शहनाई की गूंज अब मद्धम पड़ चुकी थी और विदाई की बेला ने हर आँख को नम कर दिया था। मंडप के एक कोने में खड़ी अनुराधा अपनी बेटी नव्या को निहार रही थी। नव्या, जो अब अपने बचपन के आँगन को छोड़कर एक नए संसार में कदम रखने जा रही थी, उसकी आँखों में एक अजीब सी घबराहट और अनिश्चितता थी। अनुराधा ने धीरे से नव्या का हाथ पकड़ा और उसे अपने कमरे में ले गई।
“नव्या, मेरी बच्ची,” अनुराधा ने नव्या के माथे को चूमते हुए कहा, “आज तुम एक ऐसे सफर पर निकल रही हो, जहाँ रास्ते तुम्हारे लिए बिल्कुल नए होंगे। मैं तुम्हें कुछ ऐसा देना चाहती हूँ, जो जीवन भर तुम्हारे काम आए।”
नव्या ने अपनी डबडबाई आँखों से माँ की ओर देखा, “माँ, आप जो भी कहेंगी, मैं उसे हमेशा याद रखूँगी। मुझे बस डर लग रहा है कि क्या मैं उस नए परिवार को संभाल पाऊँगी?”
अनुराधा ने एक गहरी साँस ली और कहा, “बेटा, हमारे समाज में हमेशा से बेटियों को यही सिखाया जाता है कि ससुराल जाकर सब कुछ बर्दाश्त करना, किसी को पलट कर जवाब मत देना। लेकिन मैं तुम्हें यह नहीं सिखाऊँगी। मैं तुम्हें एक छलनी और एक तराज़ू का उदाहरण देती हूँ। तुम्हारी सास या परिवार के अन्य सदस्य अलग-अलग स्वभाव के होंगे। कुछ बातें तुम्हें चुभेंगी, कुछ अच्छी लगेंगी। तुम्हें एक छलनी की तरह बनना है, जो अच्छी बातों को अपने पास रख ले और बुरी बातों को नीचे गिरा दे। किसी की व्यर्थ की बातों को दिल से लगाकर मत बैठना।”
नव्या ध्यान से सुन रही थी। अनुराधा ने आगे कहा, “पर सबसे जरूरी बात… कभी भी अन्याय को देखकर अपनी आँखें बंद मत करना। चाहे वह तुम्हारे साथ हो, या घर के किसी अन्य सदस्य के साथ। संतुलन बनाए रखना, लेकिन जहाँ लगे कि कुछ गलत हो रहा है, वहाँ मूक दर्शक बनकर मत रहना। नई जगह है, पहले सबको समझना, उनके स्वभाव को तौलना, लेकिन जब तुम्हारे हस्तक्षेप की जरूरत हो, तो पीछे मत हटना। तुम्हारी समझदारी ही तुम्हारी सबसे बड़ी ताकत बनेगी।”
नव्या ने अपनी माँ को कसकर गले लगा लिया। माँ की इन बातों ने उसके अंदर के डर को एक अजीब से आत्मविश्वास में बदल दिया था। उसने मन ही मन तय कर लिया कि वह अपने नए घर को सिर्फ अपनाएगी ही नहीं, बल्कि उसे सँवारेगी भी।
कुछ ही घंटों बाद, नव्या अपने पति समीर के साथ अपने नए घर की दहलीज पर खड़ी थी। घर बहुत आलीशान था। हर तरफ सजावट थी, लेकिन उस बड़ी सी हवेली में एक अजीब सा सन्नाटा पसरा हुआ था। नव्या ने गृह प्रवेश की रस्में पूरी कीं, लेकिन उसकी नज़रें बार-बार उस व्हीलचेयर पर जा टिकती थीं, जिस पर समीर के पिता, रघुनाथ जी बैठे थे।
रघुनाथ जी का चेहरा एकदम भावशून्य था। घर में इतनी बड़ी खुशी का माहौल था, लेकिन उनकी आँखों में जैसे जीवन की कोई चमक ही नहीं बची थी। उन्होंने नव्या को आशीर्वाद तो दिया, लेकिन उनके हाथ कांप रहे थे और होंठों पर कोई मुस्कान नहीं थी।
अगले कुछ दिनों में नव्या ने घर के माहौल को करीब से परखा। उसने देखा कि समीर अपने पिता से बहुत प्यार करता है। उसने रघुनाथ जी के लिए शहर के सबसे अच्छे डॉक्टर नियुक्त किए थे, चौबीस घंटे उनकी देखभाल के लिए एक वार्डबॉय रखा हुआ था। खाने-पीने से लेकर दवाइयों तक का एक सख्त चार्ट बना हुआ था। लेकिन इन सबके बावजूद, रघुनाथ जी दिन-ब-दिन कमजोर होते जा रहे थे। उन्होंने खाना-पीना लगभग छोड़ दिया था। वे घंटों खिड़की के बाहर शून्य में ताकते रहते।
एक शाम, नव्या समीर के लिए कॉफी लेकर उसके कमरे में गई। समीर बहुत परेशान लग रहा था। वह अपने पिता की मेडिकल रिपोर्ट देख रहा था।
