मैंने आगे कहा, “नए रिश्तों की ज़मीन बहुत नाज़ुक होती है सुमित्रा। इसमें मज़ाक का भारी हल नहीं चलाया जाता, बल्कि प्यार और समझदारी का बीज बहुत नरमी से बोना पड़ता है। तुम्हारी और निशांत की जान-पहचान पुरानी हो सकती है, लेकिन श्रुति के लिए तुम अभी भी ‘सास’ हो, ‘मां’ नहीं बनी हो। मां की डांट और मज़ाक बच्चे सह लेते हैं, लेकिन सास का मज़ाक बहुओं को ताने जैसा लगता है। इन दोनों रिश्तों के बीच जो फासला है, उसे मिटने में सालों लग जाते हैं।”
सर्दियों की उस कोहरे भरी सुबह में, मैं मंदिर से दर्शन करके लौटी ही थी। हाथों में प्रसाद की थाली थी और ऊनी शॉल में लिपटने के बावजूद हवा की ठंडक हड्डियों तक पहुँच रही थी। मैंने अभी घर के मुख्य द्वार की कुंडी खोली ही थी कि अंदर से लैंडलाइन फोन के बजने की आवाज़ लगातार गूंजने लगी। इतनी सुबह-सुबह किसका फोन हो सकता है, यह सोचते हुए मैं तेज़ी से भीतर गई। फोन उठाया तो दूसरी तरफ मेरी बचपन की सहेली और मेरी मुंहबोली बहन, सुमित्रा की आवाज़ थी। उसकी आवाज़ में एक अजीब सी उदासी और भारीपन था। उसने बताया कि उसके बेटे, मयंक का प्रमोशन हो गया है और उसे कंपनी ने बेंगलुरु के हेड ऑफिस में ट्रांसफर कर दिया है। इसी महीने के आख़िरी हफ़्ते में मयंक अपनी पत्नी श्रुति को लेकर हमेशा के लिए बेंगलुरु शिफ्ट हो रहा है।
सुमित्रा की बातें सुनकर मेरे मुंह से सिर्फ़ इतनी ही तसल्ली निकली, “अरे, यह तो बहुत ख़ुशी की बात है सुमित्रा, मयंक की तरक्की हुई है, तुम्हें तो खुश होना चाहिए।” लेकिन फोन रखने के बाद, मैं ख़ुद को किसी गहरी सोच में डूबा हुआ महसूस करने लगी। मैं आंगन में धूप सेंकने के लिए बिछी चारपाई पर जाकर बैठ गई। पास ही मेरी मनपसंद मासिक पत्रिका रखी थी, मैंने उसे उठाया ज़रूर, लेकिन मेरे नेत्र अक्षरों को पढ़ने के बजाय अतीत के पन्नों को पलटने लगे। सर्दियों की यह गुनगुनी धूप मुझे आज से ठीक ढाई साल पहले के उन दिनों में ले गई, जब मयंक और श्रुति की शादी हुई थी।
सुमित्रा और मेरी दोस्ती कोई आज की नहीं, बल्कि पूरे पैंतीस साल पुरानी है। हम दोनों ने एक ही कॉलेज से पढ़ाई की, एक ही मोहल्ले में हमारी शादियां हुईं और सुख-दुख के हर मोड़ पर हम एक-दूसरे के साये की तरह साथ रहे। सुमित्रा के पति के असमय निधन के बाद, मयंक ही उसकी दुनिया का इकलौता सहारा था। सुमित्रा उम्र में मुझसे थोड़ी छोटी है, इसलिए वह मुझे सिर्फ अपनी बड़ी बहन ही नहीं मानती, बल्कि मेरे हर शब्द को पत्थर की लकीर समझती है। जब मयंक की शादी तय हुई, तो सुमित्रा ने मुझे स्पष्ट कह दिया था, “दीदी, इस शादी की पूरी ज़िम्मेदारी आपकी है। मैं अकेली कुछ नहीं कर पाऊंगी।”
मयंक की शादी बहुत धूमधाम से जयपुर में संपन्न हुई थी। श्रुति एक बहुत ही संस्कारी, पढ़ी-लिखी और सुंदर लड़की थी। शादी वाले घर में जहाँ चारों तरफ रिश्तेदारों की भीड़, संगीत का शोर और काम की आपाधापी होती है, वहाँ मैंने सुमित्रा का दायां हाथ बनकर हर छोटी-बड़ी चीज़ को संभाला था। हलवाई से लेकर मेहमानों के कमरों की व्यवस्था तक, सुमित्रा ने हर काम मेरे ही ज़िम्मे छोड़ रखा था। शादी की सारी रस्में हंसी-ख़ुशी पूरी हुईं। जब विदाई के बाद श्रुति हमारे घर आई, तो उसकी बड़ी-बड़ी आँखों में एक नए जीवन की उम्मीद के साथ-साथ एक अनजाना सा डर भी था, जो हर नई नवेली दुल्हन के मन में होता है।
