स्नेहा अपने चार वर्षीय बेटे चीकू को लेकर अभी गेट के अंदर ही घुसी थी तो पाया कि मुख्य दरवाजे का ताला टूटा हुआ था। स्नेहा के चेहरे की तो मानो हवाई उड़ रही थी। बहुत हिम्मत करके घर के अंदर घुसी तो देखा सारे सामान इधर उधर फैले -उलझे हुए पड़े थे। जैसे ही अपने बेडरूम मे हिम्मत करके घुसी तो देखा अलमारी का लॉकर भी टूटा हुआ था। कुछ गहने इधर उधर फेंके पड़े थे। ” काटो तो मानो खून नहीं वाली उसकी स्थिति थी। वो जल्दी से अपना चप्पल दूसरे दिशा मे फेंककर सारे गहने टटोलने लगी और ज़ोर से उसकी चीख निकल आई। दिमाग ही उसका वश मे नहीं था क्या करे। उसकी चीख सुनकर तीन चार औरतें आईं। सबने कहा पति तो तुम्हारे यहाँ रहते नहीं कोई सगे -सम्बन्धी हैं तो फोन करो।
स्नेहा ने पहले अपने पति वैभव को फोन किया जो ऑफिस के काम से विदेश में रहते थे। वैभव भी सांत्वना के दो शब्द बोलने की बजाय उसे खरी खोटी सुनाने लगे। “तुम्हें हजार बार कहा था स्नेहा”! इतना मत मोह करो गहने जेवर का, एक दिन सब छोड़कर चले जाना है, लेकिन तुम्हारी ज़िद थी कि तुम्हें पाकर रहना है। और तो और इतनी बार बोला कि माहौल ठीक नहीं है, अभी इधर नए नए घर बन रहे हैं, हर महीने किटी मे पहनना और हर दिन स्कूल मे बच्चे को लाने जाने के लिए इतना बदल बदल कर पहनने की क्या जरूरत है? लेकिन तुम्हारे आँखों पर तो पट्टी लगी हुई थी ना!अब भुगतो! मेरी बात तुमने नहीं माना उसी का ये नतीजा है जो आज इतने आँसुएँ बहा रही हो। एकपल मे गहने चले गए और तुमने उन गहनो के लिए अपने अच्छे संबंध को भी दाव पर लगा दिये।
“वैभव… वैभव, सुनिए ना मेरी बात! स्नेहा ने बात काटते हुए कहा। आप मुझे कितना सुनाएंगे इस बात के लिए, पुलिस को फोन कर दीजिए, शायद मिल जाए, अभी ज्यादा देर नहीं हुयी है। और आप कोशिश करिए ना आपको छुट्टी मिल जाए तो..। ” नहीं छुट्टी मिलेगी स्नेहा! अभी तो एक महीने पहले पिताजी की मृत्यु के बाद ऑफिस जॉइन किया हूँ। भूल जाओ कुछ मिलेगा, फिर भी तुम फोन रखो पुलिस से बात करता हूँ। स्नेहा ने वैभव की बातों का गुस्सा निकालते हुए चीकू को गोद मे उठाकर बिस्तर पर पटक दिया और खुद अलमारी के पास बैठकर सारे गहने और बिखरे हुए कपड़े समेटने लगी।
” कितना गलत किया मैंने! सारे जेवर दूसरों को दिखाने के चक्कर मे सबसे हाथ धो बैठी। बुदबूदा ही रही थी स्नेहा कि पुलिस घर मे दाखिल हुई और काफी पूछताछ और तहकीकात के बाद पुलिस ने शक जताया कि पूरा हाथ नौकरानी का है। स्नेहा को भी याद आया दो दिन से उसकी बाई मनोरमा छुट्टी पर है। इस कदर दिन दहाड़े चोरी की हिम्मत और कोई नहीं कर सकता।
पुलिस दिलासा देते हुए बोलने लगे.. “पूरी कोशिश मे जुटे हैं यथा संभव कोशिश होगी मिल जाएं गहने। जब आपको बुलाएं चक्कर लगाना होगा पुलिस स्टेशन का। हालांकि स्नेहा समझ चुकी थी इतना भी आसान नहीं है मिलना। पुलिस को हाथ जोड़कर स्नेहा विदा की और बिस्तर पर मासूम चीकू को सोया देखकर उसे प्यार आया और उसने उसका सिर सहलाकर और पुचकार कर एक गिलास पानी पीया और ज़ोर की सांस खींचते हुए वापस अलमारी वाले कमरे मे बैठ गयी।
