“यह बेटियां कब से अपने मां-बाप का सहारा बनने लगी”।अपने पति नमन के मुंह से ऐसी कड़वाहट भरी बात सुनकर शालिनी हैरान रह गई।वो जानती तो थी की नमन एक संकीर्ण सोच वाला व्यक्ति है पर उसकी सोच इतनी गिरी हो सकती है उसे यह नही पता था।
“क्यों.. क्या बेटियां अपने माता-पिता की औलाद नहीं होती और औलाद होने के नाते उनका अपने माता-पिता का सहारा बनने का फर्ज़ होता है”,शालिनी ने पलट कर जवाब दिया।
शालिनी और नमन के विवाह को लगभग 2 साल होने वाले थे और इन 2 सालों में शालिनी नमन की सोच से अच्छी तरह परिचित हो गई थी पर आज तक ऐसा मौका नहीं आया था कि उसे ऐसी स्थिति का सामना करना पड़े।शालिनी अपने माता-पिता की इकलौती संतान थी और उसके माता-पिता ने उसकी परवरिश बहुत अच्छे से की थी ।
वह एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में काम करती थी और साथ ही साथ उसमें संस्कार भी अच्छे थे जिसकी वजह से वह अपने सास ससुर की चहेती बहू बन गई थी और ननद पल्लवी के साथ भी उसका रिश्ता बहुत अच्छा था।
शालिनी के पिता आज सुबह ही घर में चक्कर खाकर गिर गए थे और अब अस्पताल में भरती थे।सुबह से शालिनी वहीं थी।उसे जैसे ही पता लगा वह दफ्तर जाने की बजाय सीधा मायके चली गई थी और अभी कुछ देर पहले ही अस्पताल से वापस आई थी।पिता की हालत अब स्थिर थी
और अब वो रात को अस्पताल जाने की तैयारी कर रही थी।नमन दफ्तर से आ गया था ..हालांकि वह सुबह से सारी स्थिति को अच्छी तरह जानता था लेकिन उसने अपनी तरफ से एक भी फोन करना ज़रूरी नहीं समझा और दफ्तर में काम का बहाना बनाकर बच गया।
खैर, इस वक्त शालिनी जानती थी कि उसके माता-पिता को उसकी कितनी ज़रूरत है ।मां अस्पताल में परेशान सी बैठी थी।अब उन्हें भी आराम की ज़रूरत थी। पिता की स्थिति पहले से बेहतर थी लेकिन अभी उन्हें दो-तीन दिन अस्पताल में रहना था।शालिनी भी वहीं जाना चाहती थी
पर नमन की बात से उसका मन कड़वाहट से भर गया।यह वही नमन था जो अपने दफ्तर में औरतों के बीच बहुत प्रसिद्ध था क्योंकि अपने दोस्तों और रिश्तेदारों के सामने उसका एक अलग ही रूप था। औरतों के मर्दों के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने की बात करता..उनके अधिकारों की बात करता लेकिन उसकी असली सच्चाई तो कोई नहीं जानता था।
समय-समय पर अपनी संकीर्ण सोच से वह शालिनी को अवगत करा चुका था।शलिनी ने अपना सामान तैयार किया और अस्पताल के लिए निकलने लगी तो जाने से पहले नमन ने फिर से वही बात दोहराई और बोला,” कभी तुमने पल्लवी दीदी( नमन की बहन) को अपने ससुराल से मम्मी पापा की सेवा के लिए आते देखा है जो तुम अपने माता-पिता के लिए जा रही हो”।शालिनी बात को आगे नहीं बढ़ाना चाहती थी इसलिए संयम रख कर बोली,”देखो नमन, पल्लवी दीदी की बात अलग है उन्हें ससुराल से आने की क्या ज़रूरत है हम लोग हैं ना मम्मी पापा का ख्याल रखने के लिए।लेकिन मेरे मां-बाप..उनका तो मेरे सिवाय कोई भी नहीं है और यह बात तुम अच्छी तरह जानते हो। अगर मैं आज उनका ख्याल नहीं रखूंगी तो कौन रखेगा। सोचो, अगर हम मम्मी पापा के साथ ना हों तो पल्लवी दीदी को भी तो यहां आना पड़ेगा ना मम्मी पापा के लिए”।शालिनी की बात सुनकर नमन चुप तो हो गया लेकिन अभी भी वह शालिनी के जाने से चिढ़ ही रहा था ।
