घर में रौनक नहीं रही – करुणा मलिक

पूजा, सब ठीक तो है? बार-बार दरवाजे पर आ रही हो सुबह से…..मम्मी जी भी कह रही हैं कि आज पता नहीं, क्या बात है….पूजा कई बार दरवाजे पर दिख रही है।

हाँ-हाँ सब ठीक है…..दरसल जोधपुर से दोनों ननदें आने वाली है, वैसे तरुण गए हैं रेलवे स्टेशन….. पर न जाने क्यों लेट हो गए, गाड़ी का स्टेटस भी सही टाइम दिखा रहा है। 

ननदों के लिए इतनी उतावली ठीक नहीं, आँचल ने हँसते हुए अपनी पड़ोसन पूजा से कहा। 

नहीं-नहीं ….. अपनों के लिए उतावला होना तो स्वाभाविक है, पूरे एक साल बाद आ रही हैं दोनों…. शायद रास्ते में ट्रैफिक जाम में फँसे है ये लोग, फोन कर लेती हूँ। 

इतना कहकर पूजा अंदर आ गई….. हाथ में मोबाइल पकड़ा ही था कि बाहर से हार्न बजने की आवाज आई, उसे सुनते ही पूजा ने हाथ में पकड़ा मोबाइल मेज पर रखा और दोनों बच्चों को बाहर बुलाते हुए गेट की तरफ भागी। 

पूजा ने दोनों ननदों के पैर छुए, उन्हें गले से लगाया और उनके हाथ से सामान ले लिया। तब तक पति ने दोनों बहनों के बड़े-बड़े सूटकेस उतारे। दोनों बेटे भी अपनी बुआ के गले मिलें। 

उधर अपनी रसोई की खिड़की से झाँकती आँचल पूरे दृश्य का आंकलन करके अपनी सास के पास जाकर बोली-

मम्मी जी, ये कैसी ननदें हैं पूजा की…… वो बेचारी सुबह से पचास बार तो चक्कर लगा लगाकर उनका इंतजार कर रही थी और पैर छूने के बाद छोटी भाभी के सिर पर आशीर्वाद का हाथ तक नहीं रखा…. इनके लिए मरी जा रही थी ये? 

इधर आजा तू…. देख लिया तो कहेंगी कि खिड़की से झाँक रही है। अपनी माँ पर गई है दोनों लड़कियाँ…. अपनी गोरी चमड़ी के आगे किसी को कुछ नहीं समझती, उसने  भी कभी परिवार को अपना नहीं समझा। 

पूजा ने आते ही अपनी ननदों को उनकी मनपसंद कड़क अदरक की चाय रस के साथ पिलाने के बाद उन्हें नहाने के लिए कह दिया। वह जानती थी कि नहा- धोकर नाश्ता करने के बाद दोनों एक-दो घंटा आराम करेंगी।

जब तक दोनों बहनें नहा- धोकर बाल वगैरहा बनाकर आई तब तक पूजा ने गोभी-मूली के भँरवा परांठे, दही और दलिया तैयार कर दिया।

….तो तुम्हे याद है कि मुझे सुबह के नाश्ते में मीठा दलिया खाना पसंद हैं  , मैं तो सोच रही थी कि माँ के बाद भला कौन याद रखेगा?

नहीं दीदी, आप दोनों की पसंद- नापसंद का ख्याल करना मेरा फर्ज है और अगर भूल जाऊँ तो याद दिलाना आपका हक है…..

पूजा की बात सुनकर दोनों बहनें चुप रही।नाश्ता करने के बाद दोनों ने अपने साथ लाया एक-एक डिब्बा मिठाई का मेज पर रखते हुए कहा —

माँ के बाद मिठाई लाने का तो बिल्कुल भी मन नहीं था पर सोचा कि तुम्हे बुरा लगेगा इसलिए ले आए।

आप उदास ना हों, भगवान् की मरजी के आगे किसी की नहीं चलती पर तरुण और मैं हमेशा कोशिश करेंगे कि आपको माँ-बाबूजी की कमी कभी ना खले।

उनकी कमी कोई पूरी नहीं कर सकता……..तब तो घर की रौनक ही अलग थी।

चलिए आप दोनों थोड़ा आराम कर लीजिए,तब तक दोपहर के खाने की तैयारी कर लेती हूँ। 

मैंने आप दोनों के लिए मम्मी जी का कमरा विशेष रूप से साफ किया ….. 

तो अब हमारे लिए घर में जगह नहीं रही जो मम्मी-पापा के कमरे में रुकना पड़ेगा….. 

अरे दीदी, कैसी बात कह दी…. आपका घर है जहाँ मरजी उठो-बैठो, मैंने तो केवल यह सोचकर यहाँ आप दोनों का सामान रख दिया था कि शायद आप उनकी उपस्थिति का अहसास कर सकेंगी….. कोई बात नहीं, मैं मिट्ठू और काकू को बोलती हूँ….. आपका सामान उनके कमरे में रखवाती हूँ। 

वैसे जो रौनक मम्मी के सामने थी वो अब नहीं है इस घर में…. 

