एक आलीशान मकान के बाहर जैसे ही अंजना पहुंची उसके पांव वहीं ठिठक गए, उस घर को आखिर वह भूल भी कैसे सकती थी…. आज से लगभग 25 साल पहले ही तो वह इस घर में आती थी एक बूढ़ी महिला की देखभाल करने; अंजना एक नर्स थी जिसे इस घर में इस बूढ़ी महिला के बीमार होने पर लगभग 2 महीने के लिए सेवा हेतु रखा गया था।
उनका एक बेटा और बेटी थे जो काम के सिलसिले में दूसरे राज्यों में अपनी गृहस्थी के साथ रहते थे। घर के बाहरी हिस्से में बस एक नौकर का परिवार रहता था जो उनका हर कार्य में सहायता करता था। कहने को तो बेचारी बूढ़ी मां को उनका बेटा अपने साथ ले जा सकता था
लेकिन आजकल लोग बड़े बूढ़ों को साथ रखना ही कब चाहते है; बड़े बूढ़ों के साथ होने से उनकी जिम्मेदारियां बढ़ जाती है जो कोई नहीं उठाना चाहता….और यहां तो अपना आलीशान घर खाली न छोड़ने का बहाना भी अच्छा था जिसमें बसी यादों को छोड़कर जाना शायद ये भी नहीं जाना चाहती होंगी।
हालांकि आज अंजना इस घर में अपनी बेटी गौरी जो कि एक प्रतिष्ठित डॉक्टर थी, के कहने पर डाक्टर शशांक जिन्होंने उसके सामने विवाह का प्रस्ताव रखा था, के माता पिता से मिलने आईं थीं । आज संभवतः वह बूढ़ी महिला तो इस घर में नहीं होगी पर मकान की चमक वैसी की वैसी ही थी; परन्तु उस घर से मिली कुछ कड़वी यादों की वजह से आज वह चमक भी अंजना को धूमिल लगी जिसने उसे उल्टे पांव लौटने को मजबूर कर दिया।
“क्या हुआ मां, आज तो आप डॉक्टर शंशाक के घर जाने वाली थीं न!…गईं नहीं?” रात को खाना खाते समय गौरी ने अंजना से पूछा।
” एक बात बता क्या तू भी शशांक से…..(कहते हुए अंजना रुक गई) मेरा मतलब अगर मैं मना कर दूं तो भी तू चाहेगी कि यहां संबंध हो…”
“अरे मां आप भी कैसी बातें करती हो…आपको तो पता ही है कि मैंने अभी तक इस बारे में कुछ सोचा ही नहीं था वो तो डॉक्टर शशांक ही मुझसे पूछ बैठे कि साथ में पढ़े भी हैं और किस्मत से एक ही संस्था के अस्पताल में प्रैक्टिस कर रहे हैं तो शादी के बारे में क्या विचार है?…तब मैंने थोड़ा सोचा कि प्रस्ताव बुरा भी नहीं है लेकिन मैंने ये कह दिया कि मां से बात करके बताऊंगी….”
“तो फिर मना कर दे…..और रही बात उसके डॉक्टर होने की तो डॉक्टर तो और भी हैं….और फिर मैं ही क्यों जाऊं शशांक के घर बात करने उसके पिता भी तो आ सकते हैं यहां….”
गौरी ने बड़े आश्चर्य से देखा “अरे मां आपको क्या हो गया जो आपने उनसे और उनके परिवार से बिना मिले ही फैसला कर लिया….आखिर बात क्या है….”
“देख बेटा यदि तुझे मेरी बात माननी है तो बिना किसी प्रश्न के मान ले और अगर अपनी मर्जी करनी है तो फिर अपनी मर्जी कर…मुझसे क्यों पूछ रही है….”
“अरे मां आप भी……चलो खैर छोड़ो….मैं मना ही कर दूंगी…”
इस बात को लगभग 5–6 दिन ही बीते होंगे कि एक दिन दोपहर में अंजना के दरवाजे पर दस्तक हुई…अंजना ने जैसे ही दरवाजा खोला तो सामने शशांक के पिता सोमेश को देख स्तब्ध रह गई
“जी नमस्ते….”
