रिश्तों की कीमत व्यक्ति को कब,किस रूप में चुकानी पड़ जाऍं, कोई नहीं बता सकता है? मैं सीमा अपने व्यस्त जीवन में उलझी हुई आज फिर काॅलेज के लिए लेट हो गई।काॅलेज में गाड़ी से उतरते हुए मैं जल्दी -जल्दी अपने क्लास रूम की ओर बढ़ रही थी,तभी मेरी नजर अचानक से एक लड़की पर पड़ी,
जिसे देखकर कुछ देर के लिए मैं भौंचक्की -सी रह गई। फिर ज्यादा न सोचते हुए मैं जल्दी से अपने क्लास रूम की ओर बढ़ गई।आज मुझे क्लास में रामधारी सिंह दिनकर रचित उर्वशी पढ़ाना था।मेरे दिलो-दिमाग में हलचल मची हुई थी,कुछ देर पहले मैंने जिस लड़की को देखा था,
उसका चेहरा परिचित -सा लग रहा था।वह लड़की भी उर्वशी,मेनका-सी अप्सरा लग रही थी। मैं अपनी क्लास खत्म कर अपने विभाग में आकर बैठ जाती हूॅं,तभी वही लड़की चेहरे पर मीठी मुस्कान के साथ मेरे पास आती है।उसे देखकर मुझे ऐसा एहसास हुआ मानो भगवान ने उसे फुर्सत के पलों में गढ़ा होगा।
उसने आते ही कहा -“नमस्ते मैम! मैं अनीशा हूॅं। मैं आपके मार्गदर्शन में हिन्दी में पीएच डी करना चाहती हूॅं।”
मैंने कहा -“कर लो, फिर दिक्कत क्या है?
अनीशा -“मैम!मेरे डैड कहते हैं कि हिन्दी में पीएच डी करके क्या करोगी?”
मैंने फिर कहा -“मुझे बता दो कि हिन्दी में पीएच डी करके क्या करोगी?
अनीशा -“मैम! मैं डैड को दिखाना चाहती हूॅं कि हिन्दी भी बहुत समृद्ध भाषा है। मैं भी आगे आपकी तरह प्रोफेसर बनना चाहती हूॅं।”
कहकर जोर से खिलखिला उठी।
मैंने उससे कहा -“दफ्तर में जाकर सारी औपचारिकताऍं पूरी कर लो!”
मैंने जाते-जाते उससे उसके डैड का नाम पूछ लिया।उसने रजत नाम बताया और झट से निकल गई।
उसके जाने के बाद ऐसा महसूस हुआ मानो उसकी खिलखिलाहट से मेरे मन की सुप्त यादों की घंटियाॅं खनखना उठीं हों।उसकी उपस्थिति से तन-मन में एक एक अजीब -सी खुशबू का एहसास हो रहा था।अब मुझे पक्का विश्वास हो चला था कि यह उसी रजत की बेटी है,जो वर्षों पूर्व उसका पुराना प्रेमी था। अनीशा हू-ब-हू रजत की ही काॅपी थी। वक्त कितना तेजी से गुजर गया कि रजत की बेटी इतनी बड़ी हो गई,उसे पता ही नहीं चला!सच में लड़कियों की उम्र में पंख लगे होते हैं,कब पंख फैलाकर बड़ी हो जातीं हैं,पता ही नहीं चलता है!
रिश्तों की कीमत रजत तो अदा नहीं कर पाया, लेकिन मैं इसे पीएच डी कराकर अपने पवित्र रिश्तों की कीमत जरूर अदा करूॅंगी।
घर आने के बाद से मेरे दिल में हलचल मची हुई थी। बिस्तर पर लेटकर मैं अतीत की यादों में गुम होने लगती हूॅं। मैं उस समय एम ए की छात्रा थी।काॅलेज में ही रजत से मेरी भेंट हुई थी।रजत देखने में बहुत ही खूबसूरत और स्मार्ट था, बिल्कुल अंग्रेज की तरह दिखता था।काॅलेज की सारी लड़कियाॅं उस पर जान छिड़कतीं थीं, परन्तु रजत मेरी तरफ आकर्षित था।रजत मुझे भी बार-बार चिढ़ाते हुए कहता -“सीमा!तुम हिन्दी पढ़कर आगे क्या करोगी?”
मैं भी उसे चिढ़ाते हुए कहती -“तुम भी Msc करके कौन-सा तीर मार लोगे?”
वक्त अपनी लय में गुजर रहा था।कुछ ही दिनों में मैं और रजत अच्छे दोस्त बन गए।काॅलेज खत्म होने पर भी हम दोनों मिलने लगें।मेरे हृदय की मरूभूमि में प्रेम का छोटा-सा बीज अंकुरित होने लगा। उसमें नन्हें -नन्हें प्यार की कोपलें निकलने लगीं। धीरे-धीरे प्यार का पौधा हरा-भरा वृक्ष बन गया।हमारी जिंदगी प्यार की खुशबू से महकने लगी।एक दिन अपने प्यार का इजहार करते हुए रजत ने कहा -“सीमा! मैं अपने प्यार को रिश्ते का नाम देना चाहता हूॅं!”
