विश्वास की टूटी डोर

“मैं अब इस बारे में एक शब्द भी नहीं सुनना चाहता, मां! बस बहुत हो चुका। जिस इंसान ने मेरे विश्वास का कत्ल कर दिया हो, उसके साथ मेरा कोई नाता नहीं रह सकता,” अनिरुद्ध की आवाज में इतनी कड़वाहट थी कि हवा भी भारी लगने लगी।

पास ही बैठी कल्याणी देवी ने अपनी कांपती हुई हथेलियों से बेटे का हाथ थामने की कोशिश की। उनकी बूढ़ी आंखों में आंसुओं की पतली लकीरें चमक रही थीं। उन्होंने रुंधे हुए गले से कहा, “बेटा अनिरुद्ध! गुस्सा अपनी जगह जायज है, लेकिन खून के रिश्ते इतने कमजोर नहीं होते कि एक झटके में तोड़ दिए जाएं। रिश्ते धागे की तरह होते हैं, गांठ लग जाए तो भी उन्हें फेंक नहीं दिया जाता। वो तुम्हारे सगे ताऊजी हैं… तुम्हारे स्वर्गीय बाबूजी के बड़े भाई।”

“खून का रिश्ता? कैसा खून का रिश्ता, मां?” अनिरुद्ध की हंसी में एक गहरा दर्द छिपा था। उसने मेज पर रखी ऑडिट रिपोर्ट की मोटी फाइल को जोर से पटकते हुए कहा, “इसी खून के रिश्ते की दुहाई देकर तो मैंने अपनी आंखें बंद रखी थीं! क्या भूल गईं आप वो दिन, जब बाबूजी हमें छोड़कर चले गए थे? मेरी उम्र ही क्या थी तब? बमुश्किल बीस साल का था। आपके आंसुओं और बाबूजी के अधूरे सपनों का बोझ मेरे इन कच्चे कंधों पर आ पड़ा था। न दिन देखा, न रात देखी, एक-एक पाई जोड़कर मैंने लॉजिस्टिक्स की इस फर्म को खड़ा किया। जब कारोबार संभलने लगा, तो मुझे सबसे पहले ताऊजी की याद आई।”

अनिरुद्ध का गला भर आया, लेकिन उसने खुद को संभाला और जारी रखा, “ताऊजी गांव में अकेले रह रहे थे। उनके अपने बेटे ने विदेश जाकर पलटकर कभी हाल नहीं पूछा। मैंने सोचा कि हमारे घर में एक बुजुर्ग की छत्रछाया रहेगी, मुझे एक पिता का साया मिल जाएगा और ताऊजी को बुढ़ापे में अपनों का सहारा। मैंने उन्हें गांव से यहां बुलवाया, अपने दिल में बाबूजी की जगह दी और अपने पूरे वेयरहाउस और एकाउंट्स का वित्तीय प्रभार उनकी झोली में डाल दिया ताकि उन्हें लगे कि वे आज भी इस परिवार के मुखिया हैं।”

दरवाजे की ओट में खड़ी अनिरुद्ध की पत्नी, स्वाति, खामोशी से सब सुन रही थी। उसकी आंखें भी छलक रही थीं। स्वाति ने इस घर में बहू बनकर कदम रखा था, लेकिन केशव जी को हमेशा अपने सगे ससुर से बढ़कर आदर दिया था। उनकी हर छोटी-बड़ी जरूरत—सुबह की दवा से लेकर रात के गर्म दूध तक—स्वाति खुद अपने हाथों से देखती थी। ताऊजी को घुटनों का दर्द था, तो स्वाति घंटों बैठकर उनके पैरों में तेल मालिश करती थी ताकि उन्हें अपने पराए होने का अहसास न हो।

