उन्होंने मेरी पीठ पर हाथ फेरते हुए आगे कहा, “जा, सबसे पहले उन लोगों का कर्ज चुका और उनका हिसाब साफ कर। अपनी आत्मा पर किसी का कर्ज मत रहने देना। और याद रख, यह पैसा मैंने तुझे दान नहीं दिया है। यह मेरा तुझ पर किया गया निवेश है। मुझे ब्याज में पैसा नहीं चाहिए, मुझे तेरा आत्मसम्मान और तेरी सफलता वापस चाहिए। मुझे देखना है कि मेरा बेटा दुनिया से लड़कर अपनी जगह कैसे बनाता है।”
सफेद चादर से ढके उस पुराने तख्त पर आज एक गहरा सन्नाटा पसरा हुआ था। वह तख्त सिर्फ लकड़ी का एक ढांचा नहीं था, बल्कि पिछले नब्बे बरसों के इतिहास, अनगिनत संघर्षों और एक इंसान की मौन तपस्या का गवाह था। आज पिता जी को इस दुनिया से रुखसत हुए ठीक 15 दिन बीत चुके थे। घर के बड़े भाई-बहन अपनी व्यस्त जिंदगियों, बच्चों के स्कूलों और दफ्तरों की छुट्टियों का हिसाब लगाकर अपने-अपने शहरों की ओर रवाना होने की तैयारी कर रहे थे। पर मैं, परिवार का सबसे छोटा बेटा होने के नाते, अब भी उस खाली कमरे में उनकी लाठी, उनकी ऐनक और उनके उस पुराने रेडियो के पास बैठा था जिसकी सुई अब किसी स्टेशन पर नहीं ठहरती थी। सबसे छोटा होने का यह सबसे बड़ा दर्द होता है कि आपको अपने बुजुर्गों के आखिरी दिनों की सांसों को सबसे करीब से गिनने का मौका मिलता है, और जब वे चले जाते हैं तो वही सन्नाटा आपकी छाती पर सबसे भारी बोझ बनकर बैठ जाता है।
पिता जी ने कभी खुलकर प्यार जताना नहीं सीखा था। न उन्होंने कभी गले लगाकर रोना सीखा, न ही अपनी तकलीफों का ढिंढोरा पीटा। उनका स्वभाव नारियल जैसा था—बाहर से बेहद सख्त, उसूलों के पक्के, लेकिन भीतर से इतने कोमल कि अपनी संतान की एक छोटी सी चोट पर अंदर ही अंदर टूट जाएं। हम तीन भाई और एक बहन थे। बड़े भाई ने सिविल सर्विसेज की तैयारी करके सरकारी नौकरी पा ली थी, मंझले भाई ने बैंक में अपना मुकाम बना लिया था और दीदी अपने सुखी वैवाहिक जीवन में रम चुकी थीं। बच गया था तो सिर्फ मैं। बचपन से ही मुझे बंधी-बंधाई लीक पर चलने से चिढ़ थी। हमेशा कुछ नया करने, कोई बड़ा व्यवसाय खड़ा करने और अपनी अलग पहचान बनाने की धुन सवार रहती थी।
साल 2008 की बात है। मैं अपने छोटे से कस्बे से निकलकर पहली बार मुंबई की उस अंधी दौड़ में शामिल होने पहुंचा था। आंखों में बड़े-बड़े सपने थे, जेब में सीमित पैसे और दिल में कुछ बड़ा कर दिखाने का जुनून। पिता जी ने उस वक्त भी मुझे रोका नहीं था, हालांकि बड़े भैया का कहना था कि मुझे भी किसी सामान्य दफ्तर में क्लर्क की नौकरी कर लेनी चाहिए ताकि जिंदगी सुरक्षित रहे। लेकिन पिता जी ने अपनी पुरानी जेब से कुछ मुड़े-तुड़े नोट निकालकर मेरे हाथ में रखे थे और सिर्फ इतना कहा था, “समीर, अपनी उड़ानों का हिसाब खुद रखना। जिंदगी में अगर छलांग लगानी हो तो जमीन की पकड़ मजबूत होनी चाहिए।”
