वक्त का पहिया – दीपा माथुर

“वक्त का पहिया कहाँ रुकता है? है न?”

सुधा जी ने मुस्कुराते हुए विद्यार्थियों की ओर देखा और फिर बोलीं—

“तो हम कैसे रुक सकते हैं? हमें भी चलना ही होगा, है न?

क्यों?

हम रुक जाएँ… रील, इंस्टाग्राम, व्हाट्सऐप और फेसबुक स्क्रॉल करते-करते वक्त को आगे जाने दें और हम पीछे रह जाएँ।

फिर बहुत भागना पड़ेगा और हम भाग नहीं पाएँगे। बहुत पीछे छूट जाएँगे और फिर हताश हो जाएँगे। और जब अपनी ही गलतियों का सामना करने का साहस नहीं होगा, तो किसी और के सिर पर दोष का ठीकरा फोड़कर अपने आपको हल्का कर लेंगे।”

सुधा जी की बात सुनकर सभागार में जोरदार ठहाका गूँज उठा।

दो क्षण के विराम के बाद उन्होंने फिर अपनी बात आगे बढ़ाई—

“समय के साथ चलिए… न भागना, न हाँफना, न तनाव और न हार।

सिर्फ जीत… जीत और जीत!

तो आप सभी विद्यार्थी मुझसे वादा करेंगे कि आप वक्त के साथ चलेंगे?”

तालियों की गड़गड़ाहट से पूरा सभागार गूँज उठा।

अपनी वाणी को विराम देते हुए सुधा जी ने बड़ी विनम्रता से सभी को नमस्कार किया और मंच से नीचे उतर आईं।

ईशा ने वीणा की कमर में धीरे से कोहनी मारते हुए कहा—

“वीणा, देखो न! सुधा मैम तो बिल्कुल तुम्हारी तरह दिखती हैं। वही नैन-नक्श, वही बोलने का अंदाज और वही मुस्कान!”

वीणा को न जाने क्यों भीतर तक एक सुखद-सा गर्व महसूस हुआ।

वह धीरे से बोली—

“काश! मैं भी इनकी तरह बुलंदियों को छू पाऊँ।”

कुछ क्षण वह चुप रही, फिर जैसे खुद से ही कोई वादा करते हुए बोली—

“पर आज से यह तय रहा… मैं खूब मेहनत करूँगी और सुधा मैम की तरह बनूँगी।”

सुधा मैम की वह छवि वीणा के मन पर इस कदर अंकित हो गई कि घर पहुँचने के बाद भी उनकी आवाज उसके कानों में गूँजती रही।

“मम्मी… मम्मी! आज हमारे स्कूल में एक मैम आई थीं—

वीणा की आवाज में असाधारण उत्साह था।

“मम्मी, क्या पर्सनैलिटी थी उनकी! देखकर, सुनकर मजा आ गया।”

वीणा की मम्मी भारती उसके इस उत्साह को कुछ देर तक टुकुर-टुकुर देखती रहीं। फिर मुस्कुराकर बोलीं—

“आज तो भूख नहीं लगी होगी? आखिर इतनी बड़ी पर्सनैलिटी से मिलकर आई हो!”

“ओह हो, मम्मी! खाना लाओ। भूख तो बहुत लगी है, पर न जाने क्यों… आज बहुत खुशी भी हो रही है।”

वीणा ने मुस्कुराते हुए कहा—

“बनो तो कुछ ऐसे बनो कि लोग तुम्हारे व्यक्तित्व की मिसाल दें।”

तभी डोरबेल की आवाज गूँजी।

“नीना, जरा देखना कौन है?”

“जी।”

कहते हुए नीना ने दरवाजा खोला।

गेट पर एक संभ्रांत महिला खड़ी थीं।

“जी, कहिए?”

