पहली रसोई

विवाह वाले घर की रौनक देखते ही बनती थी। पिछले एक हफ्ते से चल रही शहनाइयों की गूंज, ढोलक की थाप और महिलाओं के लोकगीतों ने पूरे घर को एक उत्सव में बदल दिया था। अब शादी संपन्न हो चुकी थी, लेकिन विदाई के बाद भी रिश्तेदारों और मेहमानों का जमावड़ा कम नहीं हुआ था। हवेलीनुमा उस पुश्तैनी घर के आंगन में अभी भी गद्दे बिछे थे और चाय-नाश्ते का दौर अनवरत चल रहा था। आज घर में एक खास सुगबुगाहट थी, क्योंकि आज घर की दो नई बहुओं, श्रुति और काव्या की ‘पहली रसोई’ की रस्म थी।

श्रुति और काव्या, दोनों ही शहर के आधुनिक परिवेश में पली-बढ़ी लड़कियां थीं। दोनों की शादी एक ही घर में दो सगे भाइयों से हुई थी। पढ़ाई और करियर पर ध्यान देने के कारण दोनों का ही रसोई से नाता बस मैगी बनाने या कभी-कभार चाय उबालने तक ही सीमित था। जब सुबह-सुबह घर की औरतों ने घोषणा की कि आज की दावत का मीठा दोनों नई बहुएं बनाएंगी, तो दोनों के पैरों तले जमीन खिसक गई। तय हुआ कि श्रुति ‘मालपुए’ बनाएगी और काव्या ‘रबड़ी’ तैयार करेगी। दोनों ने एक-दूसरे का चेहरा देखा, उनके चेहरों पर हवाइयां उड़ रही थीं।

जब दोनों विशाल रसोईघर में दाखिल हुईं, तो वहां रखे पीतल और स्टील के बड़े-बड़े बर्तनों को देखकर उनकी घबराहट और बढ़ गई। घर में करीब पचास से साठ लोग मौजूद थे। इतने सारे लोगों के लिए उन्होंने कभी एक कप चाय तक नहीं बनाई थी, मालपुआ और रबड़ी तो बहुत दूर की बात थी। रसोई में कदम रखते ही ननदों की टोली भी उनके पीछे-पीछे आ गई। “अरे भाभियों, आज तो कमाल ही कर देना! देखना, कहीं मालपुए पापड़ न बन जाएं और रबड़ी दूध का शरबत न बन जाए!” बड़ी ननद विशाखा ने आंख मारते हुए कहा तो बाकी सब खिलखिलाकर हंस पड़ीं। वे बार-बार आतीं, कोई न कोई ताना मारतीं या डराने वाली बात कहतीं और फिर हंसते हुए बाहर भाग जातीं।

श्रुति और काव्या का आत्मविश्वास पाताल छूने लगा था। दोनों के माथे पर चिंता की लकीरें और ठंडे पसीने की बूंदें साफ छलक रही थीं। “श्रुति, इतने सारे दूध का मैं क्या करूं? इसे कितनी देर उबालना है?” काव्या ने रुआंसी आवाज में पूछा। श्रुति खुद परेशान थी, “मुझे क्या पता काव्या! मुझे तो ये भी नहीं समझ आ रहा कि मालपुए के घोल में मैदा कितना डालूं और सूजी कितनी। अगर सब बिगड़ गया तो क्या होगा?”

डरते-डरते और भगवान का नाम लेते हुए दोनों ने अपना-अपना काम शुरू किया। श्रुति ने जैसे-तैसे अंदाजे से एक बड़े बर्तन में घोल तैयार किया, लेकिन घबराहट में पानी ज्यादा डल गया और घोल एकदम पतला हो गया। जब उसने पहला मालपुआ तलने के लिए कड़ाही में डाला, तो वह गोल बनने के बजाय पूरे घी में बिखर गया। उधर काव्या की हालत और भी खराब थी। उसने दूध को गाढ़ा होने के लिए तेज आंच पर रख दिया था और लगातार चलाना भूल गई थी। अचानक रसोई में कुछ जलने की तीखी गंध उठी। काव्या ने झटपट गैस धीमी की, लेकिन तब तक दूध बर्तन के तले में लग चुका था और रबड़ी से जलने की बू आने लगी थी।

दोनों बहुएं अब लगभग रोने की कगार पर थीं। उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि इस विपत्ति से कैसे बचें। अभी वे सोच ही रही थीं कि अचानक रसोई के दरवाजे पर एक भारी और रौबीली आवाज गूंजी, “ये क्या तमाशा लगा रखा है तुम लड़कियों ने यहाँ?”