मुंबई की तेज रफ्तार जिंदगी ने शुरुआती दिनों में मुझे बहुत सुनहरे सपने दिखाए। मैंने अपने एक दोस्त के साथ मिलकर कंप्यूटर हार्डवेयर और नेटवर्किंग की एक छोटी सी एजेंसी शुरू की। शुरुआती छह महीने ठीक रहे, लेकिन व्यापार के दांव-पेच और बाजार की बेईमानियों से मैं पूरी तरह अनजान था। अनुभव की कमी और गलत लोगों पर जरूरत से ज्यादा भरोसे ने मुझे ऐसा झटका दिया जिसकी मैंने कल्पना भी नहीं की थी। हमारे एक बड़े क्लाइंट ने लाखों का माल लेकर फर्म बंद कर दी और रातों-रात गायब हो गया। पार्टनर भी अपने हाथ खड़े करके किनारे हट गया।
देखते ही देखते मैं अस्सी हजार रुपये के भयंकर कर्ज में डूब गया। आज के दौर में शायद यह रकम बहुत बड़ी न लगे, लेकिन 2008 के उस दौर में, एक बेरोजगार और असफल लड़के के लिए यह रकम किसी पहाड़ जैसी थी। जिस साहूकार से मैंने बाजार से माल उठाने के लिए पैसे लिए थे, वह हर महीने तीन प्रतिशत का ब्याज वसूलता था। हर महीने की पहली तारीख मेरे लिए कयामत बनकर आती थी। मकान मालिक का किराया बाकी था, खाने के लिए डिब्बे वाले को देने के पैसे नहीं थे और फोन की घंटी बजते ही मेरी रीढ़ की हड्डी में सिहरन दौड़ जाती थी कि कहीं साहूकार का तकादा न हो।
मैं अंधेरी रात में अपने छोटे से कमरे की छत को घूरता रहता था। पंखे की धीमी आवाज मुझे किसी फांसी के फंदे की तरह डराती थी। आत्मग्लानि और शर्मिंदगी इस कदर हावी हो चुकी थी कि मैंने घर पर फोन करना बंद कर दिया था। मुझे लगता था कि मैं अपने परिवार का सबसे निकम्मा और असफल सदस्य हूं। सब आगे बढ़ गए थे और मैं अपनी ही बुनी हुई महत्वाकांक्षाओं के जाल में तड़प रहा था। जब इंसान खुद पर से भरोसा खो देता है, तो पूरी दुनिया उसे एक खाई नजर आने लगती है। मैंने अपने दोस्तों से मदद मांगी, पर जहां पैसे की बात आती, वहां सबने अपने दरवाजे बंद कर लिए। किसी ने कहा कि समय खराब है, तो किसी ने अपनी मजबूरियों का रोना रो दिया। उस भयानक अकेलेपन में मुझे समझ आया कि तालियां बजाने वाले बहुत होते हैं, लेकिन हाथ थामने वाला कोई नहीं होता।
एक दिन जब साहूकार के आदमियों ने मुझे सड़क पर रोककर जलील किया और सीधी धमकी दी कि अगर हफ्ते भर में मूलधन और ब्याज नहीं मिला तो वे घर पहुंच जाएंगे, उस रात मैं पूरी तरह टूट गया। मेरे पास कोई चारा नहीं बचा था। मैंने कांपते हाथों से पीसीओ से घर का नंबर मिलाया। संयोग से फोन पिता जी ने ही उठाया।
“हेलो, कौन?” उनकी वही जानी-पहचानी, भारी और गंभीर आवाज थी।
मैं कुछ बोल नहीं पाया। मेरी आंखों से आंसुओं की धार बह निकली और मेरे गले से सिर्फ एक सिसकी निकली।
पिता जी ने एक पल की खामोशी के बाद कहा, “समीर? बेटा, तू रो रहा है? क्या हुआ है?”
