डिस्ट्रिक्ट कोर्ट के बाहर शंभू सिर झुकाए बैठा हुआ था।
तभी उसके कानों में ज़ोर से ठहाके की आवाज़ आई। जानी-पहचानी आवाज़ सुनकर उसने जैसे ही सामने की ओर देखा, उसकी आँखें आँसुओं से भर गईं।
सामने उसका बेटा गर्व, शहर के सबसे नामचीन वकील माथुर साहब के साथ हँसते हुए आ रहा था।
माथुर उससे हँसते हुए कह रहे थे, “आप चिंता न करें, पहली ही पेशी में ये केस आप जीत जाएँगे।”
“वो तो मुझे मालूम है माथुर साहब। आपके रहते मुझे क्या चिंता।” उनकी आवाज़ इतनी तेज़ थी कि न चाहते हुए भी शंभू को साफ़-साफ़ सुनाई दे रही थी।
तभी केस नंबर 4 की पुकार होते ही उसका बेटा गर्व और उसका वकील अकड़ कर अंदर की ओर बढ़े। पीछे-पीछे शंभू भी खुद को घसीटते हुए कोर्ट रूम में पहुँचा।
कार्यवाही शुरू होते ही गर्व के वकील माथुर साहब ने शंभू की ओर इशारा करते हुए कहा, “जज साहब, इन्होंने मेरे क्लाइंट पर धोखाधड़ी का बेबुनियाद इल्ज़ाम लगाया है। या तो ये इल्ज़ाम साबित करें, नहीं तो मेरे क्लाइंट को इन पर मानहानि का दावा करना पड़ेगा।”
यह सुनते ही शंभू हाथ जोड़कर खड़ा हो गया, “जज साहब, मैंने कोई गलत इल्ज़ाम नहीं लगाया है। इसने फर्जी वसीयत तैयार करके मेरी सारी संपत्ति को धोखे से हथिया लिया है और मुझे दर-दर की ठोकरें खाने पर मजबूर कर दिया है।” बोलते-बोलते वह फूट-फूट कर रो पड़ा।
यह देखकर जज साहब ने गंभीर स्वर में कहा, “आप शांत हो जाइए और अपने वकील को ज़िरह के लिए भेजिए। इस तरह आप खुद अपनी पैरवी नहीं कर सकते।”
“पर जज साहब, मेरे पास कोई वकील नहीं है।” शंभू ने लाचारी से सिर झुका लिया।
यह सुनते ही जज साहब ने कहा, “अदालत आपको सरकारी वकील मुहैया कराएगी। अब अगली सुनवाई एक हफ्ते बाद होगी।”
जज साहब का यह कहना था कि कोर्ट रूम की पिछली बेंच पर बैठी एक युवा महिला वकील उठ खड़ी हुई।
“जज साहब, अगर आपकी इजाज़त हो तो लीगल एड सेल की तरफ से मैं, एडवोकेट दुर्गा, इस केस की पैरवी करना चाहती हूँ।”
जज साहब ने फाइल देखी और हामी भर दी। शंभू ने मुड़कर उस युवा वकील को देखा, जिसकी आँखों में एक अजीब सी चमक और दृढ़ता थी।
दुर्गा ने आगे आकर कहा, “शंभू जी, आइए। मेरे चैंबर में चलकर बात करते हैं।”
शंभू चुपचाप दुर्गा के पीछे चल पड़ा। लेकिन वह नहीं जानता था कि जिस लड़की को वह पहली बार देख रहा था, उसका उससे रिश्ता आज से नहीं, कई बरस पहले से जुड़ा था।
कल जब दुर्गा की माँ पार्वती रोज़ की तरह सुबह का न्यूज़पेपर पढ़ रही थी, तभी अचानक एक तस्वीर देखते ही उसके हाथ से चाय का कप छूट गया था। दरअसल कुछ दिन पहले, जब शंभू डिस्ट्रिक्ट कोर्ट के चक्कर लगा रहा था, तब एक लोकल न्यूज़पेपर वाले ने उसकी फोटो के साथ उसकी यह न्यूज़ छाप दी थी कि कैसे उसके बेटे ने उसकी सारी संपत्ति पर कब्ज़ा कर उसे दर-बदर की ठोकरें खाने पर मजबूर कर दिया है।
आवाज़ सुनकर जब दुर्गा दौड़ी आई थी, तब पार्वती ने उसे बताया—
“बेटी, मैं एकदम ठीक हूँ। अचानक से यह फोटो देखकर हड़बड़ा गई थी।” उसने अख़बार में छपी शंभू की फोटो की ओर इशारा करते हुए कहा।
यह सुनते ही दुर्गा ने सवालिया नज़रों से पार्वती की ओर देखा था।
पार्वती कुछ पल अख़बार में छपी तस्वीर को देखती रही, फिर बोली—
“यह… यह मेरे बहुत पुराने पहचान वाले हैं, शंभू। पैसा तो बहुत था इनके पास, लेकिन सोच बहुत छोटी थी। बेटा पाने की चाह में इन्होंने अपनी पत्नी की कोख में पल रही बच्ची को दुनिया में आने से रोकना चाहा था। इसी बात से उनकी पत्नी ने उनका घर छोड़ दिया था। लेकिन शंभू को इससे कोई फर्क नहीं पड़ा। उसने दूसरी शादी कर ली और जब दूसरी पत्नी से बेटा हुआ, तो वह पूरी तरह पुत्र-मोह में डूब गया। लेकिन देख बेटी, वक़्त का पहिया घूमा और आज इनके बेटे ने इनकी क्या हालत कर दी है। उम्र के इस पड़ाव पर सड़क पर ला पटका। कुदरत ने अपना इंसाफ़ खुद कर दिया है।”