रजत के इस प्यार भरे प्रस्ताव से मेरे कानों में शहनाईयाॅं बजने लगीं। मैंने भी तुरंत ही हामी भर दी।वह दिन मेरी ज़िन्दगी का सबसे खूबसूरत दिन था।मेरे पैर जमीं पर नहीं पड़ रहें थे। मैं हर पल रजत के ख्यालों में डूबीं रहती।नौकरी लगने तक रजत ने शादी के लिए इंतजार करने को कहा था। मैंने भी पीएच डी में दाखिल ले लिया था और रजत की नौकरी लगने का इंतजार करने लगी।मेरे घरवाले इस रिश्ते के लिए तैयार थे।रजत ने भी शादी तक अपने परिवार को मना लेने की बात कही थी।
कुछ समय बाद मेरी पीएच डी पूरी हो चुकी थी, परन्तु रजत से संपर्क अचानक से टूट गया।उसके दोस्तों से पता चला कि वह नौकरी न मिलने के कारण काफी निराश था,इस कारण अचानक से इंग्लैंड चला गया।काॅलेज में मेरी नौकरी लग गई। मैं पाॅंच साल तक पल-पल रजत का इंतजार करती रही।रजत का इंतजार करते-करते मेरे ऑंसू सूखने लगें थे, परन्तु मैं रजत को दिल से भूला नहीं पा रही थी। माता-पिता के दबाव में आकर मैंने सागर से शादी कर ली।सागर नाम के ही अनुसार निश्छल,निर्मल और शांत स्वभाव के थे। जिंदगी की गाड़ी पटरी पर चलने लगी थी कि अकस्मात् ही एक्सीडेंट से अचानक सागर की मौत रूपी काली काली ऑंधी ने मेरे जीवन को एक बार फिर से क्षत-विक्षत कर दिया। बार-बार रिश्तों की भयानक कीमत मुझे चुकानी पड़ रही थी।बड़ी मुश्किल से मैंने खुद को सॅंभाला। माता-पिता गुजर चुके थे। भाईयों की अपनी दुनियाॅं थी।मेरी दुनियाॅं काॅलेज और मेरे छात्र बन गए थे। मैं अपने शोधार्थी के शोध में काफी सहयोग करती थी,इस कारण अधिकांश शोधार्थी मेरे मार्गदर्शन में शोध करना चाहते थे।अपने गुजरे हुए कल का अवलोकन करते हुए मैं नींद के आगोश में समा गई।
अगले दिन चिड़ियों की चहचहाहट से मेरी नींद खुल गई।मन का बोझ कुछ हल्का -सा लग रहा था।काॅलेज में शोध के सिलसिले में अनीशा से बराबर भेंट होती थी।एक दिन अनीशा ने कहा-“मैम! मैं कल आपसे मिलने आपके घर आ जाऊॅं?
मैंने कहा -“आ जाओ। वहाॅं पर सभी बातें आराम से समझा भी नहीं सकती हूॅं!”
अनीशा महादेवी वर्मा पर शोध कर रही थी।अब वह शोध के सिलसिले में बराबर मेरे घर आने लगी थी।वह बहुत बातूनी लड़की थी। कभी -कभी जिज्ञासावश पूछ बैठती-“मैम! महादेवी वर्मा शादीशुदा होते हुए भी दूसरी बार ससुराल क्यों नहीं गईं?”
मैंने कहा -“शायद दूसरी बार ससुराल जातीं तो महादेवी वर्मा नहीं बन पातीं!”
शोध के अलावे अनीशा ढ़ेर सारी बातें करती। बातों -ही-बातों में उसने बताया कि उसके डैड ने इंग्लैंड में शादी कर ली थी।जब वह पाॅंच साल की थी ,तभी दोनों का तलाक हो गया था।पाॅंच साल की उम्र से ही वह भारत में नाना-नानी के साथ रहती है। कुछ दिनों पहले उनका देहांत हो गया।उसके बाद से डैड भी सदा के लिए भारत लौट आऍं। यहीं पर उन्होंने अपनी कंपनी शुरू की है।
एक दिन अचानक रजत मुझसे मिलने आ गया। बातों -ही-बातों में अनीशा से हम एक-दूसरे के बारे में काफी कुछ जान चुके थे। मैं तो रजत को देखकर एकबार भावविभोर -सी हो गई। उम्र का थोड़ा -सा असर तो उस पर हुआ था, परन्तु आज भी उसके चेहरे में वही आकर्षण था। मैंने खुद को सॅंभालते हुए तटस्थ रहने की कोशिश की।मेरी तरफ देखते हुए रजत ने कहा -“सीमा!मुझे माफ़ कर दो। नौकरी न मिलने के कारण मैं उस समय काफी तनाव में था।तुम्हारा रिश्ता ठुकराकर मैंने बहुत बड़ी क़ीमत चुकाई है।आज मुझे रिश्तों की कीमत समझ में आने लगी है।मुझे ऊॅॅंचाईयों से प्यार था, परन्तु कब मेरे पाॅंव के नीचे से जमीन खिसक गई,मुझे पता ही नहीं चला। मैं तुम्हारा गुनाहगार हूॅं।मुझे माफ़ कर दो।”
मैंने कहा -“रजत!इतने दिनों बाद माफी का क्या मतलब है?मुझे बस इतनी खुशी है कि अब तुम्हें रिश्तों की कीमत समझ में आ गई है!”
