पिता का न्याय

रमाकांत जी के पचहत्तरवें जन्मदिन का जश्न पूरे शबाब पर था। घर के बड़े से लॉन में रिश्तेदारों और जान-पहचान वालों की भीड़ जमा थी। चारों तरफ रोशनी, फूलों की सजावट और हंसी-मज़ाक का माहौल था। केक काटने की रस्म के बाद रमाकांत जी ने अपने दोनों बेटों और बहुओं को मंच पर बुलाया। यह उनके परिवार की एक पुरानी परंपरा थी कि घर के बड़े किसी खास मौके पर बच्चों को आशीर्वाद के साथ कुछ उपहार या पारिवारिक धरोहर सौंपते थे।

रमाकांत जी ने अपनी बड़ी बहू मीना को पुश्तैनी कुंदन का भारी हार और एक लिफाफा दिया। इसके बाद उन्होंने अपनी छोटी बहू ऋतु के हाथ में एक छोटा सा डिब्बा रखा जिसमें एक साधारण सी सोने की चेन थी और साथ में एक छोटा लिफाफा था।

अचानक खुशी से भरे उस माहौल में एक कड़वाहट घुल गई। छोटे बेटे विवेक ने मंच पर ही अपनी पत्नी के हाथ से वह डिब्बा लगभग छीनते हुए खोला और उसमें रखी हल्की सी चेन देखकर उसका चेहरा गुस्से से लाल हो गया। उसने माइक की परवाह किए बिना ही तेज आवाज में कहा, “पापा जी, यह आपने बिल्कुल सही नहीं किया। ऋतु भी इस घर की बहू है, पर आपने हमेशा की तरह आज सबके सामने भेदभाव किया है। बड़े भैया और मीना भाभी को आपने पुश्तैनी गहने और भारी-भरकम लिफाफा दे दिया, और मेरी पत्नी ऋतु के हाथ में यह मामूली सी चेन थमा दी? अब तो मुझे शक हो रहा है कि आपने अपने पोते-पोतियों के लिफाफों में भी ऐसा ही भेदभाव किया होगा। आखिर हम सौतेले तो नहीं हैं?”

पंडाल में एकदम सन्नाटा छा गया। मेहमान एक-दूसरे का मुंह देखने लगे। मीना और बड़े बेटे प्रकाश ने विवेक को शांत करने की कोशिश की, “विवेक, यह क्या कर रहे हो? घर की बात है, अंदर चलकर बात करेंगे। तमाशा मत बनाओ।”

लेकिन विवेक और ऋतु दोनों ही अब तक अपना आपा खो चुके थे। ऋतु ने मुंह बनाते हुए कहा, “नहीं जेठ जी, आज तो बात होकर ही रहेगी। हमें भी तो पता चले कि दिन-रात इस घर का नाम जपने के बाद भी हमें पराया क्यों समझा जाता है।”

रमाकांत जी अब तक चुपचाप खड़े यह सब देख रहे थे। उनके चेहरे पर दुख की गहरी लकीरें उभर आई थीं, लेकिन उनकी आंखों में एक अजीब सी दृढ़ता थी। उन्होंने प्रकाश को पीछे हटने का इशारा किया और आगे बढ़कर माइक अपने हाथ में ले लिया।

“तमाशा मैंने नहीं, तुमने बनाया है विवेक,” रमाकांत जी की आवाज़ में वह कड़क थी जिसने पूरे पंडाल को खामोश कर दिया। “तुमने अभी कहा कि मैंने भेदभाव किया है? तुमने पूछा कि मैंने ऐसा क्यों किया? तो सुनो… मैंने वही किया है, जिसका जो हकदार था। मैंने कर्मों का वज़न तौला है, खून का नहीं।”

विवेक ने त्यौरियां चढ़ाते हुए कहा, “कैसा हक पापा? हम दोनों आपके बेटे हैं, दोनों बहुएं इस घर की इज्जत हैं। फिर यह फर्क क्यों?”

रमाकांत जी की आंखों में आंसू और गुस्सा दोनों एक साथ तैरने लगे। उन्होंने कहा, “तुम हक़ की बात करते हो विवेक? तो चलो आज सबके सामने तुम्हारे और तुम्हारे बड़े भाई के हक़ का हिसाब कर ही लेते हैं। तीन साल पहले जब तुम्हारी माँ को लकवा मार गया था, तब तुम्हें याद है ऋतु ने क्या कहा था? उसने कहा था कि उसे गंदगी साफ करने से घिन आती है और वह अपने मायके जाकर बैठ गई थी। पूरे दो साल तक तुम्हारी माँ बिस्तर पर रही। इस मीना ने… इस बड़ी बहू ने… मेरी पत्नी को अपने हाथों से खाना खिलाया, उसके कपड़े बदले, उसे नहलाया। रातों की अपनी नींद हराम करके वह तुम्हारी माँ के सिरहाने बैठी रहती थी। क्या उस वक्त तुमने या तुम्हारी पत्नी ने अपना हक़ या अपना कर्तव्य याद किया था?”