नीना ने साड़ी के पल्लू से अपना चेहरा पोंछा और उन्हें भीतर ड्राइंग रूम में बैठा दिया।

“मैं अभी मैम को बुलाती हूँ।”

कहती हुई वह ड्राइंग रूम के पर्दे ठीक करती हुई भारती के पास पहुँची।

“दीदी, एक महिला आई हैं। आपको पूछ रही हैं।”

“आती हूँ। उन्हें पानी पिलाओ और हाँ… नाश्ता भी रख देना।”

भारती ने चपाती का एक कौर तोड़ते हुए कहा।

वह जल्दी-जल्दी खाना खाकर हाथ धोने गई और फिर ड्राइंग रूम की ओर बढ़ी।

लेकिन जैसे ही उसकी नजर सामने बैठी महिला पर पड़ी, उसके कदम वहीं ठिठक गए।

चेहरा जैसे अचानक सफेद पड़ गया।

वह कुछ क्षण तक उन्हें देखती रही, फिर नजरें झुकाकर सामने सोफे पर बैठ गई।

महिला ने भर्राई हुई आवाज में कहा—

“मेरे पास आओ… इतनी दूर क्यों बैठी हो? पास आओ। अपनी मम्मी से नहीं मिलोगी?”

भारती के भीतर जैसे बरसों से बंद कोई बाँध टूट गया।

वह दौड़कर अपनी मम्मी से लिपट गई और फूट-फूटकर रोने लगी।

सुधा जी ने उसके बालों पर हाथ फेरते हुए धीरे से पूछा—

“ठीक तो हो?”

भारती ने उनके सवाल का जवाब न देकर सुबकते हुए पूछा—

“पर… पर आप यहाँ?”

सुधा जी खामोश रहीं।

वे कुछ नहीं बोलीं, बस अपनी बेटी की आँखें पढ़ती रहीं। उन आँखों में वर्षों का पछतावा, अपराधबोध और अनकही पीड़ा साफ दिखाई दे रही थी।

उनकी नजर भारती के माथे पर पड़ी, जहाँ अनगिनत सलवटें जैसे बीते वर्षों की कहानी कह रही थीं।

कुछ क्षण बाद सुधा जी ने धीमे स्वर में पूछा—

कैसी हो?

फिर हल्की-सी शिकायत उसके स्वर में उतर आई 

“तुमने तो घर छोड़कर हमें ही पराया कर दिया। अरे, बता देती… मैं खुद तेरी शादी तेरी पसंद के लड़के से कर देती।”

वे कुछ क्षण चुप रहीं।

“खैर… जो हुआ, सो हुआ। अब मैंने तुम्हें माफ कर दिया।”

फिर अचानक उनके चेहरे पर वही पुरानी आत्मीयता लौट आई।

“चलो, अब अपनी फैमिली से मिलवाओ भी!”

सुधा जी के चेहरे पर उत्साह था, लेकिन भारती की आँखों से आँसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे।

“मम्मी… प्लीज, मुझे माफ कर दो। मैंने आपको और पापा को बहुत परेशान किया।”

सुधा जी का गला रुंध गया।

उन्होंने बेटी के हाथ को अपने हाथों में थामते हुए कहा—

“चलो… कोई बात नहीं। जो हुआ, सो हुआ। तुम तो खुश हो न?”

वीणा ने मम्मी के हाथों पर अपना हाथ रखा और धीमे से बोली—

“हाँ मम्मी… बहुत खुश हूँ।”

फिर अचानक उसे कुछ याद आया।

उसने आवाज लगाई—

वीणा

“आई, मॉम!”

कहती हुई वीणा ड्राइंग रूम में पहुँची, लेकिन सामने बैठी सुधा जी को देखते ही उसकी आँखें आश्चर्य से फैल गईं।

“आ… आप हमारे घर?”

फिर वह उत्साह से बोली—

“मैम, मैं आपके लिए क्या करूँ? सॉरी… पर मैं बहुत खुश हूँ कि आप मेरे घर आई हैं। मैं आपसे बहुत मोटिवेट हुई हूँ। मैं बिल्कुल आप जैसी बनना चाहती हूँ।”

वीणा की आवाज में खुशी का सागर उमड़ रहा था।

मम्मी मैं स्कूल में जिन पर्सनालिटी से मिलो थी वो ये ही है।

भारती ने वीणा को बताया बेटा ये तुम्हारी नानी मां है।

“नानी?”