शालिनी की सास मीरा जी और ससुर प्रभाकर जी बहुत अच्छे थे..वे पूरी बात समझते और जानते थे कि नमन पूरी तरह से गलत है और उसे इस वक्त अपने सास ससुर के पास होना चाहिए था जबकि वह दफ्तर से सीधा घर आ गया था और शालिनी को भी वहां जाने से रोकने की कोशिश कर रहा था। मीरा जी एक सुलझी हुई महिला थी वह मां होने के नाते अपनी सीमा जानती थी और बेटा बहू के मामले में उन्होंने कभी भी दखलंदाजी नहीं की। लेकिन आज मामला कुछ अलग था।
वह नमन को समझाते हुए बोली,”शालिनी बिल्कुल ठीक कह रही है।आज जब उसके माता-पिता को उसकी ज़रूरत है तो यह उसका फर्ज़ बनता है कि वह उनके पास रहे।आखिर औलाद है वह उनकी और अगर इस मुश्किल समय में वह उनका सहारा नहीं बनेगी तो कौन बनेगा।उसके माता-पिता ने कितने नाज़ों से उसे पाल पोसा, उसे पढ़ाया लिखाया ,अच्छे संस्कार दिए।उन्हीं सस्कारों की बदौलत आज शालिनी हमारे साथ अच्छा व्यवहार करती है, सबको इज़्ज़त मान देती है। तुम्हारी बहन पल्लवी जब भी यहां आती है तो उसे सिर आंखों पर बिठा कर रखती है। तुमने कभी यह बात नहीं देखी की दफ़्तर से आने के बाद शालिनी सबसे पहले तेरे माता-पिता से मिलने उनके कमरे में आती है..नहीं तो आजकल की लड़कियों के पास सास ससुर से दूर रहने के ढेरों बहाने हैं।
अच्छा यह बता कि क्या कभी शालिनी ने तुझे एक बार भी हमारे खिलाफ किसी बात के लिए भड़काया है..नहीं तो झूठ बोलना कौन सा मुश्किल है..कोई भी झूठा बहाना बना दे तो पति तो अपनी नई-नई पत्नी की बातों में बहुत जल्द आ जाता है। इसने हमेशा हमें अपने माता-पिता की तरह ही आदर दिया है ।यह जो तू 10-10 दिन के लिए अपने कंपनी के काम से टूर पर चला जाता है वह इसीलिए ना कि पीछे से शालिनी है और इसीलिए तुझे और पल्लवी को हमारी चिंता नहीं।शालिनी के माता-पिता का क्या..वे बेचारे किसके सहारे जिएंगे।अपनी औलाद ही अगर वक्त पर काम ना आए तो क्या फायदा।
और तू भूल गया कि तेरे सास ससुर तुझे अपना बेटा ही मानते हैं और तू इतनी संकीर्ण सोच रखता है।मुझे तो आज शर्म आ रही है कि मेरे बेटे की ऐसी सोच है जो बाहर तो औरतों के हक की बात करता है और आज जब अपने घर में हक और फर्ज़ की बात आई तो तुझे क्या हो गया।बल्कि तुझे तो दफ्तर से सीधा अस्पताल जाना चाहिए था । तेरे सास ससुर बहुत अच्छे दिल के हैं अभी भी यही सोच रहे होंगे कि उनका दामाद किसी काम में फंसा होगा।अपनी आंखों के सामने मैं तेरा ऐसा व्यवहार बिल्कुल बर्दाश्त नहीं कर सकती।अभी शालिनी तो वहां जाएगी ही बल्कि तुझे भी जाना चाहिए।मैं और तेरे पापा तो शाम को ही उनसे मिले थे और कल सुबह फिर से जाएंगे..वो हमारे समधि हैं और उनकी ज़रूरत में उनके साथ खड़ा होना हमारा फर्ज़ है”।यह कहकर मीरा जी बाहर चली गई।
