“घर ईंटों से नहीं, दिलों से बनता है।” – अंशु कंसल

“मां, आज टिफिन में सूजी का हलवा थोड़ा ज्यादा रखना,” सोनल ने रसोई में काम करती मां से चहकते हुए कहा। मां ने प्यार से उसके बाल सहलाए और मुस्कुराते हुए बोलीं, “पता है मुझे, तुम्हारी सहेली रश्मि को मेरे हाथ का हलवा कितना प्रिय है। पर सोचती हूं, जब तुम दोनों की शादी हो जाएगी, तब एक-दूसरे के बिना कैसे रहोगी?

” सोनल ने मां का हाथ थामते हुए दृढ़ता से कहा, “शादी रिश्तों को बदल सकती है, तोड़ नहीं सकती मां। हम हमेशा साथ रहेंगी, हम एक-दूसरे के बिना रह ही नहीं सकतीं।” समय अपनी गति से चलता रहा। दोनों सहेलियां बड़ी हुईं। एक दिन सोनल रश्मि के घर गई।

रश्मि छत की मुंडेर पर बैठी दूर के क्षितिज को देख रही थी। सोनल की आवाज सुनकर वह चौंकी। छत पर बैठकर बचपन की यादों के बीच भविष्य की बातें होने लगीं। सोनल ने पूछा, “आगे का क्या सोचा है, रश्मि ?” रश्मि ने ठंडी आह भरकर कहा, “पापा मेरे लिए रिश्ता देख रहे हैं।

मैं चाहती हूं मेरा पति इतना अमीर हो कि मेरे पास नौकर-चाकर हों और मैं ऐशो-आराम में लिपटी रहूं।” सोनल ने सादगी से जवाब दिया, “मैं तो बस इतना चाहती हूं कि मेरा जीवनसाथी मेरा सम्मान करे और मुझे समझे प्यार ही असली धन है । ” समय का पहिया घूमा। रश्मि की शादी एक विशाल कोठी वाले रईस परिवार में हुई

और सोनल मध्यमवर्गीय घर की बहू बनी। शादी के बाद जब पहली बार दोनों का मिलन हुआ, तो रश्मि के शब्दों में रिश्तों की मिठास कम और अपनी हैसियत का प्रदर्शन ज्यादा था । “सोनल, तूने मेरी यह साड़ी देखी? कितना महंगा रेशम है ! और तेरा यह मंगलसूत्र ? कितना साधारण है, ” रश्मि ने घमंड से अपनी महंगी घड़ी और हीरों की चमक दिखाते हुए कहा ।

सोनल ने बस मुस्कुराकर इतना कहा, “मेरे पास जो है, उसमें मेरा मन तृप्त है रश्मि। सुख गहनों में नहीं, मन की संतुष्टि में होता है । ” रश्मि की बातों में अहंकार की दीवारें उठती गईं, सोनल ने दूरी बना ली। वर्षों बीत गए। सोनल अपने पति के साथ एक दिन रश्मि के शहर पहुँची।

उत्सुकता और पुरानी यादों के साथ वह रश्मि की उस आलीशान कोठी के सामने खड़ी थी। अंदर का दृश्य स्तब्ध करने वाला था।

कोठी तो विशाल थी, लेकिन वहां सन्नाटा पसरा था। रश्मि अब पहले वाली रश्मि नहीं थी। उसका चेहरा झुर्रियों से भरा था और आंखों में एक ऐसी खामोशी थी जिसे किसी भौतिक सुख से नहीं भरा जा सकता था। सोनल को देखते ही रश्मि फफक कर रो पड़ी। “सोनल, मैं कितनी मूर्ख थी!” रश्मि सिसकते हुए बोली।

“मैंने ईंटों की कोठी को घर मान लिया, पर इस घर में रहने वाले सब एक-दूसरे के लिए अजनबी हैं। न पति का वक्त है, न बच्चों का प्यार। मैं बीमार हूँ, पर दीवारें बात नहीं करतीं।” सोनल ने रश्मि को अपने गले से लगा लिया। उसने उसके कांपते हाथों को अपने हाथों में लेते हुए कहा, “रश्मि, घर ईंट-पत्थर से नहीं, विश्वास और समर्पण के धागों से बुना जाता है।

तूने कोठी तो बड़ी बनाई, पर रिश्तों का आंगन खाली छोड़ दिया । ” रश्मि की आँखों से पश्चाताप के आंसू बह रहे थे। आज उस कोठी में धन की चमक नहीं, बल्कि दो सहेलियों के पुनर्मिलन की गर्माहट थी। सोनल ने उसे ढांढस बंधाया, “दुखी मत हो, अब तेरी सहेली वापस आ गई है।

हम फिर से उन खुशियों को बटोरेंगे जो हमने पीछे छोड़ दी थीं।” दोनों एक-दूसरे के कंधे पर सिर रखकर बहुत देर तक रोती रहीं, जैसे बरसों का सूखा अब प्रेम की बारिश में भीग रहा हो। आज रश्मि को समझ आ गया था कि जिंदगी की असली रौनक तिजोरियों में नहीं, अपनों के साथ साझा किए गए पलों में होती है, क्योंकि सच तो यही है कि घर ईंटों से नहीं दिलों से बनता है। 

अंशु कंसल

 #“घर ईंटों से नहीं, दिलों से बनता है।”  

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