“सुमित,” प्रशांत ने भर्राए गले से कहा, “अगर उस दिन हम बाबूजी की बात न मानते, अगर हम अपनी सहूलियतों और दलीलों के पीछे छुपकर उन्हें गाँव न ले जाते, तो आज हम जीवन भर उस अपराधबोध की आग में जलते रहते। बाबूजी अपनी मौत से नहीं हारे, वे तो अपनी जिंदगी को उसकी पूरी सार्थकता के साथ जीकर गए। उनकी असली दवा वो गाँव की माटी ही थी, जिसने उन्हें जाते-जाते जिंदगी का सबसे बड़ा सुकून दे दिया।”
चंडीगढ़ के सेक्टर बाईस की चौड़ी, पक्की सड़कों पर सुबह की धूप खिली थी, लेकिन फ्लैट नंबर 402 की बालकनी में बैठे अस्सी वर्षीय विद्याधर जी की नजरें सीमेंट की उन ऊँची इमारतों के पार किसी अनजान क्षितिज को ताक रही थीं। उनके कांपते हाथों में पीतल की छड़ी थी और पैरों में एक अजीब सा जूता। लगभग चार साल पहले हुए कूल्हे और घुटने के एक जटिल प्रत्यारोपण के बाद उनके दाएँ पैर की बनावट में हल्का सा खिंचाव आ गया था। उस खिंचाव के चलते उनका दायाँ पैर बाएँ पैर से करीब डेढ़ इंच छोटा हो गया था। चलने के संतुलन को बनाए रखने के लिए डॉक्टरों ने एक विशेष जूता तैयार कराया था—जिसमें एक पैर का तला बेहद मोटा था और दूसरे का बिल्कुल सपाट।
उस भारी-भरकम जूते के सहारे जब वे घर के भीतर भी चार कदम चलते, तो उनके मुँह से दर्द की एक मद्धिम सी कराह निकल जाती थी। लेकिन शरीर के इस दर्द से कहीं ज्यादा गहरा एक दूसरा दर्द था, जो पिछले कई महीनों से उनके दिल को छलनी कर रहा था। वह दर्द था अपनी जड़ों से बिछड़ने का, अपने गाँव की उस मिट्टी से दूर रहने का जहाँ उन्होंने अपनी जिंदगी के सत्तर बसंत बिताए थे।
“सुमित… ज़रा इधर तो आ बेटा,” विद्याधर जी ने भर्राई आवाज में अपने छोटे बेटे को पुकारा।
सुमित, जो लैपटॉप पर अपनी दफ्तर की कोई फाइल देख रहा था, तुरंत दौड़कर बालकनी में आया। “हाँ बाबूजी, कहिए? क्या सिर में दर्द है? पानी लाऊँ या दवा का समय हो गया?”
विद्याधर जी ने अपने सूखे, झुर्रीदार हाथों से सुमित की कलाई थाम ली। उनकी आँखों में आँसुओं की एक पतली सी लकीर तैर रही थी। “बेटा, दवाइयों से मेरा कोई मर्ज ठीक नहीं होने वाला। मैं कब से कह रहा हूँ, मुझे एक बार गाँव ले चल। बस एक बार मुझे अपनी उस पुरानी चौखट पर माथा टेकने दे। मेरा मन अब इस कंक्रीट के पिंजरे में एक पल भी नहीं लगता।”
तभी बड़ा बेटा प्रशांत भी कमरे से बाहर आ गया। प्रशांत स्वभाव से बेहद व्यावहारिक और पिता के स्वास्थ्य को लेकर जरूरत से ज्यादा सतर्क था। उसने बालकनी की रेलिंग का सहारा लेते हुए समझाने वाले लहजे में कहा, “बाबूजी, आप फिर वही जिद पकड़कर बैठ गए! डॉक्टर वर्मा ने साफ-साफ मना किया है कि आपको लंबा सफर नहीं करना चाहिए। सड़क के झटके आपकी रीढ़ और घुटने को और नुकसान पहुँचा सकते हैं। और गाँव में रखा क्या है? वो पुराना मकान आधा खंडहर हो चुका है। वहाँ न तो वेस्टर्न टॉयलेट है, न एसी है, और न ही कोई स्पेशलिस्ट डॉक्टर। अगर ऐन वक्त पर आपकी तबीयत बिगड़ गई तो हम क्या करेंगे? हम दोनों भाइयों की नौकरी है, बच्चे हैं… आप यहाँ आराम से रहिए, हम आपकी सेवा में कोई कमी थोड़ी रख रहे हैं!”