“मां, सिर्फ मैंने ही नहीं, स्वाति ने भी कभी उन्हें ताऊ ससुर नहीं समझा,” अनिरुद्ध ने स्वाति की ओर इशारा करते हुए कहा। “इसने अपनी हर खुशी से पहले उनकी सेहत और सम्मान की चिंता की। और बदले में ताऊजी ने हमें क्या दिया? हमारे चीफ अकाउंटेंट के साथ मिलकर पिछले डेढ़ साल में कंपनी के तीस लाख रुपये फर्जी वेंडर्स के खातों में ट्रांसफर करवा दिए! वो तीस लाख रुपये मेरी दिन-रात की मेहनत की कमाई थी, मां। वो पैसा हमारे नए प्रोजेक्ट के लिए सुरक्षित रखा गया था, जिसे गंवाकर आज मेरी कंपनी दिवालिया होने की कगार पर पहुंच गई है।”

कमरे के एक कोने में, अंधेरे की चादर ओढ़े, एक पुरानी लकड़ी की कुर्सी पर केशव जी सिर झुकाए बैठे थे। उनकी सफेद दाढ़ी और झुर्रियों से भरे चेहरे पर आत्मग्लानि और शर्म की ऐसी कालिख पुती थी कि वे अपनी पलकें तक उठाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे थे। उनके हाथ थर-थर कांप रहे थे। जिस भतीजे को उन्होंने अपनी गोद में खिलाया था, आज उसी के सामने वे एक अपराधी की तरह कटघरे में खड़े थे।

“मां, ताऊजी ने सिर्फ पैसा नहीं चुराया, उन्होंने उस पावन रिश्ते को हमारी नजरों से गिरा दिया है,” अनिरुद्ध ने अत्यंत दृढ़ और कठोर स्वर में कहा। “जो इंसान एक बार नजरों से गिर जाए, उसे दोबारा दिल में जगह नहीं दी जा सकती। मैं कानून के पास नहीं जाऊंगा, पुलिस में शिकायत नहीं करूंगा, क्योंकि बाबूजी के संस्कारों की लाज मुझे रोकती है। इस बुढ़ापे में मैं इन्हें बेघर करके सड़क पर भी नहीं फेंक सकता। वे इसी छत के नीचे रहेंगे, उन्हें दो वक्त की रोटी और दवाएं पहले की तरह मिलती रहेंगी… लेकिन आज के बाद इस घर में वे सिर्फ एक आश्रित बुजुर्ग होंगे, मेरे पूज्य ताऊजी नहीं। वे उस मान-सम्मान, उस आदर और उस अधिकार के हकदार अब कभी नहीं हो सकते जो मैंने एक पिता समझकर उन्हें दिया था।”

यह कहकर अनिरुद्ध मुड़ा और भारी कदमों से अपने कमरे की ओर चला गया। उसके पीछे स्वाति भी भारी मन से चली गई। कमरे में केवल कल्याणी देवी और केशव जी रह गए। पंखे की सरसराहट के बीच केवल केशव जी की दबी-दबी सिसकियों की आवाज गूंज रही थी।

दिन बीतने लगे। घर का माहौल पूरी तरह बदल चुका था। बाहर से देखने पर सब कुछ सामान्य था—सुबह नाश्ता बनता, केशव जी की थाली समय पर टेबल पर सजाई जाती, उनकी दवाइयां नियत समय पर रखी मिलतीं, लेकिन उस घर की आत्मा जैसे कहीं खो गई थी। जिस घर में कभी हंसी के ठहाके गूंजते थे, वहां अब एक दमघोंटू खामोशी का बसेरा था।

अनिरुद्ध सुबह तैयार होकर दफ्तर निकलता, तो उसकी नजरें कभी उस कुर्सी की तरफ नहीं उठती थीं जहां ताऊजी बैठे होते थे। वह सीधे मां के पैर छूता और बिना किसी से बात किए निकल जाता। स्वाति जो कभी ताऊजी के पास बैठकर गांव के किस्से सुनती थी, अब केवल एक परिचारिका की तरह काम करती—थाली रख देती, पानी का गिलास भर देती, और बिना एक शब्द बोले, नजरें झुकाए कमरे से बाहर निकल जाती।

