अब से अपने स्वाभिमान के साथ जीऊँगी

रसोई के एक कोने में खड़ी मीरा की आँखों से आँसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। गैस पर चाय उबल रही थी और उसकी ज़िंदगी भी इसी तरह अंदर ही अंदर खौल रही थी। उसने जल्दी से पल्लू से अपनी आँखें पोंछीं क्योंकि बाहर से उसकी सास, सुमित्रा देवी की तेज़ आवाज़ आ चुकी थी।

“अरे मीरा! कितनी देर लगेगी चाय में? सुबह के आठ बज गए हैं, मेरा तो गला सूख गया पूजा करते-करते। इस घर में तो किसी को मेरी परवाह ही नहीं है।”

मीरा ने गहरी साँस ली, ट्रे में चाय और बिस्कुट सजाए और बाहर हॉल में आ गई। सुमित्रा देवी ने चाय का कप उठाते हुए ट्रे की तरफ नज़र दौड़ाई और मुँह बनाते हुए बोलीं, “फिर से वही सादे बिस्कुट और फीकी चाय! चार साल हो गए इस घर में आए हुए, कभी कुछ नया बनाने का सोचा है? दिन भर घर में बैठी रहती हो, कम से कम खाने में तो कुछ सलीका दिखाओ।”

मीरा ने धीमी आवाज़ में कहा, “माँ जी, रात भर काव्या रोती रही। उसके दांत निकल रहे हैं तो उसे बुखार आ गया था। मुझे रात भर जागना पड़ा, इसलिए सुबह कुछ और बनाने का समय ही नहीं मिला। वो थोड़ी बड़ी हो जाए, तो मैं सब कुछ अच्छे से संभाल लूँगी।”

सुमित्रा देवी ने नाक सिकोड़ते हुए तंज कसा, “हाँ-हाँ, दुनिया में तो जैसे तुम अकेली ही माँ बनी हो। हमने भी बच्चे पाले हैं, पूरा भरा-पूरा परिवार संभाला है। लेकिन हमने कभी बच्चों का रोना लेकर घर के कामों से जी नहीं चुराया। पता नहीं तुम जैसी लड़कियाँ कब ज़िम्मेदारी समझेंगी। मेरे बेटे की कमाई पर राज करना आसान है, पर घर संभालना तुम्हारे बस की बात नहीं।”

मीरा चुपचाप वहाँ से लौट आई। यह कोई पहला दिन नहीं था जब उसे ये ताने सुनने पड़े हों। जब से उसकी शादी विवेक से हुई थी, उसने इस घर को अपना बनाने की हर मुमकिन कोशिश की थी। लेकिन बदले में उसे सिर्फ कमियाँ और तिरस्कार ही मिला। विवेक भी हमेशा अपनी माँ का ही पक्ष लेता और अक्सर कह देता, “तुम करती ही क्या हो दिन भर? घर में रहना है, बस खाना ही तो बनाना है।” इन तानों ने मीरा के आत्मविश्वास को पूरी तरह से कुचल दिया था। उसे लगने लगा था कि उसका अपना कोई वजूद नहीं है, वह बस इस घर की एक मुफ्त की नौकरानी बनकर रह गई है।

लेकिन उस दिन, रसोई में बर्तन धोते हुए मीरा के अंदर कुछ टूट रहा था और साथ ही कुछ नया जुड़ भी रहा था। “मेरे बेटे की कमाई… घर में बैठी रहती हो…” ये शब्द उसके कानों में हथौड़े की तरह बज रहे थे। उसने नल बंद किया और खुद को आईने में देखा। बिखरे बाल, थकी हुई आँखें और मुरझाया हुआ चेहरा। क्या यही थी वो मीरा, जिसने शादी से पहले फाइन आर्ट्स और डिज़ाइनिंग में यूनिवर्सिटी में टॉप किया था?