पूजा ने चुपचाप ननदों का सामान बेटों के कमरे में रखा और रसोई में आकर दोपहर के खाने की तैयारी में लग गई। दोनों बेटों भी नाराज लग रहे थे क्योंकि इस अलटा-पलटी में सब सामान ऊपर- नीचे हो गया था। पूजा ने इस बारे में उनसे कोई बात नहीं की, बस उन्हें बैठकर सामान व्यवस्थित करने को कह दिया। 

दो घंटे के बाद दोनों बहने कमरे से बाहर निकली और बड़ी ननद बोली —

एक मिनट आँख नहीं लगी, मम्मी ही घूमती रही आँखों के सामने….. कितनी रौनक रहती थी उनके सामने … खाना-वाना बन गया तेरा या तैयार नहीं हुआ? 

खाना तैयार है दीदी…. बस , मैं खीरा काटकर लाई। 

खाने की मेज पर भी दोनों ननदें इसी बात का बखान करती रही कि मम्मी के सामने वाली रौनक नहीं रही। शाम तक पूजा और उसके दोनों बेटे इस बात को सुन सुनकर उकता गए कि अब घर में रौनक नहीं रही। 

शाम को तरुण के आने पर सभी बैठकर चाय पकौड़े का आनंद ले रहे थे तभी तरुण ने अपनी बहनों से पूछा–

दीदी, पूरे साल भर बाद आई हो…. अब महीने से पहले नहीं जाने दूँगा…. चलो, बिहारी जी के मंदिर की तरफ घुमा लाता हूँ। 

तरुण, मम्मी के बिना घर में रौनक नहीं रही…. 

हाँ ये तो है दीदी…. पर एक न एक दिन सबको ही जाना है  आप आज आई हैं ना….. इसलिए आपको ज्यादा कमी खल रही है पर देखना, पूजा और दोनों बच्चों के साथ पहले जैसी रौनक लगेगी…….. 

अच्छा….. तो तुझे माँ-बाप की कमी नहीं खलती पर….. 

तरुण ने बीच में ही बड़ी बहन को टोकते हुए कहा —

दीदी…. आप तो मुझसे बड़ी और समझदार हैं, पर इस जगह तो सब मजबूर है ं ….. चलिए मंदिर चलते हैं कल की मेरी छुट्टी है। अगर आप कहोगी तो चाचा-चाची को इधर ही ले आऊँगा, आरती भी आई हुई है…. सबका मिलना हो जाएगा, क्या कहती हो? 

लगता, पूजा और तेरा बड़ा गठजोड़ हो गया चाची के साथ….. मम्मी से तो कभी बनी नहीं थी… 

छोड़ो ना दीदी, अब घर में वही बुजुर्ग बचे हैं दोनों…. पता नहीं कितने दिन के हैं । मम्मी और चाची की अनबन उनके साथ गई। जब  भाई- बहन और चाचा- चाची इकट्ठे हो जाएँगे तो घर में रौनक आ जाएगी, बस पक्का…. कल का लंच सब एक साथ करेंगे….. पूजा! चाची को फोन करके बता देना कि मैं सुबह ही उन सबको इधर लेने आऊँगा। 

तरुण की बात सुनकर बहनें कोई ताना मारती, उससे पहले ही भाई ने बहनों को मंदिर चलने के लिए खड़ा कर दिया। 

मंदिर से आकर पूजा ने दोनों ननदों की पसंद को ध्यान में रखते हुए बडे़ मन से खाना बनाया पर दोनों वही राग अलापती रही कि अब इस घर में रौनक नहीं है। आखिर मिट्ठू ने तो रसोई में आकर अपनी माँ से पूछ ही लिया-

कैसी रौनक चाहिए बुआ को….. हम सब उनसे बातें कर रहे हैं, उन्हें मंदिर लेकर गए, आपने उनकी पसंद का खाना बनाया….. 

ऐसा नहीं कहते , वो अपनी मम्मी को मिस कर रही हैं…. जैसे मामा के घर जाने पर तुम दोनों करते हो मुझे।। 

पर हम इतनी बार नहीं दोहराते….. 

अच्छा चलो, बरतन उठाने में मेरी हैल्प कर दो। 

अगले दिन तरुण दस बजे के करीब चाचा-चाची और उनकी बेटी तथा उसके बच्चों को ले आया। चाचा-चाची ने आते ही दोनों बहनों को गले से लगा लिया, साल भर बाद आने के लिए शिकायत की और उनकी ससुराल की कुशलता पूछी। पूजा ने चाय- नाश्ता करवाया तथा बोली — आप सब बातें कीजिये मैं खाने की तैयारी कर लेती हूँ….. 

