अरी शान्ति ओ शान्ति ऽऽऽ राह चलती शान्ति देवी को पीछे से लगी आवाज सुनकर रूकना पड़ा। उन्होंने पीछे मुड़कर देखा तो शकुन बुआ उनकी ही तरफ दौड़ी चली आ रहीं थीं।
अरी, हुआ तेरे छोटे लडके का रिश्ता कहीं क्या ? शकुन बुआ बोली।
पड़ोसी शकुन बुआ जो रिश्ते कराने का काम करती वो शान्ति देवी के और करीब आकर आत्मीयता से बोली। मैं कुछ महिने हरिद्वार चली गई थी आश्रम में, कल ही तो घर वापस लौट कर आई ।
शान्ति देवी ने दोनों हाथ जोड़कर बुआ का अभिवादन किया और बोलीं – तभी लम्बे समय से दिखाई नहीं दे रहीं थीं आप, मै समझी अपने लड़के के पास शहर चले गये हो ।
बुआ रूआंसी सी होकर बोलीं शहर… मन नहीं लगता मेरा वहां बिल्कुल भी। सुन्दर आलीशान बिल्डिंग लेकिन बतियाने को कोई भी नहीं बहु बेटे नौकरी करते पोते पोतियां छात्रावास में रहते। मुझे ऐसा वीरानापन नहीं, दिलों की आत्मीयता चाहिए तभी मैं गांव में ही रहती हूँ ।
शान्ति देवी ने थोड़ा रूककर फिर धाराप्रवाह बोलना शुरू किया मेरे छोटे लडके नरेश का रिश्ता अभी कहां हुआ बुआ ?
शांतिदेवी मायूस सी होकर बोलीं -कहीं लडके को लड़की पसंद नहीं आती कहीं लड़की को मेरा लड़का पसंद नहीं आता। दसों रिश्ते देख लिए कहीं बात नहीं जम रही।
अरे बुआ तुम तो हजारों रिश्ते करवा चुकी हो मेरी तीनों बहुएं भी आप ही ढूंढ कर दीं इस बार भी तुम्हीं बताओ ढंग की लड़की।
अरी ये ढंग की लड़की से क्या मतलब है तुम्हारा ? बुआ थोड़ा गम्भीरता से कमर सीधे करते हुए बोली।
शान्ति देवी बुआ को सम्बोधित करते हुए थोड़ा हाथों को घुमाते हुए बोली…ढंग की यानि जो मेरे घर परिवार में रम जाये । व्यवहार कुशल हो । दिल से अपनेपन से मेरे पूरे परिवार को अपना ले । ऊपर वाले की कृपा और आपका सहयोग अभी तक तो सब कुशल बढ़िया चल रहा मेरे घर में,बड़ा ही मेल-मिलाप मेरे पूरे परिवार के सदस्यों में। बस इस छोटे की बहु भी और अच्छी मिल जाए तो छोली भर दूं आप की शान्ति जी बुआ के आगे हाथ जोड़ते हुए बोली।
अरी तेरी तीन बहुओं में कोई कमी रही क्या ? मैंने ही बताये रिश्ते। अरी शकुन बुआ चुन चुन कर लाती है रिश्ते। कोई कमी रही हो तो बोल शान्ति। बुआ थोड़ा उत्तेजित होकर कहने लगी ।
ना ना बुआ भगवान झूठ न बुलवाएं लाखों में एक ढूंढ कर दी बहुएं तो आपने, तभी तो कह रही छोटे की भी ढूंढ दीजिए आप शान्ति थोड़ा खुशामदी अंदाज से बुआ से बोली ।
ठीक है.. एक लड़की है मेरी नज़र में, तुम्हारे परिवार के लायक कल लड़की वालों से बात करके फिर आती हूँ घर में तुम्हारे कहकर बुआ इठलाती हुई चली गई।
दरअसल शान्ति देवी और शकुन बुआ आसपास रहते शकुन बुआ रिश्ते करवाने में माहिर यूं कहो ये उनका प्रोफेशन ही है। दिन भर गांव भर में घूमती सब पर तीखी नजर रखती । बड़ी ही पारखी नजर रखती थी बुआ। शान्ति के लिए उनके तीन बेटों के रिश्ते भी वहीं लाई थी। शान्ति देवी जी का भरा पूरा परिवार चार बेटे चारों नौकरी करते दो बेटियों का विवाह वह पहले ही कर चुकी थी। पति पोस्ट आफिस में पोस्ट मास्टर के पद पर रिटायर्ड अब अपने रिटायर दोस्तों के साथ मस्त जिंदगी जी रहे। शान्ति देवी जी का नाती पोतों से भरा पूरा परिवार बस एक छोटा बेटा नरेश ही बचा था विवाह के लिए जो व्यवसाय से इलैक्ट्रिशियन था जिसका व्यवसाय भी अच्छा खासा चल रहा था । मगर उसके लिए लडकी की तलाश में ही व्याकुल रहता शान्ति देवी जी का परिवार ।
शान्ति देवी जी का आलीशान तीन मंजिला मकान तो सभी सदस्यों के लिए पर्याप्त जो सभी की सुख सुविधाओं को ध्यान में रखकर बनाया गया था।
वैसे भी किसी मकान की खूबसूरती कभी ईंट पत्थरों से बने मकानों से नहीं होती बल्कि वहां रहने वाले लोगों इंसानों वहां के सदस्यों के आपसी प्यार दिलों के अपनेपन से होती है। शान्ति देवी जी के परिवार के सभी सदस्य एक दूसरे को भली प्रकार समझते और बड़े ही प्रेम मेल मिलाप से रहते।
