खालीपन – करुणा मलिक 

निधि! सचमुच तुम बडे़ दिल वाली हो। मुझे तो तुम्हारे आने के बाद पता चला कि भाभी का सुख क्या होता है… बड़ी भाभी को तो कुछ नहीं पता कि ननदों का लेन- देन क्या होता है… 

पर दीदी…. ऐसा कैसे हो सकता है कि  अमृता भाभी की मम्मी ने उन्हें कुछ भी नहीं सिखाया? मेरी मम्मी ने तो मुझे लेन देन के बारे में खूब अच्छे से समझा दिया था। 

तुम भी बड़ी भोली हो, जानते तो सब कुछ हैं पर जान के अनजान बनते हैं कुछ लोग….. चलो, भगवान् ने इस बार तो हमें अच्छी भाभी दे दी है। 

शिवांगी ने अपनी नई छोटी भाभी के गुणगान किए और नेग में मिले सारे उपहार समेटकर अपने सूटकेस में रख आई। वैसे तो शादी में आज सभी मेहमान जा चुके थे पर शिवांगी के पति एक महीने के लिए बाहर जा रहे थे और उसका बेटा छोटा था इसलिए वह मायके में तकरीबन बीस दिन अधिक रुकने वाली थी।  रात को दोनों भाभियों के कमरे में जाने के बाद शिवांगी अपनी मम्मी ममता से बोली —

निधि के मायके वालों ने काफ़ी अच्छे गिफ्ट भेजे हैं, मम्मी! अमृता भाभी की शादी में एक सूट तक पहनने लायक नहीं मिला था….. 

गलत बात है शिवांगी, आज कहा सो कहा, कभी भूलकर भी दोनों भाभियों की तुलना मत करना, ना एक दूसरे के सामने उनकी कमियाँ गिनवाना …. 

ये क्या बात हुई मम्मी, बताओ मैं क्या झूठ बोल रही हूँ। 

उसकी शादी को पाँच साल हो चुके हैं, आजकल पल-पल में चाल चलन बदलते हैं। फिर अमृता के मायके वाले सीधे सरल लोग हैं पर ये तो तुम गलत कह रही हो, सारा सामान बरतने लायक आया था और आज तक भी, बेशक कम आ जाए पर अच्छा सामान आता है। और तुमने सुट सिलवाया भी था। 

आप तो हमेशा मुझे ही गलत ठहराती हो मम्मी….. दुनिया की माँए अपने बच्चो ं का साथ देती हैं पर मेरी माँ को मुझमें कमियाँ ही कमियाँ नज़र आती हैं। 

इतना कहकर शिवांगी मुंह फेरकर लेट गई। ममता ने भी चुप रहने में भलाई समझी क्योंकि मायके आई बेटी को ज्यादा कहना भी अच्छा नहीं था। 

अगले दिन नई बहू निधि और शेखर हनीमून के लिए चले गए।  निधि और शेखर बहुत सवेरे घर से निकले थे और निधि को कमरा बिस्तर समेटने का समय ही नहीं मिला था। उनके जाने के बाद नौ बजे के करीब कामवाली आई और निधि के कमरे की सफाई करने के बाद ममता से बोली –

आँटी जी, छोटी भाभी का कमरा तो पूरा बिखरा पड़ा था। कहीं चप्पल, कहीं तौलिया, पूरे बेड पर कपड़ो का बाजार सा लगा है…. 

हाँ…. बड़े सवेरे की फ्लाइट थी उनकी…. तू अपना काम  ले, कपड़े वगैरहा हम सिंगवा लेंगे। 

ममता की बात सुनकर चंपा अपने काम में लग गई। शिवांगी मेज पर बैठी चाय पी रही थी तुरंत बोली –

बताओ मम्मी, निधि में इतनी भी अक्ल नहीं कि थोड़ा सा कमरे को ढंग से करके जाती, अब ये चंपा दस घरों में बताएगी कि उनकी बहू तो फूहड़ है बिलकुल….. 

चुप कर….. कम से कम चंपा को तो जाने दे, ममता ने आँखे निकालकर बेटी को घूरते हुए कहा। 

चंपा के जाने के बाद ममता ने कहा-

पता नहीं, इस लड़की का बचपना कब खत्म होगा? निधि के बारे में तो बताए ना बताए पर ये जरूर बताएगी कि आते ही सास-ननद बहू के नुक्स निकालने लगी। 

अब बताओ भाभी, जो जैसा होगा वैसा ही तो कहा जाएगा। मैंने आपको तो कभी नहीं कहा, बल्कि मैं तो सबको यही कहती हूँ कि भाभी हो तो अमृता भाभी जैसी, कोई भी मुकाबला नहीं किसी से….. 

