सावित्री जी के होंठ थरथराए। अतीत की एक पूरी किताब उनकी आँखों के आगे खुल गई। चौबीस बरस पहले की वह सर्द रात याद आ गई, जब अनघा के पिता, स्वर्गीय रमेश जी, एक भयानक सड़क हादसे में उन्हें और छह महीने की नन्हीं अनघा को बेसहारा छोड़कर चले गए थे। उस समय सावित्री की उम्र ही क्या थी—मुश्किल से छब्बीस-सत्ताईस साल। भरा-पूरा परिवार था, लेकिन पति के जाते ही सबने मुँह मोड़ लिया था। ससुराल वालों ने कह दिया कि ‘हमारा लड़का ही नहीं रहा तो बहू का क्या भार उठाएँ’, और मायके वालों ने नसीहत दी थी कि बच्ची को किसी रिश्तेदार के पास छोड़कर दूसरा घर बसा लो।
आँगन में बिछी दरी पर बैठी सावित्री देवी के काँपते हाथ लाल बनारसी साड़ी की सुनहरी गोट पर सुई-धागे से तुरपाई कर रहे थे। साठ के पार पहुँच चुकीं सावित्री जी की आँखों के आगे बार-बार धुंध छा जाती, जिसे वे अपनी सूती साड़ी के पल्लू से चुपचाप पोंछ लेतीं। घर में शहनाई की धीमी, मीठी धुन गूँज रही थी। बाहर बरामदे में मेहमानों की चहल-पहल, रिश्तेदारों की हँसी-ठिठोली और ढोलक की थाप साफ़ सुनाई दे रही थी। हर कोई खुश था, हर चेहरे पर चमक थी, सिवाय सावित्री जी के उस दिल के जो भीतर ही भीतर टुकड़े-टुकड़े हो रहा था।
वे लाल जोड़े के एक-एक रेशे को सहलाते हुए धीरे से बुदबुदाईं, “चाहे कितनी भी शिद्दत और खून-पसीने से कोई अपनी बगिया सींचे, जब फूल पूरी तरह खिलकर महकने लगता है, तो कोई दूसरा आकर उसे डाल से तोड़ ले जाता है। जिसे चौबीस बरस तक अपनी छाती से लगाकर रखा, आज उसे विदा करके खाली हाथ बैठना होगा… सब कुछ समाप्त हो जाएगा।”
उनकी आँखों से टपका एक गर्म आँसू साड़ी के सुनहरे ज़रदोज़ी काम पर गिरकर मोती की तरह बिखर गया। सावित्री देवी का चेहरा बेबसी, ममता और गहरे संत्रास से घिर गया था। उनके भीतर जैसे कोई तूफ़ान उठ रहा था जिसे वे पिछले कई हफ्तों से दबाए बैठी थीं।
“माँ, जो फूल डाल पर ही सूख जाए, उसकी सुगंध किसी के आँगन को कैसे महका सकती है? विदाई अंत नहीं होती माँ, वह तो एक नए जीवन की, एक नए संसार की रचना की शुरुआत होती है।”
एक बेहद शांत, कोमल और गंभीर आवाज़ उस कमरे के सन्नाटे में तैर गई। सावित्री जी चौंक उठीं। उनके हाथ से सुई छूटकर दरी पर जा गिरी। उन्होंने घबराकर अपनी गर्दन घुमाई और कमरे के चारों कोनों में देखा। कमरे का दरवाज़ा भीतर से अधखुला था, लेकिन वहाँ कोई दूसरा व्यक्ति मौजूद नहीं था। बाहर से ज़रूर हँसी के फव्वारे आ रहे थे, पर इस बंद कमरे में तो केवल वे और उनकी बेटी अनघा ही थीं।
उनका ध्यान सामने लगे शीशे की ओर गया। शीशे के सामने लाल लहंगे और कुंदन के गहनों में सजी-धजी उनकी बेटी अनघा खड़ी थी। अनघा—जिसके चेहरे पर हल्दी की आभा, आँखों में काजल की धार और लबों पर एक अलौकिक, शांत मुस्कान खेल रही थी। उसके चेहरे पर वैसी ही मासूमियत और तेज था, जैसा कभी बालपन में हुआ करता था जब वह माँ के पल्लू में छिपकर संसार को देखा करती थी। आज वह सोलह शृंगार किए मंडप में बैठने के लिए पूरी तरह तैयार थी। अनघा की गहरी, वात्सल्य और कृतज्ञता से भरी आँखें आईने के ज़रिये सीधे अपनी माँ की आँखों में झाँक रही थीं।
बाहर से मंगल गीतों के बोल हवा में तैरते हुए आ रहे थे—”बाबुल की दुआएँ लेती जा, जा तुझको सुखी संसार मिले…” और घर का कोना-कोना उन पवित्र सुरों से गूँज रहा था।
सावित्री देवी स्तब्ध रह गईं। उन्होंने अपनी थकी हुई आँखों को हथेलियों से मसला। क्या यह अनघा के ही शब्द थे, या उनके अपने भीतर की ममता उनसे मुखातिब थी?