यह उपेक्षा, यह खामोशी केशव जी के लिए किसी खौफनाक सजा से भी बदतर थी। उन्हें लगता था कि काश अनिरुद्ध उन पर चिल्लाया होता, उन्हें चार थप्पड़ मार दिए होते, या पुलिस के हवाले कर दिया होता, तो शायद उनके दिल का बोझ कुछ हल्का हो जाता। लेकिन यह शांत तिरस्कार, यह सम्मानविहीन दया उन्हें हर पल भीतर ही भीतर तिल-तिल कर जला रही थी। वे रोज रात को अपने बिस्तर पर करवटें बदलते और तकिया उनके आंसुओं से भीग जाता।

वास्तव में, केशव जी ने वह कदम किसी लालच में नहीं उठाया था, बल्कि अपने उस स्वार्थी बेटे के बहकावे में आकर उठाया था, जिसने कनाडा से फोन करके कहा था कि अगर पिताजी ने उसे पैसे नहीं भेजे तो उसका कारोबार डूब जाएगा और वह खुदकुशी कर लेगा। पुत्रमोह में अंधे होकर केशव जी यह भूल गए थे कि जिस बेटे के लिए वे यह पाप कर रहे हैं, उसने उन्हें कभी मुड़कर देखा तक नहीं था, जबकि जिस भतीजे ने उन्हें अपनी पलकों पर बिठाया, उसी की पीठ में वे छुरा घोंप रहे थे। जब पैसे भेजने के बाद उस बेटे ने फोन उठाना भी बंद कर दिया, तब केशव जी के सामने सच्चाई का भयानक चेहरा उजागर हुआ था, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। ऑडिट में सच सामने आ चुका था।

एक रात शहर में भीषण आंधी-तूफान आया। मूसलाधार बारिश खिड़कियों के शीशों से टकरा रही थी। रात के करीब दो बजे अचानक अनिरुद्ध को सीने में तेज घुटन महसूस हुई। वह पानी पीने के लिए नीचे रसोई की तरफ आया। जब वह हॉल से गुजर रहा था, तो उसने देखा कि मंदिर का दीया बुझ चुका था और सामने जमीन पर केशव जी बेसुध पड़े थे। उनके पास ही भगवान की मूर्ति के आगे एक सफेद लिफाफा रखा था।

अनिरुद्ध का दिल एक पल के लिए दहल गया। उसने दौड़कर ताऊजी को उठाया। उनका शरीर बर्फ की तरह ठंडा पड़ रहा था और सांसें बेहद धीमी चल रही थीं। अनिरुद्ध की चीख सुनकर स्वाति और कल्याणी देवी भी भागती हुई नीचे आ गईं।

“ताऊजी! आंखें खोलिए ताऊजी!” अनिरुद्ध का सारा गुस्सा उस पल कहीं गायब हो गया था। सामने सिर्फ उसके बाबूजी का बड़ा भाई, उसका अपना बुजुर्ग तड़प रहा था।

उसने बिना एक पल गंवाए केशव जी को अपनी बांहों में उठाया और कार की पिछली सीट पर लिटाया। आंधी और बारिश के बीच अनिरुद्ध गाड़ी दौड़ाते हुए अस्पताल पहुंचा। डॉक्टरों ने तुरंत उन्हें आईसीयू में भर्ती कराया। डॉक्टर ने बाहर आकर बताया, “इन्हें बहुत गंभीर हार्ट अटैक आया है। मानसिक तनाव बहुत ज्यादा था। अगले चौबीस घंटे बेहद नाजुक हैं।”

