रामदीन का गला भर आया। उन्होंने अपनी कांपती आवाज को संभालते हुए कहा, “बाबूजी, हम अनपढ़ रहे, जिंदगी भर लोगों का बोझ ढोते-ढोते हमारी पीठ झुक गई। हम नहीं चाहते कि हमारे बेटे को भी समाज की यह जिल्लत और बेबसी देखनी पड़े। उसकी फीस, उसकी किताबें, रहने-खाने का खर्चा बहुत है। वह कहता है कि बाबूजी आप घर बैठो, मैं कोई छोटी-मोटी नौकरी कर लूंगा। पर हमने साफ कह दिया—जब तक मेरी हड्डियों में जान है, तू सिर्फ पढ़ाई करेगा। हम चाहते हैं कि वह अफसर बने, कुर्सी पर बैठे और समाज में सिर उठाकर जिए। बस उसी की आखिरी सेमेस्टर की फीस भरनी है, उसी के वास्ते यह पहिया खींच रहे हैं।”
सूरज अभी पूरी तरह ढला नहीं था, लेकिन लखनऊ के पुराने चौक की सड़कों पर शाम की हलचल अपने चरम पर थी। बादलों से घिरे आसमान ने उमस को और बढ़ा दिया था। मैं अपनी नई नौकरी के सिलसिले में शहर आया हुआ था और चारबाग रेलवे स्टेशन से थोड़ा आगे, मुख्य बाजार के एक चौराहे पर खड़ा होकर किसी सवारी की तलाश कर रहा था। मेरे पास कपड़ों से भरा एक भारी बक्सा और किताबों का एक वजनी कार्टन था, जिसे देर तक पकड़े रहना मेरी हथेलियों के लिए मुश्किल होता जा रहा था। तभी कानों में एक धीमी, हांफती हुई आवाज सुनाई दी, “बाबूजी, रिक्शा चाहिए का?”
मैंने पलटकर देखा। सामने एक पुराना पैडल वाला रिक्शा खड़ा था, जिसकी गद्दी पर कई जगह पैबंद लगे थे। रिक्शे के पास खड़ा इंसान हड्डियों का ढांचा भर जान पड़ता था। चेहरे पर झुर्रियों का घना जाल, आंखों के नीचे गहरी स्याही, सफेद खिचड़ी दाढ़ी और बदन पर मैला-कुचैला सा पीला कुर्ता। उनकी उम्र कम से कम पैंसठ के पार रही होगी। उनके पैरों की नसें उभरी हुई थीं और चप्पलों के तले लगभग घिस चुके थे।
उनकी ऐसी अवस्था देखकर मेरा मन भारी हो गया। मैंने संकोच से कहा, “बाबा, रिक्शा तो चाहिए, लेकिन मुझे हजरतगंज के पास एक दफ्तर तक जाना है। सामान भी काफी वजनी है और रास्ता चढ़ाई वाला है। आपकी उम्र देखकर मुझसे यह नहीं होगा कि आप मुझे खींचें और मैं चुपचाप पीछे बैठा रहूं। मैं कोई ऑटो देख लेता हूं।”
बुजुर्ग रिक्शावाले के सूखे होठों पर एक फीकी सी, पर बेहद आत्मीय मुस्कान तैर गई। उन्होंने अपनी मैली पगड़ी के छोर से माथे का पसीना पोंछा और बोले, “अरे बाबूजी, आप हमारी उमर पर न जाइए। चालीस साल से यह पाँव इसी पहिए को घुमा रहे हैं। अगर आप हमारी उमर देखकर बैठेंगे ही नहीं, तो रात को चूल्हा कैसे जलेगा? बैठ जाइए हजूर, ऊपर वाले की दया से अभी टांगों में इतना दम बाकी है कि आपको आपकी मंजिल तक सही-सलामत पहुंचा दें।”
उनकी बातों में एक अजीब सी लाचारी और उससे भी कहीं अधिक उम्मीद थी। मैं चाहकर भी मना नहीं कर पाया। मैंने भारी मन से सामान रिक्शे के पायदान पर रखवाया और खुद सीट पर बैठ गया।
“कितने पैसे लेंगे बाबा?” मैंने पूछा।