अनघा धीरे-धीरे चलकर अपनी माँ के पास आई और ज़मीन पर उनके घुटनों के बल बैठ गई। उसने अपनी माँ के खुरदुरे, झुर्रीदार हाथों को अपने मेहंदी रचे दोनों हाथों में थाम लिया। उसकी हथेलियों की ठंडी मेहंदी का स्पर्श सावित्री जी के जलते हुए सीने पर चंदन की तरह लगा।
“माँ, तुम इतना क्यों घबरा रही हो?” अनघा ने अपनी माँ की काँपती ठोड़ी को छूते हुए कहा, “तुमने ही तो मुझे जीवन दिया, संस्कार दिए, अपनी हर इच्छा को मारकर मुझे पढ़ाया-लिखाया और इस काबिल बनाया कि आज मैं एक नए परिवार का आधार बनने जा रही हूँ। तुम तो मेरी सृजनकर्ता हो माँ। क्या कुम्हार कभी अपनी बनाई उस पावन मूरत के लिए रोता है जो मंदिर के गर्भगृह में विराजने जाती है? नहीं माँ, वह तो गर्व से सिर उठाता है कि उसकी उँगलियों का स्पर्श पाकर माटी भी देवत्व को प्राप्त हो गई।”
सावित्री जी के होंठ थरथराए। अतीत की एक पूरी किताब उनकी आँखों के आगे खुल गई। चौबीस बरस पहले की वह सर्द रात याद आ गई, जब अनघा के पिता, स्वर्गीय रमेश जी, एक भयानक सड़क हादसे में उन्हें और छह महीने की नन्हीं अनघा को बेसहारा छोड़कर चले गए थे। उस समय सावित्री की उम्र ही क्या थी—मुश्किल से छब्बीस-सत्ताईस साल। भरा-पूरा परिवार था, लेकिन पति के जाते ही सबने मुँह मोड़ लिया था। ससुराल वालों ने कह दिया कि ‘हमारा लड़का ही नहीं रहा तो बहू का क्या भार उठाएँ’, और मायके वालों ने नसीहत दी थी कि बच्ची को किसी रिश्तेदार के पास छोड़कर दूसरा घर बसा लो।
लेकिन सावित्री ने उस नन्ही, अबोध बच्ची के चेहरे को देखा था, जिसकी बड़ी-बड़ी आँखों में केवल अपनी माँ की सूरत का आसरा था। सावित्री ने पत्थर की तरह अपने दिल को कड़ा कर लिया था। उन्होंने अपने सारे ज़ेवर बेचकर एक सिलाई मशीन खरीदी थी। दिन का उजाला हो या रात की मद्धम लालटेन, सावित्री के पाँव उस सिलाई मशीन के पैडल पर चलते रहते थे। उँगलियों में सुइयाँ चुभतीं, खून निकलता, पीठ दर्द से दोहरी हो जाती, पर जब वे अनघा को दूध पीते या गहरी नींद में मुस्कुराते देखतीं, तो उनका सारा दर्द कपूर की तरह उड़ जाता था।