दूसरे दिन शकुन बुआ लड़की वालों से बातचीत करके शान्ति देवी जी के घर रिश्ता लेकर पहुंच जाती है।और बताती है लड़की बहुत पढ़ी लिखी है।दान दहेज भी अच्छा देने को तैयार हैं। बड़े घर की बेटी है। घर में सबसे छोटी है। सबकी लाड़ली है। बस खाता पीता खानदानी परिवार चाहते हैं। कल का कह कर आई हूँ नरेश से बात कर लो कल चलकर देख ले लड़की।
शान्ति देवी और मनोहर बाबू जी एक साथ बोले बुआ हमें दान दहेज कुछ नहीं चाहिए। आजकल पढ़ें लिखे बच्चे हैं लड़का लड़की एक दूसरे को पसंद कर लें बस लड़की संस्कारी, सहृदय है तो समझो रिश्ता मंजूर ही है हमें। फिर नरेश को साथ लेकर लड़की वालों के घर गए। दोनों बच्चों की पसंद दोनों परिवार की रजामंदी एक निश्चित तिथि पर धूमधाम से विवाह हो गया। लता नरेश की पत्नी और शान्ति जी की सबसे छोटी बहु बनकर उनके घर में आ गई ।
सभी वैवाहिक कार्यक्रम, सकुशल निपट गये। मेहमान नवाजी में कोई कमी नहीं रही। पूरे घर में खुशी का माहौल रहा । शादी में आये सभी मेहमान अपने अपने घर लौट गये। बेटियां दामाद भी वापस चले गए अपने अपने घर, शान्ति जी की खुशी का कोई ठिकाना नहीं था। वो नई बहु लता से बोलीं बिटिया आज तुमको पहली रसोई में मीठे की रस्म करनी है। ऐसा करो तुम्हारी जेठानी बना लेंगी तुम केवल हाथ लगा देना शगुन हो जायेगा ।
नई बहु लता ने मुस्कुराते हुए सासूमां शान्ति की तरफ देखा और बहुत ही भोलेपन से बोली हाथ क्यों लगाना है ? मुझे आता है सब कुछ बनाना । आप चिंता छोड़िए और आराम से कमरे में बैठिए मैं बनाती हूँ और किचन में आ गई । बड़ी बहु ने सारा सामान दिखा दिया और कह दिया हमारी सहायता चाहिए तो बुला सकती हो बहुरानी संकोच मत करना ।
लता किचन में पकवान तैयार करने में जुट गई। कुछ घंटे में लजीज पकवान से डाइनिंग टेबल सजी थी। पूरा घर पकवान और मसालेदार खाने की खुशबू से महक रहा था । सभी सदस्य खाने में व्यस्त और खुले दिल से लता के बनाये व्यंजनों के तारीफों के पुल बांध रहे थे।
लता सभी को बड़े प्रेम से परोस रही थी और आग्रह कर कर खिला रही थी । तभी मनोहर बाबू बोले लता बिटिया जरा मुझे थोड़ी खीर और दे दो बहुत लजीज बनी है। और तुम भी बैठो खाने हमारे साथ बाकी हम सब खुद ले लेंगे।
मनोहर जी खीर खाते और लता से पूछते बिटिया ये सब खाना तुम अपने मायके में खूब बनाती रहती होगीं ।
लता अपने लिए प्लेट लगाते हुए बोली नहीं बाबूजी मैंने तो अपने घर में कभी काम नहीं किया। हमारे घर तो महाराज खाना बनाते हैं। मै तो घर में सबसे छोटी तो बड़े ही लाड़ प्यार से पालन पोषण हुआ। कोई मुझे काम नहीं करने देता था । वो तो जब बुआ रिश्ता लेकर आई तो उन्होंने यहां के बारे में बताया कैसे सारा परिवार बडे ही प्यार से रहता है ? मुझे बड़ी उत्सुकता जागी क्योंकि मैं ऐसे ही परिवार में विवाह करना चाहती थी । ऐसा परिवार जहां मुझे अपनेपन के दर्शन हों ।
लता फिर बोली बाबूजी बुआ ने उसी समय ये भी बता दिया था कि खाना बनाना भी सीख लेना । क्योंकि वहां सभी सदस्य मिलजुलकर खाना बनाते और काम करते हैं। इसलिए मैंने अपने महाराज जी से खाना बनाना सीख लिया क्योंकि मैं चाहती थी जितनी जल्दी हो सके मैं आप सभी के दिल में जगह बना सकूं,और आप सभी मुझे दिल से स्वीकार कर लें । वैसे भी मेरा मानना है “घर ईंटों से नहीं दिलों से बनता है ‘ । इंसान महलों में रहकर अकेले पन और दूरियां बनाये रखे तो वो जेल से कम नही होती लेकिन इंसान झोपड़ी में रहकर भी अपनापन लिए अपनों के साथ रहे तो वो स्वर्ग से कम नहीं लगता। असली खूबसूरती ईंटों से बने मकानों में नहीं वहां रहने वाले सदस्यों के दिलों में होती है।
नई बहु लता की बातों ने परिवार के सभी सदस्यों का दिल जीत लिया। सभी ने रस्म के बाद उसको सुन्दर सुन्दर उपहार दिए। और शान्ति जी ने तो उसे गले ही लगा लिया और बोली भई मैं तो धन्य हो गई अपने पूरे परिवार की आत्मीयता पाकर । लता का तो जैसे आज स्वप्न ही पूरा हो गया था ।
लेखिका डॉ बीना कुण्डलिया
(घर ईंटों से नहीं दिलों से बनता है)