घूंघट की मर्यादा

सच ही तो है, किसी भी कुल की असली मर्यादा और इज्जत बहू को चारदीवारी और भारी पर्दों में कैद करने से नहीं बचती। मर्यादा तब बचती है जब बहू को पराए घर की अमानत समझने के बजाय उसे अपनी कोख से जन्मी बेटी जितना स्नेह और सम्मान दिया जाए। जब किसी बहू को ससुराल में मायके जैसी सुरक्षा, बराबरी और अपनापन मिलता है, तो वह पूरे परिवार को अपनी जान से भी ज्यादा संभालकर रखती है। अगर सोच में यह छोटा सा बदलाव आ जाए, तो न किसी मां-बाप को बुढ़ापे में वृद्धाश्रम की वीरान दहलीज देखनी पड़ेगी और न ही किसी बहू को घुट-घुट कर अलग आशियाना तलाशना पड़ेगा।

 मनोरमा देवी अपने उसूलों की पक्की थीं। उनकी नजर में एक आदर्श बहू वही थी, जो सुबह चार बजे उठे, गाय के खुर छूकर दिन की शुरुआत करे, घुटनों तक का लंबा घूंघट ताने और किसी गैर मर्द की परछाई तक से अपनी नजरें चुरा ले। उनके ठीक सामने वाले घर में रहती थीं यशोदा जी। दोनों के परिवारों का नाता तीन दशक पुराना था। कभी जब यशोदा जी के पति असमय चल बसे थे, तब मनोरमा जी और उनके परिवार ने आगे बढ़कर उनका संबल बांधा था। दोनों घरों के आंगन भले अलग थे, पर सुख-दुख की सांझ अक्सर एक साथ कटती थी। मगर इस गहरे जुड़ाव के बीच एक बुनियादी फर्क था—यशोदा जी अपने विचारों से वक्त के साथ बहने वाली इंसान थीं, जबकि मनोरमा देवी वक्त की सुइयों को पचास साल पीछे रोक कर रखना चाहती थीं।

यशोदा जी के इकलौते बेटे मानस ने जब बेंगलुरु की एक मल्टीनेशनल कंपनी में डेटा एनालिस्ट के रूप में काम करने वाली अवनि से विवाह किया, तो मनोरमा जी की पेशानी पर बल पड़ गए। अवनि तेज-तर्रार, आत्मनिर्भर और अपने काम को पूरी निष्ठा से जीने वाली लड़की थी। वह जींस-कुर्ता पहनती, कंधे पर लैपटॉप बैग लटकाकर तेज कदमों से अपनी स्कूटी स्टार्ट करती और दफ्तर के लिए निकल जाती। मोहल्ले के बुजुर्गों को नमस्ते करते वक्त उसके होंठों पर सच्ची मुस्कान होती, पर उसके सिर पर पल्लू नहीं ढलता था। बस यही बात मनोरमा जी के गले की फांस बन गई। जब भी अवनि घर से बाहर कदम रखती, मनोरमा जी अपने चबूतरे से आवाज कसतीं, “अरे यशोदा, ये शहर की छोकरी तेरे कुल का नाम मिट्टी में मिलाकर दम लेगी। न ढंग से साड़ी बांधना आता है, न चाल-चलन में कोई लिहाज है। ऐसी फूहड़ चाल और हवा में उड़ते बाल देखकर कोई भला इंसान कहेगा कि यह किसी शरीफ खानदान की बहू है? अरे, बहू तो घर की दहलीज की लक्ष्मी होती है, उसे पर्दे में रखा जाता है, ऐसे सड़कों पर नुमाइश की तरह घुमाया नहीं जाता।”