“समीर, क्या बात है? आप इतने परेशान क्यों हैं?” नव्या ने कॉफी का कप मेज पर रखते हुए पूछा।
समीर ने एक लंबी आह भरी, “नव्या, मैं हार गया हूँ। पिताजी कुछ खाते ही नहीं हैं। जब से माँ गुजरी हैं, वे जैसे पत्थर के हो गए हैं। मैंने उनके लिए क्या कुछ नहीं किया। हर सुविधा दी है, लेकिन वे किसी से बात ही नहीं करते। डॉक्टर कह रहे हैं कि अगर उन्होंने ऐसे ही खाना छोड़ दिया, तो उनका शरीर जवाब दे जाएगा। मुझे समझ नहीं आ रहा कि मैं उन्हें कैसे बचाऊँ।” समीर की आवाज़ में एक बेटे की बेबसी साफ झलक रही थी।
नव्या को अपनी माँ की दी हुई सीख याद आई— ‘पहले समझना, और फिर जहाँ जरूरत हो, वहाँ हस्तक्षेप करना।’ उसने समीर के कंधे पर हाथ रखा और कहा, “आप चिंता मत कीजिए, हम कुछ न कुछ रास्ता जरूर निकालेंगे।”
अगले दिन, घर में रघुनाथ जी के एक पुराने मित्र, माथुर साहब आए। नव्या उनके लिए चाय लेकर गई और जानबूझकर वहीं रुक गई ताकि उनकी बातें सुन सके।
समीर माथुर साहब से अपनी परेशानी साझा कर रहा था, “अंकल, आप ही पिताजी को समझाइए। वे नाश्ता वापस भेज देते हैं। मेरी कोई बात नहीं सुनते।”
माथुर साहब ने एक फीकी मुस्कान के साथ कहा, “बेटा समीर, तुम्हारी माँ सुशीला के जाने के बाद रघुनाथ ने अपना आधा हिस्सा खो दिया है। तुम्हें याद है जब तुम्हारी माँ ज़िंदा थी, तो इस घर का माहौल कैसा था? सुबह उठते ही दोनों में बहस शुरू हो जाती थी। कभी अखबार पहले पढ़ने को लेकर, कभी चाय में चीनी कम होने को लेकर। रघुनाथ पूरे घर पर हुक्म चलाता था और सुशीला उसे डांटती रहती थी। वह नोक-झोंक ही तुम्हारे पिता की ज़िंदगी का ईंधन थी। अब तुमने क्या किया है? तुमने उन्हें एक मरीज बना दिया है। एक बिस्तर, एक नौकर और खामोशी। उनका अधिकार, उनका घर का मुखिया होने का अहसास, सब छिन गया है। वे बीमारी से नहीं, अकेलेपन और खुद को अनुपयोगी समझने की भावना से मर रहे हैं।”
यह सुनकर नव्या के दिमाग में जैसे बिजली सी कौंध गई। उसे अपनी माँ के शब्द याद आए— ‘गलत होते देखकर आँखें बंद मत करना।’ यहाँ गलत यह नहीं था कि समीर अपने पिता की परवाह नहीं करता था, बल्कि गलत यह था कि परवाह करने का तरीका उन्हें अंदर ही अंदर मार रहा था। रघुनाथ जी को एक मरीज की नहीं, बल्कि एक पिता, एक मुखिया की भूमिका की जरूरत थी। उन्हें यह महसूस कराने की जरूरत थी कि इस घर को आज भी उनकी जरूरत है।
नव्या ने मन ही मन एक योजना बनाई। उसने तय किया कि वह इस घर के सन्नाटे को तोड़कर ही रहेगी।
अगली सुबह, घर का माहौल हमेशा की तरह शांत था। वार्डबॉय रघुनाथ जी के कमरे में दलिया लेकर गया, और हमेशा की तरह उन्होंने मुँह फेर लिया। तभी अचानक रसोई से बर्तन गिरने की ज़ोरदार आवाज़ आई।
रघुनाथ जी ने चौंक कर दरवाज़े की तरफ देखा। तभी समीर (जिसे नव्या ने रात में ही अपनी योजना का हिस्सा बना लिया था) ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाते हुए रसोई की तरफ गया।
“यह क्या तरीका है नव्या? तुम्हें एक साधारण सा पोहा बनाना नहीं आता? पूरा जल गया है! और यह चाय… इसमें तो जैसे चीनी की जगह नमक डाल दिया हो! क्या सीख कर आई हो अपने घर से?” समीर की आवाज़ पूरे घर में गूँज रही थी।
नव्या भी ज़ोर-ज़ोर से रोने का नाटक करने लगी, “मुझसे गलती हो गई, लेकिन आप ऐसे कैसे चिल्ला सकते हैं मुझ पर? मैं नई हूँ, मुझे इस घर के स्वाद का कैसे पता होगा?”