कुछ दिनों बाद, जब शादी में आए तमाम दूर-दराज़ के रिश्तेदार अपने-अपने घरों को लौट गए और घर में थोड़ी शांति छाई, तो मयंक और श्रुति अपने हनीमून के लिए शिमला चले गए। उन दस दिनों में, मैं और सुमित्रा अक्सर दोपहर की चाय के साथ आंगन में बैठते और ढेरों बातें करते। सुमित्रा अपनी नई बहू की तारीफ़ करते नहीं थकती थी। हम दोनों इस बात से बेहद संतुष्ट थे कि मयंक के जीवन में एक बहुत ही सुलझी हुई लड़की आई है जो सुमित्रा के इस सूने घर को फिर से खुशियों से भर देगी।
शिमला से लौटने के बाद घर में फिर से एक नई रौनक आ गई थी। श्रुति ने धीरे-धीरे घर के कामों में हाथ बंटाना शुरू कर दिया था। सब कुछ एक खूबसूरत सपने जैसा चल रहा था। लेकिन तभी एक दिन कुछ ऐसा हुआ जिसने उस शांत झील में एक भारी पत्थर फेंक दिया और उसकी लहरों ने घर का सुकून छीन लिया।
उस दिन रविवार था। दोपहर के समय श्रुति के चचेरे भाई, निशांत का वीडियो कॉल आया। निशांत रिश्ते में सुमित्रा की एक दूर की ननद का देवर भी लगता था। चूँकि निशांत ने ही इस रिश्ते में बिचौलिए की भूमिका निभाई थी और वह सुमित्रा के दूर के रिश्ते में आता था, इसलिए सुमित्रा और निशांत के बीच हंसी-ठिठोली और मज़ाक का एक सहज रिश्ता बन गया था। निशांत ने सुमित्रा से हाल-चाल पूछा और फिर अपनी चिर-परिचित मज़ाकिया शैली में बोला, “और बुआ जी, कहिए क्या हाल हैं? हमारी श्रुति ने आपके घर का राज-काज संभाल लिया या नहीं? या अभी भी आप ही उसे सुबह की चाय बनाकर पिला रही हैं?”
निशांत की इस बात पर सुमित्रा भी अपने सीधे-सादे और बेबाक स्वभाव के चलते हंसी-मज़ाक के मूड में आ गई। उसने भी उसी लहज़े में हंसते हुए कह दिया, “अरे निशांत बाबू, तुमने तो कहा था कि लड़की बिल्कुल गृहलक्ष्मी है, सारे काम जानती है। यहाँ तो हाल यह है कि हमें ही उसे रसोई का रास्ता दिखाना पड़ता है। तुम लोग तो इसे लाड़-प्यार में बिगाड़ कर भेज दिए हो, अब मुझे ही इसे सुधारना पड़ेगा।”
सुमित्रा के लिए यह महज़ एक हल्का-फुल्का मज़ाक था, जो उसने एक रिश्तेदार के साथ किया था। उसका कोई गलत इरादा नहीं था। लेकिन समस्या यह थी कि जिस वक़्त सुमित्रा दालान में बैठकर यह बात कह रही थी, श्रुति ठीक उसी समय अपने कमरे से बाहर आ रही थी और उसने सुमित्रा की यह पूरी बात सुन ली।
मैंने देखा कि श्रुति के चेहरे का रंग अचानक उड़ गया। जो आँखें कुछ देर पहले ख़ुशी से चमक रही थीं, उनमें अचानक आंसुओं की नमी तैरने लगी। वह बिना एक शब्द कहे उलटे पांव अपने कमरे में लौट गई और उसने अंदर से दरवाज़ा बंद कर लिया।
शाम को जब मयंक ऑफिस से लौटा, तो कमरे का माहौल देखकर उसे कुछ गड़बड़ होने का अहसास हुआ। श्रुति की आँखें रो-रोकर लाल हो चुकी थीं। जब मयंक ने बहुत कुरेदा, तो श्रुति ने फफकते हुए उसे सारी बात बता दी। उसने कहा, “अगर मम्मी जी को मेरे काम से इतनी ही शिकायत थी, तो उन्होंने मुझसे अकेले में क्यों नहीं कहा? मेरे ही भाई के सामने मेरा और मेरे मायके वालों का इस तरह अपमान करने की क्या ज़रूरत थी? क्या मेरे माता-पिता ने मुझे यही संस्कार दिए हैं कि मैं ससुराल में राज करूं और सास से काम करवाऊं?”