यशोदा जी हर बार अपनी चाय का प्याला मेज पर रखतीं और बहुत शांति से मुस्कुरा देतीं। वह कहतीं, “मनोरमा, संकोच और मर्यादा कपड़ों के धागों में नहीं, इंसान की नीयत और दिल के ठहराव में होती है। मेरी अवनि सुबह निकलने से पहले मेरी दवाइयों की पर्ची खुद संभालती है, घर के हर सदस्य की पसंद-नापसंद का ख्याल रखती है। अगर वह अपनी मेहनत से अपनी पहचान बना रही है और दुनिया के सामने सिर उठाकर चल रही है, तो मुझे उस पर गर्व है। जिस घर में बेटी की तरह बहू को खुलकर सांस लेने की इजाजत हो, उसी घर में खुशियों का वास होता है। तुम भी अपनी नई बहू को जरा खुला आसमान दो, देखना घर में कितना सुकून आ जाएगा।” लेकिन मनोरमा जी झल्लाकर अपना पल्लू झटक देतीं और कहतीं, “तूने तो बिगाड़ रखा है उसे, देखना किसी दिन सिर धुनकर रोएगी।”

मनोरमा जी ने अपने बेटे निखिल के लिए गांव से एक संकोची और पारंपरिक लड़की चुनी थी—वंदना। वंदना को शादी के पहले दिन से ही सिखाया गया कि सास के सामने बोलना गुनाह है, पांव से लेकर सिर तक ढका होना चाहिए और दिन-रात रसोई के धुएं में खप जाना ही उसका परम धर्म है। मनोरमा जी को लगता था कि उन्होंने अपने घर में असली संस्कारी बहू लाकर यशोदा को दिखा दिया है कि घरानेदार औरतें कैसी होती हैं। लेकिन जिस घूंघट के नीचे उन्होंने अपनी सत्ता चला रखी थी, उसी घूंघट की ओट में एक गहरा आक्रोश और असंतोष धीरे-धीरे पक रहा था। वंदना हर दिन घुटती जा रही थी। उसे अपनी सास की हर बात में रोक-टोक, हर कदम पर ताने और चौबीसों घंटे की पहरेदारी एक जेल जैसी लगने लगी थी। बेटे निखिल पर काम का दबाव था और वह घर में मां और पत्नी के बीच पिसता रहता था।

वक्त का पहिया घूमा और धीरे-धीरे मनोरमा जी के शरीर ने जवाब देना शुरू कर दिया। घुटनों के दर्द और बढ़ती उम्र ने उनकी रफ्तार धीमी कर दी। अब वे घर के कामों में हाथ बंटाने के बजाय बस हुकुम चलातीं, जो वंदना को बर्दाश्त नहीं होता था। आए दिन चूल्हे-चौके से लेकर बैठक तक कलह के सुर गूंजने लगे। जिस बेटे पर मनोरमा जी को अटूट भरोसा था, उसने भी मानसिक तनाव से बचने के लिए अपनी आंखें और कान बंद कर लिए। घर का माहौल इतना विषाक्त हो चुका था कि एक दिन बात हाथ से निकल गई।

एक दोपहर, जब तेज गर्मी से सड़कें वीरान थीं, यशोदा जी के घर का दरवाजा खुला और अवनि अंदर दाखिल हुई। उसके चेहरे पर एक गहरी चमक थी। उसने यशोदा जी को गले लगाते हुए कहा, “मां, हमारी मेहनत रंग लाई। मैंने अपनी पुरानी बचत और इस महीने के बोनस को जोड़कर आपके लिए चार धाम की तीर्थयात्रा की पूरी बुकिंग फाइनल कर दी है। आप हमेशा कहती थीं ना कि पिताजी की इच्छा थी आपको बद्रीनाथ और केदारनाथ के दर्शन कराने की, बस अब आपकी वह मुराद पूरी होने वाली है।” यशोदा जी की आंखों से खुशी के आंसू छलक पड़े। उन्होंने अपनी बहू के माथे को चूम लिया और कहा, “अवनि, तूने आज सच में मुझे जीवन का सबसे बड़ा सुख दे दिया। पर बेटी, यह खुशखबरी जरा मनोरमा को भी तो सुना आएं। वह भी तो सालों से तीर्थ जाने की बातें करती थी, उसका भी दिल बहल जाएगा।”