आईसीयू के बाहर की बेंच पर अनिरुद्ध सिर पकड़कर बैठ गया। स्वाति ने धीरे से वह सफेद लिफाफा अनिरुद्ध के हाथ में थमा दिया, जो मंदिर के पास गिरा मिला था।

कांपते हाथों से अनिरुद्ध ने लिफाफा खोला। उसके भीतर दो चीजें थीं—एक केशव जी के गांव वाले पुश्तैनी मकान और उपजाऊ जमीन के कागजात, जिसे उन्होंने अनिरुद्ध की कंपनी के नाम ट्रांसफर करने के पावर ऑफ अटॉर्नी के पेपर्स पर दस्तखत कर रखे थे, और दूसरा, आंसुओं से भीगा हुआ एक पत्र।

अनिरुद्ध ने पत्र पढ़ना शुरू किया:

“मेरे प्यारे बेटे अनिरुद्ध,मैं जानता हूं कि ‘बेटा’ कहने का अधिकार मैं अपने हाथों से खो चुका हूं। मैंने जो अक्षम्य अपराध किया, उसकी कोई माफी नहीं है। एक मतलबी बेटे के झूठे आंसुओं ने मेरी बुद्धि भ्रष्ट कर दी थी और मैंने उस हाथ को काट लिया जिसने मुझे सहारा दिया था। तुम्हारी नाराजगी, तुम्हारा गुस्सा सौ फीसदी सही है। तुमने मुझे घर में रखकर जो रोटी दी, वह तुम्हारी शराफत थी, लेकिन मेरा यह पापी मन तुम्हारी उस खामोश उपेक्षा को बर्दाश्त नहीं कर पा रहा था। हर रोज तुम्हारी झुकी हुई नजरें मेरे सीने में खंजर की तरह चुभती थीं। अपनी आंखों में जो आदर मैंने खो दिया, उसके बिना जीना मेरे लिए हर पल मरने जैसा है।

मैं तुम्हारे नुकसान की भरपाई तो कभी नहीं कर सकता, लेकिन मेरे पास गांव की जो पुश्तैनी जमीन और मकान है, उसे बेचकर तुम अपने नुकसान की भरपाई कर लेना। यह मेरी तरफ से कोई अहसान नहीं, बल्कि मेरे गुनाहों का बहुत छोटा सा प्रायश्चित है। अगर मेरी सांसें टूट जाएं, तो बस इतना सोचना कि तुम्हारा एक गुनहगार चला गया। स्वाति बहू से कहना कि मुझे माफ कर दे, उसने मुझे पिता माना और मैंने उसे सिर्फ आंसू दिए। खुश रहना मेरे बच्चे…”

पत्र पढ़ते-पढ़ते अनिरुद्ध की आंखों से आंसुओं का सैलाब बह निकला। वह पत्र सीने से लगाकर फूट-फूट कर रो पड़ा। स्वाति और कल्याणी देवी की भी हिचकियां बंध गईं। जिस इंसान को वह केवल धोखेबाज समझ रहा था, वह भीतर ही भीतर पश्चाताप की भट्टी में किस कदर जल रहा था, इसका अहसास अनिरुद्ध को आज हुआ। गलती इंसान से होती है, लेकिन जो इंसान अपने किए पर इस कदर टूट जाए और अपना सब कुछ न्योछावर करके प्रायश्चित करने को तैयार हो, क्या उसे दूसरा मौका नहीं मिलना चाहिए? क्या धर्म केवल सजा देने में है, क्षमा करने में नहीं?