गाँव से शहर तक का सफ़र, पाई-पाई जोड़कर अनघा को कॉन्वेंट स्कूल में दाखिला दिलाना, फिर कॉलेज की महँगी पढ़ाई… कभी सावित्री ने खुद के लिए एक नई साड़ी नहीं खरीदी। त्योहारों पर जब दूसरी औरतें सजतीं, सावित्री पुरानी धोती को ही धोकर पहन लेतीं और जो पैसे बचते, उनसे अनघा के लिए रंग-बिरंगी फ्रॉक और रिबन खरीद लातीं। अनघा उनकी बेटी भर नहीं थी; वह उनकी साधना, उनकी तपस्या और उनके पूरे वजूद का आईना थी।
और आज… आज वही अनघा उनसे अलग होकर दूसरे के घर जाने वाली थी। हमेशा के लिए पराई होने वाली थी। यही विचार सावित्री के सीने में तीर की तरह चुभ रहा था। उन्हें लग रहा था कि कल सुबह जब यह घर खाली हो जाएगा, तो वे किसके लिए उठेंगी? किसके लिए चूल्हा फूँकेंगी? उनका यह चौबीस साल का संघर्ष, यह सारा सृजन, क्या बस इस एक विदाई के साथ समाप्त हो जाएगा?
अनघा ने अपनी माँ के मन की हर परत को बिना बोले ही पढ़ लिया। उसने सावित्री के कंधे पर अपना सिर रख दिया। वही कंधा, जिस पर सिर रखकर उसने अपने बचपन के सारे आँसू बहाए थे।
“माँ,” अनघा की आवाज़ बहुत गंभीर और भावपूर्ण हो गई, “तुम समझती हो कि आज मेरी विदाई हो रही है और तुम अकेली रह जाओगी? तुम यह क्यों भूल जाती हो कि विदाई अंत नहीं, विस्तार है। आज तक तुम सिर्फ मेरी माँ थीं, लेकिन कल से तुम उस पूरे घर की आत्मा बनोगी जो मुझे अपनी बहू बनाकर ले जा रहा है। मुझमें जो धैर्य है, वह तुम्हारा है। मुझमें जो प्रेम और समर्पण है, वह तुम्हारी दी हुई सीख है। जब भी मैं अपने नए घर में किसी के आँसू पोंछूँगी, तो वह हाथ मेरे होंगे पर करुणा तुम्हारी होगी। जब मैं अपनी रसोई में अन्नपूर्णा बनकर किसी भूखे को खाना परोसूँगी, तो स्वाद तुम्हारे संस्कारों का होगा।”
सावित्री की आँखों से आँसुओं की अविरल धारा बह निकली, लेकिन इस बार उन आँसुओं में भय और संकोच नहीं था।
अनघा आगे बोली, “माँ, नदियाँ कभी अपना जल अपने पास रोककर नहीं रखतीं। अगर वे सागर की ओर न बहें, तो उनका पानी ठहरकर सड़ जाएगा। उनका बहना ही खेतों को हरियाली देता है, प्यासों की प्यास बुझाता है। एक बेटी का विदा होना भी नदी के उसी प्रवाह की तरह है। तुम तो वह महासागर हो माँ, जिसने मुझे जन्म दिया। मैं जहाँ भी जाऊँगी, जिस भी आँगन को सींचूँगी, मेरी जड़ों में तुम्हारा ही तो प्रवाह रहेगा। और फिर, यह किसने कहा कि विदा होने वाली बेटियाँ लौटती नहीं हैं? मैं तो तुम्हारी परछाई हूँ माँ, परछाई कभी देह से जुदा हो सकती है क्या?”