तब दुर्गा ने अपनी माँ का हाथ थामकर कहा था, “माँ, मुझे लगता है मुझे यह केस लड़ना चाहिए। आज अगर एक लड़की उसे अदालत में इंसाफ़ दिलाएगी, तो उसकी पुरुषवादी सोच पर इससे बड़ा तमाचा और कुछ नहीं होगा।”
और इसीलिए दुर्गा ने अदालत में जाकर यह केस अपने हाथ में लिया था।
अगले सात दिनों में दुर्गा ने पूरा केस समझकर ऐसे सबूत इकट्ठा किए कि अगली सुनवाई पर वकील माथुर के पसीने छूट गए।
दुर्गा ने वसीयत पर मौजूद शंभू के सिग्नेचर की फॉरेंसिक जाँच कराने की माँग रखी। कोर्ट ने अर्ज़ी मंज़ूर की और जब फॉरेंसिक रिपोर्ट खुली, तो दूध का दूध और पानी का पानी हो गया। सिग्नेचर पूरी तरह जाली साबित हुए।
जज साहब ने गर्व को धोखाधड़ी के जुर्म में जेल भेज दिया और शंभू को उसकी संपत्ति वापस लौटा दी गई।
कोर्ट का फैसला सुनते ही शंभू भावुक हो गया और उसने दुर्गा के सिर पर हाथ रखकर कहा, “जुग-जुग जियो बेटी! आज तुमने अपने नाम को सार्थक कर दिया है। तुम्हारे माँ-बाप को तुम पर बहुत फ़ख्र होगा।”
तभी उसके कानों में एक जानी-पहचानी आवाज़ आई—
“क्या बात है! कल जिस बच्ची को मारने पर उतारू थे, आज उसी की लंबी आयु की दुआ माँग रहे हो। लेकिन शंभू, मेरी बेटी को तुम्हारी झूठी दुआओं की ज़रूरत नहीं है।”
यह सुनते ही शंभू ने चौंककर देखा तो उसे यक़ीन ही नहीं हुआ, सामने उसकी पहली पत्नी पार्वती खड़ी थी।
पार्वती के शब्द सुनते ही वह खुशी से चिल्ला पड़ा, “ये मेरी बेटी है! मेरी बिटिया!” कहते हुए वह दुर्गा की ओर बढ़ा।
लेकिन पार्वती ने उसे रोकते हुए कहा, “यह तुम्हारी नहीं, सिर्फ और सिर्फ मेरी बेटी है। तुम इसके बाप कहलाने का हक़ उसी दिन खो चुके हो, जब तुमने इसे मेरी कोख में ही मारने की प्लानिंग की थी।”
यह कहकर वह अपनी बेटी दुर्गा का हाथ पकड़ कर बोली, “चल बेटा।”
तभी दुर्गा अपनी माँ को पकड़ कर फफक-फफक कर रोने लगी, “माँ, तूने मुझे पहले क्यों नहीं बताया कि जिस बच्ची को यह दुनिया में आने से पहले ही मार देना चाहता था, वह मैं ही हूँ।”
यह सुनकर पार्वती उसके सिर पर हाथ फेर कर बोली, “बेटा, फिर तू शायद इस घटिया इंसान का केस नहीं लड़ पाती और तब इसे भी एहसास कभी नहीं होता कि इंसान अपने लिंग से नहीं, बल्कि अपने कर्मों और संस्कारों से जाना जाता है। कल जिस बच्ची को यह बोझ समझ कर गर्भ में ही मार देना चाहता था, आज उसी बच्ची ने इसके सिर की छत बचाई है। इसके लिए इससे शर्मनाक बात और कुछ नहीं हो सकती।”
शंभू की आँखों से पश्चाताप के आँसू बह निकले, “मुझे माफ़ कर दो बेटी… मैं तुम्हारा गुनहगार हूँ…”
यह सुनते ही दुर्गा उसकी ओर देख कर बिल्कुल शांत शब्दों में बोली—
“शंभू जी, मैं आपको नहीं जानती। मेरे पिता तो मेरे जन्म से पहले ही मर चुके थे। मुझे मेरी माँ ने बहुत मुश्किलों को सहकर अकेले ही पाला है। और रही बात आपके केस की, तो मैं अदालत में एक बेसहारा बुज़ुर्ग के लिए लड़ी थी, जिसके साथ धोखा हुआ था। मेरा काम पूरा हो चुका है। अब हमारा और आपका कोई नाता नहीं है।”
ये कहकर दुर्गा अपनी माँ के साथ वहाँ से चली गई।
शंभू वहीं खड़ा उन दोनों को जाते हुए असहाय भाव से देखता रह गया।
वक़्त का पहिया पूरा घूम चुका था। जिस बेटे ‘गर्व’ पर शंभू को गर्व था, उसी ने उसे बेघर कर दिया था और जिस बेटी को वह जन्म से पहले ही मिटा देना चाहता था, वही आज उसका घर बचाकर उससे हमेशा के लिए दूर जा चुकी थी। एक बार फिर शंभू डिस्ट्रिक्ट कोर्ट के बाहर सिर झुकाए अकेले बैठा हुआ था।
धन्यवाद।
साप्ताहिक विषय प्रतियोगिता #वक्त का पहिया
शीर्षक- वक्त का इंसाफ’
लेखिका- श्वेता अग्रवाल।
धनबाद, झारखंड
#वक्त का पहिया