“बाबूजी, जो जायज बनता है वही दीजिएगा। डेढ़ सौ रुपये दे दीजिएगा।” उन्होंने विनम्रता से सिर झुकाकर कहा। मैंने हामी भर दी।
रिक्शा आगे बढ़ा। शुरुआत में तो वह समतल सड़क पर ठीक-ठाक चला, लेकिन जैसे ही रास्ता थोड़ा ऊपर उठा, उन बुजुर्ग के पैर कांपने लगे। उनकी सांसें तेजी से फूलने लगीं और कुर्ते की पीठ पसीने से तरबतर हो गई। वे पूरी ताकत से पैडल पर अपना वजन डाल रहे थे, मानो सिर्फ रिक्शा नहीं, बल्कि अपनी पूरी जिंदगी का भारी बोझ खींच रहे हों। पीछे बैठकर उनका यह संघर्ष मुझसे देखा नहीं जा रहा था। मुझे अपने ही सामान और खुद के वजन से नफरत होने लगी।
खुद को सहज करने और उनका ध्यान भटकाने के लिए मैंने पूछा, “बाबा, आपका नाम क्या है? और इस उम्र में आप इतना कड़ा परिश्रम क्यों कर रहे हैं? क्या घर में कोई सहारा देने वाला नहीं है?”
उन्होंने पैडल मारते हुए, बिना पीछे मुड़े, रुक-रुक कर बोलना शुरू किया, “नाम है रामदीन, बाबूजी। किस्मत कहिए या जिम्मेदारी, आराम हमारे नसीब में कहां। परिवार तो था हजूर… दो बेटियां थीं, भगवान की दया से उनका ब्याह अपनी हैसियत से बढ़कर अच्छे घरों में कर दिया। उनके हाथ पीले करने में पुरखों की थोड़ी-बहुत जमीन थी, वो भी बिक गई।”
“और बेटा?” मैंने धीरे से सवाल किया।
रामदीन के कदमों की रफ्तार थोड़ी धीमी पड़ी। उन्होंने एक गहरी सांस छोड़ी, जिसमें एक पिता के सालों के दर्द की तपिश थी। “बेटा है बाबूजी, सबसे छोटा है, नाम है आकाश। होनहार है बहुत। बचपन से ही किताबों में सिर खपाए रहता था। बारहवीं में पूरे जिले में उसका नाम आया था। अब शहर के बड़े कॉलेज से इंजीनियरी की पढ़ाई कर रहा है। आखिरी साल चल रहा है उसका।”
“अरे वाह! यह तो बहुत गर्व की बात है,” मैंने उत्साह से कहा, “लेकिन अगर वह इतना बड़ा हो गया है, तो आपको इस उम्र में रिक्शा चलाने की क्या जरूरत?”
रामदीन का गला भर आया। उन्होंने अपनी कांपती आवाज को संभालते हुए कहा, “बाबूजी, हम अनपढ़ रहे, जिंदगी भर लोगों का बोझ ढोते-ढोते हमारी पीठ झुक गई। हम नहीं चाहते कि हमारे बेटे को भी समाज की यह जिल्लत और बेबसी देखनी पड़े। उसकी फीस, उसकी किताबें, रहने-खाने का खर्चा बहुत है। वह कहता है कि बाबूजी आप घर बैठो, मैं कोई छोटी-मोटी नौकरी कर लूंगा। पर हमने साफ कह दिया—जब तक मेरी हड्डियों में जान है, तू सिर्फ पढ़ाई करेगा। हम चाहते हैं कि वह अफसर बने, कुर्सी पर बैठे और समाज में सिर उठाकर जिए। बस उसी की आखिरी सेमेस्टर की फीस भरनी है, उसी के वास्ते यह पहिया खींच रहे हैं।”
रामदीन की बातें मेरे दिल में तीर की तरह चुभ रही थीं। मैं सोच रहा था कि जहां आज के दौर में औलादें थोड़ी सी काबिलियत मिलते ही मां-बाप को बेसहारा छोड़ देती हैं, वहीं एक यह बाप है जो अपने बच्चे के सपनों को सच करने के लिए अपनी ढलती उम्र में अपना खून-पसीना एक कर रहा है।
