अपनों का साथ

संडे का दिन था,बेटों के ऑफ़िस की छुट्टी थी रमा ने सोचा था आज थोड़ा आराम से ऊठूँगी…किंतु सुबह से ही किसी कौवे की लगातार काँव-काँव की आवाज आ रही थी..जिससे उसकी नींद जल्दी ही खुल गई।आवाज बंद होने का नाम ही नहीं ले रही थी…उसने खिड़की का पर्दा हटाकर बाहर देखा,तो..सामने के पेड़ पर एक कौआ उलटा टंगा हुआ था।काँव..काँव चिल्ला रहा था और बुरी तरह फड़फड़ा रहा था।ये देखकर,एक पल को रमा का मन बहुत खराब हो गया पर अगले ही पल वो अपनी दिनचर्या में व्यस्त हो गई।दोपहर के बारह बज रहे थे,रमा सुबह के काम से अभी फ्री हुई थी,कि फिर से उस कौवे की तरफ़ उसका ध्यान चला गया..कौवे की आवाज पहले से कम हो गई थी,शायद चिल्ला चिल्लाकर अब उसमें शक्ति ही नहीं रही थी।हाँ फड़फड़ाहट उसकी पहले से भी ज्यादा हो गई थी।उसकी ये दशा देखकर उसने बेटे को बुलाया और कौवे को दिखाते हुए बोला-“तुम तुरन्त नीचे जाओ और वॉचमेन को बोलो इसको नीचे उतारने का कोई प्रबंध करे।रमा ने सोचा बेटा कहेगा…जी माँ,अभी जाता हूँ किंतु इसके विपरीत वो बोला-“माँ,आप तो छोटी छोटी बातों को लेकर परेशान हो जाती हो।ना जाने ऐसे कितने पशु पक्षी हैं,जो रोज मरते रहते है,आप किस किसको बचाएंगी? मैं नीचे नहीं जाऊँगा,मुझे शर्म आती है…सब लोग क्या कहेंगे?एक पक्षी को लेकर इतने परेशान हो रहे हैं,मज़ाक़ बनेगा सो अलग।रमा ने दूसरे बेटे को बोला,तो उसका भी वही जवाब था।उसने दोनों बेटों को समझाते हुए कहा-“इंसान हो या पशु पक्षी सबकी जान बहुत क़ीमती होती है,हाँ सबकी जान तो हम नहीं बचा सकते किन्तु जों हमारे सामने तड़प रहा है उसके लिए प्रयास तो कर ही सकते हैं ना…और हाँ,शर्म तो बुरे व गलत काम करने में आनी चाहिए,किसी की जान बचाने में नहीं क्योंकि किसी की जान बचाना शर्म का नहीं पुण्य का काम होता है।” ये कहकर रमा स्वयं नीचे जाने के लिए तैयार हो गई यही सोचकर कि…जब तक खुद ना मरो,तब तक स्वर्ग नहीं मिलता।नीचे जाकर उसने वॉचमेन को बोला-“भैया, बाहर पेड़ पर एक कौआ ना जाने कब से उलटा लटका हुआ है,बुरी तरह तड़प रहा है।आपके पास कोई लम्बी सीढ़ी या बाँस है,जिसकीं सहायता से इसको नीचे उतारा जा सके।” वॉचमेन ने पहले तो रमा को बड़ी अचरज भरी नजरों से देखा….!! जैसे उसने कुछ गलत कह दिया हो,फिर बोला-“नहीं मैडम,हमारे पास इतनी बड़ी सीढ़ी नहीं है।और वैसे भी हम तो डूटी पर हूँ।” रमा अभी बात कर ही रही थी,कि ऊपर से किसी की व्यंग भरी आवाज़ आई….अरे आंटी जी इतनी ही चिंता है उस कौवे की तो खुद ही क्यों नहीं पेड़ पर चढ़कर उसे उतार लातीं? रमा ने ऊपर की ओर देखा…तीन चार लड़के लड़कियाँ मिलकर हंस रहे थे।उसने सोचा,कह दूँ …तुम्हारे जैसे जवान होती तो शायद पेड़ पर भी चड़ जाती…!! फिर सोचा कौन मुँह लगे इनके बस निराश मन से ऊपर आ गई।