ऐसा नहीं कहते शिवांगी, निधि धीरे-धीरे सब कुछ सीख जाएगी। अभी दस दिन ही हुए है शादी को….. मुझसे तुम इतना प्यार इसलिए करती हो क्योंकि  जब मैं आई तो तुम्हारी शादी नहीं हुई थी और हमें इकट्ठे रहने का मौका मिला। 

नहीं भाभी…. मुझे तो पहले से ही निधि के लक्षण दिख रहे हैं, अपने को कुछ ज्यादा ही समझती है, बड़ी होगी अपने लिए होगी, हम क्या उसका दिया खाते हैं? 

ममता ने विषय बदलने की खातिर बड़ी बहू से कहा-

अमृता, चलो नाश्ता कर लो बेटा। फिर आज शाम को अपनी बुआ के भी जाना है, तो कपड़े-लत्ते भी लगाने है ं। 

अमृता के जाने पर ममता ने दुबारा शिवांगी को समझाने के इरादे से कहा —

शिवांगी बेटा, भाभियों के साथ मिलकर रहना चाहिए। माँ-बाप सदा नहीं रहते वरना हमेशा के लिए पीहर छूट जाता है। अपना सम्मान अपने हाथ होता है। क्या जरूरत थी अमृता के सामने निधि को उलटा सीधा कहने की ….. 

अरे मम्मी, आपका तो यही  राग खत्म नहीं होता। मैं तो इस तरह घुट-घुटकर नहीं जी सकती…. 

समझाना मेरा काम था बाकी तेरी मरजी….. 

समय अपनी चाल चलता रहा पर शिवांगी की इस आदत में कोई सुधार नहीं आया। वह इसकी बातें उसके आगे और उसकी बातें इसके आगे करने में कुशलता पाती चली गई। एक आध बार तो निधि ने दबे शब्दों में अमृता से भी कहा –

भाभी, शिवांगी दीदी की नेचर कुछ अलग सी है ना, आसानी से किसी को पसंद नहीं करती…. 

नहीं निधि, ऐसा नहीं है बस बचपना है अभी….. अमृता तुरंत बात काट देती थी। 

एक दिन ममता और उनके पति अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करके संसार से चले गए।  कुछ दिनों तक तो शिवांगी ने बहुत संभल कर बात की पर जब ममता की मृत्यु तिथि के दूसरे महीने आई तो फिर अपने मूल स्वभाव के अनुसार इधर की उधर करने लगी। 

एक दिन उसने   रसोई में खडी निधि से कहा-

निधि, बड़ी भाभी कहीं तुम्हारी सास तो नहीं बन बैठी? आज सुबह मुझे बहुत बुरा लगा जब उन्होंने दस औरतों के सामने तुम्हें ऐसा आर्डर दिया मानो तुम नौकरानी हो…. अरे, तुम इतने अच्छे घर की और अमृता भाभी….. बस क्या बताऊँ, उनके घर के बारे में…. 

जिस समय शिवांगी का बखान चल रहा था ठीक उसी समय अमृता किसी काम से रसोई में आ रही थी, कुछ शब्द उसके कानों में पड़े पर उसने अनसुना कर दिया क्योंकि उसकी शादी को बीस साल होने को थे पर इस तरह की कोई बात कभी घर में नहीं सुनी थी। दरअसल बात यह थी कि ममता ने बेटी-बहुओं में एक दुसरे की बात को कभी तूल ही नहीं पकड़ने दिया। 

अब जब भी शिवांगी भाभियों को फोन करती तो इसकी, उसके सामने और उसकी, इसके सामने करती थी। अमृता को जीवन का अच्छा तजुर्बा था, वह निधि के व्यवहार में भी फर्क महसूस कर रही थी पर उसे सास की कही बात हमेशा याद आती –

अमृता, घर बिगड़ने में पल भर नहीं लगता पर बनाने में उम्र गुजर जाती है। उसने एक दो बार थोड़ा बात को घुमाकर पति और निधि के सामने रखने की कोशिश की पर बिना सबूत के कैसे साबित करे? 