अवनि हाथ में मिठाई का डिब्बा लिए जैसे ही मनोरमा जी के घर की दहलीज पर पहुंची, अंदर से आ रही तीखी आवाजों ने उसके कदम थाम लिए। बैठक के भीतर वंदना अपने घूंघट को पूरी तरह उतारकर अपनी सास पर चिल्ला रही थी, “बस बहुत हो गया आपका यह रोज का ताना और बंदिशें! मुझसे अब आपकी यह चौबीस घंटे की चाकरी नहीं होती। अगर इस घर में मुझे रहना है, तो यह बुढ़िया यहां नहीं रहेगी। निखिल, तुम साफ सुन लो, या तो अपनी मां को किसी वृद्धाश्रम भेजो या फिर मैं इस घर को छोड़कर मायके जा रही हूं और तुम पर प्रताड़ना का केस ठोक दूंगी।” निखिल बेबसी और लाचारी से सिर झुकाए कोने में खड़ा था। और सामने, जिस मनोरमा देवी की आवाज से कभी पूरा मोहल्ला कांपता था, वे आज जमीन पर बैठी, अपने घुटनों को सीने से चिपकाए जार-जार रो रही थीं। उनकी आंखों के सामने उनका पूरा संसार ढह चुका था। जिस घूंघट को उन्होंने संस्कारों की ढाल समझा था, उसी ने आज उनके स्वाभिमान की धज्जियां उड़ा दी थीं। निखिल का हाथ एक आश्रम के ब्रोशर पर था, जिसे वह भारी मन से देख रहा था।

अवनि ने चुपचाप कमरे में कदम रखा। मनोरमा जी ने जब उस ‘मॉडर्न’ लड़की को अपने सामने देखा, तो उनका रोना और फूट पड़ा। वे सिसकते हुए बोलीं, “अवनि… देख ले अपनी इस चाची का हाल। जिस बहू को घूंघट में रखकर खानदान की नाक समझा, आज वही मुझे दूध की मक्खी की तरह फेंकने पर आमादा है। और मेरा बेटा… जिसके लिए मैंने अपनी जवानी कुर्बान कर दी, वह मुझे आश्रम भेजने की कागजी तैयारी कर रहा है। मैं तो तुझे जींस में देखकर कुलटा और संस्कारहीन समझती थी, पर आज तू अपनी सास को तीरथ भेजने का सपना पूरा कर रही है और मैं तीरथ की उम्र में अनाथालय जैसी जगह जाने के लिए धकेली जा रही हूं।”

अवनि तुरंत आगे बढ़ी, उसने मनोरमा जी के कांपते हाथों को थामा और उन्हें उठाकर सोफे पर बिठाया। अवनि की आवाज में गजब का ठहराव और आत्मविश्वास था। उसने कहा, “चाची जी, आप कहीं नहीं जा रही हैं। जिस वृद्धाश्रम में आपको भेजने की बात हो रही है, मैं उस ट्रस्ट के सलाहकार बोर्ड में हूं। समाज की सेवा करना अलग बात है, पर किसी भरे-पूरे परिवार की मां को वहां जाने देना मेरे संस्कारों में नहीं है। और दूसरी बात, आप वृद्धाश्रम नहीं, बल्कि मां के साथ चार धाम की यात्रा पर जा रही हैं। टिकट दो लोगों का ही बुक हुआ है।”

मनोरमा जी अविश्वास से अवनि को देखने लगीं, “क्या कह रही है तू? मैं… और तेरे पैसों से तीरथ जाऊं? मैंने तो तुझे हमेशा बुरा-भला कहा, तेरे कपड़ों पर उंगली उठाई…”

अवनि ने बहुत शालीनता से जवाब दिया, “चाची जी, जब मेरे ससुर जी इस दुनिया से गए थे, तब मां अकेली थीं। उस मुश्किल वक्त में आपने अपनी जमा-पूंजी से बिना किसी ब्याज के मां की मदद की थी और रात-दिन उनके साथ खड़ी रही थीं। उस एहसान का कर्ज मां आज तक नहीं भूलीं। मां हमेशा कहती हैं कि मनोरमा दीदी का सपना है बद्रीनाथ धाम जाने का। यह टिकट कोई दान नहीं है, यह उस पुराने अपनेपन का आभार है। कपड़ों से संस्कार नहीं नापे जाते चाची जी, संस्कार तो संकट के समय अपनों का हाथ थामने में होते हैं। आप बस अपनी पैकिंग शुरू कीजिए, बाकी घर की उलझन मुझ पर छोड़ दीजिए।”