रात को खाने की मेज़ पर एक अजीब सा सन्नाटा पसरा था। श्रुति ने सिरदर्द का बहाना बनाकर कमरे से बाहर आने से मना कर दिया था। खाना खाने के बाद मयंक बहुत भारी कदमों से सुमित्रा के पास आया और दबी हुई लेकिन नाराज़ आवाज़ में बोला, “मां, आपको निशांत के सामने श्रुति और उसके मायके वालों के बारे में ऐसा कहने की क्या ज़रूरत थी? श्रुति अभी इस घर में नई है, वह सब कुछ सीखने की कोशिश कर रही है। आपके उन शब्दों ने उसे बहुत गहरी ठेस पहुंचाई है।”
सुमित्रा यह सुनकर सन्न रह गई। उसे समझ ही नहीं आ रहा था कि उसकी कही गई एक इतनी छोटी सी, मज़ाक में कही बात का इतना बड़ा बतंगड़ कैसे बन गया। उसने मयंक को समझाने की कोशिश की कि वह तो बस निशांत से मज़ाक कर रही थी, लेकिन मयंक बिना कुछ सुने वहाँ से चला गया।
सुमित्रा रोती हुई मेरे पास आई। उसने मुझे पूरी घटना बताई और कहा, “दीदी, आप तो जानती हैं मेरे मन में कोई खोट नहीं था। मैंने तो ऐसे ही कह दिया था। क्या अब मैं अपने ही घर में, अपने ही लोगों से हंसी-मज़ाक भी नहीं कर सकती?”
मैंने सुमित्रा को अपने पास बिठाया, उसे पानी पिलाया और बहुत शांत स्वर में समझाया। मैंने कहा, “सुमित्रा, तुम्हारी बात अपनी जगह सही है कि तुम्हारा इरादा गलत नहीं था। लेकिन तुम्हें श्रुति के नज़रिए से भी सोचना होगा। एक नई नवेली बहू जब अपने मायके की चौखट छोड़कर आती है, तो उसका मन एक कच्चे धागे की तरह होता है। उसके अंदर हज़ारों तरह के डर होते हैं—क्या सास मुझे अपनाएगी? क्या मैं इनके तौर-तरीकों पर खरी उतरूंगी? ऐसे में, जब वह अपनी सास के मुंह से अपने मायके वालों के सामने अपनी बुराई सुनती है, चाहे वह मज़ाक ही क्यों न हो, तो उसे लगता है कि उसकी सारी मेहनत बेकार गई और उसे इस घर में कभी स्वीकार नहीं किया जाएगा।”
मैंने आगे कहा, “नए रिश्तों की ज़मीन बहुत नाज़ुक होती है सुमित्रा। इसमें मज़ाक का भारी हल नहीं चलाया जाता, बल्कि प्यार और समझदारी का बीज बहुत नरमी से बोना पड़ता है। तुम्हारी और निशांत की जान-पहचान पुरानी हो सकती है, लेकिन श्रुति के लिए तुम अभी भी ‘सास’ हो, ‘मां’ नहीं बनी हो। मां की डांट और मज़ाक बच्चे सह लेते हैं, लेकिन सास का मज़ाक बहुओं को ताने जैसा लगता है। इन दोनों रिश्तों के बीच जो फासला है, उसे मिटने में सालों लग जाते हैं।”
सुमित्रा को मेरी बात गहराई तक समझ में आ गई। उसने उसी रात श्रुति के कमरे में जाकर उससे माफ़ी मांगी और उसे गले लगाकर समझाया कि उसका इरादा उसका दिल दुखाने का बिल्कुल नहीं था। श्रुति ने भी सुमित्रा के गले लगकर अपने सारे गिले-शिकवे आंसुओं के रूप में बहा दिए। उस रात वह मनमुटाव तो सुलझ गया, लेकिन कहीं न कहीं उस एक घटना ने उन दोनों के बीच एक अदृश्य और बहुत ही महीन सी दीवार ज़रूर खड़ी कर दी थी।