दरवाजे पर अम्मा जी खड़ी थीं। अम्मा जी यानी इस घर की सबसे बड़ी और सबसे सख्त महिला। सफेद सूती साड़ी, चेहरे पर झुर्रियों के बीच चमकता हुआ तेज और आंखों में एक ऐसा अनुशासन जिससे घर का हर सदस्य कांपता था। उनके कड़क स्वभाव के किस्से श्रुति और काव्या ने अपने पतियों से सुन रखे थे। अम्मा जी को देखते ही दोनों बहुओं की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई। उन्हें लगा कि अब आज उनका इस घर में पहला और आखिरी दिन है। अम्मा जी ने रसोई में झांक रही बाकी लड़कियों और ननदों को डांटते हुए कहा, “तुम सब यहाँ क्या भीड़ लगा रही हो? चलो बाहर जाओ, जाकर मेहमानों के लिए मेज सजाओ और पानी पिलाओ। मुझे यहाँ किसी की शक्ल नहीं दिखनी चाहिए!” उनके एक बार कहने पर ही सारी लड़कियां वहां से ऐसे गायब हुईं जैसे गधे के सिर से सींग।

अब रसोई में सिर्फ अम्मा जी, श्रुति और काव्या थे। अम्मा जी धीरे-धीरे चलते हुए चूल्हे के पास आईं। उन्होंने एक नजर कड़ाही में बिखरे हुए मालपुए पर डाली और फिर उस बर्तन को सूंघा जिसमें काव्या की रबड़ी बन रही थी। दोनों बहुओं ने डर के मारे आंखें झुका लीं, वे बस अम्मा जी के गुस्से के फूटने का इंतजार कर रही थीं। काव्या की आंखों से तो एक आंसू भी छलक कर गाल पर आ गिरा था।

“रोने से क्या बर्तन का जला हुआ दूध ठीक हो जाएगा?” अम्मा जी की आवाज अचानक बहुत शांत और गंभीर थी। दोनों ने चौंकाकर ऊपर देखा। अम्मा जी के चेहरे पर वह कठोरता नहीं थी जो अक्सर बाहर दिखाई देती थी।

“अम्मा जी… वो… मुझसे दूध नीचे लग गया, इसमें से जलने की बदबू आ रही है,” काव्या ने कांपते होंठों से कहा। श्रुति भी हिम्मत करके बोली, “और मेरा घोल बहुत पतला हो गया है, मालपुए घी में बिखर रहे हैं। हमें माफ कर दीजिए, हमें यह सब बनाना नहीं आता।”

अम्मा जी ने एक गहरी सांस ली, उनके चेहरे पर एक हल्की सी, न दिखाई देने वाली मुस्कान तैर गई। “माफी किस बात की? क्या कोई माँ के पेट से सब कुछ सीखकर आता है? जब मैं इस घर में नई-नई ब्याह कर आई थी, तो मैंने पहली बार में पूरी दाल में नमक की जगह पिसी हुई चीनी डाल दी थी।”

यह सुनकर श्रुति और काव्या की आंखें आश्चर्य से फैल गईं। जिस महिला के अनुशासन की मिसालें दी जाती थीं, उनकी ऐसी बात सुनकर दोनों को यकीन नहीं हुआ।

“चलो, अब रोना-धोना बंद करो और जो मैं कहती हूं वो करो। बिगड़ी हुई चीज को संवारना ही तो असली हुनर है,” अम्मा जी ने साड़ी का पल्लू कमर में खोंसते हुए कहा। उन्होंने सबसे पहले काव्या को निर्देश दिया, “जल्दी से एक दूसरा साफ और भारी तले वाला बर्तन निकालो। इस जले हुए दूध को बहुत ही हल्के हाथों से ऊपर-ऊपर से नए बर्तन में पलट लो। ध्यान रहे, कलछी बर्तन के तले तक नहीं जानी चाहिए वरना जली हुई खुरचन भी साथ आ जाएगी।”