“नमस्ते” सोमेश के शब्दों से उसकी तंद्रा टूटी “जी कहिए…”
“मैं डॉक्टर शशांक का पिता हूं…शायद आपको डॉक्टर गौरी ने बताया हो…मैं आपसे ही कुछ बात करने आया था…”
“जी ….आइए….”अपने दिल में उठे ज्वार भाटे को शांत रखने की कोशिश करते हुए अंजना उन्हें अंदर ले गई।
“बताइए आपको मुझसे क्या बात करनी है…”
“मैं शशांक के लिए आपकी बेटी गौरी का हाथ मांगने आया हूं….”
“लेकिन यह बात तो कुछ दिन पहले ही खत्म हो गई न….गौरी ने शशांक को बता तो दिया था कि यह संबंध नहीं हो सकता….”
“हां उसी वजह से तो मैं आज आपके पास आया हूं….मुझे आश्चर्य है कि आप क्यों सहमत नहीं हैं जबकि दोनों की शिक्षा भी एक सी है और ईश्वर की कृपा से जाति धर्म भी…”
“और मुझे इस बात का आश्चर्य है कि आप हमारे खानदान के बारे में जाने बिना इस संबंध में इतने उत्सुक क्यों हैं….” अंजना ने कड़वाहट से भरी हल्की सी हँसी के साथ कहा।
“अरे बहन जी आजकल जमाना बदल गया है, आज के जमाने में खानदान देखता ही कौन है बस लड़के और लड़की एक दूसरे को पसंद कर लें, उनके मन मिल जाएं बस और क्या….”
“माफ करना, जमाना इतना भी नहीं बदला है कि लड़की के माता पिता की भी जानकारी न ली जाए….।
“आप भी कैसी पहेली बुझा रही हैं…मैं शशांक का पिता हूं आप गौरी की मां है और गौरी का आपके अलावा दुनिया में और कोई नहीं है ….”
“तो क्या आप पिता के बारे में भी नहीं जानना चाहते कि गौरी के पिता कौन थे?क्या करते थे….”
” कौन थे….?”
“प्रतिष्ठित बिजनेस मैन श्री मुरारीलाल जी के बेटे सोमेश….”पूरे गुस्से के साथ जिसे वो अब तक अपने दिल में बमुश्किल रोके हुए थी, कहा।
अंजना के ये शब्द सुन सोमेश के हाथ में रखे पानी के गिलास से पानी छलक गया “ये क्या बकवास है….”
“अरे,….अरे…संभालो अपने आपको और याद करो आज से लगभग 25 साल पहले की वो घटना जब तुम्हारी दादी बीमार थीं और उनकी देखरेख को एक नर्स आती थी तब एक दिन तुम दादी से मिलने आए थे और उस समय तुम्हारे घर में कोई नौकर नहीं था तब तुम उस नर्स को देख हैवान बन बैठे और तुम्हारी हैवानियत का शिकार जो हुई वो मैं थी मैं….”अंजना ने अंतिम शब्द बहुत ही गुस्से से दांतों को भींचते हुए कहा।
अंजना की बातें सुन सोमेश सुन्न रह गए, काटो तो मानो खून नहीं…
मुझे माफ कर दो….उस समय पता नहीं मुझे क्या हो गया था परन्तु अब…अब तो इस घटना को बहुत साल बीत चुके हैं….अब बताइए मैं क्या करूं उस गलती के लिए…और…और इस समय मैं शशांक से क्या कहूं ….सोमेश ने हाथ जोड़कर कहा
ये आप जानो मि. सोमेश और वैसे भी इस समय आपको केवल शशांक को जवाब देना है जबकि उस समय तो मुझे पूरे समाज को जवाब देना था….उस समय मेंने सोचा था अब आप सोचिए पर इस समय कृपया करके आप यहां से चले जाइए….और मुझे मेरे हाल पर अकेला छोड़ दीजिए जैसे उस समय छोड़ गए थे….