रमा इस उधेड़ बुन में बैठी थी,कि अब क्या करूँ,क्या ना करूँ? तभी उसे याद आया उसने कहीं पड़ा था,शहरों में ‘नेचर केयर क्लब’ होते हैं जो पशु पक्षियों की देखभाल करते हैं।पशु पक्षी यदि घायल हो जाते हैं तो इनको फोन करने पर इनके सदस्य आते है और घायल पशु पक्षियों को साथ ले जातें हैं व इनका इलाज करते हैं।उसे एक आशा की किरण दिखाई दी।उसने सोचा कोशिश करने में क्या जाता है?बेटों को बोला. …सुनो नेट पर नेचर केयर क्लब वालों का फोन नम्बर ढूँढो शायद मिल जाए।बच्चे फिर गुस्सा हो गए,कहने लगे-“फोन नम्बर मिल भी गया तो उठाएगा कौन?और उठा भी लेगा तो इस भरी दोपहर में आएगा कौन? हमारा संडे तो आपने खराब कर ही दिया है उनको तो छोड़ दो।सब लोग अपने अपने घरों में आराम कर रहे हैं और एक आप हो,कि सुबह से खुद भी परेशान हो रही हो और हमें भी चैन से नहीं बैठने दे रही।

“हाँ बेटा,मैं परेशान हूँ।क्योंकि मुझे लगता है कि तुम्हारे पापा को समय पर मेडिकल सुविधा नहीं मिल सकी इसलिए हम उन्हें नहीं बचा पाए किंतु इस पक्षी की समय पर मदद करके तो हम इसे बचा सकते हैं ना।”रमा की ये बात सुनकर दोनों बेटे भावुक हो गए और बिना कुछ कहे,लैप्टॉप चालू करके नम्बर ढूँढने लगे कुछ ही देर में फोन नम्बर मिल गया और उनसे सारी बात भी हो गई उन्होंने एक घंटे के भीतर आने को कहा। रमा ने चैन की साँस ली……!!!! वो बार बार उस कौवे को देख कर आती,कि हिलडुल रहा है या नहीं?

चार बजे नेचर केयर क्लब वालों का रमा के बेटे के पास फोन आया,कि वो लोग आ गए हैं आप नीचे आ जाएं।रमा को तो विश्वास ही नहीं हो रहा था,कि सचमुच ऐसे संस्थाएँ इतनी सक्रिय होती हैं,जो एक फ़ोन कॉल करने पर हाजिर हो जाती है वो भी संडे के दिन?

उसने नीचे देखा… दो तीन युवक और युवतियाँ बाइक पे आए थे।बेटों से बातचीत कर रहे थे।कुछ ही देर में उन्होंने फ़ायर ब्रिगेड को बुलाया।फ़ायर ब्रिगेड वालों ने एक बटन दबाया तो लम्बा सा लोहे का रोड ,जिसके एक सिरे पर हुकनुमा आकृति बनी हुई थी,बाहर आया और पेड़ की उस ऊँचाई तक पहुँच गया जहाँ कौआ लटका हुआ था…बस हुक की सहायता से उसे खींचकर नीचे उतार लिया और उसे नेचर क्लब वालों को सौंप दिया।उन्होंने सबसे पहले उसे पानी पिलाया फिर उसके घावों पर दवा लगाई और प्यार से ऐसे सहलाया जैसे कोई अपने बच्चे को सहलाता है। उनका पक्षियों के प्रति निश्चल प्रेम देखकर रमा की आँखे नम हो गईं।वहाँ खड़े सभी लोग ये दृश्य देखकर भावुक हो गए।

कौवे को नेचर क्लब वाले अपने साथ ले गए।बेटे भी ऊपर आ गए थे।रमा ने महसूस किया,जो बच्चे सुबह से उसे भला बुरा कह रहे थे वो अब एकदम शांत थे। उनके चेहरे पर एक सुकून था मानो वो किसी अपने की जान बचाकर आएं हैं।

उस दिन रमा को विश्वास हो गया,कि अपनों का साथ केवल हौसला ही नहीं देता, बल्कि असंभव लगने वाले कार्यों को भी संभव बना देता है।यदि उसके बच्चों ने अंत में उसका साथ न दिया होता और नेचर केयर क्लब व फ़ायर ब्रिगेड ने सहयोग न किया होता,तो शायद उस बेजुबान की जान नहीं बच पाती।सच ही है,जब नेक इरादों के साथ अपनों का हाथ जुड़ जाए,तो हर मुश्किल आसान हो जाती है।

#अपनों का साथ

कमलेश आहूजा

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