काव्या ने फुर्ती से वैसा ही किया। दूध पलटने के बाद अम्मा जी ने एक डिब्बे से केवड़ा जल और कुछ हरी इलायची निकाली। “अब इसमें थोड़ा सा केवड़े का पानी और अच्छी तरह कुटी हुई इलायची डाल दो। इसकी तेज खुशबू दूध की उस हल्की सी जलने वाली महक को पूरी तरह दबा देगी। और इसे गाढ़ा करने के लिए इसमें थोड़ा सा मावा (खोया) कद्दूकस करके मिला दो।” काव्या ने खुशी-खुशी सारे निर्देश माने। देखते ही देखते रबड़ी का रंग और खुशबू दोनों बदल गए।

अब बारी श्रुति की थी। अम्मा जी ने उसके पतले घोल को देखा और कहा, “घबराने की जरूरत नहीं है बेटी। इसमें थोड़ी सी सूजी और दो चम्मच गेहूं का आटा और मिला दो। सूजी अतिरिक्त पानी सोख लेगी और मालपुए कुरकुरे भी बनेंगे।” श्रुति ने तुरंत आटा और सूजी मिलाकर घोल को अच्छे से फेंटा। दस मिनट बाद जब अम्मा जी ने उसे मालपुआ तलने को कहा, तो श्रुति के हाथों से बना मालपुआ एकदम गोल, सुनहरा और बेहतरीन सिका हुआ निकला। अम्मा जी ने उसे चाशनी में डुबोकर बाहर निकाला और एक छोटा सा टुकड़ा चखा।

“मिठास एकदम सटीक है!” अम्मा जी ने संतुष्टि भरे स्वर में कहा।

श्रुति और काव्या की जान में जान आई। उन दोनों के चेहरों पर अब खौफ की जगह एक असीम शांति और कृतज्ञता थी। दोनों ने बिना कुछ कहे एक साथ झुककर अम्मा जी के पैर छू लिए। अम्मा जी ने दोनों के सिर पर हाथ फेरा और प्यार से कहा, “ये रसोई सिर्फ खाना बनाने की जगह नहीं है, ये इस घर का दिल है। और आज तुम दोनों ने इस दिल को जीत लिया है। अब जल्दी से इन्हें सुंदर कटोरियों में सजाओ, बाहर सब इंतजार कर रहे हैं।”

अम्मा जी वहां से चली गईं। कुछ देर बाद, जब बाहर डाइनिंग टेबल पर खाना परोसा गया, तो पूरा घर मालपुए और रबड़ी की खुशबू से महक उठा। मेहमानों ने जैसे ही पहला निवाला खाया, हर तरफ से तारीफों के पुल बंधने लगे। “वाह! क्या रबड़ी बनी है, बिल्कुल हलवाई जैसी!” ससुर जी ने कहा। “और ये मालपुए तो मुंह में जाते ही घुल रहे हैं,” बड़े चाचा जी ने दाद दी। ननदें जो पहले मजाक उड़ा रही थीं, वे भी उंगलियां चाटती रह गईं।

श्रुति और काव्या रसोई के दरवाजे से यह सब देख रही थीं। उनका दिल खुशी से फूला नहीं समा रहा था। रस्म के अनुसार, जब घर के बड़ों ने बहुओं को ‘नेग’ (शगुन) देने के लिए बुलाया, तो अम्मा जी ने आगे बढ़कर दोनों को अपने हाथों से सोने के कंगन पहनाए। जब अम्मा जी उन्हें कंगन पहना रही थीं, तो श्रुति और काव्या की आंखें आंसुओं से नम थीं—लेकिन ये आंसू डर के नहीं, बल्कि उस गहरे आभार और प्यार के थे जो उन्हें उस सख्त दिखने वाली अम्मा जी के भीतर से मिला था। अम्मा जी ने दोनों के माथे चूम लिए और उन्हें अपने गले से लगा लिया। उस दिन श्रुति और काव्या को सिर्फ एक नई रसोई ही नहीं, बल्कि एक माँ मिल गई थी।

पाठकों के लिए एक सवाल:

क्या आपके या आपके किसी परिचित के साथ भी ‘पहली रसोई’ या किसी नई शुरुआत में ऐसा कुछ हुआ था जब सब कुछ बिगड़ने वाला था और किसी अपने ने आकर हालात संभाल लिए? अगर हाँ, तो आपकी मदद किसने की थी? अपनी कहानी और अनुभव कमेंट करके जरूर साझा करें!

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