ममता को गए साल हो गया। शिवांगी बच्चों और पति के साथ बरसी पर आई। अगले दिन उसने बच्चों और पति को भेज दिया और खुद दो- चार दिन बाद आने की कह दी। 

अगले ही दिन अमृता दोपहर में आराम कर रही थी। शिवांगी अमृता को सोया जानकर निधि के कमरे में चली गई-

क्या कर रही हो निधि, तुम्हारी जेठानी तो खर्राटे मार रही है। देखा नहीं, आज तक चेहरे पर कितना ग्लो है। जब तुम्हारी शादी हुई, कैसी चमक थी तुममें…. ध्यान रखा करो अपने शरीर का….. तुम बराबर की मालकिन हो। 

हाँ दीदी, ध्यान रखती हूँ पर आपको तो पता ही है कि इस थाइरॉइड के कारण हमेशा थकान रहती है, बस पड़े रहने का मन करता है। भाभी भी बहुत ध्यान रखती हैं मेरा…. 

बस…. ये सफाई तो रहने दो निधि। हवन वाले दिन तुम्हारी मम्मी खुद कह रही थी कि निधि की हड्डियां निकल आई….. 

बस…. इतना सुनते ही निधि की आँखों से आँसू बहने लगे और शिवांगी अपने शब्दों से राहत के स्थान पर आहत कर रही थी। 

उस दिन निधि रात के खाने की तैयारी के समय रसोई मे ं नहीं आई। अमृता खाने की तैयारी में लगी थी। शिवांगी को निधि के कमरे से निकलता देख अमृता बोली –

शिवांगी, निधि की तबियत ठीक नहीं लगती वरना हर रोज तो मुझसे पहले रसोई में पहुँच जाती है, लो जरा ये छौंक चलाओ, मैं उसे देखकर आई। 

इतनी बड़ी महारानी है वो कोई…. आपने कुछ ज्यादा ही सिर चढ़ा रखा है भाभी। छोटी-मोटी बीमारियां सबको हैं आजकल….. ये क्या मतलब कि कमरे से बाहर ही ना निकलो।  आप भी बीमार होती है पर मैंने आपको कभी इतनी ढीठ  नहीं देखा  । आपने तो बुखार तक में रसोई संभाली है। 

बस इतना सुनना था कि अमृता की आँखों से पानी निकल गया —

मेरी भी उम्र हो रही है शिवांगी, कितना करूँ?

हद कर दी भाभी…. आप दीदी के सामने मुझे नीचा दिखाना चाहती है, मैंने बहुत सहन कर लिया। मुझे सब पता है कि आप मेरे बारे में क्या- क्या कहती हैं….. 

मुझे भी सब पता है कि तुम अपनी सारी हदें पार कर रही हो, क्या कहा तुमने शिवांगी से कि मैं तुम पर रोब जमाती हूँ, नौकरानी बनाकर रखा है….. 

तो आपने भी तो कहा कि मैं घमंडी हूं, अपने आप को महारानी समझती हूँ….. 

जिस समय दोनों भाई घर में घुसे, वहाँ पूरी महाभारत छिड़ी हुई थी। पहले तो घबरा गए, फिर दोनों ने बाँटकर घर में शांति करवाई। बच्चों ने भी अपने माँ- बाप का ऐसा रौद्र रूप पहली बार देखा था। चारो ं बच्चे नादान तो नहीं थे, आते- जाते बुआ की बातें उनके कानों में भी पड़ती थी। अचानक अमृता की बड़ी बेटी वाणी ने कहा-

बुआ, हमारे घर में लड़ाई आपने करवाई है….. 

शिवांगी रोते हुए माँ के कमरे में चली गई। उस रात खाना ज्यों का त्यों बना पड़ा रहा। 

मुश्किल से रात कटी और सुबह सवेरे ही शिवांगी ने छोटे भतीजे से कहकर आटो मँगवाया और चली गई। उसे आशा थी कि भाई फोन करके रुकने को कहेंगे, भाभियाँ मनाएंगी पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। 

उलटा शिवांगी के जाने के बाद बच्चों और दोनों भाइयों ने अमृता और निधि को समझाया कि असली कसूरवार शिवांगी है और घर को बचाने के लिए उससे दूर रहने में ही भलाई है। दोनों भाइयों ने निर्णय लिया कि तीज- त्योहार पर, वे स्वयं शिवांगी के घर जाया करेंगे पर भूल से भी उसे अपने घर नहीं बुलाएँगे क्योंकि जवान होते बच्चों की बात को टालना सागर और शेखर के बस में भी नहीं था। 

शिवांगी शायद आज भी उस घड़ी को कोसती है #जब एक भूल ने छीन लिया था मायके का आँगन….. काश! उसने माँ की बातों में छिपे भेद को समझ लिया होता कि मायके के बिना एक लड़की के जीवन में कितना खालीपन आ जाता है। 

करुणा मलिक 

 #जब एक भूल ने छीन लिया था मायके का आँगन

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