अचानक उसके भीतर सोई हुई एक चिंगारी भड़क उठी। उसने ठान लिया कि अब वह इन तानों के बोझ तले अपनी ज़िंदगी नहीं गुज़ारेगी। सम्मान भीख मांगने से नहीं मिलता, उसे कमाना पड़ता है। उस रात जब सब सो गए, तो मीरा ने अपनी अलमारी खोली। उसमें एक छोटा सा डिब्बा रखा था जिसमें उसने शादी के वक्त मिले शगुन के पैसे और अपनी कुछ छोटी-मोटी बचत सहेज कर रखी थी। उसने वो पैसे गिने और एक गहरा निश्चय कर लिया।

अगली सुबह मीरा के लिए महज़ एक नया दिन नहीं, बल्कि एक नए जीवन की शुरुआत थी। वह सुबह चार बजे ही उठ गई। उसने घर की साफ-सफाई की, नाश्ता बनाया और काव्या को दूध पिलाकर सुला दिया। इसके बाद वह चुपचाप घर से बाहर निकल गई।

सबसे पहले वह पड़ोस की बस्ती में गई और वहाँ रहने वाली शांति मौसी से मिली, जो घरों में काम करती थीं। मीरा ने उन्हें अपने घर का भारी काम करने के लिए मना लिया और कहा कि पैसे वह खुद देगी। उसके बाद मीरा सीधा शहर के बड़े बाज़ार गई। उसने अपनी बचत के पैसों से एक बेहतरीन ग्राफ़िक डिज़ाइनिंग टैबलेट, डिजिटल पेन और कुछ उच्च कोटि के कैनवस और रंग खरीदे। उसे अपना हुनर याद आ गया था।

जब मीरा दो घंटे बाद घर लौटी, तो घर का नज़ारा देखने लायक था। काव्या ज़ोर-ज़ोर से रो रही थी, विवेक झुंझलाया हुआ था और सुमित्रा देवी सोफे पर बैठी बड़बड़ा रही थीं।

मीरा को दरवाज़े पर देखते ही विवेक चिल्लाया, “कहाँ चली गई थी तुम बिना बताए? देखो काव्या का रो-रोकर बुरा हाल है। माँ जी परेशान हो रही हैं और मुझे ऑफिस के लिए देर हो रही है। तुम्हें किसी बात का कोई होश है या नहीं?”

मीरा ने शांति से आगे बढ़कर काव्या को गोद में लिया और उसे पुचकार कर चुप कराने लगी। तभी पीछे से एक डिलीवरी वाला लड़का आया जिसके हाथ में मीरा के मंगाए हुए कैनवस और उपकरणों के बड़े-बड़े पैकेट थे। शांति मौसी भी पीछे-पीछे घर में आ गईं और सीधे रसोई की तरफ झाड़ू-पोंछा लगाने चली गईं।

सुमित्रा देवी की आँखें फटी की फटी रह गईं। “ये सब क्या है मीरा? ये इतने बड़े डब्बे कौन लाया है और ये कामवाली हमारे घर में क्या कर रही है?”

मीरा ने काव्या को सीने से लगाए हुए, एक दृढ़ लेकिन शांत आवाज़ में अपनी सास की आँखों में आँखें डालकर कहा, “माँ जी, ये मेरा नया ‘आर्ट और डिज़ाइन स्टूडियो’ का सामान है। और रही बात शांति मौसी की, तो उन्हें मैंने काम पर रखा है। उनका सारा खर्च मैं खुद उठाऊँगी।”

सुमित्रा देवी और विवेक स्तब्ध रह गए। मीरा ने आगे कहा, “माँ जी, कल आप कह रही थीं ना कि मैं आपके बेटे की कमाई पर राज करती हूँ और मेरा अपना क्या वजूद है? पता नहीं मैं कब ज़िम्मेदारी समझूँगी? तो बस माँ जी, अब मैं समझ गई हूँ। अपना घर भी संभालूँगी और अपनी पहचान भी बनाऊँगी। अब मैं इस घर में सिर्फ ताने सुनने के लिए नहीं, बल्कि अपने स्वाभिमान के साथ जीऊँगी।”

उस दिन मीरा की आवाज़ में एक ऐसी खनक थी, जिसने हमेशा के लिए सुमित्रा देवी और विवेक के तानों को खामोश कर दिया।

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