रजत बुझे मन से वापस लौट गया।रजत के जाने के बाद मेरे अंतस की भीतरी तहों में दबी प्यार की यादें कुलबुलाने लगीं। इंसान कितनी ही उम्र का क्यों न हो जाऍं, परन्तु पहला प्यार कभी नहीं भूलता है।मेरे शांत जीवन में कभी-कभी रजत की यादें हिलोरें लेने लगतीं, परन्तु मैं यही सोचकर कि प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में कुछ ऐसा घटित होता है,जिन्हें भूलना ही पड़ता है,उन यादों को भूलने की कोशिश करती।
कुछ वर्ष पश्चात् अनीशा का शोध-कार्य पूरा हो चुका था।उसके उपलक्ष्य में अनीशा ने घर में पार्टी रखी थी।उस पार्टी में उसने मुझे विशेष रूप से आमंत्रित किया था।मेरे मन में अंतर्द्वंद्व चल रहा था कि जाऊॅं या न जाऊॅं?खैर मैंने अपने दिल को समझाया कि अब तेरी वो उम्र नहीं रही कि फिसल जाओ।
पार्टी में अनीशा अपने दोस्तों के साथ मस्त थी।रजत मेरे पास आकर बहुत देर तक बैठा रहा। बार-बार एक ही बात कहता -“सीमा!मुझे माफ़ कर दो!”
मैंने कहा -“रजत!जो बीत गया,उसके लिए अब पश्चाताप करने से क्या फायदा?हम दोनों दोस्त रहेंगे।”
अब फिर से मैं अपने कामों में व्यस्त हो गई।अनीशा से संपर्क लगभग टूट चुका था।काफी दिनों बाद एक दिन फोन पर रोते हुए अनीशा ने कहा -“मैम! डैड काफी दिनों से बीमार हैं।सिटी अस्पताल में भर्ती हैं। दिनों-दिन उनकी हालत खराब होती जा रही है।मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा है कि क्या क्यूॅं?”
मैंने उसे आश्वासन देते हुए कहा -“तुम घबराओ मत! मैं कल अस्पताल आती हूॅं।”
अगले दिन अस्पताल जाकर देखती हूॅं कि रजत बिस्तर पर बेसुध लेटा हुआ है।अनीशा ने रोते-रोते बताया -“मैम! डॉक्टर ने लीवर कैंसर की अंतिम अवस्था बताई है।डैड को भी अपनी बीमारी के बारे में पता चल चुका है।वो आपसे बात करना चाहते हैं!”
मैं कुछ देर बैठकर रजत के जागने का इंतजार करने लगी।रजत ऑंखें बंद कर हमारी बातें सुन रहा था।उसने धीरे से ऑंखें खोली और मेरा हाथ पकड़कर भावुक होते हुए कहा -“सीमा! वैसे तो तुम पर मेरा कोई हक नहीं है ,परन्तु तुम्हें रिश्तों की एक और कीमत अदा करनी होगी।”
मैंने कहा -“बोलो रजत! मैं तुम्हारे लिए क्या कर सकती हूॅं?”
रजत -“सीमा!मुझे बस तुम पर ही भरोसा है।तुम मेरी बेटी को कानूनन गोद ले लो।वह बहुत मासूम है।अकेली इस जालिम दुनियाॅं का सामना नहीं कर पाएगी!”
मैंने रजत को आश्वासन देते हुए कहा -“तुम निश्चिन्त रहो।आज से अनीशा मेरी बेटी है!”
मेरा आश्वासन सुनते ही रजत की जिंदगी के दुख, पीड़ा, उम्मीदों का सिलसिला एकाएक खत्म हो गया और वह चिरनिंद्रा में लीन हो गया।
अकल्पनीय,भीषण हादसों का सामना कर सदा खिलखिलाती रहनेवाली अनीशा पत्थर-सी हो गई। मासूमियत भरी सुहानी डगर धीर-गंभीर राहों पर चल निकली। मैं अनीशा को अवसाद के कुऍं से ममत्व के प्रेम भरे स्पर्श से बाहर निकालने की कोशिश करने लगी। कुछ दिनों बाद मैंने अनीशा की सलाह से उसे गोद ले लिया।अनीशा को गोद लेने के बाद मैं सोच रही थी कि एक रजत ने तो सचमुच रिश्तों की कीमत चुकाई।खुद नहीं तो अपनी बेटी को मेरी झोली में डालकर मेरी ज़िन्दगी खुशहाल कर गया।मेरी ज़िन्दगी की सूनी बगिया को अनीशा अपनी सुगंध से सुवासित करने लगी। मैं समझ नहीं पाई कि रिश्तों की असली कीमत किसने चुकाई? मैंने या रजत ने?
समाप्त।
लेखिका -डाॅ संजु झा (स्वरचित)