विवेक की आंखें थोड़ी झुकीं, लेकिन वह फिर भी बुदबुदाया, “पर मेरी भी तो जॉब थी, मैं बिजी था।”

“जॉब तो प्रकाश की भी थी,” रमाकांत जी ने कड़े शब्दों में कहा। “लेकिन बात सिर्फ तुम्हारी माँ की सेवा की नहीं है। जब पिछले साल मुझे हार्ट अटैक आया था और मेरे बाईपास सर्जरी के लिए पंद्रह लाख रुपयों की तुरंत जरूरत थी, तब मैंने तुम्हें फोन किया था। तुम्हारा जवाब क्या था? ‘पापा, अभी कंपनी ने बोनस नहीं दिया, मैंने नई गाड़ी फाइनेंस कराई है, मेरे पास पैसे नहीं हैं।’ तुमने अपने पिता की जिंदगी से ज्यादा अपनी नई गाड़ी की ईएमआई को अहमियत दी।”

रमाकांत जी का गला भर आया। उन्होंने मीना के गले में पड़े उस कुंदन के हार की तरफ इशारा करते हुए कहा, “तुम इस हार को देख रहे हो विवेक? यह हार मैंने आज मीना को तोहफे में नहीं दिया है। यह हार तो उसका अपना है! जब मेरे ऑपरेशन के लिए पैसे कम पड़ गए थे और प्रकाश अपनी एफडी तुड़वा रहा था, तब इस मीना ने बिना मुझे बताए अपनी शादी का यह पुश्तैनी हार और अपने सारे जेवर बैंक में गिरवी रख दिए थे ताकि मेरे ऑपरेशन में कोई कमी न आए। आज मैंने अपनी पेंशन और कुछ पुरानी जमीन बेचकर इसके यह गहने बैंक से छुड़वाए हैं और इसे ससम्मान वापस लौटाए हैं।”

पूरे लॉन में अब किसी के भी बोलने की आवाज नहीं आ रही थी, सिर्फ कुछ महिलाओं के सुबकने की आवाजें गूंज रही थीं। ऋतु का चेहरा शर्म से पीला पड़ चुका था।

रमाकांत जी ने विवेक के हाथ से वह छोटा लिफाफा लिया और उसे खोलकर माइक के सामने ही दिखा दिया। “और तुम जो इन लिफाफों पर सवाल उठा रहे हो न? मीना के लिफाफे में उस पुश्तैनी घर के कागज़ हैं जहाँ मैं और तुम्हारी माँ रहे। और तुम्हारे इस लिफाफे में… तुम्हारे इस लिफाफे में वो बैंक के कागज़ हैं जो बताते हैं कि तुमने अपना घर खरीदने के लिए मुझसे जो बीस लाख रुपये लिए थे, वो मैंने आज माफ कर दिए हैं। मैंने तुम्हें तुम्हारे हिस्से से ज्यादा ही दिया है विवेक, लेकिन तुमने हमेशा सिर्फ लेना सीखा, कुछ लौटाना नहीं।”

“रिश्ते केवल खून से या जन्म लेने से नहीं बनते विवेक,” रमाकांत जी ने अपनी बात पूरी करते हुए कहा। “रिश्ते बनते हैं समर्पण से, सेवा से और प्यार से। जो इंसान अपने माता-पिता के बुरे वक्त में उनके साथ खड़ा नहीं हो सकता, उसे उनके अच्छे वक्त में हक़ मांगने का कोई अधिकार नहीं है। बड़ी बहू ने इस घर को अपना माना है, इस घर की नींव को अपने आंसुओं और पसीने से सींचा है। इसलिए इस घर की असली मालकिन वही है। मैंने कोई भेदभाव नहीं किया, मैंने सिर्फ न्याय किया है।”

विवेक के हाथों से वह सोने की चेन वाला डिब्बा छूटकर जमीन पर गिर पड़ा। जिस दौलत और दिखावे के लिए वह अपने पिता से लड़ रहा था, वह दरअसल उसके खुद के खोखलेपन का आईना बन गई थी। वह कुछ बोल नहीं पाया और सिर झुकाकर वहां से पीछे हट गया। ऋतु भी अपने अपमान से बचने के लिए नजरें चुरा रही थी।

मीना रोते हुए आगे बढ़ी और उसने रमाकांत जी के पैर छू लिए। रमाकांत जी ने कांपते हुए हाथों से अपनी बड़ी बहू को उठाया और सीने से लगा लिया। उस रात उस घर के आंगन में सिर्फ एक पिता का न्याय नहीं हुआ था, बल्कि समाज के हर उस स्वार्थी रिश्ते को एक करारा तमाचा लगा था जो सिर्फ अधिकारों की बात करता है, कर्तव्यों की नहीं।

क्या आपको भी लगता है कि माता-पिता की संपत्ति पर असली हक़ सिर्फ उसी का है जो उनके बुढ़ापे की लाठी बनता है? अपने विचार जरूर बताएं।

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