विद्याधर जी की आँखों से दो बूँद आँसू टपक कर उनकी सफेद धोती पर गिर पड़े। उन्होंने अपनी गर्दन झुका ली और धीमी, थरथराती आवाज में बोले, “प्रशांत, तू सच कह रहा है। तुम दोनों ने मेरी सेवा में कोई कमी नहीं छोड़ी। पर बेटा, शरीर की सेवा और आत्मा की प्यास में फर्क होता है। तुम मुझे यहाँ दुनिया के सबसे अच्छे डॉक्टर दिखा दोगे, सबसे महँगी गोलियाँ खिला दोगे, लेकिन जिस मिट्टी पर खेलकर मैं बड़ा हुआ, जहाँ मेरे पुरखों के पसीने की खुशबू है, वहाँ की हवा में जो दवा है, वो तुम्हारी इन बोतलों में नहीं है। मुझे कोई सुख नहीं चाहिए… मुझे बस अपनी उस माटी को छूना है। क्या पता, कल ये आँखें खुलें या न खुलें…”
बाबूजी की इस बात ने दोनों भाइयों के सीने पर एक भारी हथौड़े जैसा वार किया। सुमित ने प्रशांत की तरफ देखा। प्रशांत का कड़ा चेहरा भी पिता की इस बेबसी के आगे मोम की तरह पिघल चुका था। चार साल से जिस पिता ने कभी किसी चीज़ की माँग नहीं की थी, जिसने अपने सारे दर्द को अपने सीने में दबाकर रखा था, आज वह अपने ही बेटों के आगे अपने गाँव जाने की भीख माँग रहा था।
“भैया,” सुमित ने बहुत धीरे से कहा, “बाबूजी की इस इच्छा के आगे अब हमारी कोई दलील नहीं टिकती। चाहे जो हो जाए, हम बाबूजी को गाँव लेकर चलेंगे।”
प्रशांत ने एक गहरी सांस ली, चश्मा उतारकर अपनी आँखें पोंछीं और बोला, “ठीक है। हम कल सुबह ही निकलेंगे। मैं कार की पिछली सीट पर गद्दे बिछवा देता हूँ ताकि बाबूजी को झटके न लगें।”
मार्च 2025 का वह दूसरा हफ्ता था। बसंत की विदाई और हल्की गरमी की दस्तक के बीच, सुबह की पहली किरण फूटने से पहले ही गाड़ी चंडीगढ़ से निकल पड़ी। हरियाणा और पंजाब के हाईवे पार करते हुए जब गाड़ी दोपहर बाद हिमाचल की तलहटी के पास बसे उनके पैतृक गाँव ‘सुंदरनगर’ की कच्ची पगडंडी पर मुड़ी, तो मौसम का मिजाज पूरी तरह बदल चुका था। खेतों में पीली सरसों के फूल हवा में झूम रहे थे, नीम और महुए के पेड़ों से एक मीठी, सौंधी सुगंध आ रही थी और दूर कहीं ट्यूबवेल के पानी की छप-छप सुनाई दे रही थी।
गाड़ी जैसे-जैसे गाँव के पुराने बरगद के पेड़ के करीब पहुँच रही थी, विद्याधर जी के चेहरे का रंग ही बदलने लगा था। जो चेहरा पिछले छह महीने से बुझा हुआ, पीला और निस्तेज पड़ा था, उस पर अचानक एक अलौकिक तेज छाने लगा। उनकी थकी हुई, पथराई आँखों में एक अनोखी चमक तैर गई। वे खिड़की का शीशा नीचे करके अपने कांपते नथुनों से गाँव की उस धूल भरी, ताजी हवा को ऐसे खींच रहे थे जैसे कोई प्यासा मुसाफिर तपते रेगिस्तान में मीठे पानी का घूँट भर रहा हो।
गाड़ी उनके पुश्तैनी मकान के सामने आकर रुकी। लाल खपरैल वाला वह पुराना मकान, जिसकी दीवारों पर चूने की सफेदी कई साल पहले उखड़ चुकी थी, आज भी अपनी जगह सीना ताने खड़ा था।
“बाबूजी, रुकिए, मैं व्हीलचेयर निकालता हूँ,” प्रशांत ने गाड़ी से उतरते हुए कहा।
“नहीं बेटा!” विद्याधर जी की आवाज में आज चार साल बाद एक कड़क और पौरुष लौट आया था। “आज मैं अपनी चौखट पर पहियों के सहारे नहीं जाऊँगा। आज मेरे पैर अपनी धरती को खुद महसूस करेंगे।”
सुमित और प्रशांत ने दोनों तरफ से उन्हें सहारा दिया। विद्याधर जी ने अपना वह मोटा-पतला जूता जमीन पर टिकाया। जैसे ही उनके पैर गाँव की उस कच्ची, लाल माटी पर पड़े, विद्याधर जी के पूरे बदन में एक सिहरन दौड़ गई। उन्होंने अपनी छड़ी एक तरफ छोड़ दी। दोनों बेटों के कन्धों से हाथ हटाकर वे अचानक घुटनों के बल उस धूल में बैठ गए।
प्रशांत और सुमित घबरा गए, “बाबूजी, क्या हुआ? दर्द हो रहा है क्या?”