लगभग पैंतालीस मिनट की मशक्कत के बाद रिक्शा हजरतगंज की एक बहुमंजिला इमारत के सामने रुका। रामदीन बुरी तरह हांफ रहे थे। उन्होंने उतरकर मेरा बक्सा और कार्टन नीचे उतारा। उनके हाथ बुरी तरह कांप रहे थे और चेहरे पर थकान की गहरी लकीरें थीं, लेकिन काम पूरा करने का एक संतोष भी था।
मुझे उन पर इतनी दया और सम्मान आ रहा था कि मैंने अपनी जेब से सीधे पाँच सौ रुपये का एक नया नोट निकाला। मेरे मन में अपनी संपन्नता और तथाकथित ‘महानता’ का एक अजीब सा अहंकार तैर गया था कि आज मैं किसी गरीब पिता की बहुत बड़ी मदद करने जा रहा हूँ।
मैंने वह पाँच सौ का नोट रामदीन की तरफ बढ़ाते हुए बेहद हमदर्दी भरे लहजे में कहा, “रामदीन जी, यह पांच सौ रुपये आप रखिए। छुट्टे की कोई जरूरत नहीं है। यह मेरी तरफ से आपके बेटे की पढ़ाई और आपकी मेहनत के लिए एक छोटा सा उपहार समझिए। इसे रख लीजिए, आपके बहुत काम आएगा।”
मुझे लगा था कि रामदीन हाथ जोड़कर मेरा धन्यवाद करेंगे, उनकी आंखें कृतज्ञता से भर जाएंगी और वे खुशी-खुशी पैसे अपनी जेब में रख लेंगे।
लेकिन जो हुआ, उसने मेरे पैरों तले से जमीन खिसका दी।
रामदीन ने नोट को देखा भी नहीं। उनका चेहरा, जो अब तक बेहद विनम्र और थका हुआ था, अचानक एक अजीब से स्वाभिमान से तन गया। उनकी झुकी हुई कमर सीधी हो गई। उन्होंने अपनी फटी हुई जेब में हाथ डाला, उसमें से पचास-पचास के तीन मुड़े-तुड़े नोट निकाले और मेरे हाथ पर रख दिए। साथ ही मेरा पाँच सौ का नोट भी मेरे ही हाथ में थमा दिया।
“नै बाबूजी!” रामदीन की आवाज में अब कोई लाचारी नहीं थी, बल्कि एक ऐसी चट्टानी गरिमा थी जिसके आगे मेरा वजूद बहुत छोटा लग रहा था। “हम गरीब जरूर हैं हजूर, पर भिखारी नहीं हैं। हमने आपसे अपनी मेहनत का डेढ़ सौ रुपया मांगा था, खैरात नहीं। यह पसीना हमने आपके सामान को यहां तक लाने के लिए बहाया है, किसी के सामने हाथ फैलाने के लिए नहीं। अगर मैं अपने बेटे की पढ़ाई में खैरात का पैसा लगाऊंगा, तो उसकी डिग्री का मोल कम हो जाएगा। मैं उसे ईमानदारी और मेहनत की रोटी खिलाकर बड़ा कर रहा हूँ, ताकि वह कल को किसी के आगे न झुके। हमारा डेढ़ सौ ही बनता है, वही काट लीजिए।”
मैं सन्न रह गया। मेरे हाथ में रखे वे तीन मैले नोट और मेरा पाँच सौ का नोट जैसे मुझे जलते हुए अंगारे की तरह लग रहे थे। मेरी तथाकथित ‘उदारता’ और ‘दया’ वास्तव में मेरी रईसी का खोखला घमंड थी, जिसे एक अनपढ़, फटेहाल रिक्शेवाले ने एक ही झटके में तार-तार कर दिया था। मेरे पास अपने बचाव में कहने के लिए एक भी शब्द नहीं बचा था। मुझे अपने ऊपर इतनी शर्मिंदगी पहले कभी महसूस नहीं हुई थी।
मैंने कांपते हाथों से अपना पाँच सौ का नोट वापस लिया, अपने पर्स से सौ और पचास के दो साफ नोट निकाले और अत्यंत आदर से दोनों हाथों से उनके सामने बढ़ाए। “मुझे माफ कर दीजिए बाबा… मुझसे बहुत बड़ी भूल हो गई। यह आपका हक है।”