सुबह की पहली किरण के साथ आईसीयू का दरवाजा खुला। डॉक्टर बाहर आए और मुस्कुराते हुए बोले, “खतरे की बात टल गई है। मरीज को होश आ गया है। उनकी जिजीविषा ने उन्हें बचा लिया। आप लोग उनसे मिल सकते हैं।”

अनिरुद्ध सबसे पहले कमरे के अंदर दाखिल हुआ। बिस्तर पर केशव जी बेहद कमजोर और असहाय लेटे हुए थे। जब उन्होंने अनिरुद्ध को देखा, तो शर्म के मारे अपनी आंखें फेर लीं और चेहरे को दूसरी तरफ मोड़ लिया।

अनिरुद्ध धीरे-धीरे उनके पास गया। उसने केशव जी के कमजोर, झुर्रीदार हाथ को अपने दोनों हाथों में थाम लिया। उस छुअन से केशव जी सिहर उठे।

“ताऊजी…” अनिरुद्ध की आवाज भीगी हुई थी।

केशव जी ने धीरे से अपनी आंखें घुमाईं। उनकी आंखों से आंसुओं की धार बह निकली। उन्होंने कांपते होठों से कहा, “अनिरुद्ध… मुझे क्षमा… मत करना बेटा… मैं पापी हूं…”

“बस कीजिए ताऊजी!” अनिरुद्ध ने उनके माथे पर हाथ रखा और वह जमीन पर उनके बिस्तर के पास घुटनों के बल बैठ गया। उसने वह जमीन के कागजात निकाले और केशव जी के सामने ही उन्हें दो टुकड़ों में फाड़ दिया।

केशव जी स्तब्ध रह गए। “यह क्या किया तुमने अनिरुद्ध?”

“ताऊजी, जमीन और पैसे कभी रिश्तों से बड़े नहीं हो सकते,” अनिरुद्ध ने रुंधे गले से कहा। “पैसा मैंने पहले भी कमाया था, आगे भी कमा लूंगा। कंपनी फिर से खड़ी हो जाएगी। लेकिन अगर आज आपको कुछ हो जाता, तो मैं जिंदगी भर अपने बाबूजी से नजरें नहीं मिला पाता। गलती आपने की थी, पर सजा आपने खुद को उससे कहीं ज्यादा दे दी। आपका पश्चाताप आपके हर गुनाह से बड़ा है।”

स्वाति ने आगे बढ़कर केशव जी के चरण स्पर्श किए और बोलीं, “बाबूजी, घर की दहलीज वही होती है, जहां गलतियों को माफ करके आगे बढ़ा जाए। आप हमारे घर के बुजुर्ग हैं, कोई बाहरी नहीं। अगर आप ही हमसे नजरें चुराएंगे, तो हम किसके सहारे रहेंगे?”

कल्याणी देवी ने केशव जी के सिर पर हाथ फेरा। केशव जी ने फूट-फूट कर रोते हुए अनिरुद्ध को अपने सीने से लगा लिया। उस आलिंगन में पिछले कई महीनों का मैल, अविश्वास और कड़वाहट आंसुओं के साथ बह गई।

कुछ ही हफ्तों बाद केशव जी पूरी तरह स्वस्थ होकर घर लौट आए। अब उस घर का दृश्य पूरी तरह बदल चुका था। अनिरुद्ध जब दफ्तर जाने लगता, तो पहले की तरह ताऊजी के पैर छूकर आशीर्वाद लेता। ताऊजी भी अब कंपनी के बड़े फैसलों में एक संरक्षक की तरह बैठते, जहां उनका अनुभव अनिरुद्ध के जोश को सही दिशा देता। घर की दालान में फिर से चाय की चुस्कियों के साथ हंसी की खिलखिलाहट गूंजने लगी थी। रिश्तों की जो डोर अविश्वास की आंधी में टूट गई थी, वह क्षमा और सच्चे पश्चाताप के धागों से जुड़कर पहले से भी अधिक मजबूत और अटूट बन चुकी थी।

क्या आपको लगता है कि अगर कोई अपना दिल से अपनी गलती का प्रायश्चित करे, तो उसे माफ करके एक और मौका देना चाहिए? या फिर विश्वास टूटने के बाद रिश्ते कभी पहले जैसे नहीं हो सकते? अपनी राय कमेंट बॉक्स में जरूर लिखकर बताएं।

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