श्रुति ने उसके बाद कभी सुमित्रा को शिकायत का कोई मौका नहीं दिया। वह घर का हर काम पूरी ज़िम्मेदारी से करती, सुमित्रा की हर ज़रूरत का ध्यान रखती। लेकिन उस दिन के बाद सुमित्रा ने भी श्रुति के सामने या किसी रिश्तेदार से श्रुति के बारे में कोई मज़ाक नहीं किया। दोनों के बीच एक आदर्श सास-बहू का रिश्ता स्थापित हो गया था, जिसमें सम्मान और कर्तव्य तो भरपूर था, लेकिन वह जो एक बेतकल्लुफ़ी और निश्छल हंसी-ठिठोली होनी चाहिए थी, वह शायद हमेशा के लिए कहीं पीछे छूट गई थी। एक अनकही मर्यादा ने दोनों के बीच हमेशा के लिए अपनी जगह बना ली थी।
और आज, जब मैं आंगन में बैठी यह सब सोच रही हूँ, तो मुझे एहसास हो रहा है कि वक़्त कितनी तेज़ी से रेत की तरह मुट्ठी से फिसल जाता है। आज मयंक अपनी उसी गृहस्थी को लेकर एक नए शहर जा रहा है। सुमित्रा इस बड़े से घर में अब अकेली रह जाएगी। शायद उम्र के इस पड़ाव पर सुमित्रा को श्रुति की उस आत्मीयता की सबसे ज्यादा ज़रूरत थी, जो उस एक मज़ाकिया संवाद के कारण कभी पूरी तरह पनप ही नहीं पाई।
जीवन की यही विडंबना है। हम अक्सर अपने शब्दों के वज़न को नहीं समझ पाते। हमें लगता है कि जो बात हमने हवा में उछाली है, वह हवा में ही खो जाएगी, लेकिन कई बार वह बात सामने वाले के दिल पर एक ऐसी गहरी छाप छोड़ जाती है, जिसकी टीस उम्र भर बनी रहती है। रिश्तों को संवारना किसी नाज़ुक कांच के बर्तन को संभालने जैसा है। एक छोटी सी ठेस, एक गलत शब्द, और कांच में पड़ी दरार कभी नहीं भरती।
शायद मयंक और श्रुति के बेंगलुरु जाने के बाद सुमित्रा को इस बात का और भी गहराई से एहसास होगा कि दूरियां सिर्फ शहरों के बीच नहीं होतीं, कभी-कभी वो उन अनकहे शब्दों और अनजाने में की गई ग़लतियों के कारण दिलों के बीच भी आ जाती हैं। मैं मन ही मन ईश्वर से प्रार्थना कर रही थी कि दूरी चाहे कितनी भी बढ़ जाए, लेकिन मयंक और श्रुति के दिलों में सुमित्रा के लिए जो प्रेम और आदर है, वह हमेशा बना रहे। बस यही सोचते-सोचते मेरी आँखें भर आईं और मैंने अपनी पत्रिका को बंद करके एक तरफ रख दिया।
क्या आपने भी कभी अपनी ज़िंदगी में महसूस किया है कि अनजाने में कहे गए शब्द किसी गहरे रिश्ते में दरार डाल सकते हैं? अपने अनुभव या इस कहानी से जुड़ी अपनी भावनाएं नीचे कमेंट बॉक्स में ज़रूर साझा करें।
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