चला जाऊंगा लेकिन एक बात जानना चाहूंगा कि शशांक तो कह रहा था कि गौरी के पिता उसके जन्म से पहले ही….
“मर गये….यही न….मुझे यही डर था कि आगे आप कुछ न पूछें लेकिन जब पूछ ही लिया है तो सुन लीजिए कि बच्चों को जो बताया जाए बच्चे वही तो जानेंगे ….और फिर मैंने गौरी को गलत भी क्या बताया …अरे जिस आदमी का ज़मीर मर गया हो, आत्मा मर चुकी हो तो क्या आपको लगता है कि वो जिंदा है…”
सोमेश जमीन में नजरे गढ़ाए खड़ा था और अंजना का सारा गुस्सा आज उस पर फूट पड़ा था
“सोमेश जी आप तो समाज में प्रतिष्ठित और धनवान लोग हैं आप का क्या….आप तो कुछ भी कर सकते हैं उस समय भी गलती आपकी थी और अपने ही माता पिता की नजरों में दोषी मैं थी उन्होंने तो ये तक कहा कि मैं इस पाप की निशानी को मिटा दूं क्योंकि यह समाज के लिए एक कलंक है जो कभी नहीं मिटेगा….लेकिन मैं अडिग रही कि जब मेरी कोई गलती नहीं तो मैं क्यों समाज से डरूं और आज देखिए मेरा फैसला सही ठहरा भले ही उस समय अंजान शहर में जाकर कुछ मुश्किलों का सामना करना पड़ा हो लेकिन आज मैं एक होनहार बेटी की मां हूं और समाज में सम्मान के साथ जी भी रही हूं….जिसके लिए मेरी मां ने कहा था कि इस कलंक को समाज कभी स्वीकार नहीं करेगा उसे देखिए समाज तो क्या आप भी स्वीकार करने आ गए… मैंने तो अपने सिर से जैसे तैसे कलंक मिटा दिया था सोमेश जी लेकिन क्या आप अब भी गौरी को जो आपकी ही बेटी है उसे अपनी बहू बनाना चाहेंगे….और अगर आप अब भी हमसे संबंध जोड़ना चाहते हैं तो गौरी को बहू नहीं बेटी स्वीकार करना होगा …..उस समय मैंने सबसे कहा था कि एक रेल हादसे में इसके पिता मर गए….अब बस आपको ये कहना होगा कि मैं उस दुर्घटना में बच गया था बस इन दोनों की जिम्मेदारियों से बचने के लिए मुंह छिपा रहा था….. उस समय मैंने अपने ऊपर से कलंक मिटाया था अब आप मिटा लीजिए…..क्योंकि आपके कुकर्म से मैं खुद को या अपनी बेटी को कलंकित क्यों मानूं जब गलती आपकी है तो ये कलंक कि आप एक बेहद गिरे हुए इंसान हैं, आपको स्वीकार करना होगा ….. अगर है आपमें इतनी हिम्मत तो ही आपका हमारे घर में स्वागत है अन्यथा आप यहां से चले जाइए और सोचते रहिए कि आप अपने बेटे से क्या कहेंगे जो मेरी बेटी से शादी करने के लिए इतना इच्छुक है कि उसके कहने पर आप यहां तक चले आए….”
सोमेश जी वहां से सिर झुकाकर माफी मांगते हुए चले गए और अंजना अपनी परवरिश पर गर्व महसूस कर रही थी कि उसकी बेटी भले की पाप की सही लेकिन उनकी बेटी संस्कार और सम्मान की धनी थी जिसे आज सारे समाज ने स्वीकार किया था वो आज कलंकित या पाप की निशानी नहीं थी उसका खुद का अपना वजूद था।
#यह कलंक कभी नहीं मिटेगा
प्रतिभा भारद्वाज (प्रभा)