तू मेरा सहारा है – जगनीत टंडन

“स्नेहा, जल्दी चल, अभी तक तैयार नहीं हुई क्या..” नीना स्नेहा के घर पहुंचते ही चिल्लाई।

माला भी वहां आ गई थी।

“नीना, जल्दी आने की कोशिश करना बेटा, जब तक तुम सब घर नहीं आ जाओगी तब तक दिल डरता ही

रहेगा। आज इसका मोबाईल भी सीमा लेकर गई हुई है”

“अरे आंटी, घबराइए मत, अतुल भईया आ जायेंगे हमें वहां से लेने। फंक्शन खत्म होते ना होते मैं उनको

कॉल कर दूंगी।”

दोनों ही सहेलियों ने आभा के संगीत में बहुत आनंद लिया। अतुल भी गाड़ी लेकर समय से उन दोनों को

वापिस लाने पहुंच गया था।

वापिसी में गाड़ी का टायर पंचर हो गया। सभी गाड़ी से नीचे उतरे तो अतुल टायर बदलने लगा। अभी वो टायर

बदल ही रहा था कि वहां एक गाड़ी आकर रूकी।

“क्या हो गया भाई,हम कुछ मदद करवा दें क्या..?”

अतुल ने देखा की लड़कियां कुछ भयभीत सी हो गईं थीं। गाड़ी में तीन लड़के थे और नशे में भी लग रहे थे।

अतुल जल्दी से बोला “नहीं भाई, सब ठीक है, थैंक्स, नीना, बैठो सब जल्दी गाड़ी में” अतुल ने बिजली की सी

तेज़ी के साथ गाड़ी की डिक्की बंद की और अपना मोबाईल निकाल कर नंबर मिलाते हुए बस वो ड्राइविंग सीट

पर बैठने ही वाला था कि वो चारों लड़के भी अपनी गाड़ी से नीचे उतर कर उसके पास आ गए।

एक लड़के ने उसे जकड़ लिया, उसका मोबाईल नीचे गिर पड़ा और बाकी दो नीना और स्नेहा की ओर झपटने ही

वाले थे की उनमें से एक लड़का पत्थर से टकरा कर गिर गया। दूसरा लड़का उसे संभालने लगा तो इतने में ही

अतुल चिल्लाया,“ नीना,स्नेहा ,भागो.. भाग जाओ यहां से, जल्दी जाओ, भाग जाओ, भाग जाओ” तभी

उसके सर पर किसी तेज चीज का प्रहार हुआ तो वो वहीं बेहोश हो गया।

उसे होश आया तो वो हॉस्पिटल में था। आँखें खुलते ही उसने अपने सामने एक पुलिस ऑफिसर को देखा। उसके

बाद उस ऑफिसर से उसे जो पता चला वो अतुल की बरदाश्त के बाहर था।

अतुल के बेहोश होने के बाद तीनों लड़को ने लड़कियों को पकड़ लिया था। पर किसी तरह नीना ने एक लड़के

की कलाई बुरी तरह से अपने दांतों से काट ली और वहां से भाग निकली। वो बहुत तेज़ी से भाग रही थी। भागते

भागते वो एक मोटर साइकिल से टकरा गई। उसी मोटर साइकिल सवार ने उसकी मदद की। पुलिस बुलाने से

लेकर हॉस्पिटल लाने तक वो साथ रहा।

इतने सब में स्नेहा के साथ जो हुआ उसने उसे ज़िंदा लाश बना दिया था।

“वापिस आई क्यूं तू, मर क्यूं नहीं गई… सीमा भी है तेरी छोटी बहन… तू मर जाती तो कम से कम उसका

विवाह तो हो सकता था… अब जिसकी बड़ी बहन का बलात्कार हो चुका हो उसकी छोटी बहन के किए कौन

रिश्ता लाएगा…?”

एक शब्द मुंह से नहीं निकालती थी स्नेहा। रोज़ जहर से बुझे तीर जैसी बातें सुनती और अंदर ही अंदर

घुटती रहती। एक दिन ना जाने कैसे विचार आए उसके दिमाग़ में कि अकेली ही थी वो घर पर कि उठ कर

अपने लिए फंदा बनाने लगी, अपनी जान देने का फैसला कर लिया था उसने कि तभी उसकी नज़र सामने दीवार

पर सजी अपने दिवंगत पिता की तस्वीर पर गई ।

उनके स्वर्णिम शब्द “अन्याय करना भी अपराध है और अन्याय सहना भी अपराध है” उसके दिमाग़ में

हथौड़े की भांति बजने लगे।

“क्या वो भी अपराधी है ? क्या अपराध किया है उसने ? शर्मिंदा क्या उसे होना चाहिए?”

“ नहीं, वो अपराधी नहीं है, समाज तो सदा से ही केवल तमाशबीन रहा है..! वो लड़के बेशक पकड़े गए हैं पर

उसकी आत्महत्या उनके लिए वरदान साबित होगी ना, गुनहगार तो वो लोग हैं… अपनी आंखों से वो उनको

सज़ा पाते हुए देखना चाहती है और जब मैंने कोई गलती की नहीं तो क्यों बर्दाश्त करूं…!”

स्नेहा ने आज जैसे ना जाने कितने वक्त बाद खुल कर सांस ली। दरवाज़ा खोल कर बाहर देखा तो ऐसा लगा

जैसे एक नया आसमां है उसके ऊपर जिसकी रोशनी अब उसकी जिंदगी में दुबारा कभी अंधेरा नहीं होने देगी।

आज चाहे उसके पिता इस दुनिया में नहीं थे पर उनकी अनमोल शिक्षाएं सदा स्नेहा का सबसे मज़बूत

सहारा बनकर उसका जीवन भर मार्गदर्शन करतीं रहेंगीं, इस बात का स्नेहा को पूर्ण विश्वास था ।

जगनीत टंडन

#सहारा

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