यह ऐसा हंगामा था जो सुशीला जी के जाने के बाद इस घर ने कभी नहीं देखा था। रघुनाथ जी, जो महीनों से अपने बिस्तर से बिना सहारे के नहीं उठे थे, उनके अंदर का सोया हुआ मुखिया अचानक जाग उठा। उन्होंने अपनी छड़ी उठाई और कांपते कदमों से, बिना वार्डबॉय की मदद लिए, कमरे से बाहर आ गए।
रसोई के दरवाज़े पर पहुँचकर उन्होंने अपनी छड़ी ज़मीन पर ज़ोर से पटकी।
“क्या तमाशा लगा रखा है सुबह-सुबह?” रघुनाथ जी की भारी आवाज़ सुनकर समीर और नव्या दोनों चुप हो गए।
समीर ने डरने का नाटक करते हुए कहा, “देखिए न पिताजी, इसने पूरा नाश्ता जला दिया। मुझे ऑफिस के लिए देर हो रही है और…”
“चुप कर बेवकूफ लड़के!” रघुनाथ जी ने समीर को डपटते हुए कहा, “नई बच्ची है, दूसरे घर से आई है। वक्त लगेगा उसे हमारे घर के तौर-तरीके सीखने में। तू अपनी माँ के पेट से सब कुछ सीख कर आया था क्या? बात-बात पर चिल्लाने लगता है।”
फिर वे नव्या की तरफ मुड़े। नव्या सिर झुकाए खड़ी थी। रघुनाथ जी का स्वर अचानक नरम हो गया, “रो मत बहू। इधर आ मेरे पास।”
नव्या उनके पास गई। रघुनाथ जी ने उसके सिर पर हाथ रखा और बोले, “तुम्हारी सासू माँ जब नई-नई आई थी ना, तो उसने एक बार दाल में हल्दी की जगह पिसी हुई सरसों डाल दी थी। हम सबने चुपचाप खा ली थी। तुम तो फिर भी पोहा बना रही हो। चलो, मैं बताता हूँ कि समीर की माँ पोहा कैसे बनाती थी। उसका पोहा खाकर इस गधे का मिज़ाज ठीक हो जाएगा।”
समीर और नव्या ने एक-दूसरे की तरफ देखा। समीर की आँखों में आँसू थे। महीनों बाद उसके पिता के चेहरे पर वही पुराना अधिकार, वही रुतबा और वही अपनत्व वापस आ गया था।
रघुनाथ जी एक कुर्सी पर बैठ गए और नव्या को निर्देश देने लगे, “हाँ, अब इसमें राई डालो… अब कड़ी पत्ता… आँच धीमी रखना बहू…”
नव्या मुस्कुराते हुए सब कुछ उनके कहे अनुसार कर रही थी। जब पोहा बनकर तैयार हुआ, तो नव्या ने पहली प्लेट रघुनाथ जी के सामने रखी।
“पिताजी, पहले आप चख कर बताइए कि क्या यह सासू माँ के हाथ जैसा बना है?” नव्या ने मनुहार करते हुए कहा।
रघुनाथ जी, जिन्होंने हफ्तों से ठीक से कुछ नहीं खाया था, उन्होंने कांपते हाथों से चम्मच उठाई और पोहा मुँह में रखा। उनकी आँखें खुशी से चमक उठीं। “बिल्कुल तुम्हारी सासू माँ के हाथ का स्वाद है बहू,” कहते हुए उन्होंने एक और चम्मच भर ली।
समीर दूर खड़ा यह सब देख रहा था। उसने पास आकर नव्या का हाथ धीरे से दबाया, मानो बिना कुछ कहे उसे दुनिया का सबसे बड़ा धन्यवाद दे रहा हो।
नव्या ने एक गहरी साँस ली। उसे अपनी माँ अनुराधा की याद आई। माँ ने सच ही कहा था— रिश्ते सिर्फ निभाने से नहीं, उन्हें समझने से चलते हैं। उसने रघुनाथ जी को एक मरीज के दर्जे से निकालकर वापस घर के मुखिया के दर्जे पर बैठा दिया था। उसने एक बेटे को उसका पिता वापस लौटा दिया था। अब वह घर एक खाली इमारत नहीं, बल्कि एक असली घर बन गया था, जहाँ रूठना, मनाना, डांटना और प्यार करना, सब कुछ था।
ज़िंदगी के इस नए अध्याय में नव्या ने यह साबित कर दिया था कि एक नई शुरुआत केवल अपने लिए नहीं होती, बल्कि पूरे परिवार को एक नए धागे में पिरोने के लिए होती है।
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