वीणा कुछ पल के लिए अवाक रह गई।

फिर एकदम नानी के लिपट गई।

“आई एम प्राउड ऑफ यू, नानी जी!”

खुशी के मारे उसे समझ ही नहीं आ रहा था कि वह क्या बोले।

अचानक वह भारती की ओर देखकर बोली—

सुधा जी ने वाणी को अपनी ओर खींचकर गोद में बिठा लिया।

उसके सिर पर हाथ फेरते हुए वे बोलीं—

“सभागार में तुम्हें देखते ही मुझे भारती की याद आ गई थी। लगा, हो न हो… तुम भारती की बेटी ही हो।”

वीणा ध्यान से उनकी ओर देखने लगी।

सुधा जी ने आगे कहा—

“इसीलिए मैंने तुम्हारी प्रिंसिपल मैम से तुम्हारे बारे में पूछा। उन्होंने तुम्हारी खूब तारीफ की और तुम्हारा एडमिशन फॉर्म भी मुझे दिखाया।”

उनकी आँखों में खुशी की चमक थी।

“मेरा शक सही निकला। उन्हीं से तुम्हारा पता लेकर मैं यहाँ पहुँची हूँ।”

सुधा जी ने वीणा को सीने से लगा लिया।

“मेरी प्यारी बच्ची…”

वीणा की आँखों से आँसू बहते रहे।

कुछ देर बाद सुधा जी ने मुस्कुराकर कहा—

“अब अपनी नानी के साथ रहोगी?”

वीणा की आँखें चमक उठीं।

“सच?”

“मुच!”

दोनों एक साथ हँस पड़ीं।

वीणा की ओर देखते हुए भारती बोलीं—

“अब तुम होमवर्क कर लो और नानी जी को थोड़ा आराम करने दो।”

वीणा तुरंत बोली—

“भूखे पेट भजन नहीं होते, मॉम। नानी जी को पहले खाना तो खिलाओ।”

भारती हँस पड़ीं।

“ठीक है, तुम होमवर्क करो। मैं देखती हूँ।”

वीणा अपने कमरे में चली गई।

भारती ने डाइनिंग टेबल पर खाना लगाया और सुधा जी के पास आकर बैठ गईं।

कुछ क्षण तक दोनों के बीच खामोशी पसरी रही।

फिर भारती ने गहरी साँस लेकर कहा—

“आप सही कहती थीं… उम्र की उस डोर में महज एक आकर्षण होता है, उसे प्यार का नाम नहीं दिया जा सकता।”

उनकी आवाज भर्रा गई।

“पर मैं ही नहीं समझी थी। उस दिन अपनी गुल्लक से रुपये लेकर घर से निकलकर मैं संदीप के पास आ गई थी।”

सुधा जी चुपचाप सुनती रहीं।

“वह मुझे एक कमरे में ले गया। मैंने बहुत जिद की तो इसने पास के मंदिर में मेरी माँग भर दी… और मैं नादान उसे शादी समझ बैठी।”

भारती की आँखों के सामने जैसे उसका अतीत फिर से जीवित हो उठा।

“महीने भर साथ रहने के बाद वह कहीं चला गया। मैंने बहुत इंतजार किया, लेकिन एक दिन उसका पत्र मिला।

मेरे मम्मी ,पापा ने मेरा विवाह अन्यत्र कर दिया मै उनकी जिद्द के आगे मजबूर था”

वह कुछ पल के लिए रुक गई।

अब मैं आपके पास भी नहीं आ सकती थी पापा के स्वर्गवास की खबर मुझे लग गई थी।

ओर उसके लिए में ही दोषी हु।

पर क्या करती ?

भारती का गला सूख गया।

पानी का घुट पी कर बोली :” कई दिन ऐसे ही बीता दिए

फिर सोचती संदीप का भी क्या दोष वो तो एक आज्ञाकारी बेटा है।

पर मैं….