उस दिन मेरा सारा झूठा स्वाभिमान और बड़बोलापन ढह गया। मैंने हिचकियों के बीच सब सच कह दिया। मैंने बताया कि कैसे मैं बर्बाद हो चुका हूं, कैसे मुझ पर अस्सी हजार का कर्ज है और लोग मुझे जान से मारने या जलील करने की धमकियां दे रहे हैं। मैंने रोते हुए कहा, “पिता जी, मैं हार गया। मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई। मैंने आपका नाम मिट्टी में मिला दिया।”
दूसरी तरफ कई पलों तक सन्नाटा छाया रहा। मुझे लगा कि अब पिता जी मुझ पर टूट पड़ेंगे। वे कहेंगे कि मैंने पहले ही मना किया था, तूने हमारी नाक कटवा दी, अपने बड़े भाइयों को देख और उनसे सीख। मैं उन गालियों और तानों को सुनने के लिए खुद को तैयार कर रहा था, क्योंकि मुझे लगता था कि मैं उसी के लायक हूं।
लेकिन पिता जी की आवाज में कोई गुस्सा नहीं था। उसमें एक अजीब सा ठहराव और भारीपन था। उन्होंने बेहद शांत स्वर में कहा, “समीर, सांस ले। घबराने से कभी मुसीबतें खत्म नहीं होतीं। कल सुबह की ट्रेन पकड़ और घर आ जा।”
“लेकिन पिता जी, वो लोग मुझे ढूंढ रहे हैं…” मैंने डरते हुए कहा।
“मैंने कहा न, घर आ। जब तक तेरे बाप का साया तेरे सिर पर है, तुझे डरने की जरूरत नहीं है।” उन्होंने बस इतना कहा और फोन रख दिया।
अगले दिन जब मैं चौबीस घंटे का थकाऊ सफर तय करके घर पहुंचा, तो मेरे चेहरे की हवाइयां उड़ी हुई थीं। आंखें अंदर धंस चुकी थीं और दाढ़ी बढ़ी हुई थी। मुझे देखकर मां रो पड़ीं, पर पिता जी दालान में वैसे ही अखबार पढ़ रहे थे जैसे हमेशा पढ़ते थे। उन्होंने मुझे ऊपर से नीचे तक देखा, कोई सवाल नहीं किया। न यह पूछा कि पैसा कहां गंवाया, न यह पूछा कि पार्टनर ने क्या किया, और न ही किसी तरह का ताना मारा।
दोपहर में जब सब सो रहे थे, पिता जी ने मुझे अपने कमरे में बुलाया। उन्होंने अलमारी का ताला खोला और एक भूरे रंग का लिफाफा मेरे हाथ में रख दिया।
मैंने लिफाफा खोला तो उसमें नोटों की गड्डियां थीं। कुल अस्सी हजार रुपये।
मैं हैरान रह गया। हमारे परिवार की आर्थिक स्थिति कोई बहुत रईसों वाली नहीं थी। पिता जी एक साधारण सरकारी स्कूल के शिक्षक पद से रिटायर हुए थे। उनकी एक तय पेंशन आती थी, जिससे घर का खर्च और उनकी दवाइयां चलती थीं। मैंने कांपती आवाज में पूछा, “पिता जी, ये… ये इतने सारे पैसे आपके पास कहां से आए? आपने किससे उधार लिए?”
पिता जी ने चश्मा उतारकर मेज पर रखा और मेरी आंखों में देखा। उनकी आंखों में एक असीम दर्द था, लेकिन चेहरे पर गर्व का पर्दा था। वे बोले, “किसी से उधार नहीं लिया है। मैंने अपने जीपीएफ और पेंशन का कुछ हिस्सा बैंक में बंधक रख दिया है, कुछ फिक्स डिपॉजिट थे जो मैंने तुम्हारी शादी या जरूरत के लिए रखे थे, उन्हें तुड़वा दिया है।”
मेरे पैरों तले से जमीन खिसक गई। मुझे पता था कि एक सेवानिवृत्त शिक्षक के लिए उसकी पेंशन और जमा-पूंजी क्या मायने रखती है। वह उनका बुढ़ापे का एकमात्र सहारा थी, उनका आत्मसम्मान थी। मेरी नादानी और असफलता की कीमत मेरे बूढ़े पिता को अपना स्वाभिमान और अपनी सुरक्षा दांव पर लगाकर चुकानी पड़ रही थी।
मैं उनके पैरों में गिर पड़ा और फूट-फूट कर रोने लगा। “पिता जी, आपने यह क्या किया? आप मुझ पर इतने पैसे क्यों खर्च कर रहे हैं? मैं तो एक असफल इंसान हूं। मैंने आपका भरोसा तोड़ा है। आप मुझे डांटते क्यों नहीं? दो थप्पड़ क्यों नहीं मारते?”