मनोरमा जी का गला भर आया। उन्होंने अवनि को कसकर अपने सीने से लगा लिया। उनके आंसुओं ने अवनि के उस आधुनिक कुर्ते को भिगो दिया, जिसे वे कभी नफरत की नजर से देखती थीं।

अगले ही दिन यशोदा जी और मनोरमा जी दोनों अपनी तीर्थयात्रा के लिए रवाना हो गईं। स्टेशन पर उन्हें छोड़ते वक्त मनोरमा जी की आंखों में पश्चाताप और मुक्ति दोनों के आंसू थे। अब बारी थी घर की उस कड़वाहट को दूर करने की, जो निखिल और वंदना के बीच दीवार बनकर खड़ी थी। अवनि सीधे उनके घर पहुंची। निखिल और वंदना अपने भविष्य को लेकर उलझन में बैठे थे।

अवनि ने सीधे सोफे पर बैठकर वंदना की आंखों में देखा और बहुत सहज लहजे में कहा, “भाभी, मैं आपकी पीड़ा समझती हूं। किसी भी नई लड़की के लिए एक ऐसे माहौल में खुद को ढालना बहुत मुश्किल होता है जहां हर बात पर पाबंदी हो। आपको लगा कि सास को हटा देने से आपकी जिंदगी में आजादी आ जाएगी? लेकिन क्या आपने कभी व्यावहारिक पहलू सोचा है? चाची जी को मिलने वाली स्वर्गीय चाचा जी की पारिवारिक पेंशन ही इस घर के राशन और दवाओं का आधा खर्च उठाती है। निखिल भैया की नौकरी में जो मंदी चल रही है, उसे संभालने में वह पेंशन ही सबसे बड़ा सहारा है। अगर चाची जी आश्रम चली गईं, तो कानूनी रूप से वह पेंशन सीधे उनके आश्रम के खाते में ट्रांसफर होगी, यहां आपको एक फूटी कौड़ी नहीं मिलेगी। इसके अलावा, समाज में जो बदनामी होगी और कोर्ट-कचहरी के जो चक्कर कटेंगे, क्या आपका यह घर उस तनाव को झेल पाएगा?”

निखिल ने चौंककर अवनि की तरफ देखा, उसने इस पहलू पर कभी सोचा ही नहीं था। वंदना का चेहरा भी सफेद पड़ गया। अवनि ने फिर वंदना का हाथ पकड़ा और नर्म आवाज में बोली, “भाभी, आजादी घूंघट फेंकने या बुजुर्गों को बेघर करने से नहीं मिलती। आजादी तब मिलती है जब आप अपने अधिकारों के साथ अपनी जिम्मेदारियों का संतुलन बनाना सीख जाएं। चाची जी पुरानी सोच की हैं, उनका जमाना अलग था। उन्होंने जो देखा, वही आपको सिखाने की कोशिश की। अगर वे गलती पर थीं, तो उन्हें प्यार से समझाया जा सकता था, न कि इस तरह अपमानित करके। सास को अगर आप मां का दर्जा नहीं दे सकतीं, तो कम से कम एक बुजुर्ग के रूप में उनकी गरिमा का सम्मान तो कर ही सकती हैं। जब वे लौटकर आएं, तो उन्हें बदलिए मत, बस उन्हें यह अहसास दिलाइए कि यह घर जितना उनका है, उतना ही आपका भी है।”

अवनि की यह स्पष्ट, तार्किक और संवेदनशील बातें वंदना के दिल में उतर गईं। उसे अपनी गलती का गहरा अहसास हुआ कि उसने गुस्से में आकर पूरे परिवार को बर्बादी की कगार पर ला खड़ा किया था। निखिल ने भी माना कि उसने दोनों के बीच संवाद का पुल बनने के बजाय कायरों की तरह सिर्फ पल्ला झाड़ने की कोशिश की थी।