कमरे के दरवाज़े पर हल्की सी दस्तक हुई। अनघा के मामा जी खड़े थे। उनके चेहरे पर भी विदाई की भावुकता थी, पर समय का तकाज़ा था। “दीदी, पंडित जी बुला रहे हैं। लग्न का समय हो गया है। बारात दरवाज़े पर आ चुकी है, समधी जी स्वागत के लिए खड़े हैं। अनघा को मंडप में ले चलने का वक्त आ गया।”
सावित्री देवी ने गहरी सांस ली। उन्होंने अपनी बेटी के मुखड़े को दोनों हाथों से थामा, उसके माथे पर लगे सुनहरे टीके को चूमा और उसके गालों पर लगे हल्दी के रंग को बड़े प्यार से सहलाया। अचानक उनके भीतर से सारा डर, सारा विषाद और सारा अकेलापन धुल गया था। उन्हें लगा कि सचमुच, सृजन का वास्तविक आनंद तो उसके समर्पण में है। जब एक कुम्हार मूरत गढ़ता है, तो वह मूरत घर के किसी बंद संदूक में छुपाकर रखने के लिए नहीं होती; वह तो जगमगाते पंडाल में प्रतिष्ठित होने के लिए होती है, जहाँ हज़ारों लोग उसके सामने नतमस्तक होते हैं। आज उनकी बेटी भी उसी गरिमा के साथ एक नए घर की लक्ष्मी बनने जा रही थी।
सावित्री जी उठीं। उनकी कमर अब झुकी हुई नहीं थी, उनके कदम अब काँप नहीं रहे थे। उन्होंने अपनी साड़ी का पल्लू अपनी कमर में खोंसा और अनघा के सिर पर लाल चुनरी को बड़े नाज़ से ठीक किया। उनके चेहरे पर अब एक ममतामयी, दृढ़ और गौरवशाली मुस्कान थी।
“चल मेरी बच्ची,” सावित्री जी की आवाज़ में एक असीम विश्वास गूँज उठा, “आज तेरी माँ तुझे रोते हुए नहीं, बल्कि अपने पूरे जीवन के आशीर्वाद और फक्र के साथ विदा करेगी। जा और उस नए आँगन को भी उसी तरह स्वर्ग बना, जैसे तूने मेरे इस वीरान जीवन को चौबीस बरस तक महकाए रखा।”
जब अनघा मंडप की ओर बढ़ी, तो शहनाई की तान और ऊँची हो गई। शंख की पावन ध्वनि और वेदमंत्रों के उच्चार से पूरा प्रांगण गूँज उठा। सावित्री देवी मंडप के एक कोने में खड़ी होकर अपनी बेटी को सात फेरे लेते देख रही थीं। दूल्हे रोहन के चेहरे पर अनघा के लिए अथाह सम्मान था और समधी-समधन के चेहरे पर ऐसी सुयोग्य बहू को पाकर गहरा संतोष।
विदाई का वह अंतिम क्षण भी आया जब डोली उठने वाली थी। अनघा ने जब अपनी माँ के पैर छुए, तो सावित्री जी ने उसे गले से लगाया, लेकिन इस बार उनकी आँखों में बेबसी के आँसू नहीं थे। वे जानती थीं कि प्रेम कभी बिछोह में खत्म नहीं होता, वह तो दूरियों के पार जाकर और अधिक प्रगाढ़, और अधिक विस्तृत हो जाता है। उन्होंने कार की खिड़की से अनघा का हाथ धीरे से छोड़ा और मुस्कुराते हुए हाथ हिलाया। कार जैसे-जैसे आगे बढ़ रही थी, सावित्री देवी का सीना गर्व से चौड़ा होता जा रहा था। उन्हें समझ आ गया था कि विदाई किसी रिश्ते का विसर्जन नहीं, बल्कि प्रेम और संस्कारों का अनंत विस्तार है।
दोस्तों, क्या हमारी बेटियाँ सचमुच विदाई के बाद पराई हो जाती हैं, या वे हमारे संस्कारों को दो कुलों में बाँटकर हमें और अधिक समृद्ध कर देती हैं? आपके अनुसार माता-पिता के त्याग और विदाई के इस पावन नियम के प्रति समाज की सोच कैसी होनी चाहिए? अपने विचार और अनुभव नीचे कमेंट बॉक्स में लिखकर हमारे साथ ज़रूर साझा करें।
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