पिता जी ने झुककर मुझे उठाया और अपने सीने से लगा लिया। यह शायद मेरी जिंदगी में पहला मौका था जब मैंने अपने पिता को रोते देखा था। उनके आंसू मेरी कमीज को भिगो रहे थे। उन्होंने मेरे कंधे थपथपाते हुए कहा, “समीर, मेरी जिंदगी की सबसे बड़ी कमाई कोई मकान, पेंशन या बैंक बैलेंस नहीं है। मेरी सबसे बड़ी कमाई तुम चारों बच्चे हो। अगर तुम ही टूट जाओगे, तो इस पैसे को बचाकर मैं क्या करूंगा? लोग क्या कहेंगे, इसकी फिक्र मत कर। व्यापार में घाटा हुआ है, तू चरित्र से नहीं गिरा है। गलतियां सबसे होती हैं, लेकिन जो गिरकर उठ खड़ा हो, वही मेरा बेटा है।”
उन्होंने मेरी पीठ पर हाथ फेरते हुए आगे कहा, “जा, सबसे पहले उन लोगों का कर्ज चुका और उनका हिसाब साफ कर। अपनी आत्मा पर किसी का कर्ज मत रहने देना। और याद रख, यह पैसा मैंने तुझे दान नहीं दिया है। यह मेरा तुझ पर किया गया निवेश है। मुझे ब्याज में पैसा नहीं चाहिए, मुझे तेरा आत्मसम्मान और तेरी सफलता वापस चाहिए। मुझे देखना है कि मेरा बेटा दुनिया से लड़कर अपनी जगह कैसे बनाता है।”
उस एक दोपहर ने मेरे पूरे अस्तित्व को झकझोर कर रख दिया। वह सिर्फ अस्सी हजार रुपये नहीं थे, वह मेरे पिता का मुझ पर किया गया वह अटूट विश्वास था जिसे दुनिया की कोई दौलत नहीं खरीद सकती थी। उस दिन मुझे समझ आया कि जब हम हारते हैं, तो सिर्फ हम अकेले नहीं हारते; हमारे साथ वे लोग भी हार जाते हैं जो हमारे भीतर छिपी संभावनाओं पर अपनी जिंदगी की बाजी लगा देते हैं। मैंने तय कर लिया कि अब मेरे पास थकने, रुकने या बहाने बनाने का कोई विकल्प नहीं बचा है।
मैं वापस मुंबई लौटा। सबसे पहले मैंने साहूकार का एक-एक पैसा ब्याज समेत उसके मुंह पर मारा और रसीद ली। उस दिन जो सुकून मुझे मिला, वह शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता था। उसके बाद मैंने एक छोटी सी आईटी कंपनी में मामूली तनख्वाह पर बतौर सेल्स एग्जीक्यूटिव काम करना शुरू किया। मैं दिन में बारह-चौदह घंटे काम करता। जिन रास्तों पर मैं पहले जाने से कतराता था, वहां भरी दोपहर में पैदल चलकर क्लाइंट्स से मिलता। मैंने अपने कंफर्ट जोन की हर दीवार को तोड़ दिया। न कोई रविवार था, न कोई छुट्टी। मेरे दिमाग में सिर्फ एक ही चेहरा घूमता था—अपने बूढ़े पिता का चेहरा, जो बिना किसी शिकायत के हर महीने कटकर आने वाली पेंशन के सहारे मुस्कुराते हुए जी रहे थे।
मेहनत कभी बेकार नहीं जाती। तीन साल के भीतर मुझे कंपनी में बेस्ट परफॉर्मर का अवॉर्ड मिला और फिर मुझे एक मल्टीनेशनल फर्म में सीनियर कंसलटेंट के पद पर बड़ा अवसर मिला। मेरी आर्थिक स्थिति सुधरने लगी। मैंने सबसे पहले बैंक जाकर पिता जी की गिरवी रखी पेंशन को छुड़वाया और उनका पूरा पैसा उनके खाते में ब्याज सहित जमा कराया। जब मैंने बैंक की नई पासबुक ले जाकर पिता जी के हाथ में रखी, तो उन्होंने पासबुक को देखा भी नहीं। उन्होंने बस उसे एक तरफ रख दिया और मेरा हाथ पकड़कर बोले, “मुझे इस पैसे की कभी चिंता नहीं थी समीर, मुझे तो बस उस दिन का इंतजार था जब तू अपनी नजरें उठाकर मुझसे बात कर सके। आज तू जीत गया।”
