अचानक दोनों में टक्कर हो गई।
” जरा संभल कर”।
“ओह,सारी” और टकराने वाली नौ-दो ग्यारह।
मिहिर के हाथ से गिलास गिर गया। गनीमत गिलास खाली था…झन्न से आवाज हुई , मिहिर ने नजरें दौड़ाई हल्का सा गुलाबी दुपट्टा दिखा। उसने देखने की कोशिश की… और आगे बढ़ गया।
शादी विवाह का घर, नृत्य-संगीत, रस्मोरिवाज चारों ओर गहमा-गहमी मची हुई थी। सामने पूरियां तलती लड़की पर नजर पड़ते ही मिहिर के पांव ठिठक गये।
तेज आंच से लड़की का चेहरा लाल हो रहा था।कान में कुंडल झूल रहा था। बड़ी-बड़ी मृगनयनी अंखियां जैसे कुछ कहना चाह रही है। गुलाबी सलवार सूट में वह बहुत सुंदर लग रही थी” अरे यह वही लड़की है जो सुबह मुझसे टकराई थी। ” चलो अभी खबर लेता हूं।उसी समय ” मिहिर, मिहिर” करता उसका मित्र रमण आ पहुंचा।
” चलो, नाश्ता लग गया है” रमण मिहिर की बांह पकड़ खींच कर ले गया।
दरअसल मिहिर अपने सहकर्मी रमण के बहन की शादी समारोह में गांव आया हुआ है। महानगर में पलने बढ़ने, पढ़ाई कर नौकरी करने वाले सरल स्वभाव वाले मिहिर को गांव देखने की बड़ी चाहत थी अतः अपने सहकर्मी रमण के बहन की शादी में एक बुलावे पर गांव खींचा चला आया।
सामने मेंहदी का रस्म चल रहा है। और वही लड़की ढोलक पर बड़ी तन्मयता से कोई गीत गा रही थी। मिहिर ठगा सा देखता रह गया।
शाम में वही लड़की मेहमानों के हाथ में नाश्ते का प्लेट पकड़ा रही थी,” लीजिए” उसने मिहिर को प्लेट पकड़ाते हुए कहा। ओह कितनी मधुर आवाज।
” आपका नाम जान सकता हूं ” मिहिर शरारत से बोला।
तभी “अरे पीहू अभी नाश्ते में ही लगी हुई हो उधर दुल्हन को भी तैयार करना है ” ताई ने आवाज लगाई।
” जी अभी आई” कहती मिहिर की ओर देख इशारा किया,” सुन लिया मेरा नाम।”
” पीहू,पीहू” मिहिर मन-ही-मन दुहराया।
दो दिनों में विवाह संपन्न हुआ। बिटिया की बिदाई भी हो गई। संयुक्त परिवारों का रहन-सहन, मेल-मिलाप, रस्मोरिवाज, अपनापन गांव की पगडंडियां, पेड़-पौधे, सीधे-सादे लोग मिहिर को बहुत पसंद आया।
आज सुबह से पीहू कहीं दिखाई नहीं दी वह भी लड़की के साथ ही चली गई क्या… मिहिर का हृदय धक-धक करने लगा।
यूं ही घर के पिछवाड़े जहां बड़े-बड़े फलदार वृक्ष लगे थे। कुआं था तालाब में कुमुदिनी खिल रहे थे। हंसों का जोड़ा तैर रहा था… उत्सुकता से मिहिर चला आया।
वहां पीहू चुप-चाप खड़ी एक टक डुबते सूरज को निहार रही थी। अस्ताचलगामी सूर्य की किरणों में पीहू का मुखड़ा दमक रहा था।
” आप यहां” मिहिर ने कहा।
” और आप”।
” हां आपसे मिलने की बड़ी इच्छा थी …आपको ढूंढता इधर आ गया ” मिहिर ने धीरे से कहा।
“झूठ … सफेद झूठ…क्यों” वह धीरे से बोली।
” बस,दिल से बंधी एक डोर -और मैं खींचा चला आया , जी मैं झूठ नहीं बोलता” मिहिर ने दिल की बात कह दी।
” अच्छा आप शायर भी हैं…पीहू हंसी” आप मेरे विषय में जानते ही कितना हैं” पीहू ने उदास स्वर में कहा।
” और जानना भी नहीं चाहता…बस अपने बारे में बता दूं अपनी मां के साथ महानगर में रहता हूं। पिता मेरे बचपन में ही गुजर गए , अपनी कोठी है, नौकरी है…बस मेरी मां को एक सुंदर प्यारी सी बहू चाहिए… तुम्हारी तरह… अगर आपको मंजूर हो” मिहिर अपनी रौ में कहता गया और पीहू भागकर भीतर चली गई।
मिहिर ने रमण से अपने दिल की बात बताई,” मुझे पीहू पसंद है, उससे मेरे रिश्ते की बात चलाकर मुझपर एहसान कर दो दोस्त।”
रमण चौंक उठा,” तुम्हें कुछ मालूम भी है पीहू के बारे में….”।
” क्या,बताओ तो सही।”
” पीहू एक विधवा है, शादी के दूसरे दिन बिदाई के समय रास्ते में कार एक्सीडेंट में उसका पति, उनके पिता और भाई की भी मृत्यु हो गई। पीहू भी गंभीर रूप से घायल हुई लेकिन बच गई।”
“ओह, फिर…”।
” फिर क्या पीहू के पिता बचपन में ही गुजर गए थे और मां इस सदमे में चल बसी। ससुराल वालों ने मनहूस कहकर पीछा छुड़ा लिया। पीहू अपने चाचा-चाची के पास रहती है एक प्राइवेट स्कूल में पढ़ाती है…वह बहुत, असहाय और अकेली है मिहिर…वह शादी के लिये तैयार होगी या नहीं कहना मुश्किल है।”
मिहिर पर जैसे वज्रपात हो गया। लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी। दूसरे दिन रमण के साथ पीहू और उसके चाचा-चाची से मिला और बिना किसी लाग-लपेट के अपने दिल की बात बताई।
” नहीं,नहीं मैं मनहूस हूं जो मेरे जीवन में आयेगा उसका अनिष्ट होगा” पीहू फफक-फफक कर रो पड़ी।
” ऐसा कौन कहता है,जब मैं तैयार हूं मेरी मां को आपत्ति नहीं है तब ऐसा सोचना व्यर्थ है… मैं नये युग का युवक हूं अपना भला-बुरा समझता हूं” मिहिर ने समझाने का प्रयास किया।
थोड़ी ना-नुकुर के बाद दोनों परिवारों में सहमति बन गई।सादे समारोह में विवाह की रस्में पूरी हुई और पीहू मिहिर की दुल्हनिया बनकर उसके घर आ गई।
इसे कहते हैं दो दिलों का बंधन।लोग सच कहते हैं जोड़ियों का रिश्ता उपर से बनकर आता है।
मौलिक रचना -डाॅ उर्मिला सिन्हा