी जिंदगी सिर उठाकर चल सकती थी। बरसों से जिस कश्ती को तूफानों ने घेर रखा था, आज उसे एक महफूज़ किनारा मिल गया था।

दोस्तों, क्या आपको भी लगता है कि सच्चा प्यार और सम्मान रूप-रंग या शारीरिक कमियों का मोहताज नहीं होता? क्या समाज को भी लोगों को देखने का अपना नजरिया बदलना चाहिए? अपने विचार कमेंट में जरूर बताएं।

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