रामदीन ने वे डेढ़ सौ रुपये लिए, उन्हें माथे से छुआया और अपनी जेब में रख लिया। उनके चेहरे पर फिर से वही सौम्य मुस्कान लौट आई। “कोई बात नहीं बाबूजी, भगवान आपका भला करे।”
वे मुड़े, अपने पुराने रिक्शे पर चढ़े और पैडल मारते हुए भीड़ में ओझल हो गए। मैं वहीं फुटपाथ पर खड़ा रहा, हाथ में अपना सामान पकड़े, उस दिशा में टकटकी लगाए देखता रहा जहां से वह बुजुर्ग स्वाभिमानी फरिश्ता गुजरा था। उस दिन मुझे समझ आया कि असली अमीरी बैंक बैलेंस में नहीं, बल्कि इंसान के आत्मसम्मान और उसकी नीयत में होती है।
वर्षों बीत गए। मैं उसी शहर में एक बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनी में प्रोजेक्ट मैनेजर बन चुका था। एक दिन हमारे ऑफिस में नए भर्ती हुए जूनियर इंजीनियरों का परिचय सत्र चल रहा था। एक नौजवान मंच पर आया। तेजतर्रार आंखें, आत्मविश्वास से भरा चेहरा और गजब का सलीका। जब उसने बोलना शुरू किया, तो उसकी आवाज में वही सच्चाई और ठहराव था जिसने मुझे बरसों पहले झकझोरा था।
उसका नाम था आकाश।
उसने अपनी सफलता का श्रेय देते हुए मंच से कहा, “आज मैं जिस मुकाम पर हूँ, वह किसी तकनीक या डिग्री की वजह से नहीं, बल्कि मेरे पिता के पैरों के उन छालों की बदौलत है जो उन्होंने मुझे पढ़ाने के लिए रिक्शा खींचते हुए सहे थे। उन्होंने मुझे सिखाया कि जीवन में चाहे कितनी भी तंगहाली आए, कभी अपने स्वाभिमान और ईमानदारी का सौदा मत करना।”
सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। मेरी आंखों से आंसू बह रहे थे। कार्यक्रम खत्म होते ही मैं तेजी से आगे बढ़ा और आकाश को गले से लगा लिया।
“सर, आप?” आकाश ने हैरान होकर पूछा।
मैंने नम आंखों से मुस्कुराते हुए कहा, “आकाश, मुझे तुम्हारे बाबूजी से मिलना है। आज मुझे उन्हें फिर से झुककर सलाम करना है, क्योंकि उस दिन उन्होंने सिर्फ तुम्हें नहीं, मुझे भी इंसानियत और स्वाभिमान का सबसे बड़ा पाठ पढ़ाया था।”
उस शाम मैं आकाश के साथ उनके नए, छोटे लेकिन बेहद साफ-सुथरे घर गया। रामदीन जी आंगन में खाट पर बैठे थे। अब उनके चेहरे पर थकान नहीं, बल्कि एक विजेता का सुकून था। मैंने उनके चरण छुए। उन्होंने मुझे पहचाना या नहीं, मैं नहीं जानता, लेकिन उनके झुर्रीदार हाथों ने जब मेरे सिर को छुआ, तो मुझे लगा कि मुझे दुनिया का सबसे बड़ा आशीर्वाद मिल गया है। इंसान की असली दौलत उसकी मेहनत और उसूल होते हैं, और जब तक यह दुनिया है, स्वाभिमान की रोटी का स्वाद किसी भी छप्पन भोग से कहीं अधिक मीठा रहेगा।
जीवन में जब हम किसी जरूरतमंद को देखते हैं, तो क्या हमारी मदद के पीछे अनजाने में हमारा अहंकार छुपा होता है? क्या आपने कभी किसी गरीब इंसान के भीतर ऐसा अद्भुत स्वाभिमान देखा है जिसने आपकी सोच बदल दी हो? अपनी जिंदगी का ऐसा कोई प्रेरक अनुभव कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।
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