सोने का हार

मीरा ने महीने भर के राशन का हिसाब डायरी में लिखकर जैसे ही मेज़ पर रखा, सामने बैठे उसके पति सुधीर ने तुरंत डायरी उठा ली। सुधीर की आदत थी कि वह घर खर्च के लिए दिए गए पैसों का एक-एक रुपये का हिसाब मांगता था। पंद्रह रुपये का हिसाब डायरी में नहीं था, और बस इसी बात पर सुधीर ने लंबी सांस खींचते हुए कहा, “मीरा, पैसे पेड़ पर नहीं उगते। जब तक हम एक-एक रुपये की कद्र नहीं करेंगे, तब तक भविष्य के लिए कुछ नहीं बचा पाएंगे।” मीरा ने सिर झुका लिया। वह जानती थी कि सुधीर गलत नहीं है, लेकिन कभी-कभी उसकी यह अत्यधिक कंजूसी मीरा के सीने में चुभ जाती थी।

शादी के दो साल बीत चुके थे, लेकिन मीरा को ऐसा लगता था जैसे उसने अपनी सारी ख्वाहिशें मायके में ही छोड़ दी हों। शादी से पहले मीरा को सजने-संवरने, फिल्में देखने और बाहर घूमने का बहुत शौक था। वह सहेलियों के साथ अक्सर गोलगप्पे खाने या नई फिल्म देखने चली जाती थी। लेकिन सुधीर के साथ जीवन बिल्कुल अलग था। अगर मीरा कभी वीकेंड पर फिल्म देखने की ज़िद करती, तो सुधीर तुरंत कह देता, “वही फिल्म कुछ महीनों बाद टीवी पर आ जाएगी। बिना बात के थिएटर वालों को चार-पांच सौ रुपये देने का क्या तुक है?”

कभी-कभार अगर वे बाज़ार जाते और मीरा गोलगप्पे या चाट खाने का मन बनाती, तो सुधीर वहां भी आना-कानी करने लगता। उसका वही पुराना रटा-रटाया जवाब होता, “बाहर का खुला खाना खाकर तबीयत खराब हो जाएगी। डॉक्टर को फीस देने से अच्छा है कि घर जाकर साफ-सुथरा खाना खा लो।” सुधीर की इन बातों से मीरा कई बार अंदर ही अंदर चिढ़ जाती थी। लेकिन वह कभी उससे लड़ती नहीं थी। मीरा एक समझदार लड़की थी। वह जानती थी कि सुधीर एक छोटी सी प्राइवेट कंपनी में क्लर्क है और उसकी तनख्वाह बहुत मामूली है। सुधीर पर अपने बूढ़े माता-पिता की दवाइयों और एक छोटे भाई की पढ़ाई का भी बोझ था। वह जानती थी कि सुधीर की यह कंजूसी उसकी फितरत नहीं, बल्कि उसकी मजबूरी है।

लेकिन मजबूरी इंसान के शौक तो नहीं मार सकती। मीरा को गहनों का बहुत शौक था। शादी के समय भी सुधीर के परिवार वालों ने बहुत ही हल्के और नाम मात्र के गहने चढ़ाए थे। मीरा सोचती थी कि जब शादी के बाद सब कुछ ठीक हो जाएगा, तो सुधीर उसे उसकी पसंद के गहने बनवा कर देगा। लेकिन इन दो सालों में सुधीर उसे एक चांदी की पायल तक लाकर नहीं दे पाया था।

जब भी वे दोनों शाम को बाज़ार का सामान लेने निकलते, तो रास्ते में एक बहुत बड़ी जूलरी की दुकान पड़ती थी। उस दुकान के बाहर शीशे के शोकेस में तरह-तरह के चमचमाते गहने सजे रहते थे। मीरा के कदम अक्सर उस दुकान के सामने आकर अपने आप ठिठक जाते। उसकी नज़रें शोकेस में रखे सोने के एक खूबसूरत हार पर जाकर टिक जातीं। वह एक गहरी सांस लेकर अपने मन में बुदबुदाती, ‘काश! मेरे पास भी ऐसा ही एक हार होता।’ सुधीर अक्सर उसकी उस हसरत भरी नज़रों को देखता, लेकिन वह मीरा का हाथ पकड़कर उसे आगे खींच लेता और कहता, “चलो मीरा, देर हो रही है, अभी सब्ज़ी भी लेनी है।” मीरा एक ठंडी आह भरकर सुधीर के पीछे-पीछे चल देती।