मां की यह सारी बातें सुन नमन सोचने पर मजबूर हो गया और उसे लगा कि सच में शालिनी के होते वह कितनी सारी ज़िम्मेदारियों से मुक्त हो गया है।आराम से वह कंपनी के काम से कुछ दिनों के लिए कैसे बाहर चला जाता है और पीछे की उसे कोई चिंता नहीं..यह सब शालिनी की वजह से ही तो संभव हो पाता है और इसी वजह से कंपनी में उसके काम की प्रशंसा होती है।अभी 2 महीने पहले ही उसे प्रमोशन भी मिली है ।यह सब सोचकर नमन को अपनी ही सोच पर बहुत शर्मिंदगी हुई।
वह अपने कमरे में गया तो शालिनी अपने कपड़े अपने बैग में डाल रही थी।नमन ने देखा उसके चेहरे पर उदासी थी..एक तो पिता की चिंता और ऊपर से नमन का ऐसा रूखा और कठोर व्यवहार।यह देखकर नमन को ग्लानि हुई और उसने शालिनी के कंधे पर हाथ रखकर कहा,” तुम कुछ दिनों के कपड़े रख लो..मैं तुम्हारे साथ चलता हूं तुम वहीं रुक जाना और आज रात में भी वहीं पर रुकूंगा मिलजुल कर सब संभाल लेंगें.. फिक्र मत करना और हां मुझे माफ कर दो मुझे सच में अपनी सोच पर बहुत शर्मिंदगी है”।
कुछ देर में शालिनी अस्पताल के लिए निकल रही थी। मीरा जी ने उसकी मम्मी के लिए खाना बनाकर उसे दे दिया था।शालिनी ने जाते हुए अपनी सास की तरफ देखा और सोचा कि आज कैसे उसकी सास ससुराल में उसका सहारा बन गई थी।अगर ऐसे ही बहू को सास का सहारा मिल जाए तो वह कोई भी काम आसानी से कर सकती है।सास को मां बनने की ज़रूरत नहीं है बल्कि वह सास रहकर भी अपनी बहू का सहारा बन सकती है.. एक ऐसा सहारा जिसकी एक नई बहू को अपने ससुराल में सबसे ज़्यादा ज़रूरत होती है।
शालिनी ने आगे बढ़कर मीरा जी को कसकर गले लगाया और उसकी आंखों से आंसू निकल आए।मीरा जी उसके दिल के भावों को अच्छी तरह से समझ पा रही थी। उन्होंने उसकी सर पर हाथ फेरा और उसे दिलासा देते हुए बोली,” तू जा..हम सब साथ है तेरे.. किसी बात की कोई चिंता नहीं.. सुबह मैं और तेरे पापा जी भी आएंगे और अब मुस्कुरा दे..तेरी मुस्कुराहट से ही घर-घर लगता है” और उनकी बात सुन सच में शालिनी मुस्कुरा दी थी और फिर नमन के साथ गाड़ी में बैठकर अस्पताल के लिए निकल गई।
इधर मीरा जी सोच रही थी कि उन्होंने कोई महान कार्य नहीं किया बस गलत को गलत कहा। अक्सर मांए अपने बेटों के प्यार में उनकी गलतियां छुपा जाती हैं और इसी बात से उन्हें बढ़ावा मिलता रहता है।अगर एक औरत मां होने के साथ-साथ सास का भी फ़र्ज़ निभाए तो कितनी आसानी से सब कुछ सही हो जाता है.. बस कदम उठाने भर की देर है और यही सोचते हुए मीरा जी सोने की तैयारी करने लगी। सुबह उन्हें सबका खाना बनाकर जल्दी अस्पताल के लिए निकलना जो था।
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गीतू महाजन,
नई दिल्ली।
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