स्वाभिमान मेरा भी है – आरती झा आद्या

रंगोली बचपन से ही थोड़ा ऊँचा सुनती थी, पर उसके भीतर जीवन के रंग बेहद गहरे थे। उसकी हँसी में उजास था, सपनों में खुला आसमान विस्तार ले रहा था। अभी वह इक्कीसवें वर्ष में कदम ही रख ही रही थी कि उसके पेट पर सफेद छोटे धब्बे उभर आए। जब डॉक्टर ने जाँच के बाद यह स्पष्ट किया कि यह सफेद दाग है, तब जैसे उसके जीवन की दिशा ही बदल गई।

यह सुनते ही घर में अनकही ख़ामोशी छा गई, घर के सभी सदस्य के चेहरे पर डर उतर आया। बीमारी से ज्यादा चिंता इस बात की थी कि अब उसका विवाह कैसे होगा। रंगोली के पिता और चाचा सम्पन्न थे, ठेकेदारी में खूब पैसा था। उन्होंने समाधान भी अपने ढंग से ढूंढ लिया। सोच बनी कि किसी गरीब लेकिन होनहार लड़के से शादी कर दी जाए, इतना दान दहेज दिया जाए कि वह लड़का एहसान के बोझ तले दब जाए और रंगोली की कमी उसे दिखे ही नहीं।

कुछ समय बाद एक ऐसा ही परिवार मिला। लड़के का घर आर्थिक रूप से कमजोर तो नहीं था, लेकिन स्वभाव से अत्यंत कंजूस होने के कारण कमजोर प्रतीत होता था। रंगोली के घर वालों ने विवाह के साथ-साथ लड़के की आगे की पढ़ाई, नौकरी और जीवन की हर सुविधा का भार उठाने का प्रस्ताव रखा।

साथ ही गहने, नकद धन और गाड़ी देने की बात भी खुले दिल से रखी गई। लड़के वालों को भी इसमें क्या ही आपत्ति हो सकती थी, क्योंकि यह प्रस्ताव उनके लिए एक अवसर से कम नहीं था। उन्हें केवल इतना बताया गया कि लड़की थोड़ा ऊँचा सुनती है।

रंगोली ने कई बार धीमे स्वर में अपने सफेद दाग के बारे में बताने की कोशिश की, लेकिन हर बार उसे डांटकर चुप करा दिया गया। उसकी सच्चाई उसकी ही आवाज के साथ दबा दी गई और वह भीतर ही भीतर वह घुट कर रह गई।

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रूपवती रंगोली के साथ अब एक ऐसा पुरुष खड़ा था, जो उसके व्यक्तित्व से बिल्कुल विपरीत था, पर उस असंगति पर किसी ने ध्यान नहीं दिया। सब कुछ बाहरी दिखावे में सिमट कर रह गया था।

शादी के दूसरे ही दिन सच्चाई का पर्दा उठ गया। रंगोली के पति शत्रुघ्न ने अपनी माँ को रंगोली के दाग के बारे में बता दिया। यह सुनते ही जैसे घर का वातावरण विषाक्त हो गया। उसकी सास ने बिना किसी संकोच के, बिना इस बात की परवाह किए कि घर मेहमानों से भरा है, ऊँची आवाज में रंगोली और उसके परिवार को अपमानित करना शुरू कर दिया।

उस क्षण रंगोली भीतर तक काँप उठी। उसे लगा जैसे वह किसी भीड़ के बीच खड़ी है और सबकी निगाहें उसे नंगा कर रही हैं। उसी समय उसके मायके वालों को बुलाया गया, लेकिन वहाँ से भी उसे कोई सहारा नहीं मिला। उन्होंने निर्लज्जता से यह कहकर अपना पल्ला झाड़ लिया कि इतना दान दहेज यूँ ही नहीं दिया गया था। उस क्षण रंगोली को ऐसा लगा जैसे उसके पैरों के नीचे की जमीन खिसक गई हो। वह स्तब्ध खड़ी रह गई, जैसे उसके भीतर की सारी आवाजें एक साथ मौन हो गई हों। जो चुप्पी अभी तक उसकी एकमात्र सहारा थी, वही चुप्पी अब उसकी सबसे बड़ी विवशता बन चुकी थी।

उस दिन के बाद रंगोली का जीवन उस घर में धीरे धीरे मुरझाने लगा। उसे अच्छे वस्त्रों और सम्मान से वंचित कर दिया गया। वह अक्सर एक पुरानी और मुड़ी तुड़ी साड़ी में दिखाई देती और घर में आने वाले लोग उसे उस घर की नौकरानी समझ लेते। सबसे अधिक पीड़ा की बात यह थी कि घर के लोग यह सब सुनकर भी चुप रहते थे, मानो यह सब सामान्य हो।