समय का पहिया अपनी गति से घूमता रहा। साल बीतते गए। मैं अपनी जिंदगी में पूरी तरह स्थापित हो गया। मैंने अपना घर बनाया, शादी हुई, बच्चे हुए। पर पिछले पांच सालों से जब पिता जी का शरीर ढलने लगा और वे बिस्तर पकड़ने लगे, तो मैंने तय किया कि अब मुझे उनके पास ही रहना है। बड़े भाई-बहनों ने कहा कि उन्हें किसी अच्छे केयरटेकर के सहारे छोड़ दिया जाए, लेकिन मैं नहीं माना। मैंने अपनी कंपनी से वर्क-फ्रॉम-होम का विकल्प चुना और पिता जी के कमरे में ही अपना वर्कस्टेशन बना लिया।
मुझे उनके अंतिम समय तक उनकी सेवा करने का, उन्हें अपने हाथों से दवाइयां देने का, उनके पुराने किस्से सुनने का और उनके पैरों को दबाने का मौका मिला। वे अक्सर मुझे देखते और बिना कुछ कहे मुस्कुरा देते। उनकी उस मुस्कान में मेरे लिए पूरी कायनात का आशीर्वाद समाया होता था।
चार दिन पहले, जब उन्होंने अंतिम सांस ली, तो उनका हाथ मेरे ही हाथ में था। उनके चेहरे पर किसी तरह की बेचैनी या शिकायत नहीं थी, बल्कि एक गहरा, शांत संतोष था—एक ऐसे पिता का संतोष जिसने अपनी औलाद को दुनिया के थपेड़ों से बचाकर एक मजबूत इंसान बना दिया था।
आज जब मैं उनके खाली कमरे में खड़ा हूं, तो मुझे महसूस होता है कि इंसान शारीरिक रूप से भले ही चला जाए, लेकिन उसके दिए हुए संस्कार, उसका भरोसा और उसकी सीख कभी नहीं मरती। पिता एक ऐसा वटवृक्ष होते हैं जो खुद धूप में तपते रहते हैं ताकि उनकी संतानें छांव में सुकून से सांस ले सकें। उन्होंने मुझे केवल कर्ज से बाहर नहीं निकाला था, उन्होंने मुझे जीवन जीने का हौसला दिया था। उन्होंने मुझे सिखाया कि विपरीत परिस्थितियों में घुटने टेक देना सबसे आसान काम है, लेकिन उन परिस्थितियों की आंखों में आंखें डालकर खड़े रहना ही असली पुरुषार्थ है।
मैं जानता हूं कि अब जब भी मेरी जिंदगी में कोई मुश्किल आएगी, जब भी कोई अंधेरा मुझे घेरने की कोशिश करेगा, तो मुझे पीछे मुड़कर देखने की जरूरत नहीं होगी। मेरे पिता का वह मूक भरोसा, उनका वह हाथ जो मेरी पीठ पर था, हमेशा एक अदृश्य शक्ति बनकर मुझे गिरने से पहले संभाल लेगा। जीवन का असली टर्निंग प्वाइंट कोई बड़ी लॉटरी या अचानक मिली कामयाबी नहीं होती, बल्कि वह मोड़ होता है जहां कोई अपना आपके टूटे हुए वजूद पर बिना किसी शर्त के यकीन कर लेता है।
एक पिता का प्यार अक्सर खामोश होता है, वह मां की तरह आंसुओं में नहीं बहता, बल्कि चुपचाप अपनी कुर्बानियों से औलाद के भविष्य की नींव मजबूत करता है। क्या आपने भी कभी अपने जीवन में किसी अपने का ऐसा निस्वार्थ भरोसा और त्याग महसूस किया है जिसने आपकी डूबती हुई कश्ती को किनारा दिखा दिया हो? अपनी अनमोल यादें और विचार नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।
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