नहीं बहू, तू अकेली तैयारी क्यों करेगी? तेरी तीनों ननदें मिलकर करवाएँगी….. सब्जी और चाकू मुझे पकड़ा दे, बैठी-बैठी मैं काट दूँगी। 

चाची की बात सुनकर दोनों बहनों ने एक दूसरे को देखा क्योंकि उनके अनुसार तो मायके में आराम करने के लिए आया जाता है। तभी चाची ने दोनों बहनों के मनोभावों को पढ़ते हुए अपनी बेटी आरती से कहा–

आरती! तुम भाभी के साथ काम करवाओ, तनुजा और तेजस मुझे बहुत दिनों के बाद मिली है…. मैं अपनी बेटियों के साथ जरा दुख- सुख कर लूँ। 

आज भी दोनों बहनें बात-बात पर घर में रौनक न होने की बात दोहराती रही। पूजा, दोनों भतीजे और तरुण तो दो दिन से इसी बात को सुन रहे थे पर चाची-चाचा और आरती  को भी शाम तक इसी राग को सुन सुनकर कोफ्त होने लगी थी। 

शाम को चाय इत्यादि के बाद तरुण चाचा के परिवार को उनके घर छोड़ आया। चाची ने दोनों बहनों को अपने यहाँ आने और दो-चार दिन चाचा-चाची के साथ ठहरने का निमंत्रण भी दिया। 

उनके जाते ही दोनों बहनों ने जो चाची का निंदा- पुराण शुरू किया, उसे सुनकर तरुण को बहुत गुस्सा आया और बात को खत्म करने के इरादे से उसने कहा —

दीदी! #घर ईंटों से नहीं दिलों से बनता है, क्या आपको याद है कि कभी मम्मी ने परिवार को जोड़ने की बात कही हो या बड़ी होने के नाते कभी चाची को छोटी बहन की तरह समझा हो या हमें बड़ों के ख़िलाफ़ कुछ कहने पर डाँटा हो….. जहाँ तक मुझे याद है वे हमेशा हमसे पूछती रहती थी कि तेरी चाची ने इस बात पे क्या कहा, उस बात पे क्या कहा और बाद में इन्हीं छोटी-छोटी बातों का सहारा लेकर चाचा-चाची और दादा-दादी से अलग हो गई 

अगर चाची भी केवल अपने बच्चों के बारे में सोचती तो अंतिम समय में दादी -दादा की देखभाल कौन करता, शायद आपको याद होगा कि पूरे छह महीने दादी बिस्तर पर रही थी। क्या आपको ध्यान नहीं कि बुआ के आने की खबर मिलते ही मम्मी कहीं बाहर घूमने का प्रोग्राम बना लेती थी। मैं कल से सुन रहा हूँ कि घर में रौनक नहीं, रौनक नहीं….. दो-चार बार तो स्वाभाविक है पर क्या मुझे समझ नहीं आ रहा कि आप पूजा को नीचा दिखाने के लिए बार-बार ऐसा बोल रही हैं। 

पूजा और दोनों बहनें हैरानी से तरुण को देख रही थी क्योंकि वह हमेशा शांत रहता था। दोनों बहनें उठकर अंदर जाते-जाते बोली —

हमने नहीं कहा था यहाँ बुलाने को…. एक ही दिन में बहनें भारी लगने लगी, अब एक भी दिन नहीं रुकेंगे यहाँ। 

ये क्या किया तरुण! वो दोनों आपसे बड़ी हैं….. हमारे बच्चों पर क्या असर पड़ेगा,  कल को वे भी बड़े छोटे का लिहाज़ छोड़ देंगे…. 

पर दोनों दीदी ही तो बड़ों के बारे में उलटा- सीधा बोल रही थी, मैंने तो केवल सच्चाई बताई है । 

जो भी हो आपने गलत किया….. इतना कहकर पूजा ने मौसी सास को फोन मिलाया और सारी बातें विस्तार से बताई , वह जानती थी कि मौसी के अलावा ननदें किसी की बात नहीं सुनेंगी और मौसी जी बहुत ही समझदार है। 

खैर…..  अगले दिन सुबह जब पूजा ननदों के लिए चाय लेकर उनके कमरे में गई तो छोटी ननद बोली–

चाय तो रख दे और हाँ…. वो तेरा पति क्या समझता  है कि उसके कहने से हम चले जाएँगे, जितने दिन के लिए आएँ है, रहकर जाएँगे। 

और क्या दीदी…. आपका घर है, कल से घर में इतनी रौनक है कि मैं आपको बता नहीं सकती। अच्छा बताओ, नाश्ते में क्या बनाऊँ? 

पूजा मन ही मन मौसी और भगवान् को धन्यवाद देते हुए रसोई की तरफ चल पड़ी। चार- पाँच दिन बाद मिट्ठू और काकू अपनी माँ के कानों में फुसफुसाए–

बुआ अपनी फेवरेट बात कैसे भूल गई, ” मम्मी के बाद तो घर में रौनक ही नहीं रही “

पूजा ने बेटों की तरफ आँखे निकाली और दोनों साॅरी कहते हुए वहाँ से भाग गए। 

करुणा मलिक

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