लेकिन विद्याधर जी ने कोई जवाब नहीं दिया। उन्होंने अपनी दोनों कांपती हथेलियों में गाँव की मिट्टी भरी और उसे अपने माथे से लगा लिया। उन्होंने अपनी आँखें बंद कर लीं और उस मिट्टी को अपने गालों पर, अपनी छाती पर मलने लगे। उनकी आँखों से आंसुओं की अविरल धारा बह निकली, जो उस सूखी धूल पर गिरकर मिट्टी के छोटे-छोटे गोले बना रही थी।
उस वक्त उनके चेहरे पर जो सुकून, जो अगाध शांति और जो अवर्णनीय खुशी खिली हुई थी, उसे देखकर दोनों बेटे वहीं अवाक खड़े रह गए। वह दृश्य इतना पवित्र और मर्मस्पर्शी था कि शब्द उसकी गहराई को बयान करने में बौने साबित हो रहे थे। चार साल का शारीरिक संताप, अस्पताल के आईसीयू का खौफ, लाचारी का दंश—सब कुछ उस एक पल में उस मिट्टी के स्पर्श से धुल चुका था।
गाँव के लोगों को जब खबर मिली कि ‘मास्टर साहब’ आए हैं, तो देखते ही देखते उस पुराने दालान में भीड़ जुट गई।
गाँव का पुराना चरवाहा मंगतू, जो कभी विद्याधर जी के साथ स्कूल में पढ़ा था, दौड़ता हुआ आया। “अरे विद्याधर भैया! तुम आ गए? हम तो सोचते थे कि शहर की बड़ी गाड़ियों और पक्के महलों में जाकर तुम हमें भूल ही गए!”
विद्याधर जी ने मंगतू को अपनी बाहों में भर लिया। “मंगतू रे… कोई अपनी साँसों को भी भूल सकता है क्या? शहर तो बस जिस्म को खींच ले गया था, मेरी रूह तो इसी बरगद की छाँव में और तुम्हारे इन खेतों में ही भटक रही थी।”
गाँव की महिलाएँ घर से ताज़ा मट्ठा, बाजरे की रोटी और सरसों का साग लेकर दौड़ी चली आईं। उस दिन किसी को याद नहीं रहा कि विद्याधर जी का कोई ऑपरेशन हुआ था, उनका पैर छोटा था या उन्हें किसी परहेज की जरूरत थी। विद्याधर जी उस पुराने नीम के पेड़ के नीचे बिछी चारपाई पर बैठे रहे। उन्होंने खटिया पर पालथी मारकर मक्के की रोटी खाई, गाँव के बुजुर्गों के साथ हुक्के की गुड़गुड़ाहट के बीच बचपन के किस्से दोहराए और हर उस व्यक्ति का हालचाल पूछा जो उनके बचपन का साथी था।
शाम ढलते-ढलते वे अपने दोनों बेटों का हाथ पकड़कर गाँव के पुराने शिव मंदिर गए। वहाँ उन्होंने शिवलिंग पर गंगाजल चढ़ाया और हाथ जोड़कर बहुत देर तक मौन खड़े रहे। लौटते वक्त उन्होंने अपने खेतों की मुंडेर पर खड़े होकर लहलहाती फसलों को देखा और दोनों बेटों के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा,
“प्रशांत, सुमित… मेरी बात गाँठ बाँध लो। तुम शहर में कितने भी बड़े अफसर बन जाना, चाहे जितना धन कमा लेना, लेकिन अपनी इस जमीन को कभी बेचना मत। यह सिर्फ मिट्टी नहीं है, यह तुम्हारे बाप-दादाओं का स्वाभिमान है। जब कभी तुम्हारी जिंदगी में मुश्किलें आएं, जब शहर की भागदौड़ तुम्हें थका दे, तो यहाँ चले आना। यह मिट्टी तुम्हें कभी टूटने नहीं देगी।”