मै ही गलत थी।

“उस वक्त आपको बहुत मिस किया… लेकिन वापस लौटना भी मेरे लिए नामुमकिन था। इसीलिए सबसे पहले घर बदला। वहीं मकान मालकिन के सहयोग से ट्यूशन पढ़ाने लगी।”

“तभी मुझे पता चला कि मैं माँ बनने वाली हूँ।”

भारती ने एक पल के लिए आँखें बंद कर लीं।

“समझ ही नहीं आ रहा था कि क्या करूँ? मकान मालकिन को विधवा होने की बात कहकर मैंने वीणा को इस दुनिया में लाने का फैसला किया।”

उसकी आवाज में दर्द था, लेकिन अब उसमें पछतावे के साथ एक अजीब-सा संतोष भी था।

“बस… अब यही मेरा जीवन बन गई। मैथ्स में पकड़ तो थी ही। ट्यूशन फिर से चलने लगी। धीरे-धीरे हालात सुधरे और फिर मैंने यह मकान खरीद लिया।”

भारती ने सुधा जी की ओर देखा।

“मम्मी… खून तो आपका ही है न?”

सुधा जी की आँखें भर आईं।

भारती ने आगे कहा—

“इस मकान के ऊपर के कमरों में मेरी तरह भटकी हुई लड़कियाँ रहती हैं। जिन्हें मैं सिलाई-कढ़ाई सिखाती हूँ और जो पढ़ी-लिखी होती हैं, उन्हें ट्यूशन में लगा देती हूँ। कोशिश करती हूँ कि वे उस अँधेरे से बाहर निकल सकें, जिसमें कभी मैं खुद भटक गई थी।”

कॉलेज में जाकर काउंसलिंग करती हु 

उम्र के आकर्षण के धोखे में ना पड़े इसके लिए स्कूल कॉलेज के बच्चो से चर्चा कर उन्हें भटकाव से बचाने का प्रयास करती हु।

आप ही तो कहती थी कोई भी काम करो मन से करो संघर्ष के समय सब अकेले ही होते है लेकिन जब सफलता मिलने लगती है कारवा बनता चला जाता है।

वही हुआ आज बहुत सी लड़कियां जो मेरी तरह थी मुझसे जुड़ गई ओर हमारी एक टीम बन गई।

आपको पता है इस कार्य में हमे बहुत स्पोर्ट मिलने लगा है।

कई ngo भी जुड़ गए।

अब मैं लड़कियों को भटकने नहीं देती जहां तक कोशिश होती है बचाने का प्रयास करती हु।”

सुधा जी देर तक बेटी को देखती रहीं।

जिस लड़की के पाँव कभी जमीन पर नहीं पड़ते थे, जिसे अपनी छोटी-सी दुनिया से बाहर की कठिनाइयों का अंदाजा तक नहीं था… उसी लड़की ने एक छोटी-सी भूल की और उसकी कीमत वर्षों तक चुकाई।

लेकिन उसी ठोकर ने उसे टूटने के बजाय दूसरों के लिए सहारा बनना सिखा दिया था।

सुधा जी ने आगे बढ़कर भारती का चेहरा दोनों हथेलियों में थाम लिया।

“बेटी… गलती ने तुम्हें छोटा नहीं किया। तुमने अपनी गलती के बाद जो रास्ता चुना, उसने तुम्हें बहुत बड़ा बना दिया।”

भारती की आँखों से आँसू बह निकले।

“मम्मी…”

“और सुन,” सुधा जी ने उसके आँसू पोंछते हुए कहा, “तुम वक्त से पीछे नहीं छूटी हो, भारती… तुमने तो वक्त की ठोकर से अपना रास्ता बनाना सीख लिया है।”

भारती माँ के सीने से लग गई।

कमरे में कोई शब्द नहीं था।

बस दो पीढ़ियों के बीच वर्षों से जमा दूरी आँसुओं में बह रही थी।

बाहर शाम उतर रही थी।

और शायद पहली बार वीणा को लगा—वक्त सचमुच किसी के लिए नहीं रुकता… लेकिन जो इंसान उसकी चाल समझ ले, वह अपनी ठोकरों को भी किसी और की राह का उजाला बना सकता है।

अप्रकाशित ओर स्वरचित

दीपा माथुर

सीकर ,राजस्थान

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