पंद्रह दिनों की पावन यात्रा के बाद जब यशोदा जी और मनोरमा जी वापस लौटीं, तो मोहल्ले का नजारा बदला हुआ था। जैसे ही मनोरमा जी ने अपने घर की चौखट पर कदम रखा, वंदना ने आगे बढ़कर उनके चरण छुए। इस बार उसके सिर पर हल्का सा पल्लू था, लेकिन चेहरे पर कोई घूंघट या नफरत नहीं थी। उसने अपनी सास को गले लगाया और आंखों में आंसू भरकर अपनी पुरानी गलतियों की माफी मांगी। मनोरमा जी ने भी अपनी बहू को सीने से भींच लिया। तीर्थयात्रा के दौरान यशोदा जी के सानिध्य और अवनि के त्याग ने मनोरमा जी की आंखें पूरी तरह खोल दी थीं।

उस दिन के बाद से शांति कुटीर की फिजां हमेशा के लिए बदल गई। अब मनोरमा जी अपनी बहू पर बात-बात पर घूंघट खींचने का दबाव नहीं बनाती थीं, बल्कि अगर वंदना से कोई चूक हो जाती, तो वे खुद आगे बढ़कर उस पर ममता का पर्दा डाल देती थीं। उधर वंदना भी अपनी सास की हर छोटी-बड़ी जरूरत का ख्याल एक सगी बेटी की तरह रखने लगी। जिस घर में कल तक कलह की चीखें गूंजती थीं, आज वहां हंसी के फव्वारे छूट रहे थे।

एक दिन शाम को जब अवनि अपने दफ्तर से थकी-हारी लौटी, तो मनोरमा जी अपने चबूतरे पर बैठी थीं। उन्होंने अवनि को देखा, अपनी छड़ी उठाई और मुस्कुराते हुए उसके पास आईं। उन्होंने अवनि के कंधे पर हाथ रखा और कहा, “बेटी, आज समझ आया कि असली पर्दा तो आंखों और सोच पर होना चाहिए ताकि हम किसी की बुराई न देख सकें। तूने न सिर्फ मेरी गृहस्थी बचाई, बल्कि मुझे एक इंसान के तौर पर दोबारा जन्म दिया। तूने साबित कर दिया कि संस्कार कपड़ों से नहीं, कर्मों की पवित्रता से पहचाने जाते हैं।” अवनि ने झुककर उनके पांव छुए और मनोरमा जी ने उसे दिल से ढेरों दुआएं दीं।

सच ही तो है, किसी भी कुल की असली मर्यादा और इज्जत बहू को चारदीवारी और भारी पर्दों में कैद करने से नहीं बचती। मर्यादा तब बचती है जब बहू को पराए घर की अमानत समझने के बजाय उसे अपनी कोख से जन्मी बेटी जितना स्नेह और सम्मान दिया जाए। जब किसी बहू को ससुराल में मायके जैसी सुरक्षा, बराबरी और अपनापन मिलता है, तो वह पूरे परिवार को अपनी जान से भी ज्यादा संभालकर रखती है। अगर सोच में यह छोटा सा बदलाव आ जाए, तो न किसी मां-बाप को बुढ़ापे में वृद्धाश्रम की वीरान दहलीज देखनी पड़ेगी और न ही किसी बहू को घुट-घुट कर अलग आशियाना तलाशना पड़ेगा।

परिवार की नींव ईंट-पत्थरों से नहीं, बल्कि एक-दूसरे के प्रति समझ, सम्मान और संवेदना से मजबूत होती है। अपनी सोच के दायरों को बदलिए, घर खुद-ब-खुद स्वर्ग बन जाएगा।

इस कहानी और अवनि के इस कदम के बारे में आपकी क्या राय है? क्या आपको भी लगता है कि कपड़ों और दिखावे से परे इंसान के विचार और कर्म ही उसके असली संस्कार तय करते हैं? अपने विचार कमेंट बॉक्स में लिखकर जरूर बताएं।

अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो लाइक, कमेंट और शेयर करें अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें , धन्यवाद।

error: Content is protected !!