जैसे ही स्नेहा बचे हुए गहने हाथ मे उठाने लगी तो एक छोटा सा टुकडा उसके हाथों मे चुभने लगा उसने उस टुकड़े को निकाला और वो कड़ा ढूँढने लगी जो उसका अंश था। बहुत देखने के बाद पता चला ज्यादातर भारी गहने नहीं थे सिर्फ हल्के वाले कुछ बचे थे।
हाथ मे टुकडा लिए हुए स्नेहा ख्यालों में खो गयी… ” दीदी! माना आपकी इसी शहर मे शादी हुई है तो आपने समय पर मम्मी पापा की देखभाल की है पर इसका मतलब ये नहीं कि इन गहनो पर आपका बराबरी का हक होगा। स्नेहा अपनी माँ की तेरहवीं के बाद अपने दोनों भाईयों के साथ बहस मे उलझी पड़ी थी। उसके दोनों भाई नितीश और राजेश दोनों ने एक स्वर मे कह दिया… “आप सोच लीजिए दीदी! आपको रिश्ता आगे निभाना है या गहनो मे हिस्सा चाहिए। कोई भी एक चीज ही आपके हिस्से आएगी। अनेक विचार स्नेहा के अंदर पनप रहे थे। उसने मन ही मन सोचा..छोटा सा घर है, इतने सारे भारी गहने हैं अगर एक चौथाई भी मिल जाए तो घर को थोड़ा बड़ा करने की सोच सकती हूँ। पर पापा की स्थिति ठीक नहीं है, उन्हें तो कुछ याद नहीं रहता। अगर उनसे भी मदद लेती हूँ तो वो भी पुराना डायलॉग मारेंगे और मुझे वो सुनना नहीं है। स्नेहा पहले थोड़ी देर तो बुत बनकर खड़ी रही फिर उसने जो मुँह से आग उगला वो किसी के लिए सह्य नहीं था।
“मुझे किसी से कोई मतलब नहीं “! तुमलोगों के दरवाजे पर कभी झांकने नहीं आऊँगी लेकिन मुझे मेरे किए का हिस्सा चाहिए।
राजेश ने स्नेहा दीदी के पीठ पर प्यार से हाथ फेरते हुए कहा… ” दीदी! मम्मी ने आपको भी जन्म दिया है और इस नाते आपका भी कर्तव्य है कि आप मम्मी के लिए कुछ करें। नजदीक रहने के नाते आपने वही किया। रही बात गहने की, तो ये मम्मी का मनपसंद हार है जो उन्होंने पापा के रेटायरमेंट पार्टी पर बनवाया था। आपको पढ़ा लिखा के शादी ब्याह करके अच्छे घर मे भेज दिया और क्या चाहिए..? उपहार स्वरूप ये दे रहे हैं आप इसको रख लीजिए। गुस्से से स्नेहा ने बिस्तर पर फैले हुए पांच छः गहने भारी वाले उठाकर अपने पर्स मे डाल लिया और चीखते हुए कहा… “सिर्फ गहने से मुझे मतलब है… बस! और कहते हुए वो दरवाजा पटक कर बाहर निकल गयी। सब निःशब्द होकर अवाक देखते रह गए।
फोन की आवाज़ सुनकर स्नेहा नींद से जागी हो जैसे। फोन स्नेहा के पति वैभव का था। गला रुन्धा सा आवाज़ जैसे बाहर ही नहीं आ रही थी। रोते रोते उसने कहा..” सबका दिल दुःखा के आज ये हालत होगी सोचा नहीं था वैभव।
मैंने किसी की कद्र नहीं की, शर्म आती है मुझे। मम्मी की तेरहवीं थी और मैंने कुछ नहीं सोचा। वैभव ने उदास स्वर मे कहा…”अब यही बेहतर होगा कि तुम जाकर सबसे माफी माँगो वो तुम्हारे अपने हैं, अपना लेंगे।
मैं अब माफी के लायक नहीं वैभव! भाग्य भरोसे मुझे छोड़ना था कुछ और कुछ मेहनत करनी थी पर मैंने सिर्फ लालच चुना।
फिर भी वैभव के दिलासा भरे शब्द सुनकर स्नेहा ने पुलिस की आश्वासन भरी बातों को बताया।
वक़्त का पहिया आगे बढ़ कर भी ऐसा लग रहा था मानो रुक सा गया हो। लालच के चक्कर मे स्नेहा आगे बढ़ने की जगह रिश्ते, और सम्मान सबसे पीछे रह गयी थी।
# वक़्त का पहिया