समय के साथ रंगोली ने एक बेटी को जन्म दिया, जिसका नाम सोनाक्षी रखा गया। लेकिन माँ बनने का सुख भी उसे पूर्ण रूप से नहीं मिल सका। किसी ने भी उसके इलाज के लिए किसी भी प्रकार की तत्परता नहीं दिखाई थी लेकिन बच्ची को उसकी गोद से दूर रखा जाता, मानो उसकी ममता भी संक्रामक हो। 

फिर भी, ममता का रिश्ता किसी भय या दूरी से नहीं टूटता। सोनाक्षी अपनी माँ की ओर बार बार खिंची चली आती थी। वह जैसे अपनी माँ को उसकी खुशबू से पहचानती थी। जब भी वह रंगोली के पास आती और उसे “माँ” कहकर पुकारती, तो रंगोली के सूखे जीवन में जैसे एक क्षण के लिए फिर से हरियाली लौट आती।

जैसे जैसे सोनाक्षी बड़ी होती गई, वह अपनी माँ की स्थिति को समझने लगी। उसके भीतर आक्रोश भी उठता था और वह कई बार विरोध करना चाहती थी। लेकिन हर बार रंगोली उसे समझाकर पढ़ाई पर ध्यान देने के लिए कहती। वह चाहती थी कि उसकी बेटी वह जीवन जिए जो वह स्वयं कभी नहीं जी पाई।

सोनाक्षी ने अपनी माँ की बात को अपना लक्ष्य बना लिया। उसने पूरी लगन से पढ़ाई की और आगे चलकर त्वचा रोग विशेषज्ञ बनी। शायद उसने अपनी माँ के घावों को इतने करीब से देखा था कि अब वह दुनिया के घाव भरना चाहती थी।

उधर रंगोली का स्वास्थ्य दिन प्रतिदिन गिरता जा रहा था। वर्षों की उपेक्षा और मानसिक पीड़ा ने उसके शरीर को भीतर से तोड़ दिया था। जब तक सोनाक्षी इस योग्य बनी कि वह अपनी माँ का इलाज कर सके, तब तक समय उसके हाथों से निकल चुका था। एक दिन रंगोली ने इस संसार को चुपचाप अलविदा कह दिया।

उसका पार्थिव शरीर घर में जमीन पर रखा था। वातावरण में एक अजीब सा सन्नाटा था। सोनाक्षी ने अपने हाथों से अपनी माँ को लाल साड़ी ओढ़ाई। वही लाल रंग, जो उसकी माँ को बेहद प्रिय था, लेकिन जिसे उसके जीवन से छीन लिया गया था।

घर के लोग कह रहे थे कि वह सुहागन गई है, इसलिए भाग्यशाली है। तभी उसके पिता समाज की परंपरा निभाने के लिए उसकी माँग में सिंदूर भरने के लिए आगे बढ़े।

सोनाक्षी ने दृढ़ता से उनका हाथ रोक लिया।

उसकी आँखों में आँसू थे, लेकिन आवाज में अडिग साहस था। उसने स्पष्ट शब्दों में कहा, मेरी माँ ने अपने जीवन में बहुत कुछ सहा है, लेकिन वह भीतर से कभी कमजोर नहीं थी। मेरी माँ नहीं चाहती थी कि आप जैसा बुजदिल उसकी माँग भरे या उसे कंधा दे। वह हमेशा कहती थी कि स्वाभिमान हर स्त्री का होता है, पर जब पिता और पति ही कमजोर निकलें तो स्त्री को अपने स्वाभिमान को दबाना पड़ता है।

मैंने इन्हें लाल साड़ी इसलिए ओढ़ाई है क्योंकि इन्हें यह रंग बहुत प्रिय था। आपने इनके जीवन से हर रंग छीन लिया था।

आज मैं ऐसा नहीं होने दूँगी। आज मैं रंगोली के स्वाभिमान को आहत होने नहीं दूँगी।

मैंने एम्बुलेंस बुला ली है। आज मेरी माँ किसी झूठी परम्परा का सहारा लिए बिना स्वाभिमान के साथ विदा होंगी। 

उसकी आवाज के बाद पूरा घर मौन हो गया। शब्द जैसे अपनी जगह खो चुके थे।

जब एम्बुलेंस में रंगोली का पार्थिव शरीर रखा जा रहा था, शत्रुघ्न को एक क्षण के लिए ऐसा लगा जैसे उस शांत चेहरे पर एक हल्की, संतोष भरी मुस्कान तैर गई हो।

मानो वह इस घर में आने के बाद पहली बार अपने पूरे अस्तित्व के साथ कह पा रही हो, “स्वाभिमान मेरा भी है।”

✍️आरती झा आद्या

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