उस रात विद्याधर जी उस पुराने दालान में बिछी रस्सी की खाट पर सोए। कोई पंखा नहीं था, बस खिड़की से आती रात की ठंडी बयार थी और झींगुरों की मधुर आवाज। चार साल बाद पहली बार ऐसा हुआ था कि विद्याधर जी ने रात को दर्द की कोई गोली नहीं माँगी। उनके चेहरे पर एक ऐसी शांत, निश्चिंत और दिव्य मुस्कान थी, जैसे किसी छोटे बच्चे को माँ की गोद में नींद आ गई हो।
अगले दिन शाम को, जब वापस चंडीगढ़ लौटने का वक्त आया, तो विद्याधर जी ने एक छोटे से कपड़े के थैले में अपने हाथों से आँगन की एक मुट्ठी मिट्टी बाँध ली। उन्होंने उस थैले को अपनी छाती से चिपका लिया।
गाँव से लौटते समय उन्होंने पीछे मुड़कर उस पुराने घर को तब तक देखा जब तक कि वह आँखों से ओझल नहीं हो गया।
चंडीगढ़ लौटने के ठीक तीन हफ्ते बाद, अप्रैल की एक शांत भोर में, विद्याधर जी अपनी नींद में ही, बिना किसी तड़प या कष्ट के, उस अनंत यात्रा पर निकल पड़े। वे हमेशा के लिए सो चुके थे। उनके चेहरे पर वही गाँव वाली तृप्त और शांत मुस्कान वैसी की वैसी ही चस्पा थी। और उनके सिरहाने, उनके तकिए के नीचे, वही गाँव की मिट्टी से भरा छोटा सा थैला रखा हुआ था।
अंतिम संस्कार के बाद जब दोनों भाई घर लौटे, तो प्रशांत ने उस थैले को अपनी आँखों से लगाया और फूट-फूट कर रो पड़ा।
“सुमित,” प्रशांत ने भर्राए गले से कहा, “अगर उस दिन हम बाबूजी की बात न मानते, अगर हम अपनी सहूलियतों और दलीलों के पीछे छुपकर उन्हें गाँव न ले जाते, तो आज हम जीवन भर उस अपराधबोध की आग में जलते रहते। बाबूजी अपनी मौत से नहीं हारे, वे तो अपनी जिंदगी को उसकी पूरी सार्थकता के साथ जीकर गए। उनकी असली दवा वो गाँव की माटी ही थी, जिसने उन्हें जाते-जाते जिंदगी का सबसे बड़ा सुकून दे दिया।”
जिंदगी की सबसे बड़ी सच्चाई यही है कि इंसान चाहे तरक्की की कितनी भी ऊँची उड़ान भर ले, उसकी आत्मा का असली विश्राम केवल उसी जमीन पर होता है जहाँ से उसका वजूद अंकुरित हुआ था। बुजुर्गों की छोटी-छोटी इच्छाएं कोई नखरे नहीं होतीं, वे तो उनके जीवन के अंतिम पड़ाव की वो मूक पुकार होती हैं जिन्हें केवल प्रेम और संवेदनशीलता की भाषा से ही समझा जा सकता है।
प्रिय पाठकों,
क्या हम अपनी आधुनिक व्यस्तताओं और सुख-सुविधाओं के फेर में अपने घर के बुजुर्गों की उन भावनात्मक जरूरतों को अनदेखा तो नहीं कर रहे हैं, जो किसी भी महँगे इलाज से कहीं ज्यादा उनके लिए मायने रखती हैं? क्या आपको भी लगता है कि अपने गाँव, अपनी मिट्टी की खुशबू हर इंसान के दिल में हमेशा जिंदा रहनी चाहिए? इस संवेदनशील और मर्मस्पर्शी कहानी पर अपनी राय नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।
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