देखते ही देखते उनकी शादी की तीसरी सालगिरह नज़दीक आ गई। मीरा ने मन में कोई उम्मीद नहीं पाली थी। उसे पता था कि सुधीर सुबह उठकर उसे ‘हैप्पी एनिवर्सरी’ कहेगा और फिर अपना टिफिन लेकर ऑफिस चला जाएगा। इसलिए उसने भी कोई विशेष तैयारी नहीं की। बस सुधीर की पसंद की खीर और पूरी बना दी थी।

सालगिरह की शाम सुधीर घर लौटा। मीरा रसोई में काम कर रही थी। सुधीर के जूतों की आहट सुनकर वह बाहर आई। सुधीर आज बहुत थका हुआ लग रहा था। उसके कपड़े पसीने से भीगे थे और उसके जूते भी एक तरफ से घिसकर फटने लगे थे। मीरा को सुधीर की यह हालत देखकर बहुत दुख होता था कि वह आदमी अपने लिए कभी एक नया रुमाल तक नहीं खरीदता।

सुधीर ने पानी पिया और फिर अपने ऑफिस वाले बैग में हाथ डाला। उसने लाल रंग का एक छोटा सा मखमली डिब्बा निकाला और मीरा के हाथों में रख दिया।

मीरा हैरान रह गई। “यह क्या है?” उसने कांपते हाथों से पूछा।

“खोल कर देख लो,” सुधीर के चेहरे पर एक बहुत ही सुकून भरी और हल्की सी मुस्कान थी।

मीरा ने जैसे ही डिब्बा खोला, उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं और उनमें आंसुओं का सैलाब उमड़ पड़ा। डिब्बे के अंदर बिल्कुल वैसा ही सोने का हार रखा था, जिसे वह अक्सर बाज़ार की उस दुकान के शोकेस में देखकर आहें भरा करती थी। वह अवाक रह गई। उसे समझ नहीं आ रहा था कि सुधीर ने इतने पैसे कहाँ से लाए।

सुधीर ने मीरा के आंसू पोंछते हुए कहा, “मुझे पता है मीरा, मैं तुम्हें गोलगप्पे नहीं खिलाता, फिल्में नहीं दिखाता और घर के राशन के दस-दस रुपये का हिसाब मांगता हूँ। मैं एक बुरा पति लग सकता हूँ। लेकिन सच यह है कि पिछले एक साल से मैं ऑफिस से पैदल घर आ रहा हूँ ताकि बस का किराया बचा सकूं। मैंने दोपहर की चाय पीनी छोड़ दी। मुझे पता था कि तुम उस दुकान के हार को कितनी हसरत से देखती हो। मेरी आमदनी कम है, इसलिए तुम्हारी उस खुशी को खरीदने के लिए मुझे पाई-पाई जोड़नी पड़ी।”

मीरा फूट-फूट कर रोने लगी। उसने सुधीर को कसकर गले लगा लिया। आज उसे सुधीर की उस कंजूसी में दुनिया का सबसे बेशकीमती प्यार नज़र आ रहा था। उसे अहसास हुआ कि सुधीर ने अपनी खुशियां, अपनी ज़रूरतें मारकर मीरा के सपने को पूरा किया है। वह सोने का हार सिर्फ एक गहना नहीं था, बल्कि सुधीर के उस खामोश प्यार और मूक त्याग का प्रतीक था, जिसे मीरा अब तक सिर्फ एक कंजूसी समझ रही थी।

क्या आपको भी लगता है कि कभी-कभी अपनों की सख्ती या कंजूसी के पीछे उनकी कोई गहरी मजबूरी या कोई बड़ा त्याग छिपा होता है? क्या आपने भी कभी किसी के ऐसे मूक प्रेम को महसूस किया है? अपने विचार और अनुभव हमारे साथ कमेंट में ज़रूर साझा करें।

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